Saturday, July 8, 2017

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।    

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 
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आज का पोस्‍ट अवध के अश्‍लील इतिहास को बयां करता है. मगर यह कहना उचित होगा कि यह इतिहास भले ही अश्‍लील हो मगर नवाबों का रंगीन मिजाज और उनकी कला के प्रति प्रेम को बयां करने के लिए काफी कारगर है. यह प्रथा थी 'हिचकारे' की. आलम यह था कि हिचकारों को जितना धन नवाब और राजा देते थे उतना तो वे अपनी कनीजों और वेश्‍याओं पर भी खर्च नहीं किया करते थे. 

दरअसल, फैजाबाद में नवाब शुजाउद्दौला के हरम में बेतादाद स्‍त्रियों के प्रवेश, तरुण रति कामना में तमाम लड़कों को ख्‍वाजासरा (जनान-खाने की रखवाली करने वाला) बना देना आदि प्रक्रियाएं इसी सफर की शुरुआत कही जा सकती है. अवध के प्रथम बादशाह गाजाउद्दीन हैदरन अपनी सनकी व्‍यवहार व अफीम की लत के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, उनकी बेगमों की भी अच्‍छी खासी संख्‍या थी. वहीं, उनके बेटे बादशाह नसीरुद्दीन हैदर अपनी औरत परस्‍ती व एय्याशियों के लिए मशहूर रहे थे. नई-नई लड़कियों को ब्‍याह कर लाना उनका शौक था. यहां तक की एक समय के बाद उन्‍होंने दुल्‍हन को विदाई के लिए जाना भी छोड़ दिया था. शादी के नाम पर उनकी तलवार ही गाजे-बाजे के साथ ससुराल भेज दी जाती थी. फिर दुल्‍हन की डोली सीधे उनके शयन कक्ष में भेज दी जाती थी. 

इस तरह के रसिक क्रिया-कलापों को सबसे अधिक प्रोत्‍साहन मिला 'जान-ए-आलम' के जमाने में. इस दौर को अवध के इतिहास में विलासिता की पराकाष्‍ठा के तौर पर जाना जाता था. नवाब वाजिद अली शाह की पुस्‍तक परीखाना में इस विलासिता के बारे में काफी गहराई से वर्णन किया गया है. मर्दानगी बरकरार रखने वाली दवाओं के सौदागर आज तक वाजिद अली शाही गोलियां और किमाम उनके नाम से बेच रहे हैं. 

इन दवाओं के अलावा यौन इच्‍छा को बढ़ाने के लिए लखनऊ में एक नई परम्‍परा की शुरुआत की गई थी. इसे हिचकारों का नुस्‍खा कहा जाता है. हिचकारे एक पद हुआ करता था. इस पर मालिश करने वाले लड़कों की तैनाती की जाती थी. उनके पास स्‍त्रियों की अत्‍यधिक सोहबत करने से थके हुए लोगों में भी जोश जगाने का हुनर होता था. 

राजपूत युग में जिस तरह रणभूमि में उतरने वाले राजा का उत्‍साहवर्धन चारण या भाट किया करते थे उसी तरह अवध के पतनशील युग में रति क्रिया के दौरान नवाबों में जोश जगाने के लिए हिचकारे प्रयुक्‍त किए जाते थे. वे सहवास कर रहे नवाब के पलंग के नीचे लेट जाया करते थे. फिर जब पलंग के ऊपर नवाब संभोग कर रहे होते थे तब ये हिचकारे अश्‍लील काव्‍य गाकर उनमें जोश पैदा करते थे. हालांकि, उस दौरान उन्‍हें पलंग के नीचे से बाहर आने की इजाजत नहीं होती थी. ये अपने काव्‍य की रचना से पुरुष की मर्दानगी का खूब बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया करते थे. वे काव्‍य के बीच में तरह-तरह से अश्‍लील आवाजें भी निकाला करते थे. नवाबी दौर के गुंचा, दिलबर, प्‍यारे, घमासान गुलगुले आदि उस दौर के चर्चित हिचकारे थे. 
इन्‍हीं में से एक संगम नामक एक हिचकारे के अश्‍लील काव्‍य उस समय सबसे ज्‍यादा चर्चा में आए थे. संगम अपने हुनर में बहुत माहिर था. यहां यह बताना जरूरी है कि हिचकारों का प्रवेश कभी घर के आंगन में या ब्‍याहता बीबियों के संदर्भ में नहीं होता था. हिचकारे बाजारू औरतों के आस-पास या फिर देह संसर्ग के अन्‍य ठिकानों पर ही अपना काम करते थे.
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अंत में संगम के गाए अश्‍लील दोहे की एक झलक... 
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तन गोरा मुख सांवरा, बसे सरोवर तीर 
पहिल लड़ाई उइ लड़ें, एक नाम दुई बीर।
और करे अपराध कोई, और कोई फल पाहिं 
नैन सैन करि झुकि रहे, उरज उमेंठे जाहिं।  
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ)
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।

Wednesday, July 5, 2017

क्‍या खत्‍म हो जाएगा अफ्सपा कानून का फरमान?


नीरज तिवारी 

विवादित अफ्सपा (AFSPA) कानून को केंद्र सरकार धीरे-धीरे समाप्‍त करने की योजना में है. इस कानून को लेकर कई बरसों से विभिन्‍न सामाजिक संगठन आवाज बुलंद करते रहे हैं. हालांकि, सेना ने इसे देश विरोधी ताकतों को काबू में रखने का अचूक 'हथियार' ही माना है. सबसे पहले ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए अफ्सपा को अध्यादेश के जरिए 1942 में पारित किया था.
दरअसल, गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, आर्म्‍ड फोर्सेस स्‍पेशल पावर एक्‍ट यानी अफ्सपा को असम व अरूणांचल प्रदेश से टुकड़ों-टुकड़ों में हटाने की कोशिश में है. इस संदर्भ से मंत्रालय ने भाजपा शासित राज्‍यों से उनकी राय मांगी है. हालांकि, जम्‍मू कश्‍मीर में इस कानून को हटाने की रणनीति पर चर्चा नहीं की गई है. इस बारे में मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि अब राज्‍यों की राय का इंतजार किया जा रहा है. इसके बाद ही कोई उचित कदम उठाया जाएगा. इस बारे में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू का कहना है कि अरूणांचल प्रदेश से इस कानून को हटाने के लिए केंद्र पूरी तरह से तैयार है. हालांकि, नगालैंड व म्‍यांमार में इस राहत को लाने की कोई योजना नहीं है. 
बता दें कि अफ्सपा कानून के तहत आर्मी व अन्‍य केंद्रीय बलों को इसका पूरा अधिकार हासिल होता है कि वह विवादित क्षेत्रों में किसी को भी कानून की खिलाफत करने पर गोली मार सकते हैं. बिना किसी सर्च वॉरेंट के घरों की तलाशी ली जा सकती है. शक के आधार पर ही किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है. यही कारण है कि विभिन्‍न सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों को यह कानून रास नहीं आता है. वहीं, सेना ने इसे एक काबिल कानून की संज्ञा दे रखी है. यहां यह भी जानना जरूरी है कि यह कानून नगालैंड, असम, मणिपुर (इम्‍फाल के सात विधानसभा क्षेत्रों को छोड़कर) में लागू है. वहीं, अरूणांचल प्रदेश के 16 थानाक्षेत्रों में प्रभावित है. उधर, असम के तिरप, लौंगडिंग और चैंगलैंग जिलों में इस कानून को लागू किया गया है. इससे इतर त्रिपुरा ले वर्ष 2015 में इस कानून को अपने यहां से हटा दिया था. साथ ही, मेघालय का सीमावर्ती क्षेत्र जो असम के बीस किलोमीटर के दायरे में आता है वहां इसे लागू किया गया है. 
भारत में संविधान की बहाली के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रहे अलगाववाद, हिंसा और विदेशी आक्रमणों से प्रतिरक्षा के लिए मणिपुर और असम में वर्ष 1958 में अफ्सपा लागू किया गया था. वर्ष 1972 में कुछ संशोधनों के साथ इसे लगभग सारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में लागू कर दिया गया. अस्सी और नब्बे के दशकों में पंजाब और कश्मीर में भी राष्ट्रविरोधी तत्वों को नष्ट करने के लिए अफ्सपा के तहत सेना को विशेष अधिकार प्रदान किए गये. इस क़ानून के सेक्शन 3, 4, 6 और सेक्शन 7 पर विवाद रहा है. सेक्शन 3 के अंतर्गत केंद्र सरकार को ही किसी क्षेत्र को ‘डिस्टर्बड’ घोषित करने का अधिकार है. राज्य सरकारों की इसमें कोई ख़ास भूमिका नहीं होती. वहीं सेक्शन 4 आर्मी को बिना वारंट के हिरासत में लेने, किसी भी वाहन की जांच का अधिकार और उग्रवादियों के ठिकानों का पता लगाकर नष्ट करने का अधिकार देता है. सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम का सेक्शन 6 फ़ौज को संबंधित व्यक्ति की संपत्ति जब्त करने और गिरफ्तार करने का अधिकार देता है जबकि सेक्शन 7 के अनुसार इन मामलों में अभियोजन की अनुमति केवल केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृति के बाद ही होती है. 
साल 2005 में जीवन रेड्डी कमेटी और वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्टों में सेना और सुरक्षाबलों पर काफी गंभीर आरोप लगाए थे. इसी आधार पर अफ्सपा पर रोक लगाये जाने की मांग की गई थी, जिससे रक्षा मंत्रालय और सेना ने असहमति जताते हुए सिरे से नकार दिया. यह एक्ट सुरक्षा बलों को सशक्त करता है. इसी वजह से नगालैंड, पंजाब और कश्मीर में शांति बहाली में काफी सफलता मिली है. माना जाता है कि अधिकतर आरोप अलगाववादियों की साजिश के तहत लगाये जाते हैं और सिर्फ तीन फीसदी मामलों में ही सेना पर लगाए गए आरोप सही पाए गये हैं. जम्मू-कश्मीर के नेशनल कांफ्रेसं, पीडीपी और वाम दलों सहित देश के कई राजनीतिक दलों ने अफ्सपा एक्ट में संशोधन की मांग की है. हालांकि इस पर केंद्र सरकारों ने कभी सहमति नहीं जताई है. यही नहीं वर्ष 2000 में इम्फाल में कथित तौर पर असम राइफल्स के जवानों ने 10 लोगों पर गोली चला दी थी. इसके विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मीला पिछले 16 सालों से आमरण अनशन कर रही थीं. हाल में हुये विधानसभा चुनाव में भी उन्‍होंने इस कानून के खिलाफ लड़ने का मन बनाते हुए चुनाव लड़ने का मन बनाया था. मगर जनता ने उन्‍हें अस्‍वीकार करते हुए इतने कम वोट दिए जिससे उनकी जमानत तक जब्‍त हो गई. इसके बाद बुद्धिजीवी वर्गों में इस बात को लेकर बहस ने जोर पकड़ लिया था कि जनता की भलाई के लिए इतने बरसों तक अनशन करने के बाद जनता ने इतनी बुरी तरह से क्‍यों नकार दिया.  
इस विवादित कानून को लेकर अब तक कई कमेटियों का गठन किया जा चुका है. इसके तहत जनवरी 2013 में गठित की गई सतोष हेगड़े कमीशन ने मणिपुर में हुए छह एनकाउंटर की जांच की थी. आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए सभी लोगों में एक भी ऐसा आदमी नहीं था जिसका कोई आपराधिक इतिहास रहा हो. आयोग ने अपनी सिफारिश में यह भी कहा था कि इस कानून को 'डिस्‍टर्ब' क्षेत्र में लागू करने के बाद हर छह माह पर जरूरत के मुताबिक संसोधित किया जाना चाहिए. वहीं, जस्‍टिस जीवन रेड्डी आयोग ने अफ्सपा कानून को घृणा और उत्‍पीड़न का सबसे बड़ा साधन करार दिया था. हालांकि, केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई फैसला नहीं है. वहीं, अफ्सपा कानून के तहत किए गए एक एनकाउंटर की सुनवाई में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने अपने ऐतिहासि फैसले में कहा था, 'अफ्सपा कानून के तहत ऑर्म्‍ड फोर्सेस यदि किसी का एनकाउंटर करती है तो यह जांच का विषय होना चाहिए. इससे इस बात का कोई संबंध नहीं है कि गोली का शिकार एक आम आदमी है या आतंकी. कानून सभी के लिए समान है. लोकतंत्र को कायम रखने के लिए यह जरूरी है.'
यूं तो अफ्सपा कानून को लेकर तमाम तरह की समर्थन में या विरोध में दलीलें दी जा चुकी हैं. मगर किसी भी सेना से हाथ बांधकर आपराधिक तत्‍वों को शांत रखने की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है. ऐसे में अफ्सपा में कुछ संशोधन की बात तो जरूर की जा सकती है मगर इसे पूर्णतया हटा देना देश की आंतरिक सुरक्षा के नजरिये से उचित नहीं होगा. 

