Saturday, December 1, 2012

अखबार मुस्कुरा रहा था, लोकतंत्र घबड़ा रहा था


ठंड की सुगबुगाहट होते ही माहौल रूमानी सा हो जाता है। जाड़े के मौसम की सुबह अनायास ही खिड़की से बाहर झांकने को मजबूर कर देती है। हल्की ओस की बूंदों के पार देखने का मजा और हल्की सांस छोड़ते हुए मुंह और नाक से भाप निकलने का एहसास यकायक ही दिल को रोमांचित कर देता है। ऐसी ही एक सुबह दिल घर के बाहर चहलकदमी करने को मजबूर करने लगा। हमने भी अपने ट्रैक शूट का जोड़ा निकाला और किरमिच के जूतों को सलीके से बांधते हुए पास की मुख्य सड़क पर जाना तय कर लिया। मैं घर से अपनी जैकेट की जेबों में हाथ डाले हुए कान में एफएम की लीड को लगाए हुए तेज कदमों से दबे अंदाज में कुछ विचारते और कुछ गुनगुनाते हुए चल पड़ा। अजब इत्तिफाक था सड़क के पास पहुंचते ही देखा कि रात भर जिस बैंड और डीजे के शोर के चलते मैं सो नहीं पाया था उसका पुछल्ला अब भी नजर आ रहा था। बारात अभी जाने को तैयार हो रही थी। बाराती पास की चाय की दुकान पर मजमा लगाए हुए थे। जाहिर है, ऐसे माहौल में कभी राजनीति पर चर्चा होती है तो कभी नवदंपतियों के प्रणय पर मजाक। यहां भी ऐसा ही कुछ देखने और सुनने को मिला। मैं भी शांत मन से उनकी चुहल का हिस्सा बनने लगा। दरअसल, मैंने पूरी तरह से लखनवी तहजीब का इस्तेमाल करते हुए दुकान पर रखे अखबार पर हाथ मारते हुए अपनी जगह सुनिश्चित कर ली थी।
अखबारी आदमी की बीमारी होती है कि वह अखबार को सिरसिरे निगाह से देखते हुए। आस-पास के लोगों का खबरों पर मन जांचने लगता है। सब कुछ साधारण सा था। कुछ भी तो नहीं बदला था। हमेशा की तरह लोगों ने दो-दो, एक-एक पन्नों को मांगते हुए उस ताजे अखबार का चीरहरण भी कर दिया था। इसी बीच किसी की नजर अखबार की एक खबार पर गई। खबर थी 'केंद्र सरकार के खिलाफ देशव्यापी धरने की' सभी ने इस धरने के आयोजक की तारीफ में कसीदे काढऩा और सरकार के खिलाफ गुस्सा उगलना शुरू कर दिया। कोई उस अनाम आयोजक को शेर तो कोई मर्द की संज्ञा दे रहा था। वहीं, सरकार विरोधियों ने पौ फटते ही पूरी संसद को गाली देना शुरू कर दिया। मैं सभी की बातों को सुन रहा था। अपनी मर्जी को मैंने किसी के सामने नहीं रखा। वरन यह जरूर किया की जैसे ही कोई मुझसे मुखातिब होता मैं उसकी बातों में हामी भर देता। सभी ने चाय की चुस्कियों का आनंद लिया और जमकर अपनी भड़ांस निकाली। अखबार के पन्ने पहले लोगों के दोनों हाथों में थे। कुछ देर बाद अंगुलियों की संख्या कम होती गई और अंत में वह दुकान में लगी टुटही बेंच पर बेतरतीब तरीके से सजा दिए गए। चाय भी खत्म होने लगी। लोग अपने-अपने रास्ते को होने लगे। सभी ने चाय का दाम चुकाने के साथ ही दिनभर के कामों की चर्चा भी आपस में कर ली। देशव्यापी धरना अखबार के माध्यम से उनकी आंखों में झांक रहा था। सभी ने अखबार को पंगू सरीखा करते हुए अपने रास्ते होना ज्यादा उचित समझा और धरने का हिस्सा बनने की बात पर बस इतना कहा कि अमा इतना वक्त कहां है। हां, लेकिन अनाम आयोजक की तारीफ में कोई कमी नहीं थी। हो भी क्यों न, वह उनके देश की रक्षा जो कर रहा था। वह संसद में उनके हाथों चुने गए मौजूद भ्रष्टï नेताओं से। अखबार कभी खुद पर कभी देश के ऐसे होनहारों पर हंस रहा था। वह मुझ पर भी हंस रहा था कि तुम ऐसे ही लोगों को जगाने के लिए खबरनवीस बने थे। अखबार लोकतंत्र का आईना होता है। मगर वह हम सबको आईना दिखा रहा था। लोकतंत्र का आईना देश की दुर्गति पर मुस्कुरा रहा था। वह मुझको देशवासियों का दिल दिखा रहा था। अखबार एक देशभक्त की आस में अपनी बांहें फैला रहा था।

