Thursday, December 30, 2010

मुझको वह बचपन दे दो

सम्‍मुख तम की लाली
मार्ग मेरा खाली
मेरी मृत्‍यु होने वाली है
मुझको वह बचपन दे दो।
मनचाहा तर्पण दे दो
आत्‍म दिखे दर्पण दे दो
बाल्‍यकाल अर्पण कर दो
मुझको वह बचपन दे दो।
न मुझको तुम आयु दो
शक्ति न स्‍नायु दो
मनचाही बस वायु दो
मुझको वह बचपन दे दो।
हे राम! कहूं किलकारी से
लडखडाती वाणी से
पर मृत्‍यु दो मुझे बारी से
मुझको वह बचपन दे दो।
दो मां के आंचल की छांव
प्रथम पर मुख दूजे पर पांव
पिता की गोद जो लागे नांव
मुझको वह बचपन दे दो।
मन मेरा तब शुद्व था
क्षोभ, लोभ न क्रुद्व था
निर्बल-दुर्बल पर बुद्व था
मुझको वह बचपन दे दो।

Friday, December 24, 2010

सहर

ख्‍वाबों में तुम, लबों पर रूबाई है

हर नज्‍म लिखने से पहले तुम्‍हें सुनाई है

वक्‍त की मजार पर पूछ रहा हूं खुद से

ऐ खुदा तुझे मुझसे क्‍या रूसवाई है

चलो फिर आम की बागों में गुम हो जाएं

सडकों पर तो लूट और जगहंसाई है

उसने प्‍यार-मोहब्‍बत सब दिया टुकडों में

मैं खुद में शहर हूं, फिर भी तन्‍हाई है।

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Monday, December 6, 2010

खामोश साज हो तुम

बदलते वक्‍त की आवाज हो तुम
जो खामोशी में गूंजे वो साज हो तुम
किस बवंडर में जा उलझे हो यार
सच बताओ क्‍यों आज उदास हो तुम
कभी तुमने भरोसा न किया हम पर
फिर भी मेरे लिए लाजवाब हो तुम
कि सुबह की तलाश में जागा हूं रातभर
कि गुनगुनी शबनम सा एहसास हो तुम।
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Wednesday, November 24, 2010

बिहार चाहे विकास

बिहार में नीतीश कुमार की जीत को आम जीत न कहें तो बेहतर है। यह जीत दर्शाती है कि बिहार की जनता को अब बारुद की गमक और बंदूक व लाठी की गूंज नहीं, विकास पथ की दरकार है। नीतीश के जरिए उसे उन्‍नत राज्‍य चाहिए। सपाट सडकों पर तरक्‍की भरी रफ्तार चाहिए। बिहार के लोगों को अब नया बिहार चाहिए।

Wednesday, November 3, 2010

पढ लेते तो पत्रकार न होते

सच कह रहा हूं। मन में आजकल ऐसे ही विचार आते हैं कि पढ लेते तो पत्रकार न होते। तब पिता जी की बात क्‍यों नहीं सुनी जब वे किताब थमाने के लिए बेचैन रहते थे। इंटर में आने के बाद वे सरकारी
नौकरी का फार्म भरने को कहते थे। मगर आदत से मजबूर हम फिर कोताही कर बैठे। आज पछता रहे हैं। दीपावली में सभी अपने घर जा रहे हैं और हम खबर बना रहे हैं। सच कहूं पेशा तो यह अच्‍छा है
मगर पैसा नहीं है। ये थी मेरी और मेरे साथी पत्रकारों की दर्द भरी दास्‍तां। अब सुनिए मेरे एक मित्र का हाल, जो पढने में अव्‍वल नहीं थे लेकिन आज उनसे बडा पारिवारिक सफल कोई नहीं। सुकून की जिंदगी जीते हैं। घर की शादी में भी नाचते हैं और पडोसी की शादी में भी धूम मचाते हैं। दरअसल, इसका कारण साफ है कि उन्‍होंने अपने पिता जी की बात सुन ली थी। उन्‍होंने किताबों से दिल लगाते हुए सरकारी नौकरी का फार्म भर दिया था। नतीजा, वही मनचाही जिंदगी जी रहे हैं। जब इच्‍छा होती है छुट्टी ले लेते हैं। घर पर जाने के लिए ज्‍यादा सोचना नहीं पडता। मजे से जिंदगी काट रहे हैं। वहीं, हम उन्‍हें देख के ललचा रहे हैं। काश, हम भी सरकारी दामाद बन जाते। कम से कम दीपावली में घर तो जा पाते। किसी भी शहर में जाना होता तो हरा-हरा नोट दिखाते और ट्रांसफर करा लेते। मगर अब तो जिंदगी बदल सी गई है। सच है साथियों जो जीवन में ज्‍यादा पढाई नहीं करता वो पत्रकार बनने के बाद पूरे जीवन पढाई ही करता रहता है। जिंदगी जीने की जद्दोजहद ही करता रहता है। अपना मन मारता रहता है और दूजों के हक के लिए लडता रहता है। तो अंत में यही कहूंगा, पढ लो मेरे यार मत बनना पत्रकार।

Monday, November 1, 2010

हंगामा है क्‍यों बरपा थोडी सी जो रंग ली है


चारों तरफ चर्चा है कि रुडकी इंजीनियरिंग कॉलेज में बडा गडबड हुआ है। लडकों ने लडकियों के होठों को अनोखे तरह से रंग जो दिया है। भइया, कोई ज्ञानी जरा इतना बताए इसमें हर्ज क्‍या है? चर्चा करने का अधिकार मीडिया के माध्‍‍यम से समाज के ठेकेदारों को कबसे मिल गया। इस रोमांटिक विष‍य पर चर्चा का अधिकार सिर्फ उन छात्र-छात्राओं के घरवालों को है। यदि उन्‍‍हें दिक्‍‍कत है तो दिक्‍‍कत जताने दो नहीं तो शांत हो जाओ ठेकेदारों, जवानी को जीने दो। न जाने क्‍‍या हंगामा सा बरपा रखा है थोडी सी जो रंग ली है।

हद है यार, किसी को अपने मन की आजादी ही नहीं देते। यदि कोई अपना होंठ अपने किसी प्रिय के होठों में दबी लिपिस्टिक से लाल करवा रहा है तो तुम्‍‍हें काहे की दिक्‍कत मजा करने दो उन्‍हें। अरे दिन-रात मेहनत करके उक्‍त कालेज में दाखिला पाने की मेहनत उन्‍होंने की है। अब जीवन जीने का तरीका दुनिया सिखाएगी। सच बताओ, समाज के ठेकेदारों उस तस्‍‍वीर को देखते ही पर्सनल फोल्‍डर में सेव किया की नहीं। किया न, अब जबान पर ताला लग गया। जवाब दो। खैर, अब ये बताओ कि उन्‍‍होंने गलती क्‍‍या की। जरा-जरा सी बात पर लोगों को परेशान करना। उनके उडते मन को पिंजडे में बांधना। ये सब करने से मिलता क्‍‍या है? कभी तुमने किसी लडकी को गलत निगाह से नहीं देखा। देखा होगा। नहीं देखा तो मामला संगीन कहूंगा। मेरे ठेकेदार भाइयों दुनिया को बदलने दो। मन की शांति जिसमें मिले लोगों को वही करने दो। न जाने क्‍‍या हंगामा सा बरपा रखा है, जो थोडी सी रंग ली है। जिसको बुरा लगे वो कमेंट दे सकता है। कोई कमेंट नहीं हटाउंगा। सबको बोलने का अधिकार है मेरे राज में।

