Tuesday, September 23, 2014

उर्दू के विकास में मिर्जा हादी रूसवा का अमूल्य योगदान

मिर्जा मोहम्मद हादी रूसवा ने अपनी कलम से दुनिया में पहचान हासिल की. वे उर्दू कवि और कथा लेखक थे. उनके लिखे कई नाटकों ने काफी सुर्खियां बटोरी, जो उनकी जिंदगी की अमूल्य धरोहर बन गए. उनकी रचना में मुख्य रूप से धर्म, दर्शन और खगोल विज्ञान की झलक दिखती थी. वे उर्दू, फारसी, अरबी, हिब्रू, अंग्रेजी, लैटिन और ग्रीक भाषा के ज्ञानी थे. उन्हें अवध के निजाम ने भाषा के उत्थान के लिए अपनी सलाहकार समिति शामिल कर रखा था. वर्ष 1905 में प्रकाशित उमराव जनवरी अदा को उनका लिखा हुआ पहला उर्दू उपन्यास का गौरव हासिल है. इस उपन्यास की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी कहानी पर कई बार फिल्में बनाई गईं. फिर भी लोगों में इस उपन्यास के प्रति प्रेम अब भी बरकरार है. 


जीवन परिचय
मिर्जा मोहम्मद हादी रूसवा के जीवन का सही विवरण उपलब्ध नहीं है. इतिहासकारों द्वारा दी गई जानकारियों में काफी विरोधाभास मिलता है. रूसवा स्वयं लिखते हैं कि उनके पूर्वज फारस से भारत में आए थे. उनके परदादा अवध की सेना में उच्च पद पर थे. रूसवा के मुताबिक उनके पिता और दादा गणित और खगोल विज्ञान में खासी रुचि रखते हैं. उनका जन्म वर्ष 1857 में लखनऊ में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा घर में हरी प्राप्त की. जब वे मात्र 16 साल के थे तभी उनके मां-बाप का देहांत हो गया था. उनके बड़े भाई मिर्जा मोहम्मद जाकी की भी जल्द ही मौत हो गई थी. इसी बीच वे हैदर बख्श नाम के एक कैलीग्राफिस्ट के सम्पर्क में आ गए. हैदर ने रूसवा को भी अपनी कला सिखाकर उनके जीवनयापन का इंतजाम करवा दिया. साथ ही साथ रूसवा ने घर पर ही पढ़ते हुए अपनी मैट्रिक का एग्जाम पास कर लिया. इसके बाद उन्होंने मुंशी फाजिल का कोर्स किया. इसके बाद उन्होंने रुड़की स्थित थॉमस इंजीनियरिंग स्कूल से ओवरसियर डिप्लोमा हासिल किया. कुछ समय के लिए उन्होंने बलुचिस्तान में रेल की पटरियां बिछाने का भी काम किया. हालांकि, इस बीच उन्होंने लिखना और पढऩा नहीं छोड़ा. कुछ समय की नौकरी के बाद वे लखनऊ वापिस लौट आए और उन्होंने पढ़ाने और लिखने को ही अपना करियर बनाना तय किया. उसके बाद वे एक स्थानीय मिशनरी स्कूल में टीचर बन गए और फिर बाद में क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवक्ता भी बने. जहां वे गणित, विज्ञान, दर्शनशास्त्र और फारसी पढ़ाया करते थे. मगर कुछ समय के बाद उन्होंने लखनऊ छोड़कर हैदराबाद में जाना तय किया. वहां वे उस्मानिया यूनिवर्सिटी में अनुवादक के ब्यूरो के पद पर काबिज हुए. 21 अक्टूबर 1931 को उनकी टाइफाइड से मौत हो गई.

लेखन में योगदान 
रूसवाजी की लेखनी लैला-मजनू को वर्ष 1887 में प्रकाशित किया गया था. यह प्रेम पर लिखी गई एक कविता थी. मगर इस कविता को ज्यादा प्रसिद्धि नहीं मिली. इसकी आलोचकों ने जमकर निंदा की. फिर भी उन्होंने कविता लिखने की कला को नहीं छेाड़ा. जीवन के अंतिम पलों तक वे कविता लिखने के काम में सक्रिय रहे. अफसाई राज का पहला प्रकाशन वर्ष 1902 में किया गया. इसके तीन साल के बाद उनकी उर्दू में लिखा फेमस नॉवेल उमराव जान अदा का प्रकाशन हुआ. इसके बाद उन्हें काफी सराहना मिली. तदोपरांत जात-ए-शरीफ और शरीफ जादा नाम से उनकी दो और रचनाओं का प्रकाशन हुआ. मगर ये उतनी सफलता हासिल नहीं कर सकीं. हालांकि, इन रचनाओं को भी उर्दू पाठकों के एक बड़े वर्ग ने काफी सराहा. रूसवाजी ने धार्मिक और दार्शनिक विषयों पर काफी कुछ लिखा है. फिर भी वे आर्थिक रूप से उतनी सफलता अर्जित नहीं कर सके, जिसके वे हकदार थे.