Tuesday, July 4, 2017

लखनऊ के चिकन का बड़ा रोचक है इतिहास

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 
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लखनऊ हमेशा से ही अपने इमामबाड़ों चिकन की कारीगरी के लिए जाना जाता है। इन दोनों के बीच का गहरा रिश्‍ता भी है। दरअसल, राजधानी के वजीरबाग के पास उजड़ा पड़ा 'मुगल साहिबा का इमामबाड़ा' अब उजाड़ नजर आता है। मगर यह इमामबाड़ा अस्‍तरकारी की कला का बेहतरीन नमूना है। इसे बेशुमार नर्मनाजुक गुलबूटों का एक संग्रहालय कहा जा सकता है। इस इमामबाड़े के दरवाजे और दीवार तो अब समय से लड़ते हुए व रखरखाव के अभाव में ढेर हो चुके हैं मगर इसके अवशेष को देखने पर ही इसमें की गई नक्‍काशीदार कारीगरी बरबस सोचने पर मजबूर कर देती है। आलम यह है कि चिकन के कारीगरों ने करीब 150 साल तक इसमें से डिजाइन को नकल कर चिकन के कपड़ों पर उकेरा है। आज भी इसकी टूटी-फूटी दरो-दीवार से चिकन की कारीगरी के लिए फूल व पत्‍तियों का डिजाइन नकल किया जाता है। 
फारसी का एक शब्‍द है चाकिन है। इसका अर्थ होता है बेलबूटे उभारना। यही शब्‍द भारत में चिकन का शब्‍द बन गया। साम्राज्ञी नूरजहां ईरानी नस्‍ल की वह शिया बेगम हैं जिन्‍होंने चिकन को अवध में नया आयाम दिलाया था। महल की दीवार व छतों पर की गई नक्‍काशी को कपड़ों पर उकेरने की कला इन्‍हीं की देखरेख में फला-फूला था। इस काम के लिए उन्‍होंने कुछ हुनरमंद औरतों को अपने हरम में तैनात कर रखा था। दिल्‍ली से लखनऊ आने पर उन्‍होंने राजधानी में चिकन के काम की नींव रखी थी। राजधानी का खदरा क्षेत्र चिकन शिल्‍प का जन्‍मस्‍थान माना जाता है। इसी क्षेत्र में शाहान-ए-अवध का रनिवास था जो हुस्‍नबाग कहलाता था या फिर 'दौलत सरा-ए-सुल्‍तानी' के नाम से जाना जाता था। मलिकाओं की इस जनानी कोठियों में उनकी कनीजों के हाथों चिकन कारीगरी का काम परवान चढ़ता रहा। नतीजतन, लखनऊ के डालीगंज के इसी 'मीठी खिचड़ी' नाम के इलाके की औरतों की इस कारीगरी का नमूना चिकन आर्ट लंदन के अलबर्ट म्‍यूजियम में रखा गया है। 
चिकन का काम अवध की औरतों का पसंदीदा काम रहा है। इस हुनर को महल की बेगमों ने अपनी खादिमाओं से सीखा था और फिर बहू-बेटियों को सिखाया। धीरे-धीरे महल का यह शौक गरीबों तक पहुंचने लगा। आलम यह हुआ कि एक समय के बाद मल्‍लिकाओं का यह शौक गरीब महिलाओं की आजीविका का साधन बन गया। राजधानी के मुफ्तीगंज, ठाकुरगंज, तोपखाना, टूड़ियागंज, हुसैनाबाद, चौपटियां, सआदतगंज, शीशमहल, रईस मंजिल, मौलवीगंज, रस्‍सीबटन, मदहेगंज और लाहौरगंज की पर्देदार औरतों ने इस कारीगरी को दुनियाभर में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। 
आजादी के बाद जनवरी, 1948 में महात्‍मा गांधी जी ने काखीतान वाले एक चिकन कारीगर को पुरस्‍कृत किया था। इसके बाद लखनऊ चिकन को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पुरस्‍कार दिए जाने लगे। वर्ष 1965 में लखनऊ के चिकन उस्‍ताद फैयाज खां अपने काम की बारीकी के लिए पहली बार राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सम्‍मानित किए गए थे. वहीं, साल 1979 में हसन मिर्जा साहब उर्फ पनके बाबू को यही सम्‍मान दिया गया। उनको 'अनोखी चिकन' का आविष्‍कारक माना जाता है। इस चिकनकारी में बारीक से बारीक कपड़े में भी बिना सुई पार किए कारीगरी की जाती है। यानी कपड़े के उलट में कारीगारी का कोई धागा या टांका नहीं दिखाई देता है। 
चिकनकारी में 36 तरह के टांकों का इस्‍तेमाल होता है जिनमें मुर्री, बखिया, उल्‍टी बखिया, जाली तेपची तथा धूमकटी, हथकटी, फंदा, चना-पत्‍ती, धनिया, लौंग, पत्‍ती, पंखड़ी, कील, बिजली और कंगन प्रमुख हैं। मगर इन दिनों चिकन का जो काम सस्‍ते दरों पर किया जाता है उसे बखिया कहते हैं। 
अवध के चिकन के प्रमुख खरीदार देशों में पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान, हॉलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्‍पेन, रूस, कनाडा, अमेरिका तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देश हैं। चिकन का ये सफर बड़ा लंबा है। कारीगर औरतों के बेबस हाथों में से होकर दलालों और व्‍यापारियों की मजबूत मुट्ठियों में से होता हुआ बाजारों में खरीददारों तक पहुंचा है। मगर दुख की बात यह है कि चिकन के ये कारीगर आज भी सरकारी उपेक्षाओं के चलते भुखमरी के शिकार हैं। 
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ, लेखक: डॉ. योगेश प्रवीन )
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।। (तस्‍वीर चिकन कारीगरी की।)

Sunday, July 2, 2017

लखनऊ से गहरा नाता है मुजरे का...

नरगिस।
 आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 

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उत्‍तर मध्‍य काल में लखनऊ का चौक अपनी गुलजार बाजारों के लिए ही नहीं बल्‍कि नाच-गाने और मुजरों के घरानों के लिए भी बहुत प्रसिद्ध रहा है। चौक ठंडी सड़क के आस-पास शाहगंज, बिल्‍लोचपुरा, कंघीवाली गली, चावलवाली गली, बजाजा, टकसाल, सराय, बांस, मेवे वाली सराय और हिरन बाग आदि इलाकों में तवायफें रहा करती थीं। अमीनाबाद की गन्‍नेवाली गली, भूसामंडी और नएगांव के आस-पास तवायफें रहती थीं। 
हालांकि, समय के साथ ही कला और नाज की अदायगी को अश्‍लीलता से देखा जाने लगा था। मगर हकीकत तो यही थी कि मुजरों में अभद्र व्‍यवहार के लिए कोई जगह नहीं थी। मुजरों की महफिल व तवायफों का कोठा तहजीब के घराने हुआ करते थे। वहां बड़े-बड़े नवाबजादे, ताल्‍लुकेदारों के बेटे व लाट साहब के लड़के शऊर व सलीका यानी तहजीब सीखने जाया करते थे। 
लखनऊ के नवाबी दौर में सुंदरी, उजागर, मुन्‍नी बेगम, मोती, सोना, पियाजू, महबूबन और हुसैनी डोमनी नाम की प्रसिद्ध तवायफें हुई हैं। चूने वाली हैदरी, हुसैन बांदी और कनीजजान के इमामबाड़े आज न होकर भी मशहूर हैं, इससे उनकी शोहरत का अंदाजा लगाया जा सकता है। लखनऊ की मशहूर तवायफ उमराव जान के दौर में ही लखनऊ के नवाबों के पांव उखड़े थे और अंग्रेजी हुकूमत अमल में आई थी। 
ब्रिटिश शासनकाल में भी कोठों का दौर कायम रहा। कहा जाता है कि गदर में हुई मौतों के चलते तवायफों की संख्‍या बहुत बढ़ गई थी। मशहूर अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दन बाई छोटी जद्दन कही जाती थीं। वह चौक के कोठे पर मेवेवाली सराय में रहती थीं। यहीं पंजाब से लखनऊ में डॉक्‍टरी की पढ़ाई करने आए मोहन बाबू से उन्‍हें इश्‍क हो गया। फिर दोनों ने इलाहाबाद में शादी कर ली। आगे चलकर उनकी बेटी नरगिस ने बॉलीवुड को एक नया मुकाम दिया था। साथ ही, जद्दन बाई ने ही बैठकर मुजरा सुनाने की प्रथा शुरू की थी जैसा कि हम सब फिल्‍मों में देखते हैं। उससे पहले तवायफें अपने सभी साजिंदों (तबला व ढोलक बजाने वालों) के साथ मंच पर खड़े होकर कार्यक्रम पेश किया करते थे। लखनऊ में बनाए जाने वाले मिट्टी के खिलौने व पुरानी तस्‍वीरों में आज भी साजिंदे खड़े देखे जा सकते हैं। 
रेहाना।
मशहूर एक्‍ट्रेस रेहाना भी राजधानी के चौक की देन हैं। कहा जाता है कि लखनऊ में कभी रेहाना ने अपने उस्‍ताद लड्डन मिर्जा के साथ तीस रुपये में अपने कान के बूंदे गिरवी रखकर मुंबई जाने का खर्च जुटाया था। फिर फिल्‍मों में सफल होने के बाद करीब दस साल बीतने पर उन्‍होंने अपने बूंदे छुड़ाए थे। 
मगर समय के साथ ही मुजरों की इस संस्‍कृति को बहुत बदनाम किया जाने लगा। वर्ष 1958 में मुजरों का ऐतिहासिक दौर सिमटने लगा। धीरे-धीरे ये कला भी गुम हो गई। 
मुजरे का दर्द समझने के लिए यह शेर ही काफी है.... 
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एक हंसी आईना यूं, आईने से कहता है 
तेरा जवाब तो मैं हूं, मेरा जवाब कोई नहीं। 
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ, लेखक: डॉ. योगेश प्रवीन )
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।। (तस्‍वीर मशहूर अदाकारा नरगिस और रेहाना की है।)

लखनऊ में सबसे पहले चश्‍मा पहनने वाला शख्‍स 'ऐनकबाज' के नाम से हुआ था मशहूर

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज। थोड़ा-थोड़ा...
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गोमती नदी का पहला पुल जो नवाबी शासन काल में राजा नवलराय की निगरानी में बनवाया गया था वह शाही पुल गोमती पर से जाने कब का गयाब हो चुका है। लखनऊ की पहली शानदार बाजारें कैप्‍टन बाजार और चाइना बाजार थी जो अब कहीं ढूंढे नहीं मिलती। अंग्रेजी दौर में इस शहर का पहला चायखाना मीर मुहम्‍मद हुसैन साहब ने खोला था लेकिन लखनऊ वाले शायद इस शै (चीज) को तब मुंह नहीं लगाते थे इसलिये वह चायखाना चल नहीं सका। हमारे शहर में पहली-पहली डबलरोटी की दुकान नवाब आगा अली हसन खां ने घसियारी मण्‍डी में खोली गई थह। हालांकि, डबलरोटी अब पूरे शहर में मिलती है मगर वह दुकान अब कहीं नहीं दिखती। कूच-ए-मीर जान के नवाबजादे और उनका फोटो स्‍टूडियो भी लापता हो चुका है। लखनऊ की पहली रंगशाला 'दिलाराम की बारादरी' कही जा सकती है जो चौपटिया के करीब थी लेकिन अब उसका कोई पता नहीं है। लखनऊ का पहला टाउनहाल राजाबाजार में राजा टिकैतराय का दीवानखाना था लेकिन अब वह नाम गुम हो चुका है। ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों ने हजरतगंज में रिंगथियेटर बनवाया जो इस शहर का पहला सिनेमा हॉल था। वह भी अब बाकी नहीं है और आज उसी की जमीन पर जीपीओ की इमारत खड़ी है। गोलागंज का 'तमाशाघर' जहां कभी आगा हश्र कश्‍मीरी के मशहूर ड्रामा हुआ करता था। हालांकि, अब उसका भी कोई नाम-ओ-निशां तक नहीं बचा है। अब तो उस जगह बुलंदबाग की बस्‍ती आबाद है।
मजे की बात तो यह हैकि बादशाह गाजीउद्दीन हैदर के अहद (शासनकाल) में लखनऊ शहर में जिस शख्‍स ने सबसे पहले ऐनक (चश्‍मा) पहनी थी उसे 'ऐनकबाज' कहकर पुकारा गया था। उस ऐनकबाज की कोठी बड़ी मशहूर थी। यह अजब इत्‍तफाक है कि ऐनकबाज की वह कोठी ठीक इसी जगह थी जहां अब हिंदी संस्‍थान का भवन है।
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ, लेखक: )
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।। 

Monday, June 19, 2017

एक गुमनाम ईमानदार...