Saturday, October 30, 2010

बीसीसीआई इतना खेल क्‍यों कराती है


दुनिया में तरह-तरह के लोग हैं। किसी को कुछ भी समझ में ही नहीं आता। किसी को हद से ज्‍यादा समझदार होने की बीमारी होती है। शायद समझदारी और बेवकूफी का मिलन यही है। खैर, इन बातों से हटकर खबरों पर चर्चा करें तो बेहतर होगा। इन दिनों मैं तंग आ गया हूं, खेल से। बिन बातों के मेल से। हर रोज कभी क्रिकेट वनडे तो कभी टेस्‍ट मैच। अरे बीसीसीआई को हुआ क्‍या है, इतना खेलने की जरूरत क्‍या है। क्रिकेट प्रेमियों के लगाव की परीक्षा लेने पर तुला हुआ है। हर रोज एक नई सीरीज। हद है बीसीआई।

अरे भारतीय क्रिकेटरों को चूस लोगे क्‍या? पहले की तरह खेल क्‍यों नहीं कराते। सिर्फ जाडे के मौसम में। हाफ स्‍वेटर पहनकर खिलाडी जब मैदान में उतरते थे तो बच्‍चे से लेकर बूढों तक में दिलचस्‍पी की गर्मी जाग जाती थी। अब इतना खेल होने लगा है कि लोग सिर्फ सुर्खियों को पढना ही दिलचस्‍पी कहते हैं। जिसे देखो वो यही कहता है कि हद है यार, 'इतना मैच होता है कि मन फट सा गया है।'

ये तो हुई लोगों की बात। अब मेरी सुनिए........

क्रिकेट के खेल से बचपन में दिलचस्‍पी नहीं थी। बडा हुआ तो दोस्‍तों को क्रिकेट खेलते देखा और पापा से जिद करके बैट मंगवा लिया। फिर क्‍या था, होने लगी बल्‍ले की सीनाजोरी। रनों के लिए भागा-दौडी। मजा आता गया और हम रमते चले गए। इसी बीच कहीं से साहित्‍य ने घेर लिया। किताबों ने ऐसा घेरा कि बल्‍ला घर के कोने में और गेंद बेड के नीचे कहीं धूल में खो गए। किताबों की संख्‍या बढती गई और खेल से दिल हट गया। दोस्‍तों ने बुलाया तो ठेंगा दिया। कहा, जाओ यार नई नॉवेल लाए हैं। उसे पढकर आज ही खत्‍म करेंगे। मगर जब बात जीवन में कुछ करने की आई तो पत्रकारिता में आ गए। इस जगत में काफी उठा-पटक के बाद जो मिली वो थी अदद सी नौकरी। खूब मजा आया, अब शब्‍दों से खेलते चले गए। मगर शब्‍दों के इस खेल ने मुझे पहुंचा दिया स्‍पोर्ट्स की खबरों के बीच। अब समस्‍या सताने लगी कि बचपन में खेल से दिल क्‍यों नहीं लगाया। कम से कम कुछ जानकार तो होता। मगर अब पछताए होत क्‍या जब चिडिया चुग गई खेत। खैर, हारना मेरा काम नहीं। इस शब्‍द को अपने शब्‍दकोश में मैंने रखा ही नहीं है। मैं सभी खेलों की जानकारी चाह रहा हूं। अब दिनरात खेल के बारे में पढ रहा हूं। इसीलिए कहा जाता है कि हर चीज से दिल लगाओ। जीवन को छोटा ही सही मगर खुलकर जी जाओ। इसीलिए खूब खेलो और पढो। वैसे, बीसीसीआई इतना मैच क्‍यों कराती है? क्रिकेट प्रेमियों को इतना क्‍यों सताती है?



Thursday, October 28, 2010

झगडा करती रहती है

अजीब बात पर लडती है
फिर भी खूब अकडती है
जब बात कहूं कुछ प्‍यार भरी
तो मुझ पर हंस पडती है
मैं तंग हूं उस नादां से
वो मुझको उल्‍लू कहती है
जब डपट पडूं किसी बात पर मैं
तो वो चुप-चुप रहती है
छा जाए सन्‍नाटा सा
फिर वो खुदबुद-खुदबुद करती है
मैं जब घुटनों पर गिर पडता हूं
तो फिर वो लल्‍लू कहती है
न जाने क्‍या वो सोच रही
वो हर पल को बस नोंच रही
वो मुझसे जीने को कहती है
पर किसी दुख को सहती है
खुलकर कह दो सारी बात
बस इतनी अभिलाषा है
जीवन तो है बडा मधुर
क्‍यों कहती घोर निराशा है?
क्‍यों कहती घोर निराशा है?
क्‍यों कहती घोर निराशा है?

Thursday, September 30, 2010

वो मेरी है गीता सार

वो मेरी है गीता सार
शीतल झरने की शीतल धार
संग रहे जो भव के पार
वो है मेरी प्राण प्रिये।
फूलों जैसी वो कोमल है
वायु जैसी वो चंचल है
बाल उसके मलमल हैं
वो है मेरी प्राण प्रिये।
सब उस पर न्‍यौछावर है
उसका मन सरोवर है
प्रकृति उसके जेवर हैं
वो है मेरी प्राण प्रिये।
कोयल जैसी जो गाती है
किरणों संग नहाती है
सपनों में मेरे आती है
वो है मेरी प्राण प्रिये।
वो मेरी शक्ति है
निश्‍छल उसकी भक्ति है
हर पल राह वो तकती है
वो है मेरी प्राण प्रिये।
नहीं उससा कोई तर्ज
उसकी इच्‍छापुर्ति मेरा फर्ज
कभी कम न होगा उसका कर्ज
वो है मेरी प्राण प्रिये।
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Thursday, September 23, 2010

ये रात बडी ही काली है

दिखता दूर सवेरा है
अंधियारे ने घेरा है
ये कालचक्र का फेरा है
ये रात बडी ही काली है।
इक ज्‍योति का तम में साथ
सिर पर मेरी मां का हाथ
चला करूं मैं सारी रात
ये रात बडी ही काली है।
साथ में न कोई दिखता है
मन तो रात में बिकता है
फिर जीने का जी करता है
ये रात बडी ही काली है।
मेरे मन को डर है सता रहा
साहस के गीत सुना रहा
पर अंधियारा है डरा रहा
ये रात बडी ही काली है।
तम पार करूं मैं दो वरदान
न खो जाउं जरा भी ज्ञान
ठोकर से न टूटे ध्‍यान
ये रात बडी ही काली है।
अंधियारे को पार किया
लोभ अधर्म न लिया दिया
समंदर जैसा किया-किया
ये रात बडी ही काली है।

Sunday, September 19, 2010

ऐसा मुझको साथी दो

सौर उर्जा सा ताजा हो
जिसकी बडी अभिलाषा हो
मिठी-मिठी भाषा हो
ऐसा मुझको साथी दो।
दुख में जो गाता जाए
हर पल जो भाता जाए
साथ सदा जाता जाए
ऐसा मुझको साथी दो।
प्रेम का जिसको होवे ज्ञान
मेरे सपनों को जो दे मान
मेरे अपनों का जो दे ध्‍यान
ऐसा मुझको साथी दो।
सांसों में जिसके हो गर्मी
चरित्र की हो धर्मी-कर्मी
पर बातों में होवे नर्मी
ऐसा मुझको साथी दो।
प्रेम का जो सम्‍मान करे
प्रेम खुशी से दान करे
साथ देने का मान करे
ऐसा मुझको साथी दो।
ढुंढ रहा जाने कब से
मैं मांग रहा जिसको हक से
पाउंगा उसको तप से
ऐसा मुझको साथी दो।