Sunday, July 22, 2012

साजी, जांबाजी और अब अंदाजी ने छोड़ा साथ



नीरज तिवारी

मृत्यु होना स्वाभाविक है मगर कुछ मौतें ऐसी होती हैं जो किसी भी उम्र में हों फिर भी दिल में एक टीस सी दे जाती हैं कि भगवान ने उन्हें हमसे जल्दी ही छीन लिया। इन्हीं दुखद घटनाओं में हमने पिछले एक माह (13-06-2012 से 18-07-2012) में तीन हस्तियों को खो दिया। इस फेहरिस्त में सबसे पहले नाम आता है उम्दा साजी मेहंदी हसन (18-07-1927 से 13-06-2012, 84 वर्ष) का जिन्होंने अपने स्वर लहरियों से कई दशकों तक गजल की आराधना की और श्रोताओं के श्रवणों में अमर हो गए। इस दुखद घटना से अभी फिल्म जगत उबर भी नहीं पाया था कि ऊपरवाले ने बालीवुड को एक समय में अपने जांबाजी के दम पर जीतने वाले योद्धा एवं हिंदी फिल्मों के स्टार की रूप में दर्ज जांबाज दारा सिंह (19-11-1928 से 12-07-2012, 83 वर्ष) को हमसे छीन लिया। इस जांबाजी की मौत को बर्दाश्त कर ही रहे थे कि भगवान ने बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार एवं बेहतरीन अंदाजी राजेश खन्ना (29-12-1942 से 18-07-2012, 69 वर्ष) को भी अपने पास बुला लिया। यकीनन, ये सभी मौतें देशवासियों के लिए किसी रत्न को खो देने से कम नहीं है। इन मौतों की टीस सालों तक हमें सालती रहेगी। ...और यही वे मौतें हैं जो अपनी पूरी जिंदगी जीने के बाद भी अल्पायु में हुई मौत सा एहसास दे रही हैं।

अजीब इत्तिफाक है कि इन तीनों दिग्गजों में एक बात समान थी कि वे मध्यमवर्गीय परिवार की जरूरतों से लड़ते हुए इस मुकाम तक पहुंचे थे। सबसे पहले बात करते हैं गजल के बादशाह मेहंदी हसन की, जिन्होंने गरीबी में जीते हुए हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे का दंश झेलते हुए अपनी संगीत साधना को जारी रखा और देखते ही देखते सुरों की महफिल में एक अदीप्त सितारे के समान जगमगाने लगे। इनकी चमक ने न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि हिंदुस्तान का भी नाम दुनिया के कोने-कोने में रोशन कर दिया। इस अमर साजी ने अपने पूरे जीवनकाल में एक से बढ़कर एक तमगे जीते। इनमें पाकिस्तान के जनरल अयुब खान के हाथों दिया गया 'तमगा-ए-इम्तियाज' फिर जनरल जीयाउल हक द्वारा नवाजा गया 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस' और अंत में जनरल परवेज मुशर्रफ की ओर से दिया गया सम्मान 'हिलाल-ए-इम्तियाज' का नाम सर्वोपरी है। इसके अलावा भी उन्होंने कई पुरस्कारों को अपनी झोली जगह में दी, जिनमें भारत के जालंधर में वर्ष 1973 में नवाजा गया 'सहगल अवार्ड', नेपाल में वर्ष 1983 में नवाजा गया 'गोरखा दक्षिणा बहु' भी शामिल हैं। हसन साहब वर्ष 1957 से लेकर 1999 तक संगीत की आराधना कर श्रोताओं का दिल जीतते रहे। मगर अपनी नासाज तबीयत के कारण इन्होंने वर्ष 1999 के बाद से गजल गायकी लगभग बंद ही कर दी। वे फेंफड़े, छाती और यूरीनरी संबंधी बीमारी से बुरी तरह से ग्रसित थे। इनके जीवन का एक दुखद पहलु यह भी है कि लंबे समय तक दुनिया में गजल उस्ताद रहे मेहंदी हसन अंत में अकेलेपन और आर्थिक तंगी के शिकार हो गए थे। विश्व के लिए हसन साहब की मौत यकीनन एक अदीप्त सूर्य के बादल में ढंक जाने से जैसा ही है क्योंकि इनके सुर आज भी हमें उनके जिंदा होने का एहसास कराते हैं।

