Monday, May 18, 2015

ये कैसा जेहाद हुआ?

फोटो गूगल से 'उधार'
हर तरफ है खून-ओ-लाश
प्रकृति का करते हाे नाश
लाश की बस आती है बास
                                  ये कैसा जेहाद हुआ?
हर तरफ है शोर-ही-शोर
आतंक से बचा नहीं कोई कोर
मानव धर्म का नहीं है जोर
                                  ये कैसा जेहाद हुआ?
ये कैसी-किसकी माया है
मौत का फैसा साया है
ये 'धर्म' कहां से आया है
                                  ये कैसा जेहाद हुआ?
अब न करो माहौल गर्म
करनी पर लाओ थोड़ी शर्म
ऐसा नहीं कहता कोई धर्म
                                  ये कैसा जेहाद हुआ?
हर धर्म के लोग रोते हैं
बच्‍चे सहमकर जीते हैं
डर के माहौल में रहते हैं
                                  ये कैसा जेहाद हुआ?
अब तो रोको अपने बढ़े कदम
धरती को तुम करो न नम
हाथ तेरा थामेंगे हम
                                  ये कैसा जेहाद हुआ?

Thursday, April 23, 2015

शामियाने में किसी ने भी कदम क्यों नहीं रखा?

गांव कनेक्‍शन अखबार की संपादकीय में मिला स्‍थान।।।। 
जहन में दबी ये यादें हैं मई, 2014 की। मेरी दादी का देहावसान हो गया था। उन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम पल बिहार में स्थित मेरे गांव यानी अपने ससुराल में बिताना पसंद किया था। लखनऊ में रह रहे उनके बड़े बेटे यानी मेरे पिताजी को जैसे ही उनकी मौत की खबर मिली, वे गांव को चल पड़े। मगर मैं छुट्टी न मिल पाने कारण उनकी तेरही में ही शामिल हो सका था। उस दौरान मैंने देखा कि जाति में ऊंच-नीच की दीवार ने बिहार का माहौल कैसा बना रखा है. 

चूंकि, मैं शुरुआत से ही लखनऊ में रहा था, इसलिए मुझे बिहार में भोज या श्राद्ध के दौरान निभाए जाने वाले जातिवादी भेदभाव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. नतीजतन, मैं शूद्र जाति के बच्चों और बड़ों को श्राद्ध के भोज के लिए बुलाता रहा और उन्होंने कातर नजरों से मुझे देखते हुए कथित कुलिष्ठों के लिए बनाए गए शामियाने से दूरी बनाना ज्यादा उचित समझा। 

बिहार में मोतिहारी जिले के अंतर्गत आने वाले अरेराज क्षेत्र के सरेयां गांव में ही हमारे परिवार की नींव है। हम सभी दादी के निधन के बाद पटिदारों को भोज कराने के लिए एकत्र हुए थे। इसी बीच मुझे बिहारवासियों की जिंदगी में जाति के कोढ़ की पीड़ा को समझने का अहसास हुआ। मैंने ज्यों ही भूख से बिलखते बच्चों को उच्च जाति के लोगों के लिए बनाए गए शामियाने में आकर खाने का इशारा किया, त्यों ही पंडाल में मौजूद सभी ब्राह्मण और ठाकुरों का मुंह बन गया। उन्हें लगा कि अब मैं लखनऊ का हूं और अपनी हद से बाहर जाकर उनके भोज के स्वाद को चौपट करने की फिराक में हूं। खैर, इस बात को सभी निम्न जाति के बच्चों तक को पता था कि यदि वे पंडाल के अंदर कदम भी रखेंगे तो हंगामा हो जाएगा। इसीलिए सभी अपनी जगह पर कांठ मारे खड़े रहे।

फिर क्या था, हमारी पटिदारी के वरिष्ठों ने कहा कि बेटा यहां सभी जाति के लोग एक ही पांति में नहीं खाते। बेहतर है कि इन्हें या तो हम लोगों के खाने के बाद बुलाना या फिर दूर कहीं खुले में बैठा दो ताकि तुम्हारा भी मन रह जाए। लेकिन, इन्हें इस शामियाने में मत बुलाओ। इतना सुनते ही मुझे इस बात का अहसास हो गया कि बिहार में भले ही सड़कें डामर की बन गई हों। भले ही कई जगहों पर बाढ़ से निपटने के लिए कारगर व्यवस्था अपना ली गई हो। भले ही कई सुदूर गांवों में बिजली की चकाचौंध मिल गई हो। इसके बाद भी वहां की जिंदगी में जातिवादी का दंश गहरे तक धंसा हुआ है। आलम यह है कि वहां के दलितों में से किसी ने इस प्रथा के खिलाफ बोलना उचित नहीं समझा। सभी ने श्राद्ध भोज के लिए कतार में खड़े होकर इंतजार करना ज्यादा मुनासिब समझा। किसी को भी इसमें स्वाभिमान पर हमला नहीं महसूस हुआ। सभी उलटा मुझसे कहने लगे कि बाबूसाब और बाबाजी लोग पहले खा लें, हम लोग तो बाद में ही खाएंगे। इसके बाद मैंने खुद को उस भोज से दूर ही रखा। मेरा मन खट्टा हो गया था। मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा बिहार की जिंदगी का यह रूप। मन में एक सवाल आज भी टीस देता है कि उन लोगों को इसमें अपमान का अहसास क्यों न हुआ? वे इस व्यवहार को ही अपनी नियती क्यों समझते हैं? क्यों इस तरह की प्रथा का अंत नहीं हो पाता? आखिर, विरोध जताते हुए शामियाने के अंदर कोई आया क्यों नहीं?