Sunday, August 29, 2010

जिद अधूरी पर तमन्‍नाएं पूरी

एक रोज मुझे वो मिल गई
मैं हंसा तो वो खिल गई
बात हुई और रात गई
जिद में मैंने इक बात कही
वो पूछ उठी हिचकी ले के
मैं सहम गया बिन शब्‍द कहे
उनमें जिद अधूरी थी पर तमन्ना पूरी थी
फिर भी थोडी हिम्‍मत कर के
मैं कह बैठा उस बचपन से
तुम बात कहो, मैं खो जाउं
तुम बाल ढंको, मैं सो जाउं
फिर वो मुझ पर हंसती थी
उसे देख मैं लरकता था
जब भी मेरी आंख खुले
मैं उसके लिए तडपता था
पर कह न सका मैं दिल की बात
कि उसे चाह रहा हूं मैं दिन-रात
मेरी जिद बात करने की थी
वो मुझसे बात करे हंसकर
मैं बहक गया इक दिन उस पर
कि कह बैठा मैं दिल की बात
कि चाह रहा उसे दिन-रात
उसने उसे मजाक कहा
उसने तुम की जगह फिर आप कहा
मैं टूट गया शीशे जैसा
टुकडे-टुकडे हीरे जैसा
फिर उसने हाथ बढाया था
पर उसे चुभ गए मेरे जजबात
मैं फिर से आज अकेला हूं
तन्‍हाई का मेला हूं
फिर उसको बंधन मुक्‍त किया
जिसको अपना था जिया दिया
वो जहां रहे बस खुश रहे
अब यही जिद मेरी दिन-रात
मेरी जिद अधूरी थी पर तमन्‍ना पूरी थी......
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Wednesday, August 18, 2010

मुझको मेरी पाती दो

जिनमें मेरे सपने थे
मेरे नहीं वे अपने थे
वादे जिनमें तपने थे
मुझको मेरी पाती दो।
अश्रुधारा संग लिखा हुआ
हृदय भाव से भरा हुआ
जीवन जिनसे मधुर हुआ
मुझको मेरी पाती दो।
जिनको छुपकर लिखा गया
दर्द जिनमें दिखा गया
क्‍यों उनको तू भूल गया
मुझको मेरी पाती दो।
जिनमें प्रेम की शिक्षा थी
हम दोनों की इच्‍छा थी
बस प्रेम दो की भिक्षा थी
मुझको मेरी पाती दो।
तू तो मुझको छोड गया
रिश्‍ते-वादे तोड गया
मुझसे रस्‍ता मोड गया
मुझको मेरी पाती दो।
उनपर मेरा है अधिकार
रग में शब्‍दों का संचार
जीवित मन में वे विचार
मुझको मेरी पाती दो।
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Monday, August 2, 2010

कामयाबी की छाया है कुंठा

कामयाबी शब्‍‍द दिल में उजाले को जन्‍मा देती है। बडी बेसब्री से लोग करते हैं इसका इंतजार। कोई एक साल, कोई दो साल, कोई सालों साल तो कोई कुछ पल। मगर इंतजार की इस परीक्षा से सभी कामयाब लोगों को ए‍क बार गुजरना पडा है। हां, इस बीच उन पर, हम पर और सब पर एक साया जरूर छा जाता है। उस छाए हुए साया का नाम है कुंठा। जी हां, कुंठा कामयाबी की छाया है। बशर्ते हम उसे खुदपर हावी न होने दें। उससे लडें, झगडें और मजबूर कर दें कि वह जाए और कामयाबी आए। मगर अफसोस है कि इस प्रतिस्‍पर्धा में कुंठा कामयाबी को लोगों से दूर करती जा रही है। इसलिए मेरी सलाह है कि इस कुंठा को दिल से निकालकर कामयाबी को पाने की कोशिश करें।

Wednesday, July 21, 2010

मेरे मन के अंधियारे में.....

मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव
मिल जाता है मुझको रस्‍ता, जिस पथ रखूं अपना पांव
मेरी भी यह इच्‍छा है कि प्‍‍यार से कोई मुझको थामे
मेरे मर जाने पर भी नाम 'नीरज' परिजन जानें
मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव

मरने पर जो भीड जो आए, मन के बल से दे वह कंधा
आंसू वे जो दिल से निकले गीला कर दे मेरा तमगा
ऐसी हो मेरी पहचान, दे दो मुझको इच्‍‍‍छादान
मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव

मुझको बांध करोगे क्‍‍या तुम, छोड दो यूं आजादी से
सच है प्‍यार सा हो गया, मनचाही बर्बादी से
सच कहूं तो डर लगता है मुझको अब आबादी से
सच है प्‍‍यार सा हो गया, मन चाही बर्बादी से
मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव

फुर्सत हो तो मुझसे मिलना, भीड भरी तन्‍हाई में
पूछ लेना तुम रस्‍ते से, रहता हूं उजियारे की खाई में
शहर से ज्‍‍यादा मुझको भाए, मेरा पगडंडी का गांव
मुड के देखूं तो दिखते हैं, मेरे पदचिन्‍हों के पांव
मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव

यह भी कोई जीवन है, सुबह उठे और शाम किया
जीवन तो कहते हैं उसको जो दूजों के नाम किया
खुद के मन में, खुद के दिल में, तो अपने ही रहते हैं
जो औरों के दिल में रहते, उसे ही मानव कहते हैं
मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव

भाग रहा हूं इस जग से मैं, भाग रहा परछाई से
फट जाता है मेरा मन अब जग की जगहंसाई से
मेरे माथे पर जो रखा है यह फूलों का ताज
दबी हुई अभिलाषा मेरी, देदो मेरा कल और आज
मेरे मन के अंधियारे में, मिल जाती है मुझको छांव

नई कलम से पेश कर रहा हूं पुरानी ही हाला
प्‍याला यह तो अपना है पर वही पुरानी मधुशाला
कोई भी जो गलती करता, तो देख रहा उपर वाला
यह वही मधुशाला है, वही पुरानी मधुशाला।

Monday, July 19, 2010

जिंदगी

हमें जिंदगी को जीने के लिए कितने ही बंधनों को मानना होता है। भले ही हम उन बंधनों को तोडने के लिए और खुद को मुक्‍त करने के लिए पूरी ताकत लगा दें। मगर आखिर में हमें उन जंजीरों को अपने गले लगाना ही पडता है। शायद इसे ही जिंदगी कहते हैं।

Sunday, June 6, 2010

मैं अजनबी हूं

प्‍यार के दिल में मैं अजनबी हूं
पहचानो मुझे इश्‍क मैं वही हूं
तेरी हर खुशी का ख्‍याल है मुझे
पर तेरे लिए ही मैं कुछ नहीं हूं
यादों में अपनी ताक-झांककर
मैं वहीं हूं और कहीं नहीं हूं
जोर न दो जज्‍बात-ए-दिल पर
कभी तो तुम कहोगे, मैं सही हूं
बदलेंगे हालात मुझे यकीन है
कभी तो तुम कहोगे कि मैं वही हूं।

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ब्‍लॉगर साथियों मुझे दिल्‍ली में अपनी गजलों की किताब छपवानी है। मगर इस बारे में मुझे ज्‍यादा जानकारी नहीं है। हो सके तो इस बारे में मुझे सलाह दें। मैं आपका आभारी रहूंगा।

Saturday, June 5, 2010

खुशी वो मुझे बेदाम दे गया

खामोश अदाओं से कोई साज दे गया
मैं निराश था वो मुझे आस दे गया
बौर देख ज्‍यों चिडिया चहक जाती है
ऐसी ही खुशी वो मुझे बेदाम दे गया
अब हमेशा होठों पर मेरी मुस्‍कान रहेगी
मुझ नासमझ को वो यही काम दे गया
जाना की रोशनी का अपना ही मजा है
मुझ बेनाम को वो 'नीरज' नाम दे गया
ऐसा नहीं कि मुझे हंसना नहीं आता
जिसे अपना कहा वही मुस्‍कान ले गया
पर अब भी उस हंसी पर हक मेरा है
आपसे जो मिला तो इमाम मिल गया

खामोश अदाओं से कोई साज दे गया
मैं निराश था वो मुझे आस दे गया
बौर देख ज्‍यों चिडिया चहक जाती है
ऐसी ही खुशी वो मुझे बेदाम दे गया
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इमाम के नाम समर्पित।
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ब्‍लॉगर साथियों मुझे दिल्‍ली में अपनी गजलों की किताब छपवानी है। मगर इस बारे में मुझे ज्‍यादा जानकारी नहीं है। हो सके तो इस बारे में मुझे सलाह दें। मैं आपका आभारी रहूंगा।