इस फेहरिस्त में दूसरे पायदान पर काबिज हैं भारत का नाम कुश्ती के क्षेत्र में अमर करने वाले दारा सिंह का। इनका जन्म वर्तमान में अमृतसर के धर्मुचक गांव में हुआ था। जीवन के 83 बसंत देखने वाले इस भारतीय ने अपने समय में लंबा संघर्ष और अथक प्रयास करते हुए बॉलीवुड में अपना कीर्तिमान दर्ज कराया था। कुश्ती में तत्कालीन विश्व विख्यात किंग-कांग को मात देने वाले दारा सिंह ने बॉलीवुड में भी लंबी पारी खेलते हुए अपने फौलादी शरीर के दम पर दर्शकों का दिल जीत लिया। इन्होंने अपने जीवनकाल में कई उपाधियों को अपने नाम दर्ज किया। इनमें 'रूस्तम-ए-पंजाब', 'रूस्तम-ए-हिंद' और 'आयरनमैन ऑफ इंडियन सिनेमा' का खिताब है। इन्होंने अपना करियर तीन चरणों में जीया था। इनके करियर का पहला चरण बतौर कुश्ती पहलवान के रूप में (1946-1983), दूसरा अभिनेता के रूप में (1952-2012) और बतौर तीसरा राजनीतिज्ञ के रूप में (2003-2009) तक रहा था। सिख धर्म के इस पहलवान ने टेलीविजन की दुनिया में चार चांद लगाते हुए भारतीय टेलीविजन जगत के अमर धारावाहिक 'रामायण' में भगवान हनुमान के चरित्र को इस कदर जीवंत कर दिया था कि बाजारों में इनकी तस्वीर हनुमान जीके रूप में बिकने लगी। इन तस्वीरों को कई चहेतों ने अपने घरों में मंदिर तक में जगह दे डाली। इस तरह अपनी ख्याती में बढ़ोत्तरी करने के बाद इन्होंने देश के कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण की। इस तरह इन्होंने अपने जीवन को अमर करते हुए देशवासियों के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ दी, जो चीरकाल तक हमें सालती रहेगी। वे हृदयाघात लगने के बाद काफी इलाज के बावजूद भी नहीं बचाए जा सके थे।