कुछ खास होकर भी वो आम रहा
ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा।

उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की 
वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा।

कहने को तो उसके दोस्‍त बहुत थे 
फिर भी मरते दम तक गुमनाम रहा।

कंपकंपाती हंसी और नम आंखें लिये 
ताउम्र अकेली शाम का वो जाम रहा। 

कहते हैं शब्‍दों का फनकार था वो 
तब भी जीवन भर वो बेजुबान रहा।

पूछो तो उसके अजीज बस कहते हैं 
नजाने हुनरमंद हो क्‍यूं अंजान रहा। 

कुछ खास होकर भी वो आम रहा
ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। 
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#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।

Saturday, June 10, 2017

भारत के राष्‍ट्रपतियों का विवादों से रहा है गहरा नाता

राजेंद्र प्रसाद


मूलत: बिहार के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्‍ट्रपति थे. 26 जनवरी 1950 से लेकर 12 मई 1962 तक राष्‍ट्रपति की जिम्‍मेदारी संभाली थी. वे अकेले ऐसे राष्‍ट्रपति रहे हैं जिन्‍होंने दो बार यह पदभार संभाला है.
भारत के पहले राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच हिंदू कोड बिल को लेकर विवाद गर्मा गया था. हालांकि, इस बीच दोनों के बीच मर्यादित रूप से ही विवाद नजर आया था. दरअसल, इस विवाद की शुरुआत हुई थी 15 सितंबर, 1951 को. उस दिन इस बिल को संसद के पटल में रखा गया था. मगर उसी दिन राजेंद्रजी ने प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था, 'मेरा यह अधिकार है कि जब भी संसद में कोई बिल पास हो तो मैं उसका परीक्षण करूं. मगर ऐसा करने के बाद यदि मैंने संसद में पारित बिल पर सवाल उठाया तो उससे सरकार पर सवाल उठेगा. ऐसे में मेरे उठाए गए कदम से सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी.' राजेंद्रजी की इस चिट्ठी को नेहरू ने गंभीरता से लिया. उन्‍होंने भी इसका त्‍वरित जवाब भेज दिया, जिसमें कहा गया था, 'यकीनन राष्‍ट्रपति को यह अधिकार है कि संसद में पारित किए गए किसी भी बिल पर अपना विचार व्‍यक्‍त करें मगर उन्‍हें फैसला लेते समय सरकार के हित का भी ध्‍यान रखना चाहिये.' इसके जवाब में राजेंद्रजी ने लिखा था, 'वह अपने अधिकारों का इस्‍तेमाल करने से हिचक नहीं रहे हैं.' कई दिनों तक चले इस पत्राचार युद्ध के साथ ही केंद्र सरकार और राष्‍ट्रपति के अधिकार को लेकर बहस का माहौल बन गया था. यह पहला मौका था जब बिल को लेकर राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री आमने-सामने आ गए थे.


सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन

सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन देश के दूसरे राष्‍ट्रपति रह चुके हैं. 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक राष्‍ट्रपति का पदभर संभालने वाले राधाकृष्‍णनजी को एक महान विचारक व लेखक के रूप में याद किया जाता है. वे दक्षिण भारत से ताल्‍लुक रखने वाले पहले राष्‍ट्रपति हैं.
बतौर उप-राष्‍ट्रपति रहते हुए राधाकृष्‍णनजी का कार्यकाल विवाद रहित रहा है. मगर राष्‍ट्रपति बनने के बाद उनका पंचवर्षीय कार्यकाल काफी चुनौती वाला साबित हो गया था. दरअसल, निर्विवाद तरीके से उप-राष्‍ट्रपति की भूमिका निभाने पर जवाहर लाल नेहरू ने उन्‍हें साल 1957 में ही राष्‍ट्रपति बनाने की इच्‍छा जताई थी. मगर मौलाना आजाद के नेतृत्‍व में विरोध होने के कारण उनकी यह मंशा पूरी नहीं हो सकी थी. मगर नेहरू ने 1962 में उन्‍हें राष्‍ट्रपति बनवा दिया था. हालांकि, उनके कार्यकाल की शुरुआत होते ही चीन से भारत का विवाद हो गया था. इधर नेहरूजी की मौत के बाद देश की स्‍थिति डगमगा गई. उधर, सितंबर 1965 में पाकिस्‍तान से हुआ युद्ध देश का अर्थव्‍यवस्‍था को काफी कमजोर कर गया. साथ ही, ताशकंद में लाल बहादुर शास्‍त्रीजी की मौत के बाद देश को गहरा झटका लगा था.


जाकिर हुसैन 

13 मई 1967 से लेकर 3 मई 1969 तक राष्‍ट्रपति की कुर्सी पर काबिज रह चुके जाकिर हुसैन अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनिवर्सिटी में बतौर वाइस चांसलर भी अपनी सेवा दे चुके हैं. उन्‍हें पद्मभूषण व भारत रत्‍न दोनों से सम्‍मानित किया गया था. उनका निधन कार्यालय में काम करते समय ही हो गया था. वे प्रथम मुस्‍लिम राष्‍ट्रपति होने के साथ ही सबसे कम समय तक राष्‍ट्रपति रहने के लिए भी जाने जाते हैं.
जाकिर हुसैन के जीवनकाल में विवादों का जिक्र इतिहास में भी न के बराबर मिलता है. हालांकि, उनकी असामयिक मृत्‍यु के बाद देश की राजनीति में उथल-पुथल का दौर जरूर शुरू हो गया था. जाकिरजी बेहद जमीनी और शिक्षा के व्‍यापक विस्‍तार के प्रति समर्पित सेवक थे. उन्‍होंने अपना पूरा जीवन महात्‍मा गांधीजी के आदर्शों पर चलते हुए गुजार दिया तथा देश विभाजन के समय भी उन्‍होंने मुस्‍लिम समुदाय को बंटने से रोकने में अहम भूमिका अदा की थी.



वीवी गिरि 

भारत के तीसरे राष्‍ट्रपति जाकिर हुसैनजी की असामयिक मृत्‍यु के बाद वीवी गिरि जी को देश का चौथा प्रथम नागरिक बनने का अवसर मिला था. गिरिजी का इस पद पर नियुक्‍त होना ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रभुत्‍व वाले कार्यकाल की शुरुआत के रूप में देखा जाता है. आपने तीन मई 1969 से लेकर 20 जुलाई 1969 तक राष्‍ट्रपति के पद का भार संभाला था.
दरअसल, अगस्त 1969 में हुए पांचवें राष्ट्रपति के चुनाव में. यह पहला मौका था, जब राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के असामयिक निधन के कारण किसी राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में ही चुनाव कराने की ज़रूरत पड़ गई थी. इस चुनाव का दृश्य अद्भुत था, जब ‘स्वतंत्र’ उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे उपराष्ट्रपति वीवी गिरि ने कांग्रेस पार्टी के ‘आधिकारिक’ उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को शिकस्त दी थी. इसे 1967 के आरंभ और चौथे आम चुनाव के समय से शुरू हुए सियासी घटनाक्रम के संदर्भ में ही समझा जा सकता है. 50 साल पहले हुए इस चुनाव ने कई मायनों में एक युग के अंत की घोषणा की. हालांकि, कार्यवाहक राष्‍ट्रपति के पद से वीवी गिरिजी ने कुछ माह के बाद ही इस्‍तीफा दे दिया था.



मोहम्‍मद हिदायतुल्‍लाह 

देश के 11वें मुख्‍य न्‍यायाधीश रह चुके मोहम्‍मद हिदायतुल्‍लाहजी को वीवी गिरि के इस्‍तीफे के बाद राष्‍ट्रपति का पदभार सौंपा गया था. उन्‍होंने 24 अगस्‍त 1969 से 24 अगस्‍त 1974 तक राष्‍ट्रपति पद का जिम्‍मा संभाला था. भारत के पहले मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हिदायतुल्‍लाहजी ने दो अवसरों पर भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्यभार संभाला था.
भारत ज्ञानकोश के मुताबिक, भारत के संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति निर्वाचन के संबंध में तो आवश्यक नियम बनाए थे, लेकिन उन्होंने एक भूल कर दी थी. उन्होंने उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति पद का दावेदार मान लिया, यदि किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति पद किसे और कैसे प्रदान किया जाए? यह स्थिति 3 मई, 1969 को डॉ. ज़ाकिर हुसैन के राष्ट्रपति पद पर रहते हुए मृत्यु होने से उत्पन्न हुई. तब वाराहगिरि वेंकट गिरि को आनन-फानन में कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया, जिसका संविधान में प्रावधान था लेकिन भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पद हेतु निर्वाचन किया जाता है. कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने के बाद भी वीवी गिरि राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना चाहते थे. मगर इसके लिए वह कार्यवाहक राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति पद का त्याग करके ही उम्मीदवार बन सकते थे. ऐसी स्थिति में दो संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए जिसके बारे में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं की गई थी. प्रथम प्रश्न यह था कि कार्यवाहक राष्ट्रपति रहते हुए वीवी गिरि अपना त्यागपत्र किसके सुपुर्द करें और द्वितीय प्रश्न था कि वह किस पद का त्याग करें- उपराष्ट्रपति पद का अथवा कार्यवाहक राष्ट्रपति का? तब वीवी गिरि ने विशेषज्ञों से परामर्श करके उपराष्ट्रपति पद से 20 जुलाई 1969 को दिन के 12 बजे के पूर्व अपना त्यागपत्र दे दिया. यह त्यागपत्र भारत के राष्ट्रपति को सम्बोधित किया गया था. यहां यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि कार्यवाहक राष्ट्रपति पद पर वह 20 जुलाई, 1969 के प्रात: 10 बजे तक ही थे. यह सारा घटनाक्रम इस कारण सम्पादित हुआ क्योंकि 28 मई 1969 को संसद की सभा आहूत की गई और अधिनियम 16 के अंतर्गत यह क़ानून बनाया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों की अनुपस्थिति में भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा इनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण कराई जा सकती है. इसी परिप्रेक्ष्य में नई व्यवस्था के अंतर्गत यह सम्भव हो पाया कि राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिक्त रहने की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया जा सकता है. इस व्यवस्था के पश्चात्त सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मुहम्मद हिदायतुल्लाह भारत के नए कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण कर सके. इस प्रकार 1969 को पारित अधिनियम 16 के अनुसार रविवार 20 जुलाई 1969 को प्रात:काल 10 बजे राष्ट्रपति भवन के अशोक कक्ष में इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई. कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने से पूर्व एम. हिदायतुल्लाह को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद छोड़ना पड़ा था. तब उस पद पर जेसी शाह को नया कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था. इन्हीं कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय ने एम. हिदायतुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई. वह 35 दिन तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद पर रहे. 20 जुलाई 1969 के मध्याह्न से 24 अगस्त 1969 के मध्याह्न तक का समय इनके कार्यवाहक राष्ट्रपति वाला समय था. इस प्रकार अप्रत्याशित परिस्थिति के चलते इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति का पदभार संभालना पड़ा.


वीवी गिरि 

देश के पांचवे राष्‍ट्रपति के तौर पर चुने जाने के बाद 24 अगस्‍त 1969 से 24 अगस्‍त 1974 तक देश के प्रथम नागरिक की भूमिका का सफलतापूर्व निर्वहन किया था.


फखरूद्दीन अली अहमद 

24 अगस्‍त 1974 से 11 फरवरी 1977 तक राष्‍ट्रपति पद काबिज रहे फखरुद्दीन अली अहमद की भी कार्यालय में ही मौत हो गई थी. उनके कार्यकाल को देश में इमरजेंसी (आपातकाल) के लिए याद किया जाता है.
भारत में 26 जून 1975 का दिन काले दिवस के रूप में जाना जाएगा. इसी दिन देश में संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों को समाप्त कर 21 माह का आपातकाल घोषित कर दिया गया था. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल लागू किया तो डंडे का राज चालू हो गया. आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) की आवाज उठाने वालों को जेल में ठूंस दिया गया. इतना ही नहीं उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए पुलिस ने डंडे के बल से उनके व्यवसाय को ध्वस्त कर परिजनों का उत्पीड़न कर रहे थे. मीसा बंदी कहते हैं कि उस समय डंडे का राज चल रहा था, दशहत इतनी अधिक थी कि अन्याय व उत्पीड़न के विरोध में कोई कुछ नहीं बोलता था.


बीडी जट्टी 

राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद की असामयिक मौत के बाद देश के कार्यवाहक राष्‍ट्रपति के पद पर आसीन रहने वाले बीडी जट्टी का कार्यकाल भी विवादों से अछूता नहीं रहा है. दरअसल, अप्रैल 1977 में जब केंद्रीय गृह मंत्री चरण सिंह ने नौ राज्‍यों की असेंबली को भंग करने का विवादास्‍पद निर्णय लिया था तब इन्‍होंने अहम भूमिका निभाई थी. उस समय जट्टी ने केंद्रीय कैबिनेट की ओर से दिए गए इस सुझाव को स्‍वीकार करने से इंकार कर दिया था. उस समय उन्‍होंने यह दलील देते हुए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था कि राष्‍ट्रपति का काम सिर्फ कैबिनेट के सुझावों को स्‍वीकार करना ही नहीं है. राष्‍ट्रपति का पद राजनीतिकरण के लिए ही नहीं है बल्‍कि कानून के दायरे में रहते देश के संचालन का निष्‍पक्ष भूमिका निभाना भी है. आपने 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तक कार्यवाहक राष्‍ट्रपति की भूमिका निभाई थी.