Tuesday, June 1, 2010

दोस्‍त कफन सजाये बैठे हैं

दर्द जमाने का सीने में दबाये बैठे हैं
नीरज रोशनी से हाथ जलाये बैठे हैं
अबकि बरसात में जी भरकर रोउंगा
कितने ही पन्‍नों को दर्द सुनाये बैठे हैं
दर्द यह नहीं कि मिला दर्द ज्‍यादा है
कई अजीज दोस्‍त कफन सजाये बैठे हैं
हर पल तकदीर को हार ही मिली है
फिर भी मंजिल की आस लगाये बैठे हैं
जिनके आंखों का कभी तारा होते थे हम
वही हमें आज जनमों से भुलाये बैठे हैं

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कभी-कभी मन भर सा जाता है।

Friday, May 28, 2010

डायरी में अनायास ही लिख दिया

यूं ही सोचा
घर चलूं
फिर सोचा किधर चलूं
मेरा घर तो छूट गया है
राह ने मुझे छत दिया है
सागर ने दे दी गहराई
जमीन से बिस्‍तर ले लिया है
आवारा हूं, बंजारा हूं पर वक्‍त का मारा नहीं
थका जरूर हूं मगर मैं अभी हारा नहीं
कोई तो मंजिल मुझे चूम लेगी
यही बस ख्‍वाहिश है
ए खुदा बस इतनी सी फरमाइश है
सोचा था घर चलूं
फिर याद आया किधर चलूं..................

Tuesday, May 11, 2010

वे तो मेरे आंसू हैं

जो सागर से भी भारी है
झरने जैसा जो जारी है
दुनिया जिससे हारी है
वे तो मेरे आंसू हैं।
वह बहा है जब मैं ठगा गया
सब कुछ जब मैं गंवा गया
जब पैरों के नीचे हवा गया
वे तो मेरे आंसू हैं।
धारा जिनमें भाव बहे
दुख-दर्दों का नाव दहे
पत्‍थर जिनको नहीं सहे
वे तो मेरे आंसू हैं।
जलन हो जिनमें ज्‍वाला सी
आकर्षण हो बाला सी
बने जहर जो हाला सी
वे तो मेरे आंसू हैं।
कोयले से जले हुए
मोम के जैसे गले हुए
मेरे भीतर जो पले हुए
वे तो मेरे आंसू हैं।
अब तू तो खुद से शर्मिंदा है
चहुंमुखी तेरी ही निन्‍दा है
पर रोकर मन मेरा जिंदा है
वे तो मेरे आंसू हैं।

Monday, May 10, 2010

दोस्‍त ने गद्दार कहा

बातों-बातों में उसने गद्दार कहा
हमने फिर भी उसे यार कहा
पलभर में वो सब भूल गया
हमने इसे उसका प्‍यार कहा
पर दिल में चूभ गई टीस सी
उसने हमें शक का शिकार कहा
किससे गिला करें, सफाई किसे दें
उसने हमें दिमाग से बीमार कहा

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Monday, May 3, 2010

हम दोस्‍तों का सिगरेट संकल्‍प


यकीन मानिए युवाओं को सिगरेट पीना बहुत पसंद हैं। बात उनकी हो रही है जो सिगरेट पीते हैं या पीने की चाह रखते हैं। मगर यह तो सिगरेट पीने वाला ही बता सकता है कि वह इससे कितना संतुष्‍ट है। इससे दिल को सूकुन मिले या न मिले मगर चंद रुपयों की उधारी जरूर मिल जाती है। ऐसे में मैं किसी और की नहीं अपने दोस्‍तों की और अपनी कहानी को आपके सामने रखना चाहता हूं। हम हर माह के अंत में सिगरेट छोड़ने का संकल्‍प लेते हैं। मगर महीने की शुरुआत यानी जब जेब गर्म हो जाया करती है तो उसे तिलांजलि देने की कोशिश भी नहीं करते। फिलहाल मैं सिगरेट छोड़ने के विचार में हूं। देखते हैं मैं सफल हो पाता हूं या नहीं। मगर सिगरेट को लेकर मैं आपसे कुछ घटनाएं बताना चाहता हूं। उम्‍मीद करता हूं आपको अपने बीते दिन याद आ जाएं।

रूम में हम चार लोग रहते हैं। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। सभी सिगरेट के महारथी हैं। पल भर में सिगरेट की डिब्‍बी को खाली करने की सभी कलाओं के हम ज्ञाता हैं। दिन की शुरुआत आंख खोलने पर ही मानते हैं। भले सूर्यदेव कितनी ही देर से मुखड़ा दिखा रहे हों। उससे हमें कोई लेना-देना नहीं होता। बस आंख खुली और हमने सुबह होने की घोषणा कर दी। भले शाम के छह बज रहे हों। खैर, अब सुबह के नित्‍य कर्मों से निपटना तो है ही। इसके लिए सिगरेट चाहिए। यदि हमारे पास अपनी सिगरेट है तो ठीक नहीं तो शुरू होती है खरीद-फरोख्त। साथ वाले से कहा सिगरेट है। उसने तपाक से कहना है नहीं है या है भी तो एक ही है। खुद के लिए रखी है। जरूरत है तो ले लो मगर चार वापस करनी होगी। लो बेमतलब में सुबह-सुबह ही बिक गए। फिर खाना खाने के बाद एक सिगरेट चाहिए। उससे पहले तो चाहिए ही चाहिए। फिर उस समय से लेकर ऑफिस आने तक सिगरेट पीना एक बूरी लत सी बन चुकी है। ऑफिस में कुर्सी छोड़कर और बाहर भागकर सिगरेट पीना ही है। जैसे लगता है कि उसी के लिए जी रहे हैं। लगातार पी रहे हैं। फिर रात में खाना खाने के पहले और बाद में सिगरेट की तलब बेचैन कर देती है। उसे भी शांत करना ही है, करते भी हैं। देखते-देखते महीने का अंत हो जाता है और पनवाड़ी और दूसरे दुकानदार हमारा इंतजार करने लगते हैं। फिर हम अपनी खुशी से उनकी मुराद पूरी करते हुए जेब ढीली कर देते हैं। उस समय हम पान वाले से भी कहते हैं कि हम जल्‍द ही सिगरेट छोड़ देंगे। रूम पर लौटने के बाद आपस में भी कहते हैं कि सिगरेट छोड़ देना चाहिए। सभी हामी भरते हैं और एक सिगरेट सुलगा लेते हैं। फिर अगले दिन से पुरानी दिनचर्या को अपना लेते हैं। मगर अब मैं आप सभी से कहता हूं कि सिगरेट पीना और पिलाना दोनों ही बुरी आदतें हैं। कभी सोचिए उन रुपयों से आप हर महीने कुछ और कर सकते हैं जो आपके पास नजर तो आएगा। इसलिए आप सभी अनुरोध है कि इस आदत को अपनाइए मत और यदि अपना चुके हैं तो छोड़ दीजिए। मैंने तो इसे त्‍यागने का संकल्‍प ले लिया है।

बेबस कदम और मंजिल

बेबस कदमों से मंजिल को चला हूं मैं
मन है सोने का पर लोहे में ढला हूं मैं
कहीं उजाला करता होगा मेरा भी इंतजार
उस उजाले के लिए सालों जला हूं मैं
मिट गई तन्‍हाई मेरी खो गया याराना
खुदा जाने किस रिश्‍ते से छला हूं मैं
सूखी नजरों को अब दरिए ही दुहाई चाहिए
आपकी ही तरह मां की गोद में पला हूं मैं

