Monday, March 7, 2016

‪#‎wakeupindia

आज काफी कुछ सीखने को मिला। दरअसल, तबीयत कुछ नासाज थी। इसीलिये सुबह भी देर से हुई। शिवरात्रि का दिन हो और शिवालय न जाऊं, ऐसा मैंने बचपन से नहीं होने दिया। शिव मंदिर में महाशिवरात्रि के दिन जाना, बहुत ही आनंद देता है। खास बात यह भी थी कि चूंकि लखनऊ में मेरा जहां घर पड़ता है, वह शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र का मजा देता है। मगर इस बार मन मसोस कर रह गया।
दरअसल, कस्बे में रहने की खूबी ही यही है कि आपको हर तरह का परिवेश देखने, समझने और जीने को मिल जाता है। महाशिवरात्रि के दिन बचपन से ही मैं अपने दोस्तों के साथ पास के बाग और छोटी झाडि़यों वाले जंगलों में जाकर धतूर, बेर, बेलपत्र और बेल तोड़ा करता था। मेरा पूरा परिवार और सच कहूं तो बाग-बगिया से लौटते समय राह में टकराने वाले कमोबेश हर शख्स को मैं पूजा के लिए कुछ सामग्री दे दिया करता था। मगर हर साल पेड़ों की संख्या कुछ कम होती गई। दोस्त भी कमाने के चक्कर में शहर छोड़ते गए। ऐसे में पिछले वर्ष तक मैं बाग से पूजन सामग्री लेकर आता रहा। मगर आज जब जागा तो पता चला कि अब तो उधर की ओर कोई पेड़ बचा ही नहीं है। घर में कुदरत से मिलने वाली पूजन सामग्री को बाजार से खरीदकर लाया गया था। मैंने पूजा करने का मन त्याग दिया। न जाने क्यों मगर कुछ चुभ गया। तब समझ में आया कि हम जो बस्तियों को यूं ही बढ़ाते जा रहे हैं, उसके साथ ही हम क्या गंवाते जा रहे हैं।
सीखने का क्रम अभी जारी ही रहा। शाम के समय मैं मन हल्का करने के लिए खेतों की ओर चल पड़ा। देखा कुछ पेड़ काटे जा रहे थे। पता चला कि वहां पर कोई सज्जन अपना बसेरा बनाने वाले हैं। मन नहीं हुआ टहलने का तो घर लौट आया। जब न्यूक सुनने के लिए प्राइम टाइम शुरू होने का इंतजार खत्म हुआ तो पता चला कि एनडीटीवी बीते कुछ दिनों से ऑन एयर नहीं है। उधर, जी टीवी पर सुधीर जी अपने मातहत सुभाष चंद्रा के साथ मिलकर खबरों का डीएनए पेश कर रहे थे। इसमें जो सीखना था वह सीखा।
खैर, बात से सुभाष जी ने सही कही कि देशवासियों को अब चुप नहीं रहना चाहिए। मसलन, जहां कहीं भी खेत और बगिया को उजाड़ कर नियम के विपरीत कागज बनवाकर बस्ती बसाई जा रही हो, उसके खिलाफ बोलें। देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता के मसले पर हकीकत को समझें और अपने विचारों को उड़ान दें। फिर विचारों को शब्दों में उकेरें या बुलंद जुबान दें। जमीनी स्तर पर ‪#‎wakeupindia‬ तभी हो पाएगा। मगर एक सच बताने की बड़ी इच्छां हो रही है, वह यह कि #wakeupindia तभी सफल हो सकेगा जब देश भ्रष्टााचार से मुक्त हो सकेगा। सरकारी नौकरी सिर्फ विज्ञापनों में दिखने के बजाय बेरोजगारों को सच में मिलने लगे तो समझ लीजिएगा कि सरकार ने भी कह दिया है #wakeupindia।
वैसे एनडीटीवी बंद क्यों हुआ, इस पर कोई जानकारी हो तो शेयर करें।