इन दो मौतों के दर्द को अभी झेल ही रहे थे कि बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार के रूप में जाने जाने वाले राजेश खन्ना जी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। बॉलीवुड के लिए इस दर्द को सहना सबसे ज्यादा कठिन रहा। इस नामी सितारे को अकेलेपन ने मार दिया। एक समय में लोगों के दिलों पर राज करने वाले एक साधारण युवक राजेश खन्ना ने एक टैलेंट हंट शो के जरिये बॉलीवुड में मौका पाने के बाद उस जमाने के नामी सितारों की रोशनी को हल्का कर दिया और बॉलीवुड में प्रेम दृश्यों को एक नया आयाम दिया। इन्होंने न सिर्फ बॉलीवुड में बनायी जा रही तत्कालीन फिल्मों को नया आयाम दिया बल्कि फिल्मकारों को अमीरों के प्रेम पर आधारित कहानियों से हटाते हुए मध्यमवर्गीय परिवार में पलने वाले प्रेम के प्रति आकर्षित किया। देखते ही देखते इन्होंने अपने कदमों में कीर्तिमानों की झड़ी लगा दी। वैवाहिक जीवन का भरपुर सुख न उठा पाने वाले इस सुपरस्टार ने हिंदी फिल्मों में कुछ पात्र तो ऐसे जीवंत कर दिए कि वे फिल्म जगत में सदा के लिए अमर हो गए। इनकी एक झलक के लिए लड़कियां मुंबई स्थित इनके घर के बाहर घंटों खड़ी रहती थीं। कहा जाता है कि खून से लिखे खतों का इनके घर आने का सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। यही कारण है कि इस अनमोल 'नगीने' की मौत ने पूरे देश को गम के साये में डुबो दिया। सभी घंटों तक टीवी पर नजरें लगाकर इनकी मौत की खबर सुनते रहे। बड़ी संख्या में इनकी शव यात्रा में शरीक होकर अपना प्रेम दर्शाया।

इन तीनों ही जिंदगियों का लखनऊ से बड़ा ही गहरा रिश्ता रहा। लखनऊ की तहजीब और लाजवाब खानपान के दीवाने इन सितारों की मौत ने अवधवासियों को भी झकझोर दिया। देश इन हस्तियों और इनकी प्रतिभा को युगों-युगों तक याद करता रहेगा। शायद यही कारण है कि ये सितारे जीए तो अपनी पूरी जिंदगी मगर इनकी मौत हमें अकास्मयिक और अल्पायु में हुई मृत्यु सा आभास कराती रहेंगी।


Wednesday, July 11, 2012

बिल्‍ली शेर को खा गई, वो बदकिस्‍मती को भा गई

[मेरे एक मित्र प्‍यार के शिकार हो गए। काफी दिनों के बाद अचानक मिल गए तो मैंने लपक लिया। पूछा, कहां थे बंधुवर,  तो बोल पडे मत पूछो यार हम क्‍या से क्‍या हो गए। कभी चौतरफा चिल्‍लाते थे आज मुख-बधिर से बीमार हो गए। हालत जनाब कि बयां कर रही थी कि प्‍यार का शिकार हैं। हमने चुटकी ली तो भरे मन से  सुनाते चले गए अपना हाल-ए-दिल।............... अब पेशेवर पत्रकार हूं तो खुलासा कर रहा हूं कि उन्‍होंने क्‍या कहा। एक सेकेंड, इसे स्टिंग मत समझिएगा उनसे पूछकर ही छाप रहा हूं। दोस्‍त हैं वो मेरे। इसका गुमान है मुझे।]