Saturday, May 1, 2010

गरीबी करती मीठे रिश्‍ते

आजकल एक शौक अपना लिया है। देर रात चाय पीने की तलब से बेचैन हो उठता हूं। ऐसे में रूम के कीचन में भोर के तीन या चार बजे के करीब कुछ बनाना शोभा नहीं देता। फिर तलब भी शांत करनी होती है। इसलिए घर के कुछ दूर पर लगने वाले एक चाय और पराठा के ठेले पर एक प्‍याली चाय की अर्जी दे आता हूं। वहां, ऐसे तो कुछ खास नहीं मिलता मगर रुपये के लिहाज से जो स्‍वाद मिल जाता है वह अपने आप में ही काफी मजेदार होता है।
आइए अब उस ठेले पर हिमालय सरीखे व्‍यवसाय के बारे में कुछ जानकारी देता हूं। उसे ठेले को एक दंपति मिलकर चलाते हैं। पति के मुताबिक, वह उत्‍तर प्रदेश के हरदोई जिले का रहने वाला है, जबकि उसकी शादी कानपुर में हुई है। इससे इतर एक बात बताना चाहूंगा कि उनके हाथों में कोई यादगार स्‍वाद नहीं है। मगर उन दोनों की सूझबूझ और हंसी मजाक कर चाय पराठा बनाने और खिलाने के तरीके ने मुझे मुरीद सा कर दिया है। उन दोनों को देर रात कब किस समय कौन सा ग्राहक कहां से छूटकर आ रहा है। वह क्‍या खाएगा, क्‍या नहीं खाएगा और चाय पीएगा की नहीं या फिर सिगरेट में दिलचस्‍पी है या नहीं तक का पूरा ब्‍यौरा याद रखते हैं।
चलिए यह बात भी साधारण हुई कि उन्‍हें तो पैसा कमाना है तो याद रखना ही होगा। मगर एक चीज जो मैं कभी नहीं भूलूंगा वह है उन दोनों का गरीबी में भी हंसी मजाक कर लेने का हसीन तरीका। सच गरीबी में इंसान अपने परिवार को जितना समय दे देता है उतना रईस नहीं। वहीं, घर के पास एक नाईन टू नाईन नाम का बेहतरीन रेस्‍टोरेंट भी है। उसे भी दो बेटे और मां-बाप वाला एक परिवार चलाता है। मगर वे हंसते हुए किसी का स्‍वागत नहीं करते। वे हमेशा एक-दूसरे को हिसाब देने में ही व्‍यस्‍त रहते हैं। ऐसे में उनके बीच प्‍यार कहीं से भी नहीं झलकता। भगवान करे आम आदमी ही बना रहूं। मगर रईसियत के साथ। शेष फिर कभी.......

Thursday, April 29, 2010

श्रद्धा ने किया अंधा


गंगाजल के प्रति लोगों की आस्था को मापना मेरे बस की बात नहीं है। उम्मीद करता हूं कि किसी और के बस की भी बात नहीं होगी। कारण, इस पवित्र पावनी जल में डुबकी लगाकर लोग अपने पापों को जल धारा में प्रवाहित हुआ सा मान लेते हैं। हो भी क्यों न राजा भगीरथ ने लोगों को उनके पापों से मुक्ति दिलाने के लिए तो घोर तपस्या करके भगवान शिव की जटा का सहारा लेते हुए मां गंगे को धरती की रगों में बहने के लिए आमंत्रित किया था। मगर आज उसी गंगा की स्थिति को देख दिल फट सा जाता है। इसका दुख मुझे उतना ही होता है जितना एक बालक को उसकी मां से बिछड़ने का।
दरअसल, कुछ रोज पहले मेरे पास एक तस्वीरों का जखीरा आया। उसे मेरे मेल बॉक्स में मेरे बड़े भाई श्री धीरज तिवारी जी ने काफी चिंतित होकर भेजा था। उसमें गंगा के प्रति लोगों की आस्था को दिखाया गया था। शुरुआती तस्वीरों को देखकर मुझे खुशी भी हुई कि मैं हिंदुत्व का हिस्सा हूं। मगर कुछ पलों के बाद जब हकीकत से मेरा सामना हुआ तो दिल भर गया। सोचने लगा मानव ने ये क्या किया? गंगाजल की पवित्रता को हमने अपने कृत्यों से पैरों तले मसल रखा है। हमने मां गंगे को इतना पतित कर रखा है कि अब वे खुद को पवित्र मानने से कतराती होंगी।
आप ही सोचिए कि आखिर हमने जीवनदायिनी गंगा नदी को दिया क्या है? उन्होंने हमें पवित्रता दी तो हमने इसके बदले उसमें पूजा के फूल बहाकर गंदगी का शिलान्यास कर दिया। हमारी जलाशय माता ने हमारी मनचाही इच्छा पूरी की तो हमने उन्हें शवों का ठेला सा बना दिया। मगर मां तो मां है न उसने हमें अब भी अपराधी नहीं समझा। वह फिर भी अप्रभावित होते हुए अनवरत् प्रवाह से स्वयं की शीतलता से हमें शीतल धारा और आशीर्वाद पहुंचाती रहीं। मगर हम तो उद्दण्ड और उच्छृंखल हैं न। हमारा जी नहीं भरा तो हमने उनके आंचल में नगरों और महानगरों में बने घरों और कंपनियों के जहरीले जल का आचमन देना शुरू कर दिया। वाह रे वाह हम तो सच-मुच इंसान ही निकले! हमने पल भर के लिए भी अपनी मां को स्वच्छता देने की कोशिश नहीं की। खैर, आखिर हम हैं तो इंसान ही।
इंसान होने के नाते सोचने लगा कैसे आप सबों से कहूं कि हमें जागरूकता दिखानी होगी। हमें मां गंगे की शीतलता को बरकरार रखना होगा। इसके लिए आपसे विनम्रता से प्रार्थना भी तो नहीं कर सकता था क्योंकि याचनाएं ठुकरा दी जाती हैं। उन पर ध्यान देने के लिए किसी के पास समय नहीं होता। ऐसे में हल मिला कि आपको डराया तो जाया ही सकता है। कारण, जो लोभ नहीं करा पाता वह डर करा जाता है। शायद आपमें से कोई इस समस्या के प्रति गंभीर हो सके।
डरना शुरू करिए.. कभी गंगा के घाटों से परे हटकर डुबकी लगाने का मन बनाइए। आप ज्यों ही नहाने की अवस्था बनाकर डुबकी मारने की मुद्रा अपनाएंगे और ... हर-हर गंगे.. का जाप करते हुए नाक पानी में डुबाएंगे, त्यों ही आपके सर से कोई चीज आ लड़ेगी। आप झट से बाहर निकल गंगा का प्रसाद समझ उसे पाने को उतावले हो जाएंगे। मगर आंखों के सामने कोई प्रसाद नहीं मानव का सड़ा हुआ अंग बहता हुआ नजर आएगा। जिसे आपके और मेरे किसी अंजान बंधु ने जल में प्रवाहित किया होगा। सोचिए, ऐसे ही अपवित्र जल में करोड़ों की संख्या में हमारे परिवार के लोग डुबकियां लगा अपनी आस्था को चरितार्थ करते हैं। उनकी सेहत की खातिर कम से कम एक आदमी तो इस कृत्य के खिलाफ कोई सार्थक कदम उठाए। मेरी बातों पर विश्वास न हो तो कभी गंगोत्री से निकलने वाली गंगा को बंगाल की खाड़ी में समाते हुए देखिए। उसे हरिद्वार के घाट से शीतलता बहाते हुए बहने के बाद कानपुर में रोते-बिलखते हुए देखिए। यकीन मानिए मैं क्षुब्ध हूं। शायद, आप भी हो जाएं।
मैं मानता हूं कि आप अकेले कुछ नहीं कर सकते मगर किसी घाट पर गंदगी को बहाए जाने से रोकने के लिए चंद अक्षरों का झुंड तो अपने मुखारबिंद से निकाल ही सकते हैं। माफ कीजिएगा, भाव कठोर थे मगर मेरी आस्था पवित्र है। मगर गंगा में गंदगी बहाने वालों का क्या, वे तो श्रद्धा में अंधे हो चुके हैं।
[उस मेल की एक तस्वीर को इस ब्लॉग पर प्रसारित कर रहा हूं। हो सके तो इस पर विचार देने का कष्ट करें]