Friday, March 4, 2016

ईपीएफ पर सरकार की बेवकूफियत

एनडीए सरकार की कोशिश आम आदमी के ईपीएफ से खिलवाड़ है. फोटो गूगल से उधार है.
मेरा मानना है कि ऐसा कोई भी रुपया जिसका आप उपभोग नहीं कर पाते हैं तो उस धन का आपके लिये होना या न होना एक समान है। इसीलिये मैं मरने के बाद इंश्योरेंस कंपनी की ओर से परिवार को जारी किये जाने वाले फंड को दिली तौर पर तो अच्छा फैसला मानता हूं मगर दिमागी तौर पर नहीं, क्योंकि उस रकम को जमा करने वाला तो बिना किसी उपभोग के ही चल बसा। खैर, यह मेरी व्यक्तिगत सोच हो सकती है। वहीं, मेरे लिये अब उपभोग से तड़पकर रह जाने वाले रकमों की इस सूची में ईपीएफ की रकम को जोड़ देना बेहतर होगा, गवर्नमेंट ने कुछ ऐसा प्लान किया है, जिससे कि कर्मचारी जीवन के अंतिम दिनों को सुदृढ़ बनाने के लिये जिस ईपीएफ पर निर्भर रहता है उसकी निकासी को भी टैक्स के घेरे में ला खड़ा किया है। सरकार की ओर से असमंजसता को जाहिर करते हुये दलीलें तो दी जा रही हैं मगर ईपीएफ पर टैक्स का पहरा हटाने की बात अब तक नहीं की गई है।

केंद्र सरकार के दूसरे आम बजट में यूं तो किसानों को वरीयता देते हुये अच्छा क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। मगर ईपीएफ की निकासी पर टैक्स का पहरा लगा देना कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। पूरी जिंदगी जिस फंड को एक कर्मचारी हर महीने की तंगी से जूझते हुये इकट्ठा करता है, उसे लेने के समय भी 60 फीसदी हिस्‍से पर टैक्‍स की सख्ती लागू करना सरकार की ज्यादती ही है। 60 साल तक कतरा-कतरा जीने के बाद रुपया निकालने के समय कानूनी शिकंजा कसना, मेरी समझ से परे है। इस संबंध में सरकार की ओर से जल्‍द ही सकारात्‍मक कदम उठाते हुये ईपीएफ की निकासी पर टैक्स का दायरा खत्म कर देना चाहिये। हो सकता है कि सरकार का गणित मुझे समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन, बुढ़ापे के समय भी अपना जमाधन पाने से बचने के लिये टैक्स देना, मैं और मेरे जैसे साधारण कर्मचारी यकीनन नहीं समझना चाहेंगे।


हर महीने कर्मचारी यह सोचते हैं कि भले ही सैलरी से वह रकम जो ईपीएफ के लिये काटी जा रही है, वह ज्यादा है मगर कुछ तो बचत हो रही है। वह स्वयं को हमेशा यही दलील देता है कि एक समय के बाद शरीर कमजोर हो जाएगा तो वही रकम हमें राहत देगी। वह पूरा जीवन उस रकम को सपने का धन समझकर भुलाये रहता है। मगर सरकार ने ईपीएफ को भी आयकर के दायरे में लाकर आम आदमी के उस भरोसे के साथ खिलवाड़ किया है। इस संबंध में उचित फैसला किया जाना चाहिये। आम आदमी को इस बारे में सरकार इस बारे में अपना पूरा स्पष्टीकरण दे तो बेहतर होगा। रही बात पंद्रह हजार रुपये की आमदनी वालों को राहत देने की तो सरकार को यह समझना चाहिये कि मिनिमम वेज पर महंगाई इतनी ज्यादा हावी है कि वह हर महीने जिंदगी में ख्वाहिशों की न्यूनता को मुंह चिढ़ाती सी प्रतीत होती है। ऐसे में उन्हें राहत देने से बेहतर है कि सरकार कुछ ऐसा प्रावधान करे कि जनता को लाचारगी का अहसास न हो, उसके बाद मजे से टैक्स लेते रहो। यदि का जनता की जेब भरने में सरकार कामयाब होती है तो जनता भी खुले दिल से आयकर का जिम्मा निभाने को तैयार है।

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...