नोट: आगे के शब्‍द मेरे गुमनाम दोस्‍त के हैं.......... तो पढिए।

बडा मजा आया कुछ दिन की गुमनामी में। ये गुमनामी कुछ दिन नहीं, महीनों चली। कभी इंसान बना, कभी भगवान और कभी कुत्‍ता। हाए, वो चीज ही ऐसी है कि रूप लेता चला गया और खुद को खोता चला गया। मगर याद बहुत आई......... आप सबकि जनाब। आखिर आती भी क्‍यों न आपने मुझे उसी रूप में स्‍वीकारा जिस
रूप में मैं हूं। कम से कम कठपुतली का नाच नचाने की कोशिश तो नहीं की। हाए.................. आइए आपको बताता हूं कि इन दिनों किस घाट का पानी पी रहा था। खैर, रहने दीजिए घाट की बात। इन दिनों क्‍या नहीं कर सका वो जानिए......... सबसे ज्‍यादा जो काम करता था वो काम नहीं कर सका यानी सुकून से रहना। लोगों को खुश रखना। खुश रहना। बीच में लक्ष्‍य से भटकाव का एहसास हुआ तो सोचा शायद यही लक्ष्‍य है। मगर वो लक्ष्‍य नहीं मरिचिका थी। हाए.................................... । समय-समय पर सोचा कि शायद मैं गलत हूं। मगर कोई अपनी गलती को स्‍वीरकारता कहां है। खैर, दुनिया का नियम भी है कि जो दुत्‍कारे उसी के पास जा प्‍यारे, तो जाने दिया। सच कहूं तो मैं भी दुत्‍कारा गया। कभी शब्‍दों से कभी बातों से मारा गया। मगर कुत्‍ता बनना तय था तो क्‍या करते। उसे कभी मेरा भरोसा न था। उसे मैं चटनी लगता था। खैर, मैं चटनी नहीं पूरी थाल हूं। इस बात का एहसास उसे अब कहां होगा। देखा फिर भटकाव आ गया नीरज भाई। मुझे शायद वो साबुन समझती है, जिससे हाथ धो लो और बाथरूम, फ्लस या वॉश बेसिन में बहा दो। मगर मैं तो घी हूं न। जब हाथ में लगूंगा तो चिकनाई दिखाउंगा ही। मुझे कोई इस्‍तेमाल नहीं कर सकता। खैर, मैंने बात को काटा और पूछा हुआ क्‍या? तो बोले मुझे भी नहीं पता।कहानी का अंत क्‍यों किया, तो बोले वो समझती ही नहीं मुझे। मजाक और मुझमें बडा अंतर है। अस्‍ितत्‍व खो सकता हूं स्‍वाभिमान नहीं। मैं समझ गया कि मामला कुछ ज्‍यादा ही गंभीर है तो ज्‍यादा छेडा नहीं। बस इतना कहकर उन्‍हें समझा दिया कि कोई बात नहीं बेटा बिल्‍ली शेर को खा गई, वो बदकिस्‍मती को भा गई जो उसने तेरा प्‍यार ठुकरा दिया। इतना प्‍यार तो कोई पत्‍थर से भी कर देता तो आलम ये होता कि वो जी उठता। मगर राह पकडने से पहले मंजिल और मरिचिका में अंतर पहचानना सीखें। फिर जीने की कोशिश करें।दोस्‍त का चेहरा उदास था, मेरा वो बडा खास था। मगर उसको खुद में ज्‍यादा
विश्‍वास था, तो हमने कहा, मौज करो यार! झटके में भी अब मत करना प्‍यार।

Monday, June 11, 2012

लेखकों को बदलनी होगी 'लेखनी'