दोहन के दंश से छटपटाते श्रमिकों का दिन है आज

विश्वकर्मा पूजा के दिन जगह-जगह लोग लोहे की मशीनों और गाडिय़ों की पूजा करेंगे. तमाम फैक्ट्रियों में उत्सव सा माहौल होगा. पूजा-पाठ के बाद खाने-पीने की उचित व्यवस्था होगी. कंपनियों को सजाया जाएगा. सुबह से लेकर शाम तक चहल-पहल होगी. फैक्ट्रियों के हूटर बजाते सायरनों को सुनकर आज के दिन कोई भी मजदूर टूटे मन से घर से रवाना नहीं होगा. वह पूरी ऊर्जा के साथ पूजन सामग्री लिए अपनी कर्मस्थली की ओर भागा जाएगा. उसके इंतजार में उसके बच्चे और बीवी दोपहर के बाद राह तकेंगे. वे इंतजार करेंगे कि उनके घर में मिठाई आएगी और खुशियां बांटीं जाएंगी. 

चौबीस घंटे की खुशी 
मगर अजीब सी बात है कि ठीक चौबीस घंटे के बाद वही फैक्ट्री मजदूर अपनी दुर्दशा के लिए कंपनी मैनेजमेंट को कोसेगा. वह चिढ़ जाएगा सायरन का आवाज सुनते ही. वह मरे हुए मन से अपनी साइकिल चलाकर घर से रवाना हो जाएगा. मात्र एक दिन की इस खुशहाली के पीछे के कारणों की तलाश करना बड़ा ही आसान है. कारण वही है मिल मालिकों का धन प्रेम. मजदूर के पसीने से उन्हें चिढ़ है. वे कभी नहीं चाहते कि एक मजदूर कभी भी आर्थिक मजबूती पाकर उनके सामने खड़ा हो सके. तभी तो महंगाई के इस दौर में भी चार अंकों के आंकड़े की तनख्वाह को पाने के लिए भी उन्हें हर पल अपने स्वाभिमान से समझौता करना पड़ता है. वे डरते हैं मैनेजमेंट के लोगों के पैरों की आहट सुनकर. श्रमिकों को स्वावलंबी बनाने का दम भरने वाले राजनेता भी उनकी इस बदहाली के लिए कुछ नहीं करते. वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाते जिससे मजदूरों को उनका वाजिब हक मिल सके.

उन्‍हें मिलना चाहिए हक 
विश्वकर्मा पूजा के दिन ही वे सिर्फ खुशियां मनाते हैं. मिठाई खाते हैं और गम हल्का करते हैं. सिर्फ कुछ घंटों की इस खुशहाली को मजदूर जीवन भर जी सकें, इसके लिए उन्हें एक मजबूत पायदान की आवश्यकता है. उन्हें एकजुट होकर अपनी दयनीय स्थिति और शोषण के खिलाफ मिल मालिकों से सामना करना होगा. राजनेताओं को सिर्फ जुबानी ही नहीं जमीनी तौर पर भी श्रमिकों के पक्ष में खड़ा होना पड़ेगा. जिंदगी को खुशहाल तरीके से जीने के लिए उन्हें सिर्फ विश्वकर्मा पूजा के दिन सम्मान पाने की जरुरत नहीं है. ये उनका हक है और यह हक उन्हें मिलना ही चाहिए.

Note: फोटो का क्रेडिट गूगल इमेज के नाम है!!! भविष्‍य काल में यह लेख इसलिए लिखा गया है ताकि यह हमेशा नवीन रहे।।।। 

मौलाना हसरत मोहानी ने इंकलाब जिंदाबाद का दिया नारा

इंकलाब जिंदाबाद का नारा देकर युवाओं को राह दिखाने वाले मौलाना हसरत मोहानी का जन्म उन्नाव के मोहान में हुआ था. क्रांतिकारी विचारधारा रखने वाले और उर्दू शायरी में एक मुकाम हासिल करने वाले मौलानाजी का 76 वर्ष की आयु में 13 मई 1951 को लखनऊ में निधन हो गया था. वर्ष 1921 में उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था. 