Saturday, March 28, 2015

तुझमें इच्‍छाशक्ति है

तू ऐसे क्‍यों रोता है
रेत हाथ से खोता है
कांटे क्‍यों तू बोता है
                         तुझमें इच्‍छाशक्ति है। 
अपनी क्षमता को पहचान
अपने मन में देखो मान
तू प्रभु की है संतान
                         तुझमें इच्‍छाशक्ति है। 
लगता क्‍यों तू हारा सा
'जीवन' का हत्‍यारा सा
बहे चला जा धारा सा
                         तुझमें इच्‍छाशक्ति है। 
वर है यह जीवन तेरा
जिसे तेरे तम ने घेरा
हार है कालचक्र का फेरा
                         तुझमें इच्‍छाशक्ति है। 
जग से क्‍यों तू भाग रहा
दुख दर्दों का मारा सा
आसमां के टूटे तारा सा
                         तुझमें इच्‍छाशक्ति है। 
अभी स्‍वस्‍थ तेरी 'स्‍नायु' है
सामर्थ्‍य से ज्‍यादा वायु है
तेरी इच्‍छा ही दीर्घायु है
                         तुझमें इच्‍छाशक्ति है। 

21 अप्रैल, 2006 को डायरी में लिखी इस कविता को आज कर रहा हूं पेश।।।
#लिखने_की_बीमारी_है।।।। 

Friday, February 6, 2015

किरण ने 'बेदी' के लिए तमगा 'त्यागा'

नीरज तिवारी
कभी केजरीवाल की जय-जयकार करती थीं किरण बेदी
दिल्ली के दंगल में एक बात तो साफ है कि इस चुनावी रणभेरी में कई चेहरे बेनकाब हो रहे हैं। मसलन, किरण बेदी, जिन्होंने अपने करियर में हमेशा ही झूठी उपलब्धि हासिल करके रखी कि उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी का चालान किया था। उन्होंने सालों तक यह बात छुपाकर रखी कि उन्होंने वह चालान नहीं किया था। उन्होंने कभी भी किसी भी मंच से खड़े होकर इस बात को स्वीकार नहीं किया कि उनके बारे में जो यह निर्भयी आईपीएस अफसर होने की गाथा गाई जाती थी वह गलत है। उन्होंने हमेशा ही इस इतिहास को अपनी सफलता का तमगा बनाए र
खा। अलबत्ता उन्होंने अपने इस कथित इतिहास को अपने ट्वीटर अकाउंट की प्रोफाइल में सजा रखा था। इसमें यह बात जानने योग्य है कि ज बवह आम आदमी पार्टी के मंच से भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ जहर उगला करती थीं तब भी वह अपनी इस झूठी गाथा को लोगों के सामने बयां नहीं कर पाईं। उन्होंने दूसरों पर तमाम तरीके के आरोप तो मढ़े लेकिन कभी अपने गिरेबान में झांक कर देखने की जरूरत नहीं समझी। हो सकता है कि एक अच्छी महिला आईपीएस अफसर हों। हो सकता है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कई झंडे गाड़े हों, मगर यह तो अब कभी भी नहीं हो सकता कि वह इंदिरा गांधी के अपने प्रकरण के बारे में जनता से आंखें मिला सकें। उन्होंने अपने इस एक झूठ से दिल्ली की जनता के साथ ही बड़ी संख्या में लोगों का दिल तोड़ा है। इत्तिफाक से इसमें मैं भी शामिल हूं।