नीरज तिवारी
किताबों के प्रति घटती लोकप्रियता चिंता का विषय है। युवा अब किताबों से दूरी बनाने लगे हैं। ज्ञान के इस अथाह सागर में गोते लगाने से परहेज करने लगे हैं। वे इससे दूर जा रहे हैं। लखनऊ की लाइब्रेरियों में भी अब पहले की तरह युवाओं की भीड़ नहीं उमड़ती। उमड़ती है तो सिर्फ सेवानिवृत्त बुजुर्गों की कुछ संख्या। किताबों के प्रति घटते इस लगाव को सिर्फ साहित्य का ही हनन नहीं कहा जा सकता। यह हनन है हमारे विचारों का। किताबों के पन्नों में काले अक्षरों में छुपे जीवन के सार का, जिसे पढऩे और अपनाने से लोग चूकने लगे हैं। वे इसे बोझिल मानने लगे हैं। ऐसा क्यों? किताबों के प्रति रूचि की गिरावट का विश्लेषण करना चाहिए। अब समय आ गया है कि लोगों को एक बार फिर किताबों की ओर आकर्षित किया जाए। शायद इसका कारण है लोगों को बदलते परिवेश के हिसाब से मनचाहा विषय न मिल पाना। विषयों के प्रति युवाओं के मन को टटोलते हुए लेखकों का न लिखना। ऐसे में उन्हें किताबों के इस मंच से जोडऩा काफी दुष्कर होता जा रहा है। युवाओं को अब हिंदी की किताबों में दिलचस्पी नहीं रही। वे अब भावनात्मक और गरीबी-अमीरी को दर्शाने वाले विषयों पर लिखी गईं पुस्तकों से कतराने लगे हैं। जाहिर, पुस्तक के मंचों पर भीड़ घटेगी ही।
सालभर कहीं न कहीं पुस्तक मेले आयोजित होते रहते हैं। इन मेलों में देशी पुस्तकों के प्रति लोगों का झुकाव क्ष्णिक होता है। वे अमुक लेखक की पुस्तक सिर्फ इसलिए खरीद लेते हैं कि अक्सर वे उनका नाम चर्चाओं में सुनते रहते हैं। मेरे एक पुस्तक के प्रेमी मित्र ने कहा था कि अक्सर पाठक पुस्तक की दुकानों में जाकर भावावेश में किताबों का चयन करता है। इससे वह नए विषयों को पढऩे से चूक जाता है। ऐसे में यदि पुस्तक उसके सामयिक विषयों को दर्शाती है तो ठीक अन्यथा वह किसी अलमारी या घर के सेंटर टेबल की शोभा बढ़ाने के काम आ जाती है। युवाओं में किताबों के प्रति घटती दीवानगी का यह दूसरा कारण हो सकता है। यानी भावावेश में आकर विषयों को चुनने के बजाय सिर्फ लेखक के नाम पर पुस्तक को खरीद लेने का चलन। इससे जाहिर है नए पाठकों को सदैव के लिए किताबों को पढऩे के प्रति प्रेरित नहीं किया जा सकता।
इन कारकों के अलावा भी पुस्तकों के प्रति घटते रूझान के कई कारक हैं। इनमें समय की कमी के बीच और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच मोटी-मोटी किताबों को सीने से लगाए रखने के लिए समय न निकाल पाना मुख्य कारक हो सकता है। साथ ही, मनोरंजन के साधनों में बाढ़ की तर्ज पर विकल्पों का भरमार होना सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है। मगर मेरा मानना है कि पुस्तकों के प्रति जिसके मन में जरा सी भी श्रद्धा होगी वह कहीं न कहीं से समय का जुगाड़ कर किताब के पन्नों को उलटने-पलटने का समय निकाल ही लेता है। ऐसे में हम इस लेख में सिर्फ उन्हीं की बात करेंगे जो पुस्तकों को पढऩे और विषयों को तलाशने में रूचि रखते हैं।