Thursday, January 28, 2010

'वे दिन बहूत अच्छे थे'


'वे दिन बहुत अच्छे थे। काश लौट आते। तब कोई तकलीफ नहीं थी। जिन्दगी में उठा-पटक नहीं थी। वक्त मेहरबानी करे। वे दिन लौटा दे ।' अक्सर, ये शब्द सुनने को मिल ही जाते हैं। कोई पुराना दोस्त जब अचानक फ़ोनकर कहता है, पहचाना?, और आप कह बैठते हैं.'अबे तू। इतने दिनों के बाद। कहाँ है आजकल? ये तुम्हारा ही नंबर है। पहले क्या दिन थे यार दिनभर साथ रहना। कभी तेरे घर में मैंने शाम काटी तो कभी तूने मेरे घर में। वहीं अब जब सब है, तो हम साथ नहीं। काश लौट आते वे दिन।'
दरअसल, कई दिनों के बाद मेरे पास ऐसा ही एक फ़ोन आया। बात तो दस मिनट हुई मगर जो हुई झकझोड़ गई। ऐसा मेरे साथ नहीं, उम्मीद करता हूँ उसके साथ भी हुआ होगा। हम दोनों साथ ही पढ़े, खेले, झगड़े, मनाये गये, ज्यादा खेलने पर घरवालों द्वारा रुलाये गये।' दिन बीतते गये। हम बड़े हो गये। साथ ही भविष्य की चिंता होने लगी। पहले किताबों ने बात दिया। क्योंकि, वह बायो का था और मैं कॉमर्स पढना चाहता था। फिर भी हम मिले, पर पहले से थोड़ा कम। समय बदला और हो गये कामकाजी। घर से दूर। दोस्तों से कोशों दूर। मस्ती करने का तरीका बदला। बचपन में जैसा सोचा था वैसे तरीके अपनाए। हमें तो अब ज्यादा खुश होना चाहिए था। फिर ये कशिश कैसी? हमें पुराने दिन क्यों याद आ रहे हैं।
ये बात समझ से परे नहीं है। दरअसल, इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में, गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच, इन्क्रीमेंट और प्रमोशन की चाह में हम काफी कुछ पाकर भी एक चीज खो चुके हैं, जिसके बिना सब बेमानी है। वह है सुकून। दुनिया गवाह है, लोग कभी संतुष्ट नहीं हुए। हुए होते तो कलियुग न आता। ऐसे में बचपन के ख्वाब पूरे करने के बाद भी हमारा उन आँखों को याद करना लाजिमी है, जिन्होंने हमारे उन सपनों को परिणति तक पहुंचाने के लिए वक़्त-वक़्त पर हमारी हौंसलाफ्जाई की थी। सच बीते दिन कब पलकों के रास्ते दिल में उतर जाते हैं। कोई नहीं जानता। क्योंकि.......

Friday, January 22, 2010

शरद जी चीनी खा लो...



केंद्रीय खाद्य मंत्री शरद पवार को कुछ हो गया है। वे नेता होने के बावजूद झूठे आश्वासन नहीं दे रहे हैं। वे हर वह बात कर रहे हैं, जिससे कांग्रेस झक-झक में बनी रहे। ठीक है किसी को झूठे आश्वासन नहीं देना चाहिए। पाप लगता है। दरअसल, वे आजकल बेलाग-लपेट मुहफट अंदाज में मीडिया को ब्यान दे रहे हैं। पूछो आम तो बताते हैं इमली। कहते हैं हम कांग्रेस के साथ हैं मगर पत्रकारों के सामने केंद्र सरकार की खाल खिचवाने जैसे ब्यान दे रहे हैं। भला ही है भगवान् का की मुझे ऐसा कोई दोस्त नहीं मिला। अच्छा हाँ, शरद जी का नाम भले शरद हो मगर नाम से उलट वे अपनी जबान से ग्रीषम ऋतू की ही बारिश करते हैं। नाम के आगे पवार लगाते हैं। मगर देश के कई परिवार का महंगाई के आगे कमर तोड़ चुके हैं। मगर, प्रयास के नाम पर उल्टा जवाब देना बेहतरी से जानते हैं। तभी तो चीनी के दाम से दिल नहीं भरा तो दूध की कीमत बढाने की कवायद शुरू कर दी। देखते हैं कब तक कामयाब होते हैं एनसीपी के शरद। शरद जी मुंह से अच्छे बोल भी निकल सकेंगे जो मीठा खा लोगे


शरद बाबू को लेकर एक बात याद आ गयी ......


मैं छोटा था। मेरा जूते का सोल अपना मुंह खोल बैठा। मम्मी मुझे प्यार बहूत करती थीं, या मैं नालायक बहूत था शायद इसीलिए मैं बिना एक रूपये लिए स्कूल नहीं जाता था। कंजूस भी बचपन से ही हूँ। उन रुपयों को कभी खर्चता नहीं था। इससे गाहे-बगाहे दोस्तों के बीच सिक्का खनका उन्हें जलाने का मौका मिल जाता था। खैर, मैंने तुरंत अपनी जेब में से सिक्के निकाले और मैं पहुँच गया मोची के पास, उसने तुरंत ही मेरे जूते का मुंह परदो कील मार दी। मैं खुश हो गया चलो जुगाड़ से जूता बन गया। मगर दो दिन के बाद वह मेरे पैरों को घाव देने लगा। कारन चाहे जो हो। मोची मुरख हो। कील खराब हो। कुछ भी। मगर दर्द तो मेरा ही पैर हो रहा था। पिताजी ने नये जूते खरीद कर दिए थे, इसलिए कह भी नहीं पा रहा था की मैंने रोड चलते पत्थर को ठोकर मार-मार के जूते की दशा और दिशा दोनों बदहाल कर दिया है। मैं दर्द झेलता रहा। दरअसल, ऐसा ही दर्द कांग्रेस का है। वह पवार के शब्दों का कील रूपी दंश झेलने को तैयार है। मगर, परित्याग करने को नहीं। खुदा जाने कांग्रेस कितना बड़ा पत्थर सीने पर रखकर शरद के ब्यान को मुखाग्नि देने को कैमरे और कलमों के सामने आती है। काश, माननीय मंत्री महोदय समझ सकते की उनकी इस तरह की बेबाक टिप्पणियों को आधार बनाकर लुटेरे सरीखे व्यापारी दाम बढ़ा देते हैं...

यकीन मानिए मुंह मीठा हो जाएगा, जो शरद जी चीनी खा लो... बात मानिए... खा लीजिये.... चलिए अच्छा दूध में मिलकर पी लीजिये।

Thursday, January 21, 2010

गागर में सागर, भारत देश

हमारे देश में घर-घर में अनेक उदाहरण हैं, जो जीना सिखाते हैं कब्र के सीने पर बैठकर। विश्वास नहीं आता तो जानिये। पाकिस्तान में मौत से आँख-मिचौली सा खेलता सरबजीत का परिवार। राष्ट्रीय खेल के नाम पर हौंकी नामक लाश को काँधे पर ढोते हमारे देश के हौंकी खिलाड़ियों का परिवार। अंत में बेशर्मी को पार चुके माननीय केंद्रीय खाद्य मंत्री शरद पवार। मैं इन साहब के परिवार को नहीं घसिटूंगा। कारण, कौन जाने यही अपने घर की शान बुझाने में विश्वास रखते हों। आप सोच रहे होंगे की इन परिवारों में ऐसा क्या है जो ये देश-विदेश के लिए बेहतरीन उदाहरण बन सकते हैं। हम इनके बारे में क्रमशः बात करेंगे।