नीलम संजीव रेड्डी

एनएस रेड्डी आंध्र प्रदेश के पहले मुख्‍यमंत्री होने के साथ ही लोकसभा अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं. उन्‍होंने 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982 तक राष्‍ट्रपति की भी भूमिका अदा की थी.
नीलम संजीव रेड्डी भारत के ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होते हुए प्रथम बार विफलता प्राप्त हुई और दूसरी बार उम्मीदवार बनाए जाने पर राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. प्रथम बार इन्हें वीवी गिरि के कारण बहुत कम अंतर से हार स्वीकार करनी पड़ी थी. तब यह कांग्रेस द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए थे और अप्रत्याशित रूप से हार गए. दूसरी बार गैर कांग्रेसियों ने इन्हें प्रत्याशी बनाया और यह विजयी हुए। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब वीवी गिरि को राष्ट्रपति चुनाव जीतने में सफलता प्रदान कराई, तब यह लगा था कि नीलम संजीव रेड्डी ने एक ऐसा मौक़ा गंवा दिया है, जो अब उनकी ज़िन्दगी में कभी नहीं आएगा. मगर समय ने नीलम संजीव रेड्डी जैसे हारे हुए योद्धा को विजयी योद्धा के रूप में परिवर्तित कर दिया. यह भारतीय राजनीति के ऐसे अध्याय बनकर सामने आए, जो अनिश्चितता का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते हैं. संजीव रेड्डी भारत के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति थे, जो निर्विरोध निर्वाचित हुए.



ज्ञानी जैल सिंह

ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल शुरू से अंत तक विवादों से घिरा हुआ था. उनके कार्यकाल में ही स्‍वर्ण मंदिर में छुपाए गए हथियार व खालिस्‍तानी आतंकियों को पकड़ने के लिए ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार चलाया गया था. इस कारण उन पर रबर स्‍टैंप राष्‍ट्रपति होने का भी आरोप लगाया गया था. इंदिरा गांधी की भी हत्‍या इन्‍हीं के कार्यकाल में की गई थी और उसके बाद सिखों का नरसंहार भी इन्‍हीं के समय में हुआ था. यही कारण है कि ज्ञानी जैल सिंह को अब तक का सबसे कमजोर राष्‍ट्रपति कहा जाता है. उस समय में प्रधानमंत्री राजीव गांधी से इनका विधेयकों को पारित न करने पर विवाद  भी हो गया था. फिर भी इनके कार्यकाल को ही राजीव गांधी सरकार के कुछ कठोर फैसलों को सफल न होने देने के लिए सराहा भी जाता है. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987 तक रहा था.


आर वेंकटरमन

स्‍वतंत्रता संग्राम में हिस्‍सा लेने के लिए वर्ष 1942 में जेल जाने वाले रामास्‍वामी वेंकटरमन ने 25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992 तक राष्‍ट्रपति का पदभार संभाला था. उन्‍होंने स्‍वतंत्र भारत के पहले वित्‍त मंत्री एवं औद्योगिक व बाद में रक्षा मंत्री का दारोमदार भी निभाया था.
उपराष्ट्रपति बनने के लगभग 25 माह बाद कांग्रेस को देश का राष्ट्रपति निर्वाचित करना था. ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त होने वाला था. इसी के तहत 15 जुलाई, 1987 को वह भारतीय गणराज्य के आठवें निर्वाचित राष्ट्रपति घोषित किये गए. 24 जुलाई, 1987 को इन्होंने उपराष्ट्रपति से त्यागपत्र दे दिया. 25 जुलाई, 1987 को मध्याह्न 12:15 पर संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आरएस पाठक ने इन्हें राष्ट्रपति के पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. इस समय वेंकटरमण ने सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा और काली शेरवानी धारण कर रखी थी. इन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में शपथ ग्रहण की.
उपराष्ट्रपति बनने के लगभग 25 माह बाद कांग्रेस को देश का राष्ट्रपति निर्वाचित करना था. ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त होने वाला था। इसी के तहत 15 जुलाई, 1987 को वह भारतीय गणराज्य के आठवें निर्वाचित राष्ट्रपति घोषित किये गए. 24 जुलाई, 1987 को इन्होंने उपराष्ट्रपति से त्यागपत्र दे दिया। इन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में शपथ ग्रहण किया था.



शंकर दयाल शर्मा 


25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997 तक राष्‍ट्रपति के पद पर रहने वाले शंकर दयाल शर्मा के कार्यकाल में ही अयोध्‍या में विवादित बाबरी मस्‍जिद का ढांचा गिराया गया था. उस जब ढांचा आरएसएस के कारसेवकों ने गिरा दिया था तब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्‍हा राव  से मदद के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में सम्‍पर्क किया. मगर वहां से उन्‍हें कोई मदद नहीं थी. इसके बाद उन सभी ने राष्‍ट्रपति भवन में जाकर मदद की गुहार लगाई. लेकिन, शंकर दयाल शर्मा उन सभी लोगों के सामने फूट-फूटकर रोने लगे. इसके बाद उन्‍होंने एक पत्र सबको दिखाया जिसमें लिखा गया था कि उत्‍तर प्रदेश सरकार को भंग करके जल्‍द से जल्‍द वहां राष्‍ट्रपति शासन लगाया जाए. मगर उनके इस पत्र पर कोई कदम नहीं उठाया गया था. उन्‍होंने तब स्‍वीकार किया था कि वे राष्‍ट्रपति होते हुए भी प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं कर पा रहे हैं. हालांकि, कुछ समय बाद यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने एक बयान दिया कि राष्‍ट्रपति को ढांचा गिराए जाने की सूचना पहले ही मिल गई थी. इस बयान को लेकर भी तब तत्‍कालीन राजनीति गर्मा गई थी. उपरोक्‍त घटनाक्रम पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं.



केआर नारायण

14 जुलाई, 1997 को हुए राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा जब 17 जुलाई, 1997 को घोषित हुआ तो पता चला कि नारायणन को कुल वैध मतों का 95 प्रतिशत प्राप्त हुआ था. यह एकमात्र ऐसा राष्ट्रपति चुनाव था जो कि केन्द्र में अल्पमत सरकार के रहते हुए भी समाप्त हुआ. इसमें पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार थे. शिवसेना के अतिरिक्त सभी दलों ने नारायणन के पक्ष में मतदान किया, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह कहते हुए इनका विरोध किया कि उन्हें भारतीय संस्कृति की जीत का आधार उनका दलित होना है. इससे पूर्व कोई भी दलित राष्ट्रपति नहीं बना था.
अपने राष्ट्रपति काल के दौरान आर नारायणन ने दो बार संसद को भंग करने का कार्य किया लेकिन ऐसा करने के पूर्व इन्होंने अपने अधिकार का उपयोग करते हुए राजनीतिक परिदृश्य को संचालित करने वाले लोगों से परामर्श भी किया था. तब यह नतीजा निकाला कि उन स्थितियों में कोई भी राजनीतिक दल बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में नहीं था. यह स्थिति तब उत्पन्न हुई थी, जब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने इन्द्रकुमार गुजराल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार के बहुमत में होने का दावा दांव पर लग गया. इन्द्रकुमार गुजराल को 28 नवम्बर, 1997 तक सदन में अपने बहुमत का जादुई आंकड़ा साबित करना था. प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल बहुमत सिद्ध करने में असमर्थ थे, अत: उन्होंने राष्ट्रपति को परामर्श दिया कि लोकसभा भंग कर दी जाए. नारायणन ने भी परिस्थितियों की समीक्षा करते हुए निर्णय लिया कि कोई भी दल बहुमत द्वारा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. अत: गुजराल का परामर्श स्वीकार करते हुए उन्होंने लोकसभा भंग कर दी. इसके बाद हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी सकल पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई, जिसके पास में सबसे ज़्यादा सांसद थे. भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को एनडीए का भी समर्थन प्राप्त था. अत: नारायणन ने वाजपेयी से कहा कि वह समर्थन करने वाली पार्टियों के समर्थन पत्र प्रदान करें, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि उनके पास सरकार बनाने के लायक़ बहुमत है. अटल बिहारी वाजपेयी समर्थन जुटाने में समर्थ थे और इस आधार पर उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया. साथ ही यह शर्त भी थी कि 10 दिन में वाजपेयी अपना बहुमत सदन में साबित करें. 14 अप्रैल, 1999 को जयललिता ने राष्ट्रपति नारायणन को पत्र लिखा कि वह वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले रही हैं. तब नारायणन ने वाजपेयी को सदन में बहुमत साबित करने को कहा. 17 अप्रैल को वाजपेयी सदन में बहुमत साबित करने की स्थिति में नहीं थे. इस कारण वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 तक रहा था.



एपीजे अब्‍दुल कलाम 

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की जायदाद पर पिछले दिनों उनके संबंधियों के बीच विवाद की खबरें आई थी. लेकिन, एक रिपोर्ट के मुताबिक आम जिंदगी में बेहद सीधे और सरल रहे कलाम की जायदाद ना के बराबर थी. उनकी जायदाद में कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसपर विवाद या दावेदारी की जा सके. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजेपी अब्दुल कलाम की जिंदगी में सिर्फ चंद जरुरत की चीजें ही थी और बहुत ज्यादा भौतिक चीजें उनके पास नहीं थी. उनके पास जो जरुरी चीजें थी उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे जायदाद का नाम दिया जा सके.
रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टर कलाम के पास कोई भी संपत्ति नहीं थी. उनके पास जो चीजें थी उसमें 2500 किताबें, एक रिस्टवॉच, छह शर्ट, चार पायजामा, तीन सूट और मोजे की कुछ जोड़ियां थी. हैरानी की बात तो यह है कि उनके पास फ्रीज तक नहीं था. डॉक्टर साहेब के पास टीवी, कार और एयर कंडीशनर तक भी नहीं था. पूर्व राष्ट्रपति कलाम का जीवन काफी सरल था. ना तो उन्होंने विलासितापूर्ण जीवन जीया और ना ही वह घोर अभाव में रहे. उनकी कमाई का मुख्य स्रोत वह रॉयल्टी था जो उनकी लिखी चार किताबों से उन्हें हासिल होती थी. उन्हें पेंशन भी मिलता था. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक था.



प्रतिभा देवी सिंह पाटिल

भारत की पहली महिला राष्‍ट्रपति होने का गौरव हासिल करने वालीं प्रतिभा पाटिल राजस्‍थान की गवर्नर भीर चुकी थीं. उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 से 25 जुलाई 2012 तक था.
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपने कार्यकाल में 23 देशों का दौरा किया, जिसमें 205 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि इससे पहले एपीजे अब्दुल कलाम ने सात बार विदेश यात्रा की. हालांकि इस दौरान उन्होंने 17 देशों का दौरा किया. इन बातों की जानकारी पहले एक सूचना अधिकार की याचिका से सामने आई थी. अपनी विदेश यात्राओं को लेकर चौतरफा निंदा की शिकार होने वालीं प्रतिभा पाटिल प्रतिभा पाटिल के साथ सबसे पहला विवाद तब जु़ड़ा जब उन्होंने राजस्थान की एक सभा में कहा कि राजस्थान की महिलाओं को मुगलों से बचाने के लिए परदा प्रथा आरंभ हुई. इतिहासकारों ने कहा कि राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार प्रतिभा का इतिहास ज्ञान शून्य है जबकि मुस्लिम लीग जैसे दलों ने भी इस बयान का विरोध किया. समाजवादी पार्टी ने कहा कि प्रतिभा पाटिल मुसलिम विरोधी विचारधारा रखती हैं. प्रतिभा दूसरे विवाद में तब घिरी जब उन्होंने एक धार्मिक संगठन की सभा में अपने गुरू की आत्मा के साथ कथित संवाद की बात कही. प्रतिभा के पति देवी सिंह शेखावत पर स्कूली शिक्षक को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने का आरोप है. उन पर हत्यारोपी अपने भाई को बचाने के लिए अपनी राजनीतिक पहुंच का पूरा पूरा इस्तेमाल करने का भी आरोप है. उन पर चीनी मिल कर्ज में घोटाले, इंजीनियरिंग कालेज फंड में घपले और उनके परिवार पर भूखंड हड़पने के संगीन आरोप हैं. साथ ही, इन पर और भी कई आरोप लगते रहे हैं.