अब बात करते हैं विषयों के प्रति लोगों में कौन सा विकल्प सबसे ज्यादा अपनाया जा रहा है। इस दिशा में सोचने पर पता चलता है कि लोगों में अब चंद्रकांता और भूतनाथ सरीखे जादू-टोने वाले विषयों को पढऩे का कोई लगाव नहीं रह गया है। वे अब रिश्तों को पर्दे के पीछे से देखने वाली दब्बू महिला और दबंग पुरुष की जीवनशैली और उठापटक वाले विषयों पर आधारित पुस्तकों को भी नहीं पढऩा चाहते। वे गरीबी पर 'पीएचडीÓ कराने वाली कहानियों को भी नहीं पढऩा चाहते, क्योंकि अब वे दिन चले गए हैं जब पर्दे के पीछे से नायिका की नजर धूप को तलाशते हुए बीत जाया करती थी। साथ ही जमींदारी की आंच में आम आदमी की गरीबी को सुलगते दिखाने वाले विषयों को भी पाठक नकार रहा है। वे अब खुले विचारों पर आधारित और 'मेट्रो लाइफÓ पर आधारित कहानियों को पढऩा चाहते हैं। इसका सीधा प्रमाण हम फिल्मों से देख सकते हैं। फिल्में समाज का आइना होती हैं। वही फिल्में सफलता के आयाम रचती हैं, जिनमें लोगों को अपनी कहानी नजर आती है। अब लोग वास्तविक कहानियों को देखना और पढऩा चाहते हैं। यही कारण है कि चेतन भगत की लिखी कहानियों में युवा खुद को जोड़ते हुए पढऩा पसंद करते हैं जबकि कई अन्य ज्वलंत विषयों की पुस्तकें बाजार में आती और जाती रहती हैं मगर पाठक उनकी चर्चा तक नहीं करते। साफ है कि विषयों के प्रति लेखकों को नवीनता लानी ही होगी। उन्हें पाठकों की पसंद को देखते हुए हिंदी की कहानियों को भी वही दिशा देनी होगी, जिसमें नायक और नायिका अपने घर और समाज के प्रति बिगुल बजाते हुए, कंधे से कंधा मिलाते हुए समाज से लड़ पड़ते हैं न कि मन की बात को मन में ही दबाये हुए जीवन काट देने का किरदार निभाते हैं। आज का समाज विषयों में क्रांतिकारी विचारधारा चाहता है। वह गरीबी और रिश्तों में उलझते हुए किरदारों को नहीं पढऩा चाहता। वह पढऩा चाहता है तो सिर्फ रिश्तों को डंके की चोट पर समाज में मनवाने वाले किरदारों की जीवनी। लेखकों को बदलते हुए समाज की नब्ज को समझते हुए अपने कलम को नया रुख देना होगा। उन्हें भाषा में ज्ञान का पुट करने की बजाय उन्हें आम बोलचाल की भाषा पर कहानी को मढऩा होगा। मैं यह नहीं कहता कि इससे पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग किताबों की ओर भागा चला आएगा। मगर इससे इतना तो तय है कि पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग भविष्य पन्नों को उलटने-पलटने के लिए उमड़ पड़े, कि शुरुआत हो जाएगी।
अंत में केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल के दामों में किए गए 'खेल' यानी पहले 7.50 रुपये प्रति लीटर के भाव से महंगा करना और फिर दो रुपये प्रति लीटर का भाव घटाते हुए लोगों को लुभाने के प्रयास पर और उनकी आर्थिक दिक्कतों का मजाक उड़ाने के बारेे में एक शेर.....