पहला सरबजीत का परिवार : हम कई बार अखबार में पढ़ते हैं की फ़लां सेवानिवृत्त बुजुर्ग अपने पेंसन के इंतज़ार में ही चाल बसे। किसी बाबू ने चिलां शर्मा जी को इसलिए पेंसन कार्यालय का चक्कर लगवाया, क्योंकि उन्होंने उसे घुस नहीं दिया। वे थक-हारकर प्रशासन रूपी रावन के आगे अपना शीश कटवा देते हैं। खासकर, जब उनके घर में उनसे जीवन के अंतिम चरण में भी यही उम्मीद की जाती हजी की वे बाजार से सब्जी तो अपने पैसे से ही ला सकते हैं। इससे हटकर यदि हमारी न्यायपालिका की बात की जाए तो न जाने कितने बेगुनाह सिर्फ इसलिए सजा काटने को मजबूर हैं क्योंकि वे गरीब हैं। वहीँ, सरबजीत का परिवार भारत देश के गाँव में बैठकर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपने पिता-पति को छुद्वान के लिए लड़ रहे हैं। वे घर बैठे ही पाकिस्तान को उसकी मनमानी (सरबजीत को फांसी पर लटकाना ) नहीं करने दे रहे हैं। काश, देश-दुनिया का हर परिवार ऐसे ही सीना ताने तानाशाहियों का मुकाबला कर सकता।

दूसरा हमारे हौंकी खिलाड़ी : बचपन में पढ़ा था की भारत का राष्ट्रीय पशु शेर, पक्षी मोर, मिठाई जलेबी और खेल हौंकी। शायद, बहुविकल्पीय में अंतिम वाला प्रश्न यानी खेल पूछा भी गया था। मैंने सही जवाब दिया होगा। मुझे नंबर भी पूरे मिले होंगे। अब भी ऐसा ही होता है। मगर हकीक़त क्या है। अब यह खेल राष्ट्रीय नहीं बल्कि यूँ ही एक नंबर का अंक मार्कशीट में बढवाने के लिए रह गया है। इसका खुलासा तो तभी हो गया था जब हौंकी पर आधारित फिल्म 'चक दे इंडिया' का गाना हौंकी पर कम और क्रिकेट की ख़बरों में ज्यादा बजा। कारण, वही 'भूखे पेट हो न गोपाला, ले लो अपनी कंठ माला'। इसी क्रम में अब महिला हौंकी खिलाडियों ने भी बगावत क बिगुल फूँक दिया है। देखते हैं यह खेल कोर्स से बाहर निकल हकीक़त में कब तक राष्ट्रीय खेल बन पाता है। देखते हैं, कब इसी प्रकार देश के सभी पिछड़े खिलाड़ी अपने हक के लिए खड़े होते हैं।

तीसरे और सबसे अनोखे पवार साहब : न जाने ये मंत्री साहब किस कुंठा के शिकार हैं। इनके पास गरीब जनता को देने के लिया झूटे आश्वासन तक नहीं हैं। गजब है। जब मुंह खोला बुरा ही बोला। कभी कहते मैं ज्योतिषी नहीं हूँ। कभी कहते दूध महंगा हो जाएगा। सब्जी पर कंट्रोल नहीं। सर्कार महंगाई से हार गयी है। वगैरह-वगैरह। मैं इनसे सिर्फ दो सवाल पूछना चाहता हूँ। पहला, भैया अच्छा बोलने में टैक्स लगता है क्या। दूसरा काहे, कांग्रेस की फांस बने हो। ये दुनिया के सबसे बड़े उदाहरण हैं, बिना सोचे बोलने वालों के। क्या दुनिया में लोग इनसे सोचे-समझे बिना न बोलने की कला नहीं सीख सकते। ये सवाल नहीं हिदायत है। पहले सोचो फिर बोलो। काश, मंत्री जी, समझ सकते की इनके इन बयानों से महंगाई को बल मिलता है।

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शरद जी के बारे में अगले पोस्ट में शब्द गर्जना की जाएगी.... नमस्कार।

Tuesday, January 19, 2010

घर छोड़ते ही रिश्तों की तलाश


मेरे एक बड़े भाईसाहब हैं। वे मेरे पहले अखबारी संस्थान में गुरु भी रहे। अभी भी हैं। न जाने उनमें ऐसा क्या है जो मुझे उनसे बात करना। डांट खाना। मजाक करना और झगड़ा करना बहूत पसंद है। अकसर हम छोटी-छोटी बातों में लड़ भी जाते हैं। वे मुझे हमेशा डांटते रहते हैं और मैं हँसता रहता हूँ। हालाँकि, मेरा घरेलु वयव्हार काफी सख्त है। मगर न जाने उनमें ऐसा क्या है की मैं उनकी कड़ी से कड़ी बात क भी विरोध नहीं कर पाता। आप सोच रहे होंगे। ऐ तो आपसी बात है, इसमें जगजाहिर करने जैसा क्या है। मगर आप दिल पर हाथ रखकर बोलिए क्या आपके जीवन ऐसा ही कोई रिश्ता नहीं है, जो अनजाने में ही बना हो, लेकिन हरदिल अजीज हो। सोच में पड़ गये न। दरअसल, हम सभी की जिन्दगी में एक रिश्ता ऐसा कहीं न कहीं बन ही जाता है। उसे कभी हम भइया, कभी बहन, कभी दोस्त, कभी बाबा और कभी अनाम ही रहने देते हैं। इस फेहरिश्त में दो प्यार करने वालों का फ़िलहाल कोई जिक्र नहीं है। क्योंकि, वह तो रूहानी रिश्ता है।
यूँ सोच रहा था की घर छोड़ बाहर जाने पर ऐसे रिश्ते बनते कैसे हैं? जवाब मिला घर की तलाश में। जी हाँ, घर से दूर होने पर हम हर अनजान चेहरे में एक रिश्ता तलाशने लगते हैं। जैसे- ठेले पर सब्जी बेचने वाला एक बुजुर्ग अचानक ही काका हो जाता है। घर के बगल में रहने वाली अंटी अचानक ही मान की तरह सर्दी-बुखार होते ही नुश्खे बताने लगती हैं। इन रिश्तों की खोज घर की तलाश में होती है। अपनों से दूर इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में अपनों की तलाश कभी आपने भी की होगी। हो सकता है की कर रहे हों.....
उन भाईसाहब की एक बात और बतलाना चाहूँगा। वे मुझसे हमेशा कहते, नीरज जिन्दगी को लेकर गंभीर हो जाओ और मैं उनकी इस बात को सिगरेट के छलों की तरह उड़ा देता। उनकी इस नसीहत का जवाब मैं अपनी बेशरम सी हंसी से देता। आज जब जीवन के प्रति गंभीर होना चाहता हूँ तो वे मुझे सलाह नहीं दे पाते। मुझसे दूर जो हैं। या मैं यह कहूं की वे मुझे अब गंभीर रूप में देख ही नहीं पाते, क्योंकि वे मुझसे दूर जो हैं। संभवतः यही कारण है की लोग कहते हैं बड़ों की बात तुरंत मान लेनी चाहिए। दरअसल, वे फिलहाल मुंबई में हैं और दिल्ली में।
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अंत में बशीर बद्र का एक शेर याद आ गया...

दालानों की धूप और छतों की शाम कहाँ
घर के बहार जाओगे तो घर जैसा आराम कहाँ
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मगर, घर के बहार ऐसे ही अनकहे रिश्ते हमारी रिश्तों की प्यास को तृप्त कर देतें हैं.....