प्रणब मुखर्जी 

देश के राष्ट्रपति का नाम हाल ही में विवाद में घसीट लिया गया था. एसार के अधिकारियों के कुछ कथित इंटरनल ईमेल्स में इस बात का जिक्र किया गया है कि प्रणव मुखर्जी की ओर से इस बात का दबाव डाला गया था कि स्टील से लेकर ऑइल सेक्टर तक में सक्रिय इस ग्रुप में एक व्यक्ति को नौकरी दी जाए. ईमेल के एक दूसरे ट्रेल में दिखाया गया है कि एसार ने लंदन में अपने ग्रुप की एक कंपनी में इंटर्नशिप के लिए मुखर्जी की एक ग्रैंड डॉटर के लिए वीजा के इंतजाम में कितनी फुर्ती दिखाई थी. राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता ने इस मामले में कुछ भी कहने से मना कर दिया था, जबकि राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों ने कहा कि इन ईमेल्स के स्रोत के बारे में उन्हें पक्के तौर पर कुछ नहीं मालूम है. एसार के एक प्रवक्ता ने कहा कि ग्रुप की कंपनियों में सभी नियुक्तियां कैंडिडेट्स की योग्यता के आधार पर होती हैं और जिन लोगों का जिक्र ईमेल्स में है, वे सभी संबंधित पदों के लिए पूरी तरह योग्य थे और उन्हें अपॉइंट करने का निर्णय किसी दबाव में नहीं लिया गया था. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 2012 को शुरू हुआ था. कुशल राजनीतिज्ञ रह चुके प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में भी छोटे-छोटे विवादों का साया मंडराता रहा है.


नोट : सभी तस्‍वीरें गूगल इमेज से साभार हैं. 

Friday, June 9, 2017

राष्‍ट्रपति की कितनी होती है सैलरी?

भारत का राष्‍ट्रपति भवन। (साभार : गूगल इमेज)
भारत के अगले राष्‍ट्रपति के चुनने के लिए कवायद शुरू हो चुकी है. ऐसे में यह तो जानना बनता ही है कि विश्‍व के चर्चित राष्‍ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों की तनख्‍वाह कितनी है...


भारत
राष्ट्रपति : प्रणब मुखर्जी
वेतन
सालाना : 1,800,000.00 रुपये
मासिक : 150,000.00 रुपये
साप्ताहिक : 34,615.00 रुपये
प्रतिदिन : 4,931.00 रुपये


युनाइटेड स्टेट
राष्ट्रपति : डोनाल्ड ट्रंप
वेतन
सालाना : 25,685,358.00 रुपये
मासिक : 2,140,447.00 रुपये
साप्ताहिक : 493,949.00 रुपये
प्रतिदिन : 70,371.00 रुपये


रूस
राष्ट्रपति : ब्लादिमीर पुतिन
वेतन
सालाना : 9,893,180.00 रुपये
मासिक : 824,432.00 रुपये
साप्ताहिक : 190,253.00 रुपये
प्रतिदिन : 27,105.00 रुपये


जर्मनी
चांसलर : एंजेला मर्केल
वेतन
सालाना : 16,282,793.00 रुपये
मासिक : 1,356,899.00 रुपये
साप्ताहिक : 313,131.00 रुपये
प्रतिदिन : 44,610.00 रुपये


चीन
राष्ट्रपति : शी जिनपिंग
वेतन
सालाना : 1,290,839.00 रुपये
मासिक : 107,570.00 रुपये
साप्ताहिक : 24,824.00 रुपये
प्रतिदिन : 3,537.00 रुपये


नीदरलैंड्स
प्रधानमत्री : मार्क रूट
वेतन
सालाना : 11,340,204.00 रुपये
मासिक : 945,017.00 रुपये
साप्ताहिक : 218,081.00 रुपये
प्रतिदिन : 31,069.00 रुपये


रूस
प्रधानमंत्री : दमित्री मेदवेदेव
वेतन
सालाना : 9,856,081.00 रुपये
मासिक : 821,340.00 रुपये
साप्ताहिक : 189,540.00 रुपये
प्रतिदिन : 27,003.00 रुपये



आयरलैंड
प्रधानमंत्री : एंडा केनी
वेतन
सालाना : 13,363,513.00 रुपये
मासिक : 1,113,626.00 रुपये
साप्ताहिक : 256,991.00 रुपये
प्रतिदिन : 36,612.00 रुपये


टर्की
राष्ट्रपति : रिसेप ताईप एर्डोगन
वेतन
सालाना : रुपये 10,772,437.00
मासिक : रुपये 897,703.00
साप्ताहिक : रुपये 207,162.00
प्रतिदिन : रुपये 29,514.00


स्लोवेनिया
प्रधानमंत्री : बोरूट पाहोर
वेतन
सालाना : रुपये 4,672,002.00
मासिक : रुपये 389,334.00
साप्ताहिक : रुपये 89,846.00
प्रतिदिन : रुपये 12,800.00




जिम्‍बॉब्‍वे
राष्‍ट्रपति : रॉबर्ट मुगाबे
वेतन
सालाना : रुपये 14,383,800.00
मासिक : रुपये 1,198,650.00
साप्ताहिक : रुपये 276,612.00
प्रतिदिन : रुपये 39,408.00



कोलंबिया
राष्‍ट्रपति : जुआन मैनुअल सैंटोस
वेतन
सालाना : रुपये 8,706,496.00
मासिक : रुपये 725,541.00
साप्ताहिक : रुपये 167,433.00
प्रतिदिन : रुपये 23,853.00


लिबेरिया
राष्‍ट्रपति : एलेन जॉनसन सरलीफ
वेतन
सालाना : रुपये 5,779,206.00
मासिक : रुपये 481,600.00
साप्ताहिक : रुपये 111,139.00
प्रतिदिन : रुपये 15,833.00


दक्षिण अफ्रीका
राष्‍ट्रपति : जैकब जुमा
वेतन
सालाना : रुपये 13,581,220.00
मासिक : रुपये 1,131,768.00
साप्ताहिक : रुपये 261,177.00
प्रतिदिन : रुपये 37,209.00


स्‍पेन
प्रधानमंत्री : मारियानो राज्‍वॉय ब्रेड
वेतन
सालाना : रुपये 5,692,921.00
मासिक : रुपये 474,410.00
साप्ताहिक : रुपये 109,479.00
प्रतिदिन : रुपये 15,597.00


अंगोला
राष्‍ट्रपति : जो एडुआर्डो डॉस सैंटोस
वेतन
सालाना : रुपये 5,206,101.00
मासिक : रुपये 433,842.00
साप्ताहिक : रुपये 100,117.00
प्रतिदिन : रुपये 14,263.00



मैक्‍सिको
राष्‍ट्रपति : एनरिक पेना नीटो
वेतन
सालाना : रुपये 10,532,176.00
मासिक : रुपये 877,681.00
साप्ताहिक : रुपये 202,542.00
प्रतिदिन : रुपये 28,855.00


बांग्‍लादेश
प्रधानमंत्री : शेख हसीना
वेतन
सालाना : रुपये 953,058.00
मासिक : रुपये 79,421.00
साप्ताहिक : रुपये 18,328.00
प्रतिदिन : रुपये 2,611.00


हौंडरस
राष्‍ट्रपति : जुआन ऑरलैंडो हरनैनडेज
वेतन
सालाना : रुपये 2,754,755.00
मासिक : रुपये 229,563.00
साप्ताहिक : रुपये 52,976.00
प्रतिदिन : रुपये 7,547.00



बुल्‍गारिया
राष्‍ट्रपति : रोजेन प्‍लेनेलिव
वेतन
सालाना : रुपये 2,281,428.00
मासिक : रुपये 190,119.00
साप्ताहिक : रुपये 43,874.00
प्रतिदिन : रुपये 6,250.00



पाकिस्‍तान
राष्‍ट्रपति : सैयद ममनून हुसैन
वेतन
सालाना : रुपये 609,648.00
मासिक : रुपये 50,804.00
साप्ताहिक : रुपये 11,724.00
प्रतिदिन : रुपये 1,670.00


स्‍वीडन
प्रधानमंत्री : फ्रेडरिक रेनफेल्‍डट
वेतन
सालाना : रुपये 13,453,113.00
मासिक : रुपये 1,121,093.00
साप्ताहिक : रुपये 258,714.00
प्रतिदिन : रुपये 36,858.00



जापान
प्रधानमंत्री : शिंजो आबे
वेतन
सालाना : रुपये 13,016,055.00
मासिक : रुपये 1,084,671.00
साप्ताहिक : रुपये 250,309.00
प्रतिदिन : रुपये 35,660.00

(नोट: सभ्‍ाी आंकड़े वेजइंडिकेटर फाउंडेशन की ओर से जारी किए गए हैं.)



देखें वह वीडियो जब भारत के पहले राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने संभाली थी कुर्सी...
https://www.youtube.com/watch?v=I4Sw3o8M0f8

Sunday, May 28, 2017

'अब पहले जैसा स्‍वाद और सेवा कहां'

साभार: गूगल इमेज।
हम तरक्‍की के लिए कितना बदलते जा रहे हैं. अपनी जड़ों को ही खोते जा रहे हैं. इन दो किस्‍सों से शायद कुछ समझा जा सके...
पिताजी ने कुछ रोज पहले खाने में दाल-भात (चावल), चौलाई का साग, भिंडी की भुजिया, पापड़, अमिया की चटनी, तिलौरी (सफेद तिल का फ्राई नमकीन स्‍वाद का छोटा लड्डू), रायता, सलाद और गाय का शुद्ध देसी घी परोसने को कहा. खाना बहुत स्‍वादिष्‍ट था. वैरायटी देखकर मैंने पिताजी से पूछा कि आखिर इतनी तगड़ी व्‍यवस्‍था करने का कारण क्‍या है. उन्‍होंने कहा, 'मेरे बचपन में एक बार माताजी (मेरी दादी) की तबीयत खराब हो गई थी. दादाजी ने उन्‍हें अपने गांव से करीब 40 किलोमीटर मोतिहारी स्‍थित एक अस्‍पताल में भर्ती करा दिया. इस बीच करीब दस दिन तक मैं बाबूजी के साथ मोतिहारी में रहा था.' फिर वे कुछ ठहरकर कहते हैं, 'उस दौरान हम लोग मोतिहारी रेलवे स्‍टेशन से करीब दो या 300 मीटर दूर स्‍थित एक दूबे भोजनालय में खाने जाते थे. उस भोजनाल की खासियत यह थी कि वहां जमीन पर लिपाई करने के बाद पीढ़ा पर बैठाकर केले के पत्‍ते पर यही सब खिलाया जाता था. एक बार में पांच से सात या अधिकतम 11 लोगों को ही खाना खिलाया जाता था. उसके बाद जमीन की फिर लिपाई की जाती थी. उसके बाद ही अगली पांति में लोगों को बिठाकर खाना परोसा जाता था.' अंत में कहते हैं, 'कई दिन से सोच रहा था कि वही खाना खाऊं. इसीलिए ये सब बनाने को कहा था क्‍योंकि अब वैसा स्‍वाद और आवभगत कहां मिलता है.'
बात तो सही है, होटल में पहले प्रेम और श्रद्धा के भाव से खिलाया जाता था. मगर अब नहीं. ऐसा ही एक और किस्‍सा आपको सुनाना चाहूंगा. कुछ रोज पहले जौनपुर के जंघई क्षेत्र में जाना हुआ था. वहां मैं पहली बार करीब 13 साल पहले पिताजी के साथ दीदी की शादी का रिश्‍ता लेकर गया था. उस समय जब पहली बार वहां पहुंचा था तब स्‍टेशन के बाहर आते ही एक छोटे से होटल में चाय-समोसे के लिए ठहरा था. वहां पिताजी ने घर से बनाकर लाया हुआ परांठा खाना शुरू किया. इस बीच होटल वाले चाय लेकर आए. मैं तो हमेशा ही चटोरा रहा हूं सो वहां पहुंचते ही कुल्‍लहड़ की चाय और एक रुपये के छोटे मगर तीखे समोसे खाने में जुट गया था. वहीं, इस बार जब उसी होटल में पहुंचा तो उसका नजारा बदला हुआ नजर आया था. अब वह खपरैल की छत वाला होटल नहीं था. अब वह एक शानदार होटल में तब्‍दील हो चुका है. वहां अब लकड़ी की बेंच पर मेहमानों को नहीं बिठाया जाता बल्‍कि महंगी कुर्सियों पर बिठाते हैं. मगर वह स्‍वाद नहीं मिला. होटल की हर दीवार पर चस्‍पा संदेश था बाहर से लाई चीजों को यहां खाना मना है. मुझे तेरह साल पहले आने पर पापा के परांठे याद आ गये. वास्‍तव में कितना बदलते जा रहे हैं हम और हमारा समाज.