शिक्षा एवं करियर 
उनका असली नाम सैयद फैजुल हसन था. मगर उर्दू शायरी के लिए वे मौलाना हसरत मोहानी उपनाम का इस्तेमाल करते थे. आगे जाकर इसी नाम से उन्हें जाना जाने लगा. उनके पूर्वज इरान के निशापुर के रहने वाले थे. उन्होंने भगवान कृष्ण से सम्बंधित भी कई रचनाएं की थीं. वे मथुरा में कृष्ण जन्माष्टमी भी मनाया करते थे. वे बचपन से पढऩे में काफी कुशाग्र थे. उन्होंने अपने पहले स्टेट लेवल एग्जाम में टॉप किया था. आगे की पढ़ाई के लिए वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए थे. इसी बीच वे मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली के सम्पर्क में आए. उनकी शिक्षिका तस्लीम लखनवी और नसीम देहलवी का भी उन पर काफी प्रभाव पड़ा.

लेखनी में योगदान 
उनकी लिखी नज्म की पुस्तक कुल्लियत-ए-हसरत मोहानी को काफी सराहना मिली. उन्हीं की लिखी गजल चुपके-चुपके रात दिन को आज भी कई लोग पसंद करते हैं. गजल गायक गुलाम अली की आवाज ने इस गजल और भी ज्यादा शोहरत मिली. वर्ष 1982 में बनाई गई फिल्म निकाह में भी इनके जीवन को पर्दे पर दिखाया गया.

राजनीति में रहे सक्रिय
वर्ष 1921 में क्रातिकारी शहीद राम प्रसाद बिस्मिल अपने शाहजहांपुर के अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ अहमदाबाद में एक कांग्रेस की बैठक में गए थे. उनके साथ वरिष्ठ कांग्रेसी प्रेम कृष्ण खन्ना और क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खान भी मौजूद थे. बिस्मिल साहब ने इस दौरान मौलाना हसरत मोहानी के साथ मिलकर पूर्ण स्वराज को लेकर अपने विचार प्रकट किए. मगर महात्मा गांधी ने पूर्ण स्वराज हासिल करने के लिए युवाओं के उस तरीके को पसंद नहीं किया. यह बिस्मिलजी की कांग्रेस को एक लिबरल पार्टी के तौर पर पेश करने की एक सफल वजह बनी. इसके बाद से हसरत मोहानीजी भी स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे. वे पहले ऐसे मुस्लिम थे, जिन्होंने पूर्ण स्वराज (आाजदी-ए-कामिल) के लिए आवाज बुलंद करने के लिए जाने गए. वर्ष 1921 में वे ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रेसीडेंट चुने गए.

कम्युनिस्ट आंदोलनों में रहे सक्रिय
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में भी मौलानाजी का अहम योगदान था. ब्रिटिश सरकार का दुष्प्रचार करने के लिए उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था. खासकर ब्रिटिश पॉलीसिज के खिलाफ उन्होंने एक आर्टिकल लिखने पर उन्हें सजा दी गई.

जीवन के अंतिम क्षण
मौलाना हसरत मोहानी की मृत्यु 13 मई 1951 को लखनऊ में हुई थी. उसी साल मौलाना नुसरत मोहानी ने हसरत मोहानी मेमोरियल सोसाइटी की स्थापना की. करांची, सिंध और पाकिस्तान में हसरत मोहानी जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम पर कई पुस्तकालयों की स्थापना की गई. उनकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करांची में एक खराब सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया. मगर आज की तारीख में उस सड़क को फाइनेंशियल हब के तौर पर जाना जाता है.

रचनाएं
1. कुल्लियत-ए-हसरत मोहानी (हसरत मोहानीजी का काव्य संग्रह) 
2. शरह-ए-कलाम-ए-गालिब (मशहूर शायर गालिब की रचनाओं की व्याख्या)
3. नुकात-ए-सुखन (कविताओं के महत्वपूर्ण पहलुओं की व्याख्या)
4. मुसाहिदात-ए-जिंदान

Wednesday, September 10, 2014

ऐसी मुझको मदिरा दो

ऐसी मुझको मदिरा दो

न हो मुझको कोई रोष
न दे मुझको कोई दोष
बढ़ा किये जा मेरा कोष
                              ऐसी मुझको मदिरा दो। 
न कभी मैं लडख़ड़ाऊं
सीधी राह चला जाऊं
सदा सम्मान मैं पाऊं
                              ऐसी मुझको मदिरा दो। 

न हो जाति का कोई मान
दुर्बल को दिया दूं दान
 बना रहे आंगन का मान
                                ऐसी मुझको मदिरा दो। 
आंखें रहीं चढ़ी सदा
कभी न हो कम-ज्यादा
कभी घटे न मर्यादा
                          ऐसी मुझको मदिरा दो। 
वाणी में रहे महक-महक
पिया करूं मैं चहक-चहक
गर्मी जिसमें दहक-दहक
                             ऐसी मुझको मदिरा दो। 
फूल के रंग से रंगा हुआ
कामाग्नि में पका हुआ
तेरी पलकों से छना हुआ
                            ऐसी मुझको मदिरा दो। 

(19/04/2006 को मैंने लिखी थी यह कविता)

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...