Wednesday, January 6, 2010

मैं हरिद्वार गया था, अमर ने इस्तीफा दे दिया


मैं हरिद्वार गया था। पिछले लेख में इसकी चर्चा कर चूका हूँ। मगर अपनी यात्रा का पूरा ब्यौरा नहीं दे पाया था। पेशे से पत्रकार हूँ इसलिए बताये बिना मानूंगा नहीं। डेल्ही से बस में सवार होकर मैं हरिद्वार अपनी दीदी के घर पहुंचा। जाते समय मुझे सिर्फ अपनी भांजी और भांजे का चेहरा याद आ रहा था, लेकिन लौटते समय उनके साथ ही हरिद्वार के हर चौराहे की याद आ रही थी।
मेरी बहन क घर कनखल में है। जहाँ माता पार्वती सटी हुईं थीं। कुछ दूरी पर दक्ष मंदिर है। विशालकाय, खुबसूरत और गंगा के पानी से धुला हुआ। दक्ष मंदिर पहुँचने के लिए माता आनंदमयी द्वार से प्रवेश करना होता है। वहीँ गंगा जी के पानी को मुख्य धरा से मोड़कर एक नहर का रूप दिया गया है। इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था की गयी है की पानी आनंदमयी द्वार के प्रवेश पूल के नीचे आकर जमा होता है। इस कारण वहां पानी का जमाव हो जाता है, जिसमें छोटी-बड़ी मछलियों का झुण्ड जमा हो जाता है। मेरी बहन ने बताया की स्थानीय लोग इन मछलियों को चीनी मिला आटा खिलाते हैं। हाँ, बता देना जरूरी है की यहाँ मछलियों का शिकार नहीं किया जाता। खैर, मुझे जानकारी देने के साथ ही मेरी बहन घर से तैयार कर के लाई हुई आटे की लोई मुझे दे देती है। मैं उस लोई के छोटे-छोटे टुकड़े कर पानी में फेंकने लगता हूँ। कुछ देर बाद आटे की मीठी गोली पाने के लिए मछलियाँ पानी में कूदने लगीं। सच, इस दृश्य को मैं पूरी उम्र नहीं भुला सकता।
अब आगे बढ़ते हैं। दक्ष मंदिर की तरफ। अपनी आदत से मजबूर मैं बहन के साथ मंदिर तो गया पर मुझे ज्यादा सुकून गंगा जी के पानी में पैर डुबो के बैठने में मिला। दीदी कुछ नाराज भी हुई, मगर मुझे आदत सी हो गयी है। शाम के समय मंदिर के पिछले हिस्से से दिखने वाली पहाड़ों को देखकर मन को सुकून मिल रहा था। तभी बच्चों ने भूख लगने की बात कही और हमें घर वापस लौटना पड़ा। सुबह के समय मंदिर का नजारा देखने की ख्वाहिश में मैं अगले दिन सुबह पांच बजे ही घर से निकल पड़ा। पैदल घूमते हुए सुबह के समय हवा की शुद्धता को महसूस करना तो मैं भूल ही गया था। दरअसल, डेल्ही में समय का अभाव और गाड़ियों के धुएं ने माहौल ही कुछ ऐसा बना रखा है।.............. हरिद्वार से जुडी आगे की बातें अगले अध्याय में लिखूंगा। अब कुछ सामाजिक बात...

सपा को पहचान दिलाने वाले अमर सिंह ने सपा के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। उम्र के इस पड़ाव में आखिर मुलायम सिंह में ऐसी क्या कठोरता आ गयी है की लोग उनसे अलग होते जा रहे हैं। यह बात मैं आपसे पूछ नहीं रहा हूँ, मुलायम को सलाह दे रहा हूँ। इस धरतीपुत्र को ऐसा क्या हुआ की इनकी रासायनिक और भौतिक खाद कहे जाने वाले इनके मित्र इनसे दूर होते जा रहे हैं। मीडिया में यह भी खबर आयी की अमर ने अपनी कोई झ्ट्कामार तकनीक क इस्तेमाल किया है, पार्टी को अपनी हैसियत का परिचय देने के लिए। मगर शाम तलक आभास हो गया की अबकी मामला कुछ संगीन है.... आगे न जाने क्या होगा....
अरे हाँ, एक बात तो मैं बताना ही भूल गया। बोर्डर पर हमारे सैनिकों के लिए अभी तक जैकेट नहीं खरीदे गये हैं शायद, मई या जून तक ले लिया जाएगा। फिलहाल, उन्हें अपने कपड़ों से काम चलाना होगा। अरे हमारे नेताओं को सालभर जैकेट खरीदने की फुर्सत ही नहीं मिल पायी थी। मीडिया भी बेमतलब उन्हें निशाने पर लिए रहती है। नेता जी, आप सभी से अनुरोध है कि आप पत्रकारों पर ध्यान मत दीजिये। गर्मी आते ही लोग भूल जायेंगे कि हमारे सैनिकों को ठण्ड के मौसम में जैकेट कि जरूरत थी...

Tuesday, January 5, 2010

दिन दोपहर में गुम हो जाना ठीक नहीं
पथरीले पथ पर पांव बढ़ाना ठीक नहीं
फूँक-फूँककर कदम बढ़ाओ नया शहर है
हर किसी से हाथ मिलाना ठीक नहीं
अपने दिल को थाम के रखो ऐ 'नीरज'
हर पनघट पर प्यास बुझाना ठीक नहीं
किसी की हस्ती देख मत किस्मत को रो
छोटी चादर में पांव फैलाना ठीक नहीं
चल दिए जब नये सफ़र, पर तब क्या डर
मंजिल से पहले सुस्ता जाना ठीक नहीं
तुम्हें मिलेंगे हर रोज नये हमदर्द और दोस्त
पर हर पत्थर को शिवलिंग बतलाना ठीक नहीं

Monday, January 4, 2010

ठण्ड में चाय बना चश्मा


वाह री ठण्ड। आजकल ठिठुरने में ज्यादा समय लग जाता है, बनिस्पत सोने में। ठण्ड का कहर बढ़ता जा रहा है। लोगों को और अपने अखबार के साथियों को बोलते सुना और लिखते देखा की त्राहिमाम-त्राहिमाम। भैया मेरे एक बात बताओ, जाड़े में ठण्ड न होगी तो क्या मई में होगी। खैर, अपनी-अपनी सोच। आपको बताना चाहूँगा की मैं हाल के दिनों में हरिद्वार गया था। सच बताऊँ तो एक उर्जा का एहसास हो रहा है। कई दिनों से ऑफिस से घर और घर से ऑफिस जा-जाकर मन उचट गया था। इस बीच कई चीजें देखीं। मंदिर देखे, साफ़-सुथरी गंगा देखी (पहली बार)। मैं ऋषिकेश भी गया। पर्वत से छनकर आते सूरज की रौशनी को पलकों में बाँध लेने का जी कर रहा था। माफ़ कीजिये मैं यादे सहेज सका दृश्य नहीं। इन नजारों के बीच एक चीज और देखी चाय की दुकान। सच समाज में फैले और बने अमीरी और गरीबी की खाई को समझने और समझाने का सबसे आसान उदाहरण है यह जगह। सोच में पड़ गये क्या? जी, हाँ। चाय की दूकान बैठे हुए मैं एक हिंदी का चुरमुराया हुआ अखबार पढने लगता। यह सिलसिला करीब एक हफ्ते तक चलता रहा। एक रोज मेरी नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी। इत्तेफाक की बात है कि उसी समय एक मध्यम दर्जे कि कार भी आकर रुकी। चार में से तीन युवक बाहर आये। उन्होंने कहा कि सनसनाती हवा में चौराहे पर चाय पीने का अपना ही मजा है। वे चाय पीने लगे। उधर, वह बुढ़ा गरीब भी चाय मांगने लगा। मैं अखबार से बाहर निकल कर, उन चारों में खो गया। ध्यान दिया तो देखा। उन लड़कों और उस बूढ़े में सिर्फ इतना अंतर था कि वह बुढ़ा खुद को चाय से गरम कर रहा था और वे तीनों मस्ती करने आये थे। सच, प्याली वही, चाय वही। मगर, इतना बड़ा अंतर.......... निशब्द होना बेहतर है। हाँ, वह बुढ़ा कुछ देर पहले आया था, लेकिन उसे चाय तीनों के बाद मिली थी। अब आप भी खिन जाइएगा तो देखियेगा। आपकी मस्ती किसी कि जिन्दगी भी हो सकती है।

अंत में कुछ कमेन्ट मिले, सभी को धन्यवाद। सुझाव और शिकायत मिले तो प्यास बनी रहती है.....

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...