Friday, May 26, 2017

खनन ने बढ़ाया खेती का खर्च, बुआई से पहले उपजाऊ मिट्टी खरीदने को मजबूर हैं किसान

“पहले खेती में खाद-पानी की समस्या हुआ करती थी। मगर खनन ने हमारी दिक्कत बढ़ा दी है। मेरे खेत की उपजाऊ मिट्टी बरसात में बहर खनन वाले तालाब में समा गई है। ऐसे में खेती से पहले हम लोगों को उपजाऊ मिट्टी खरीदने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है।” सत्तावन वर्षीय हरकिशन रावत कुछ यूं अपना दर्द बयां करते हैं।

दरअसल, राजधानी के सरोजनीनगर ब्लॉक के नटकुर गाँव में मिट्टी के अवैध खनन की समस्या काफी समय से बरकरार है। ग्राम समाज की जमीन पर अंधाधुन तरीके से किए जा रहे खनन का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। खनन की वजह से तालाब में तब्दील हुए मैदानों में उसके आस-पास के खेतों की उपजाऊ मिट्टी बरसात में बह जाती है। ऐसे में इस क्षेत्र के कृषक खेती से पहले अपनी खेतों में माटी खरीदने को मजबूर हैं।

इस बारे में हरकिशन बताते हैं, “मेरे खेत के करीब में ही ग्राम समाज की जमीन है। इस जमीन पर सुबह-शाम मनमाने तरीके से अवैध खनन का काम किया जा रहा है। चूंकि, इस काम में दबंग लोग जुड़े रहते हैं, ऐसे में विरोध भी नहीं कर पाते हैं। मगर बरसात के समय मेरे और मेरे जैसे अन्य किसानों की खेतों की मिट्टी इसमें बहकर समा जाती है।” वे अपनी बात पूरी करते हुए कहते हैं, “ऐसे में हमें खेती करने से पहले अपनी खेतों में दूसरी जगहों से मिट्टी लाकर ऊपरी परत तैयार करनी पड़ती है। जाहिर है, हमारे लिए खेती का खर्च अब और बढ़ गया है। खाद-पानी के लिए रुपए जुटाने के साथ ही अब मिट्टी के लिए भी रुपए जुटाना पड़ रहा है।”

वहीं, इस बारे में सुभाष गौतम (37 वर्ष) नाम के किसान बताते हैं, “अवैध खनन का विरोध करने पर हम लोगों की कोई सुनता नहीं है। ऊपर से दबंगों की धमकी के चलते हम भी कुछ दिनों के बाद बोलना बंद कर देते हैं। रात में बेतरतीब तरीके से किया जाने वाला अवैध खनन दिन में भी बदस्तूर जारी रहता है।”

उधर, अवैध खनन के ही शिकार हुए छोटे कृषक रामकृपाल कुशवाहा (43 वर्ष) बताते हैं, “मेरा खेत मुल्लाहीखेड़ा गाँव में है। मेरे खेत के चारों ओर बाग है। ऐसे में रात में वहां ठहरना उचित नहीं होता है। करीब दो महीने पहले मेरी खेत में से रातोंरात कई ट्राली मिट्टी चुरा ली गई। मुझे दिन में इसकी जानकारी लगी।” वे कहते हैं, “मेरे खेत में अब एक बड़ा सा गड्ढा बन गया है। उसमें दोबारा खेती करने के लिए मुझे मिट्टी खरीदनी पड़ेगी लेकिन मेरे पास उतने रुपए भी नहीं हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं।”

इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर खनन से जुड़े एक मजदूर ने बताया, “हर थाने में मिट्टी खोदाई का रुपया भेजा जाता है। दिन में डंफर से मिट्टी ढोना मना है मगर रात में दस बजे के बाद से सुबह उजाला होने से पहले तक जितनी चाहे उतनी मिट्टी की खोदाई की जा सकती है।”

वे आगे बताते हैं, “हम लोग रातभर मिट्टी खोदकर लोगों को बेचते हैं। इस बीच एक थाने को चार से पांच हजार रुपए देने होते हैं जबकि मिट्टी की सप्लाई यदि किसी दूसरे थाने के क्षेत्र में करनी पड़ती है तो वह ढाई से तीन हजार रुपए लेता है। एक बार रुपया दे देने के बाद किसी भी चौराहे पर पुलिस गाड़ी नहीं राकती है।”

साधारण कद-काठी वाले शास्त्रीजी के इरादे चट्टान की तरह थे मजबूत

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के गुणों के बारे में बखान करना सूरज को दीया दिखाने समान है। वह भी ऐसे समय में जब भारत-पाकिस्तान के बीच तल्ख रिश्तों में और गर्माहट आ गई है तब शास्त्री जी के बोले गए बोलों से देशवासियों को और मजबूती मिल सकती है। वे भले ही एक साधारण कद-काठी के इंसान दिखते थे मगर उनके हौसले की दीवार इतनी मजबूत थी कि बड़ी से बड़ी परेशानी भी उनके सामने घुटने टेक देती थी। यही कारण है कि जब शास्त्री जी ने कुर्सी संभाली थी तब देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने के साथ ही उसकी सुरक्षा को भी मजबूत करने का दायित्व उन्होंने बखूबी संभाला था। ऐसे में आइए शास्त्री जी के दिए बोलों से उनके व्यक्तित्व को जानने की कोशिश करते हैं…

1. जैसा मैं दिखता हूँ उतना साधारण मैं हूँ नहीं।

2. आर्थिक मुद्दे हमारे लिए सबसे जरूरी है, जिससे हम अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी और बेराजगारी से लड़ सके।

3. हमारी ताकत और मजबूती के लिए सबसे जरूरी काम है वो लोग में एकता स्थपित करना है।

4. लोगों को सच्चा लोकतंत्र और स्वराज कभी भी हिंसा और असत्य से प्राप्त नहीं हो सकता।

5. क़ानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना बरकरार रहे और भी मजबूती भी।

6. यदि कोई एक व्यक्ति भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सिर शर्म से झुकाना पड़ेगा।

7. आज़ादी की रक्षा केवल सैनिकों का काम नहीं है। पूरे देश को मजबूत होना होगा।

8. हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट है। अपने देश में सबके लिए स्वतंत्रता और संपन्नता के साथ समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना और अन्य सभी देशों के साथ विश्वशांति और मित्रता का संबंध रखना।

9. देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है।

10. हमारी ताकत और स्थिरता के लिए हमारे सामने जो ज़रूरी काम हैं उनमें लोगों में एकता और एकजुटता स्थापित करने से बढ़कर कोई काम नहीं है।

11. जो शाशन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर किस तरह प्रतिक्रिया करनी है। अंतत: जनता ही मुखिया होती है।

12. हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के लिए शांति और शांतिपूर्ण विकास में विश्वास रखते हैं।

13. मेरी समझ से प्रशासन का मूल विचार यह है कि समाज को एकजुट रखा जाए ताकि वह विकास कर सके और अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ सके।

प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्रीजी ने उठाए थे ये बड़े क़दम

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी के बारे में कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन्हें कोई नहीं जानता। मसलन, वे मूलत: ब्राह्मण नहीं बल्कि श्रीवास्तव थे। आइए उनके बारे में कुछ ऐसे अन्य तथ्यों के बारे में भी जानें, जिसकी वजह से आज भी उन्हें महान कहा जाता है…

जय जवान, जय किसान के नारे का सच?

जब शास्त्रीजी वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे तब भारत में गरीबी बहुत थी। उस समय हमारे देश में दूसरे देशों से अनाज खरीदा जाता था। उस दौरान नॉर्थ अमेरिका से पीएल-480 योजना के तहत अनाज खरीदा जाता था। वहीं, जब उनके पदभार संभालने के एक वर्ष बाद यानी साल 1965 में देश को सूखे की मार भी झेलनी पड़ी थी। नौबत यह बन आई थी कि शास्त्रीजी को पूरे देश में लोगों से एक दिन के लिए उपवास रखने की अपील करनी पड़ी थी ताकि मजबूर लोगों के लिए एक दिन के भोजन का इंतजाम हो सके। वहीं, युद्ध के कारण देश को आर्थिक तंगी का तो सामना करना ही पड़ रहा था। ऐसे में उन्होंने नारा दिया था, “जय जवान, जय किसान”। इस नारे के बाद देश के किसानों ने जहां अन्नदाता होने का जिम्मा बखूबी निभाया वहीं, जवानों ने भी देश को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी को सकुशल अंजाम दिया।


शास्त्रीजी का अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन से हुआ था विवाद

यह मसला करीब वर्ष 1965 के अंत और उनके देहांत की तारीख 11 जनवरी, 1966 के मध्य का है। इस दौरान शास्त्रीजी ने एक अमेरिकी पत्रकार को दिए साक्षात्कार में कह दिया था, “अमेरिका द्वारा वियतनाम में किए जा रहा युद्ध कहीं से भी उचित नहीं है। यह अमेरिका के आक्रामक रवैया को दर्शाता है।” चूंकि, उस समय हमारे में देश में पर्याप्त अनाज नहीं उत्पाद किया जाता था। अमेरिका से ही हमें एक योजना के तहत खाद्य पदार्थ का आयात कराना पड़ता था। फिर भी उन्होंने अमेरिका के खिलाफ सच बोलने से परहेज नहीं किया। मगर उनके साक्षात्कार से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत में अनाज मुहैया कराना बंद कर दिया। उस समय देश को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा था। फिर, एक रणनीति के तहत संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका से अपील करनी पड़ी थी कि वह भारत में अपने खाद्य पदार्थों का निर्यात पूर्व की तरह जारी रखे। मगर शास्त्रीजी ने सच बोलने के लिए कभी भी खुद को गलत नहीं माना।

मूलत: वे शास्त्री नहीं थे

लाल बहादुर शास्त्रीजी का जन्म वाराणसी के रामनगर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। चूंकि, उन्हें जातिगत व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं था। इसीलिए उन्होंने अपने नाम से जाति का त्याग कर दिया था। मगर जब उन्होंने काशी विद्यापीठ से स्कॉलर यानी शास्त्री की पढ़ाई पूरी कर ली तब उन्हें इसकी उपाधि दे दी गई। हालांकि, बड़ी संख्या में आज भी लोग यही मानते हैं कि शास्त्रीजी मूलत: ब्राह्मण थे।


केंद्रीय मंत्री पद पर रहते हुए शास्त्रीजी ने रचे कई आयाम

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने कैबिनेट में शास्त्रीजी को भी शामिल किया हुआ था। उस दौरान उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए थे, जो आज भी अनुसरण किए जाते हैं। इन्हीं में से एक वाक्या यह है कि जब शास्त्रीजी ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर थे तब उन्होंने एक महिला को कंडक्टर के पद पर तैनात करते हुए पुरुषों के सामने महिलाओं का कद बढ़ाया था। यानी वे महिला उत्थान के लिए पहले से ही काफी प्रयासरत थे। यही नहीं, शास्त्रीजी ने यह विचार दिया था कि जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन उग्र हो जाए तो उस पर लाठीचार्ज से बेहतर है कि पानी का तेज बौछार किया जाए। वे सत्ता के खिलाफ किए जाने वाले संग्राम को कानून का उल्लंघन नहीं जनता का अधिकार मानते थे।


प्रधानमंत्री शास्त्रीजी का देश को संबोधित पहला भाषण

हर राष्ट्र के सामने एक समय ऐसा आता है जब वह ऐसी जगह खड़ा होता है जहां से उसे एक इतिहास का चौराहा नजर आता है। और उसे यह तय करना होता है कि अब वह कौन सी राह चुने। मगर हमारे पास कोई संशय या संकोच का स्थान नहीं है। हमें दाएं या बांए देखने की भी जरूरत नहीं है। हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट नजर आ रहा है। जिसपर सामाजिक प्रजातंत्र का एक घर बनता हुआ दिख रहा है। जहां सभी के लिए स्वतंत्रता और समृद्धि है। साथ ही, विश्वभर में सभी देशों के साथ शांति और मित्रता बनाने का अवसर दिख रहा है।
लाल बहादुर शास्त्री, प्रधानमंत्री, भारत

नोटों पर ‘सोनम की बेवफाई’ लिखने से देश को होता है हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान

आजकल सोशल मीडिया में एक मैसेज वायरल हो चला है कि सोनम गुप्ता बेवफा है। लोग नोटबंदी के इस दौर में जब बैंकों और एटीएम के बाहर लाइन लगाने को मज़बूर हैं तो इस वायरल मैसेज ने सभी को गुदगुदाया है। मगर लोगों के इस मसखरेपन से आरबीआई को कितना घाटा होता है, इसका पता चलते ही आप ऐसा करना उचित नहीं कहेंगे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई करीब हर वित्तीय वर्ष में देश की कुल मुद्रा संख्या का बड़ा हिस्सा दोबारा छापता है, जिसका खर्च करोड़ों में होता है। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर अतिरिक्त बोझ है।


... तो नहीं मानते आरबीआई की गाइडलाइन

आरबीआई की ओर से जारी किए गए गाइडलाइन में हमेशा ही देशवासियों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे देश की मुद्रा को गंदा न करें। उस पर कुछ न लिखें। उसे न तो तोड़-मरोड़कर रखें और न ही फटने दें। मगर लोग नोट को गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं। जब मन चाहता है उस पर कुछ लिख देते हैं। मानकों के विपरीत जाकर उसे ऐसे रखते हैं कि वह फटने की कगार पर पहुंच जाता है। यहां तक कि कुछ दिनों के बाद ही वह गलने लगता है।