समय को देख बदलती गईं फैसला
दरअसल, आम आदमी पार्टी के मंच के ऐसे ही कई सितारों ने राजनीति की दिशा में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने के साथ ही यदि अपने अंदर छुपे ही भ्रष्ट मानसिकता को भी त्याग दिया होता तो ऐसी घटनाओं के बारे में पुनरावृत्ति होने के आसार ही नहीं होते। अच्छा हुआ जो किरण बेदी ने भाजपा का दामन थाम लिया। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यदि चुनाव के बाद मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल और योगेंद्र यादव यदि किरण बेदी को मनचाहा पद न देते तो उनके दल के अंदर और भी भयावह दलदल बन जाता। जो केजरीवाल के दल के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता। दरअसल, किरण बेदी के अंदर पद और चर्चा में बने रहने की भूख कभी खत्म नहीं हुई। यदि ऐसा न होता तो किरण अपनी आईपीएस की बेदी पर बैठे रहने के दौरान इंदिरा गांधी प्रकरण का उजागर कर चुकी होतीं। वह अपने रिटायरमेंट से कुछ समय पहले किसी और को दिल्ली का डीजीपी बनाए जाने पर नाक-भौं न सिकोड़तीं। वह केजरीवाल के साथ बने रहतीं। उन्हें जब लगा कि अन्ना आंदोलन से जुड़कर वह सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए मीडिया में सुर्खियां बटोर लेंगी तो उन्होंने अन्ना हजारे के साथ मंच साझा कर लिया। जब उन्हें यह लगा कि वह अन्ना के साथ रहकर कोई बड़ा लाभ नहीं हासिल कर पाएंगी तो उन्होंने अरविंद केजरीवाल और स्वयंभू समाजसेवियों के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी की नींव डाल दी। मगर उनकी इच्छाओं का अंत यहीं नहीं हुआ। उन्हें एक बार फिर जब यह एहसास हो गया कि केजरीवाल की पार्टी में मुख्यमंत्री का पद सिर्फ केजरीवाल ही हासिल करेंगे तो उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए पहले किरण बेदी ने अन्ना हजारे के विचारों को अपनाया। फिर उनकी खिलाफत करते हुए अरविंद केजरीवाल को सही करार दिया। और अब तो हद ही हो गई क्योंकि संसदीय चुनाव के दौरान जिन नरेंद्र मोदी को झूठा, फेंकू और गुजरात के नाम पर लोगों को बरगलाने वाला करार दिया था। आज वह उन्हीं मोदी की तारीफ करते नहीं थकतीं। उन्होंने भारत देश की उन असंख्य बेटियों का ख्वाब तोड़ा है जो यह मानती आ रही थीं कि उन्हें अपनी शिक्षा और काबिलियत के दम पर किरण बेदी की तरह नाम कमाना है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि किरण बेदी ने भाजपा का चोला ओढ़ने के साथ ही एक मंच से बयान दिया था कि उनकी यह किस्मत है कि उन्हें भाजपा ने अपना लिया। यानी वह तो किस्मत का दिया ही खा रही हैं। उन्होंने कोई भी सफलता अपनी मेहनत के दम पर हासिल नहीं की है। बेहतर होगा कि दिल्ली की जनता को ऐसा मुख्यमंत्री न मिले। किरण बेदी हार जाएं तो उन्हें इस बात का इल्म हो जाएगा कि उन्होंने लोगों के सामने झूठी शान का दिखावा करके अपनी कितनी बड़ी ख्याति और साख खो दी है। 

अदूरदर्शी हैं केजरीवाल
वहीं, आप के सिरमौर अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनावी घोषणापत्र को जिस अंदाज में जनता के सामने परोसा है उसे देखकर लगता है कि आप वाले बिना किसी विश्लेषण के ही नतीजे हासिल कर लेते हैं। कमाई का श्रोत कम और घोषणाओं का अंत ही नहीं होता। लोगों को आज की तारीख में झूठ बोलने वाला भी ऐसा चाहिए जो यह जानता हो कि आटा गूंथने के लिए कितने पानी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह तो सही है कि कोई भी चुनावी घोषणापत्र किसी भी दल के नेता द्वारा जीत जाने के बाद पूरा नहीं किया जाता। मगर जनता से ऐसा भी क्या झूठ बोलना कि वे आप पर हंसने लगें। अंत में मैं केजरीवाल को किरण बेदी और बिन्नी जैसे पद के लालची लोगों से दूर रहने की सलाह देने के साथ ही यह सुझाव भी देना चाहूंगा कि बेहतर होगा यदि वह लोगों को विकास का पथ दिखाने से पहले उसके काल्पनिक पहलुओं को भी जांच लें। इस दंगल में भाजपा ने किरण बेदी पर दांव लगाकर उन्हें बली का बकरा तो घोषित कर ही दिया। साथ ही, केजरीवाल ने अपने मैनिफेस्टो के आधार पर यह जता दिया कि उनमें दूरदर्शिता का अभाव कूट-कूटकर भरा हुआ है।