कुछ समय के बाद वे नोट बैँकों में पहुंचते हैं तो उनके बदले धारक को नई करेंसी दे दी जाती है। फिर आरबीआई की ओर से नई करेंसी की छपाई की जाती है। इसके लिए बाकायदा टेंडर तक निकाले जाते हैं। ऐसे में देश की अर्थव्यस्था पर बहुत बड़ा बोझ पड़ता है। नोटों की यह छपाई आरबीआई के लिए बड़ा खर्च बन जाती है। इस कारण देश की मुद्रा का एक अच्छा-खासा हिस्सा करेंसी की छपाई पर खर्च करना पड़ता है।


2000 और 1000 की नोट का छपाई खर्च बराबर

वर्तमान में देश में दस की सर्वाधिक करेंसी देश में चल रही हैं। इनकी संख्या करीब 32 हजार लाख है। वहीं, 500 और 1000 की नोटों की संख्या करीब 15 हजार लाख व सात हजार लाख है। वहीं, दस रुपए की एक नोट को छापने में आरबीआई को एक रुपए, 500 रुपए के नोट पर 2.5 रुपए और 1000 की नोट छपाई के लिए 3.2 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। यह आंकड़ा वर्ष 2012 में रुपए की छपाई में आए खर्च के संदर्भ में बताया गया था। वहीं, 2000 की नोट को छापने में उतना ही खर्च आता है जितना कि एक हजार रुपए की नोट में लगता है।

वर्ष 2015 में सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हो गया था कि आरबीआई ने एक जवरी 2016 से कटे-फटे और लिखापढ़ी किए गए नोटों को स्वीकार करना बंद कर दिया है। लोगों ने ऐसी करेंसी को बाजार से बाहर किया जाना मान लिया था। तब तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने एक मीडिया में यह बयान दिया था कि आरबीआई हर तरह के नोट को स्वीकार करने के लिए प्रतिबद्ध है। लोग कटे-फटे और लिखापढ़ी किए गए नोटों को बाजार से बाहर किए जाने वाले मैसेज को नकार दें। हालांकि, उन्होंने यह भी जरूर कहा था, “यदि कोई शख्स बैंक कर्मचारी के सामने ही नोट पर कुछ लिखता है तो बैंक उस नोट को स्वीकार नहीं करेगा।” इसका कारण बताते हुए उन्होंने स्वीकार किया था कि नोटों की छपाई में देश को काफी खर्च उठाना पड़ता है। हालांकि, आम नागरिकों को नोटों की छपाई के इस खर्च को वहन नहीं करना पड़ता है। इसीलिए लोग करेंसी की कद्र नहीं करते हैं और उस पर अपनी मनमर्जी करते रहते हैं। इस संबंध में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर केसी चक्रबर्ती ने हाल में बयान दिया है, “रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से आए दिन इस बात की जानकारी जारी की जाती है कि लोग करेंसी को किसी भी हाल साफ-सुथरा रखें मगर लोग इसे मानते नहीं। जो गलत है।”

जानें क्या कहती है आरबीआई की क्लीन नोट पॉलिसी


  • कोई भी बैंक में न तो नोटों को स्टैपल करेगा और न ही बैंक स्टैपल करके नोट मुद्रा धारक को सौंपेगा।
  • बैंक नोटों का बंडल धारक को सौंपते समय एक ऐसे पैकेट में देगा जिसमें नोट कहीं से मुड़े या दबे नहीं।
  • नोटों की गिनती के बाद उस पर कुछ भी लिखना सख्त मना है।
  • धारक को दिया जाने वाला कैश पूरी तरह से साफ-सुथरा हो। उसमें कोई कटा-फटा या गंदा न हो।
  • किसी भी बैंक को नोट के ऊपर वाटरमार्क या मुहर लगाने से भी मना किया गया है।
  • नोट यदि पचास प्रतिशत तक भी फटा होगा तब भी आरबीआई को उसे स्वीकार करना होगा। इसके बदले में धारक को नई देनी होगी।

नोटों की छपाई का समझें पूरा गणित

इस संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार कमर वाहिद नक़वी योजना आयोग के पूर्व सदस्य सौमित्र चौधरी के मार्फत लिखते हैं कि 31 मार्च 2016 को हज़ार रुपये मूल्य के कुल 633 करोड़ नोट और पांच सौ रुपये मूल्य के कुल 1571 करोड़ नोट चलन में थे। अनुमान है कि अक्टूबर 2016 तक इन नोटों की संख्या में 5.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। इस हिसाब से नोटबंदी के पहले हज़ार रुपये मूल्य के नोटों की संख्या 668 करोड़ और पांच सौ रुपये के मूल्य के नोटों की संख्या 1658 करोड़ बैठती है। चूंकि, छोटी-बड़ी हर मुद्रा मिलाकर जितने मूल्य की मुद्रा चलन में थी, उसका 86 प्रतिशत हिस्सा पुराने पांच सौ और हज़ार के नोटों का था। पुराने हज़ार रुपये के नोट को छापनेवाले भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लि. में ही अब दो हज़ार रुपये के नोट छापे जा रहे हैं। इसकी क्षमता दो शिफ़्ट में काम कर 133 करोड़ नोट प्रति माह छापने की है। वहीं, पांच सौ के नोटों छापने वाले सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड की क्षमता सौ करोड़ नोट प्रति माह नोट छपाई की है। इसीलिए हमेशा याद रखें कि लक्ष्मी ने सिर्फ अपना रूप बदला है स्वरूप नहीं। ऐसे में देश की करेंसी का सम्मान करें। उस पर व्यर्थ के संदेश न लिखें। देश की आर्थिक शक्ति को कमजोर न करें। उससे मजाक़ तो न ही करें।

तिरंगा फहराने से पहले एक बार जरूर पढ़ लें राष्ट्रध्वज की ये गाइडलाइंस

गृह मंत्रालय की ओर से जारी गाइडलाइंस में कई ऐसे निर्देश दिए गए हैं जिनका पालन न करके अमूमन हर वर्ष हम सभी जाने-अनजाने गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के झंडे का अपमान कर बैठते हैं। आइए संविधान में बयां किए गए तिरंगा फहराने की गाइडलाइंस को बारीकी से जानते हैं…


  1. मंत्रालय के मुताबिक, कागज के झंडे ही फहराए जाएं। हालांकि, आजकल प्लास्टिक के झंडे का इस्तेमाल बढ़ गया है। इस संदर्भ में देशवासियों को सख्त निर्देश जारी कर कागज के झंडे का ही यूज करने की हिदायत दी गई है।
  2. किसी व्यक्ति या वस्तु को सलामी देने के लिए झंडे को झुकाना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
  3. कमर के नीचे तिरंगे के रंग का कपड़ा पहनना भी पूरी तरह से वर्जित रखा गया है।
  4. कुशन, रूमाल, नैपकीन आदि पर तिरंगे की छपाई करके उपयोग करना मना है।
  5. किसी प्रतिमा, स्मारक या वक्ता मेज पर झंडे को बिछाना या लपेटना सख्म मना है।
  6. जान-बूझकर झंडे को जमीन छूने देना या पानी में सराबोर होने देना भी दंडनीय अपराध माना जाता है।
  7. भारतीय झंडे को किसी नाव, रेलगाड़ी या वाहन के टॉप, बगल या पिछले भाग पर लपेटना मना है।
  8. जो कोई भी राष्ट्रीय गान को गाने से रोकता है या ऐसा गाता है कि उससे गायन में व्यवधान पैदा होता है तो अपराध की संज्ञा में माना जाता है।
  9. राष्ट्रीय झंडे को तीनों रंगों को आयताकार में समान लंबाई-चौड़ाई में तैयार किया गया हो। साथ ही, चक्र को इस प्रकार से प्रिंट या कढ़ाई किया जाए जो सफेद पट्टी के केंद्र में हो व झंडे के दोनों ओर से साफ-साफ नजर आता हो।
  10. राष्ट्रीय झंडे को आकार आयताकार ही होना चाहिए। साथ ही, उसके लंबाई और चौड़ाई का आकार 3:2 का होना चाहिए।
  11. फहराने के लिए समुचित आकार के झंडे का इस्तेमाल किया जाए। 450 गुणा 300 एमएम के आकार का झंडा किसी वीवीआईपी को लाने व ले जाने हवाई जहाजों पर लगाया जाता है। 225 गुणा 150 एमएम आकार के झंडे मोटर कारों व 150 गुणा 100 एमएम आकार के झंडे मेजों के लिए निर्धारित किए गए हैं।
  12. झंडे पर किसी प्रकार के अक्षर को नहीं लिखना है। ऐसा करने पर दोषी पर संविधान में प्रदत्त दंड के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी।
  13. झंडे का प्रयोग किसी भवन में पर्दा लगाने के लिए नहीं किया जाएगा।
  14. झंडे को जान-बूझकर इस तरह से फहराना जिससे कि केसरिया रंग नीचे की ओर हो जाए दंडनीय अपराध माना गया है।
  15. फटा और मैला-कुचैला झंडा नहीं फहराया जाएगा।
  16. झंडे को किसी अन्य झंडे के साथ या अन्य झंडों के साथ एक ही ध्वज दंड पर फहराना सख्त मना है।
  17. झंडा यदि मैला या फट जाए तो उसे जलाकर या किसी सम्मानजनक तरीके से नष्ट करने का प्रावधान रखा गया है।
  18. यदि झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाए कि जब वक्ता का मुंह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिनी ओर रहे अथवा झंडे के पीछे दीवार के साथ और उससे लेटी हुई स्थिति में प्रदर्शित किया जाए।
  19. संविधान में कुछ ही लोगों को अपने वाहन में झंडा लगाने के लिए स्वीकृत किया गया है। इनमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, उपराज्यपाल, विदेशों में नियुक्त भारतीय दूतावासों के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री व अन्य कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्रियों, राज्यमंत्रियों, उप मंत्रियों, लोकसभा व राजयसभा के अध्यक्षों, राज्य विधान परिषदों के उप सभापतियों, सुप्रीम कोर्ट के जजों, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश ही शामिल किए गए हैं।
  20. जब कोई विदेशी गणमान्य व्यक्ति सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई कार में सवार हो तो राष्ट्रीय झंडा कार के दाईं ओर व संबंधित देश का झंडा कार के बाईं ओर लगाया जाना सुनिश्चित किया गया है।

सुकून की चाह में हम तरसते रहे

सुकून की चाह में हम तरसते रहे
हम तरसते रहे और वो गरजते रहे

सुनहरी शाम में याद उनकी आ गई
देखते ही देखते रात हमें खा गई

आज किसी नाम पर खुद को मैं वार दूं
खुद को भुला के उसकी जिंदगी संवार दूं

मेरी नब्‍ज है थमी और ख्‍वाब में जगा हूं मैं
फिर भी मेरा दिल कहे कि जिंदगी उधार दूं

ए खुदा बता मुझे कि क्‍या खता है हो गई
कि देखते ही देखते फिर सुबह हो गई।




हाशिये पर खुशी है हाशिए पर हम

हाशिये पर खुशी है हाशिए पर हम

हाशिया ही ख्‍वाब है, वही लेगा दम

उससे नाराज हैं अभी ज्‍यादा कभी कम

आंखों का क्‍या कभी सूखी अभी नम

हाशिये पर खुशी है हाशिए पर हम-3

मेरा सफर शुरू हो गया


मैं अब नही थकुंगा
गलतियों को, नही भुलूँगा
कर्मपथ पे चला करूँगा
मेरा सफर शुरू हो गया
किस्मत मेरे पास है
मन में हर्षोल्लास है
अब हर पल बडा ही खास है
मेरा सफर शुरू हो गया
मन मेरा शांत है
चारों ओर एकांत है
संग मेरे कान्त है
मेरा सफर शुरू हो गया
खुशियों को खींच लाता हूँ
ख़ुशी बाँट ख़ुशी पाता हूँ
अब चैन से सो पाता हूँ
मेरा सफर शुरू हो गया
आलस बिल्कुल बेकल है
आज ही आज नही कल है
क़दमों में, नभ - जल -थल है
मेरा सफर शुरू हो गया
चलता ही मैं जाऊंगा
जो चाहूँ वो पाऊंगा
तभी स्वर्ग मैं पाऊंगा
मेरा सफर शुरू हो गया

Thursday, May 25, 2017

आओ चलें...

तितली बनकर आओ हर सीमा पार करें
भूल हर दीवार-ओ-गम गुलिस्‍तां पार करें
उस देश की धरती जहां सभी खुशहाल रहें
आओ हम उस ग्रह पर नाम गुलजार करें
बाग बहार सब कितने भूल रहे हम सब
आओ दोस्‍त हम-तुम हर पल गुलजार करें
बिना शिकायत जो सम्‍बंधों को जी जाये
उस दुनिया की ओर चलो रफ्तार करें

Tuesday, May 23, 2017

नक्‍सलियों से नहीं कश्‍मीर के पत्‍थरबाजों से होती है नफरत : भारतीय जवान

भारतीय सेना पर पत्‍थर बरसाती कश्‍मीरी छात्राएं. (साभार: गूगल इमेज)
दोस्त अगर फौजी हो तो एक घंटा भी साथ में गुजारने पर दुनियाभर के किस्से मिल जाते हैं. आज भी कुछ ऐसा ही हुआ. करीब छह माह बाद एक लंगोटिया दोस्त से मुलाकात हुई. वह फौज में है. कुछ देर के हालचाल बताने और पूछने के बाद अपने-अपने अनुभव के बारे में बातें होने लगीं. वह अपनी नौकरी के दौरान पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में गुजारे वक्त के बारे में बताने लगा. इस बीच उसने एक से बढ़कर एक किस्से सुनाये. कभी जंगल में रात के समय तैनाती के समय नक्सलियों की आहट पर रोंगटे खड़े हो जाने वाले किस्से तो कभी नदी के बीचोबीच मछली पकड़ कर चट्टान पर सींक घुसेड़ कर उसे पकाने की बातें. इस बीच जंगली हाथी के दौड़ाने और रातभर हिरण व अन्य जानवरों की चमकती आंखों के बीच मात्र टॉर्च की रोशनी में अपनी ड्यूटी पूरी करने की कथा. हर कहानी को सुनने के दौरान हम सभी दोस्त मुंह खोलकर देखते और सुनते रहते. उसके अनुभवों में एक किस्सा ऐसा भी था जिसमें वह जिस पेड़ पर बैठा सुस्ता रहा था उसी पेड़ पर मात्र दो-ढाई मीटर की दूरी पर एक सांप डालियों पर लटका अटखेलियां कर रहा था. जैसे ही उसकी नजर उस सांप पर पड़ी वह कूद-फांदकर वहां से भागा. फिर भी तमाम दिक्कतों के बीच उसने बताया कि सेना के जवान अपनी नौकरी पूरी तन्मयता से निभाते हैं. इस दौरान हम सभी दोस्त एक दूसरी ही दुनिया में गुलाटी मारने लगे थे. खासकर, सचिन वर्मा को इन बातों में बड़ी मौज आ रही थी. वह हर किस्सागोई के बीच में कोई न कोई द्विअर्थी चुटकुला तलाश लेता था. मगर किस्सों के अंत में मेरे फौजी दोस्त ने बड़े दुख से बताया कि नीरज सबसे ज्यादा बुरा कश्मीर की सुंदर वादियों में अपने ही देश के नौजवानों के हाथों पत्थकर खाने का दुख होता है. बुरा तब लगता है जब वहां का पांच साल का बच्चा भी जोर से चींखता और तुतलाता हुआ कहता है कि ‘लेकर रहेंगे आजादी’. उसने कहा, ‘इतना गुस्सा तो नक्सलियों को देखकर भी नहीं लगता. मोदी सरकार से हम जवानों को एक ही उम्मीद थी कि वह हमें प्रतिरक्षा करने की छूट देगी. मगर ये सरकार भी यही कर रही है जो बीती सरकारें करती आई हैं. चुपचाप होकर जवानों की मौत का तमाशा देख रही हैं.’ इसके बाद मैं खामोश था. दोस्त भी चुप था. महफिल खत्म हो गयी, इस बात के बाद की मोदी सरकार ही घाटी से धारा 370 को हटवाने का दम रखती है. उसके बाद ही जम्मू-कश्मीर में सब ठीक हो सकेगा. जी हां, धारा 370 को खत्म करने की ही मोदी सरकार से आखिरी आस है. 

क्‍यों मनाते हैं लखनऊ में बड़ा मंगल?

लखनऊ में ज्‍येष्‍ठ माह के हर मंगलवार को जगह-जगह भंडारे और प्‍याऊ की व्‍यवस्‍था की जाती है. इन दिनों कोई भूखा नहीं सोता. अच्‍छा है. मगर क्‍या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी?
पुराने लखनवी जो ग्रामीण क्षेत्र के हैं, उनसे मैंने राजधानी में आयोजित होने वाले इस पुण्‍य प्रतापी आयोजन की शुरुआत के बारे में पूछा. जवाब मिला, लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्रों में बरसों बरस पहले से हर साल नया अनाज आने पर ज्‍येष्‍ठ माह के हर मंगलवार को किसानों की ओर से गुर-चना बांटा जाता था. मगर इस गुर-चना में चना नहीं होता था. इसमें किसान अपनी खेत की नयी उपज की गेहूं को भुनवाता था. फिर उस भुने गेहूं में गुड़ मिसवा (मिला) दिया जाता था. इसके बाद घर के बच्‍चे उसे अपने गले में एक कपड़ा बांधकर लटका लेते थे फिर घरों से निकल पड़ते थे. राह चलते जो दिख जाए उसे गुर-चना दिया जाता था. यानी ये तो हो गया बड़ा मंगलवार पर पेट भरने का इतिहास.
अब जानिये इसके आगे की कहानी. फिर हुआ यूं कि ग्रामीण क्षेत्रों की इस धन्‍य परम्‍परा से राजधानी के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले पंजाबी और सिंधी परिचित हुए. उन्‍होंने इन दिनों शर्बत बांटने की परम्‍परा शुरू कर दी. धीरे-धीरे बड़ा मंगल मनाने का क्रेज बढ़ता गया. इसमें पूर्वांचलियों और बिहारियों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लेना शुरू कर दिया. अब चूंकि पूरबियों को ठोस खाना खाना और खिलाना पसंद है, इसीलिए अब चारों ओर पूड़ी-सब्‍जी का बोलबाला हो गया है. है न रोचक, हमारी राजधानी में बड़ा मंगल मनाने का इतिहास.
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अंत में बड़ा मंगल से जुड़ी कुछ खास बातें.
1. कुछ लोग भंडारा कराते हैं 100 किलोग्राम आलू का मगर हांकते समय बताएंगे कि 10 कुंतल के ऊपर लग गया है. फिर यह भी कह देंगे कि भगवान के काम में गुणा-भाग काहे का.
2. भंडारा करवाता कोई और है मगर उसमें 101 रुपया देने के बाद लोग ऐसे प्रचारित करते हैं कि सारा बोझ उन्‍होंने ही अकेले अपने कंधे पर उठा लिया था.
3. कइयों को मैंने देखा है कि भंडारा कराते समय यदि कोई अमीर दिख जाएगा तो बड़े प्रेम से खिलाएंगे लेकिन रिक्‍शा चलाने वाले या भिखारियों को डंडा हांक कर लाइन लगवाते हैं.
(उपरोक्‍त तीनों प्रकार के लोगों से विनम्र निवेदन है कि वे भंडारा न करें बल्‍कि घूम-घूमकर प्रसाद भक्षण करें. हनुमानजी से न सही मगर उनके गदा से तो डरें.)

Friday, March 31, 2017

निशाने पर न आ जाएं योगी?

नीरज तिवारी 
उत्‍तर प्रदेश में योगी आदित्‍यनाथ जिस तरह की कार्यशैली के तहत हर दिन एक नया इतिहास रच रहे हैं, उससे ऐसा नजर आता है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्‍प बनकर उभरे हैं. बीते कुछ समय से ऐसा ही देखा जा रहा है. अपनी छवि के दम पर मुख्‍यमंत्री बनने वाले योगी के लिये यह एक कठिन परीक्षा है जिसमें वे खुद को सफल साबित करते जा रहे हैं. हालांकि, इस बीच यह भी कहा जाने लगा है कि योगी की इस रफ्तार से वे पार्टी के ही शीर्ष नेताओं की नजर में भी चढ़ जायेंगे, जिससे उन्‍हें नुकसान हो सकता है.
मुख्‍यमंत्री बनने के बाद योगी ने कई बड़े फैसले लिये. ऐसा पहली ही बार हुआ होगा जब कैबिनेट की बैठक से पहले ही बड़े-बड़े फैसले मुख्‍यमंत्री ने ले लिये. यह अलग की बात है कि किसानों की कर्जमाफी का फैसला अब भी विचाराधीन है. फिर भी जितनी तेजी से योगी ने अपने फैसले किये वह सभी को चौंकाने वाला रहा है.
कुछ रोज पहले जब उन्‍होंने राजधानी के पांच कालीदास मार्ग स्‍थित सरकारी आवास में गृह प्रवेश किया तो जिस तरह से उन्‍होंने घर के 9 एयर कंडीशंड बाहर करवा दिये और एक कमरे में साधारण तरीके से रहने का फैसला किया है. वह काबिल-ए-तारीफ रहा. इसकी चारों ओर चर्चा भी रही. साथ ही, इस फैसले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीवनशैली की भी तुलना की जाने लगी. इस बारे में बात करते हुये एक अधिकारी ने कहा कि सादगी से जीने का फैसला करते हुये योगी ने सभी विरोधियों को यह दर्शा दिया है कि वे भले ही मुख्‍यमंत्री के चयन के समय सभी के निशाने पर रहे हों अपने अनुभवहीनता के लिये मगर वे अपने फैसलों के कारण चर्चा के केंद्र में रहेंगे. उन्‍हें जनता में अपनी छाप छोड़ने का हुनर मालुम है.
वहीं, विदेशी मीडिया में छपी खबरों को देखा जाये तो पता चलता है कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब यूपी के मुख्‍यमंत्री ने अपनी कार्यशैली की वजह से सुर्खियां बटोरी हैं. इस बाबत भाजपा के एक वरिष्‍ठ नेता का कहना है कि योगी से जिस तरह की उम्‍मीद थी वह ऐसा ही कर रहे हैं. हालांकि, उन्‍होंने अपनी छवि के विरूद्ध जाकर जिस तरह से साम्‍प्रदायिक भाषणों से दूरी बनायी है वह उनकी गंभीरता को दर्शाता है. हालांकि, जब उनसे यह पूछा गया कि कहीं योगी की ये उपलब्‍धियां मोदी की छवि पर भारी न पड़ जाएं तो उन्‍होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता. भाजपा में मोदी ही इस समय सबसे बड़े ब्रांड हैं. ऐसे में योगी सिर्फ अपनी अलग छवि बना रहे हैं. इन दोनों के निरंतर काम करते रहने के गुण के अलावा बहुत सी बातें एक-दूसरे से जुदा हैं. वे अपनी बात समाप्‍त करते हुये कहते हैं कि इसीलिये इस बात को लेकर अभी से ही चर्चा करना कि योगी मोदी की छवि पर भारी पड़ जाएंगे कुछ जल्‍दीबाजी है.
इससे इतर देश की सबसे बड़ी विधानसभा के मुख्‍यमंत्री योगी की सफलता का ही परिणाम है कि भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव में उन्‍हें मोदी व भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह के साथ ही प्रमुख प्रचारक नामित किया है.
वहीं, योगी की ओर से लिये गये अवैध बूचड़खानों के बंदी के फैसले ने उन्‍हें देशभर में सुर्खियों में ला खड़ा किया है. इसीलिये उनका यह फैसला राजस्‍थान में भी असर दिखाने लगा है. वहां की सरकार पर इसका दबाव बढ़ गया है कि वहां भी यूपी की तर्ज पर ऐसे फैसले लिये जाएं. इस बीच झारखंड में तो अवैध बूचड़खाने को बंद करने का 31 मार्च तक समयसीमा भी तय कर दिया गया है. वहीं, बिहार में भी भाजपा विधायकों और कार्यकर्ताओं ने नीतीश सरकार से बूचड़खानों में हो रहे पशुओं की हत्‍याओं पर तुरंत फैसला लेने का दबाव बढ़ा दिया है. यानी योगी ने इस एक फैसले से पूरे देश में अपनी छवि का ब्रांड चमका लिया है. हालांकि, इस फैसले के बाद से यूपी में जिस तरह से एक खास वर्ग समुदाय में बेरोजगारी का भय बढ़ा है, उसका विकल्‍प भी योगी को तलाशना होगा.
हालांकि, लंबे समय से यूपी की राजनीति को करीने से देखने वाले पत्रकारों का भी यही कहना है कि योगी जितनी तेजी से काम कर रहे हैं, उससे एक समय के बाद वह संभवत: केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह सहित उनके समकक्ष अन्‍य भाजपा नेताओं को खटकने लगेंगे. ऐसे में योगी को अपनी रफ्तार कुछ कम करनी चाहिये. अन्‍यथा वे आलोचनाओं के शिकार भी हो सकते हैं.
इससे इतर योगी सरकार को लेकर प्रदेश की विरोधी राजनीतिक दलों में भी अभी चुप्‍पी छायी हुयी है. कोई भी पार्टी अभी योगी के खिलाफ कुछ नहीं बोल रही है. हालांकि, समय-समय पर बसपा प्रमुख मायावती अपना वार करने से नहीं चूक रही हैं. यानी योगी के विरोध में अभी लामबंदी शुरू नहीं हुयी है. इतने समीकरणों को देखते हुये यह कहना लाजिमि है कि योगी जिस रफ्तार से ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं उससे वे स्‍वयं को राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ समेत जनता की नजर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्‍प के रूप में स्‍थापित करते जा रहे हैं. यानी संभव है कि आगामी चुनावों में योगी के कंधे पर भावी जिम्‍मेदारियां सौंपी जा सकती है. हालांकि, इस बीच अयोध्‍या राम मंदिर के निर्माण को लेकर उनकी ओर से कैसा कदम उठाया जायेगा, यह सभी के लिये इंतजार का सबब बना हुआ है.

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...