चुटकुला तो बनता ही है...
अंत में एक चुटकुला याद आ गया, केजरीवाल ने किरण बेदी को एक चिट्ठी लिखी कि क्या बेदी जी आप यदि हमारी पार्टी में रहती तो कम से कम आपसे इंदिरा गांधी का चालान करने का तमगा तो कोई न छीनता। आपने तो भाजपा को अपनाते ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि को गंवा दिया। अभी भी समय है नहीं तो यह भाजपा आपसे कहीं पहली महिला आईपीएस होने का भी गौरव न छीनवा ले। 
आपका शुभचिंतक 
अरविंद केजरीवाल
रायते कर शौकीन, आम आदमी

Saturday, January 17, 2015

विकृत बच्‍ची की कब्र को बना दिया मंदिर

बच्‍ची के जन्‍म के साथ ही शुरू हाे गया था धर्म का धंधा
उत्‍तर प्रदेश के लखनऊ जिले के सरोजनी नगर क्षेत्र स्थित मुल्लाहीखेड़ा गांव में 11 मई, 2000 दिन वृहस्पतिवार को को राम नरेश और श्रीमति के घर में ही एक विकृत बच्ची का जन्म हुआ। उस बच्ची का शरीर कुछ ऐसा था कि वह पलथी मारकर बैठी हुई थी। उस सिर उसके धड़ में धंसा हुआ था। बच्ची का ऐसा रूप देखकर ग्रामीणों में हलचल मच गई। चर्चा का बाजार कुछ ऐसा गर्म हुआ कि कुछ घंटे में ही लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। देखते ही देखते वहां लोगों ने चढ़ावा चढ़ाना शुरू कर दिया। मगर परिजनों के काफी जुगत के बाद भी उस अबोध को बचाया न जा सका। फिर क्या था, आस्था पर अंधविश्वास की चादर चढ़ गई और मुल्लाहीखेड़ा से ही सटे बिजनौर रोड स्थित ग्रामसमाज की जमीन पर बच्ची के शव को दफना कर कालीजी के मंदिर का निर्माण कर दिया गया।

और हो गया काली मंदिर का निर्माण
हर साल लगता है मेला
इस घटना के बाद परिजनों ने चंदा जमाकर और स्थानीय लोगों व ईट भट्ठों की मदद से एक मंदिर का निर्माण कराना शुरू कर दिया। जन्म से 24 घंटे के बाद से शुरू हुआ अंधविश्वास का यह पूजन आज मंदिर का रूप ले चुका है। बच्ची के पिता पेशे से नाई थे। मगर फिलवक्त वे एक कंपनी में मजदूरी करते हैं। वहीं, इस कथित मंदिर पर हर वर्ष नवरात्रि के समय एक मेले का आयोजन करते हैं। इस दौरान किसी वर्ष रामचरितमानस का पाठ किया जाता है तो कभी कीर्तन। इसके लिए बाकायदे चंदा जमा किया जाता है। लोग अपनी हैसियत के मुताबिक, उस बच्ची की कब्र से मुरादें मांगते हैं और भजन-पूजन करते हैं। 

मंदिर के विकास को लेकर है दुविधा
ग्रामसमाज की जमीन पर धर्म के नाम पर चल रहे इस काम के विकास के लिए लोग ज्यादा मदद नहीं करते। ऐसा कहते हैं बच्ची के दादा प्रेम और उसकी मां श्रीमति। उनका कहना है कि लोग धर्म के नाम पर अब भी चंदा देने से थोड़ा संकोच करते हैं। फिर भी मंदिर का विकास हर साल दो  कदम आगे की दिशा तय कर लेता है। पूरे परिवार का यही सपना है कि जल्द से जल्द इस मंदिर को भव्य रूप देकर उस विकृत बच्ची का सपना पूरा कर लिया जाए। हालांकि, उस नवजात के सपने के बारे में उन्हें कैसे पता चला के सवाल पर वे चुप्पी साध लेते हैं।

पिता पर होती है सवार
अन्य किस्से-कहानियों की तरह इस मंदिर के साथ भी एक कहानी पता चलती है। पूछने पर बच्ची के दादा प्रेम बताते हैं कि आज भी वक्त-बेवक्त उस बच्ची की आत्मा अपने पिता पर सवार हो जाती है। वह उनसे मंदिर का त्वरित निर्माण और उसके ज्यादा से ज्यादा प्रचार की आवश्यकता के लिए आदेश देती है। उस दौरान बच्ची के पिता लोगों के भविष्य के बारे में भी बताना शुरू कर देते हैं। कई लोग इस दौरान उनसे अपना भाग्य जानने के लिए एकत्र होते हैं और चढ़ावा चढ़ाकर लौट जाते हैं। यानी 24 घंटे तक जिंदा रहने वाली एक विकृत बच्ची ने परिवार को जीवन जीने का लक्ष्य और मंदिर के निर्माण का रास्ता दिखा दिया। हालांकि, इस पूरे मसले पर पूछने पर प्रधान संतोष सिंह कुछ नहीं बोलते। वे बस आस्था और लोगों के विश्वास की दुहाई देकर चुप हो जाते हैं।


एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...