एक टूटी दरख्त के बदन ढंकते पत्ते भी झाड़ ले गए,
हम जिंदगी के मारे थे वो जिंदगी उधार ले गए।
बदकिस्मत तो 'नीरज' थे जो उन्हें चोर भी न कह सके,
वो तो रेंगती हुई जिंदगी से छीनकर रफ्तार ले गए।

Sunday, April 1, 2012

असमय ही वह बन गया 'छोटू'

शाम होने को थी या यह कहना ज्यादा सही होगा कि शाम हो चुकी थी। मेरी आँखें नींद को विदा करने को तैयार नहीं थी। नींद मुझसे विदा मांग रही थी और मैं उसे खुद में समेटने की जिद में बाहर की शाम को अनदेखा करने पर तुला हुआ था। इसी बीच मां की आवाज आई, शाम के वक्त नहीं सोते। गुदले की बेला में सोने से उम्र का क्षय होता है। मगर मैं साप्ताहिक अवकाश को पूरी तरह नींद की आगोश में लुटाना चाहता था। खैर, अब सोना ज्यादा ठीक नहीं था। मां की आवाज तेज होती जा रही थी। दरअसल, वह मेरे कमरे के पास तक आ गई थीं। उन्हें कमरे में दाखिल होता देख मैंने बड़े ही अलसाये हुए अंदाज में कहा, 'अच्छा-अच्छा। उठ गया हूं। परेशान न हो। सप्ताह में एक दिन सोने को मिलता है। उसमें भी उम्र बढ़ाने के तरीके सुझा रही हैं आप।' मां को हंसी आ गई। उन्होंने मेरे शब्दों में ताने के तीर को अनसुना करते हुए कहा कि ठीक है, मेहमान खाने में आ जाओ। चाय ठंडी हो रही है। मैंने भी निद्रा देवी को विदा करते हुए बिस्तर को सलाम कर खड़ा होना ज्यादा उचित समझा।
मैं हाथ-मुंह धोकर मेहमान खाने में चला गया। वहां चाय का प्याला मेरे इंतजार में ठंडा हो रहा था। मैंने भी उसे बड़ी सुस्त चुस्की के साथ पीना शुरू कर दिया। कुछ ही देर बाद मेरी सुस्त चुस्कियां चुस्त चुस्कियों में तेज हो गईं। चाय खत्म होने के साथ ही मैंने फैसला कर लिया कि अब मुझे शाम का मजा लेना चाहिए। घर के पास वाले चौराहे पर जाकर मुआयना करना चाहिए। दरअसल, अखबार की नौकरी करते हुए मुझे शाम और सुबह का आनंद नहीं मिल पाता है। इसीलिए छुट्टी के दिन मैं शाम को पूरी तरह से आंखों में बसा लेने की कोशिश करता हूं ताकि एक सप्ताह बाद आने वाले अवकाश के दिन तक शाम का नजारा मेरी यादों में बस सके। इसी फैसले के साथ मैं अपनी बाइक को तेज रफ्तार देते हुए तुरंत ही चौराहे पहुंच गया। आज की शाम कुछ अलग सी लग रही थी। अंदर का पत्रकार बार-बार अंगड़ाई लेकर लिखने के लिए कुछ मसाला तलाशने को बेचैन कर रहा था।
इसी बीच मेरी नजर एक बच्चे पर पड़ी। वह अंडे के ठेले पर प्लेट धो रहा था। उसके चेहरे पर बचपन का कोई भाव नहीं दिख रहा था। मुझे न जाने उसके चेहरे पर फिर भी कुछ खिंचाव सा नजर आया। मैं टकटकी लगाकर उसे देखने लगा। कुछ क्षण के बाद ऐसा लगने लगा कि मैं उस लड़के को, जिसकी उम्र तकरीबन 12-13 साल की होगी, को जानता हूं। दिमाग पर काफी जोर देने पर भी उसका परिचय याद नहीं आ रहा था। फिर भी मैं उस बच्चे के चेहरे पर से नजर नहीं हटा पा रहा था। खैर, दिमाग पर जोर लगाने से बेहतर मैंने यह समझा कि उस बच्चे के ठेले पर जाकर उबले अंडे ही खा आऊं। फिर, मैंने अपनी बाइक को किनारे खड़ी करके उस बच्चे से दो उबले अंडे धनिया की चटनी और प्याज के साथ देने को कहा। इस बार वह बच्चा मुझे देखते ही थोड़ा मुस्कुराया। शायद, वह भी मुझे पहचाना हुआ समझ रहा था। मगर मैंने उसकी मुस्कान पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और जेब में से मोबाइल निकालकर अपने एक अजीज से बात करने लगा।
मगर दिमाग के एक कोने में अब भी उस बच्चे के प्रति आकर्षण बनने का सवाल जोर मार रहा था। खैर, इसी बीच वह प्लेट में अंडे सजाकर ले आया। उसके चेहरे पर अब भी मुस्कान रह-रहकर झलक रही थी। मैंने उससे पूछा तुम्हें हंसी क्यों आ रही है? क्या तुम मुझे जानते हो? इस सवाल पर उसने धीरे से कहा, हां। मैंने तपाक से कहा, मुझे भी लग रहा है कि मैं तुम्हें जानता हूं। मगर याद नहीं कर पा रहा हूं कि तुम्हें मैंने कहां देखा है। इस पर उसने कहा कि आप नीरज सर ही हैं न? मैंने कहा हां, क्या मैंने तुमको कभी पढ़ाया है। इसके कुछ ही पल के बाद मुझे याद आ गया कि वह बच्चा तो एक समय में जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, तब मुझसे एक स्कूल में पढ़ता था। उसकी इंग्लिश बहुत कमजोर थी। इस वजह से मैं उसे कभी-कभी इंग्लिश को याद करने के टिप्स भी दिया करता था। मगर जल्द ही मुझे एक बात और कौंध गई कि यह तो बहुत ही हंसता-खेलता था। इसकी हंसी से तंग आकर एक बार मैंने इसे डंडे भी मारे थे। मगर अब यह इतना गंभीर क्यों हो गया है और पढऩे-खेलने की इस उम्र में इस ठेले पर क्या कर रहा है, जबकि वह अकसर कहता था कि पापा की ख्वाहिश है कि वह बड़ा होकर कोई सरकारी अधिकारी बने। मगर .....अब। मैं उससे पूछ बैठा। तुम इस उम्र में पढ़ाई करने का समय छोड़कर ठेले पर क्या कर रहे हो। वह मायुस हो गया। उसने बताया कि पिछले साल उसके पिता इसी जगह पर ठेला लगाते समय एक ट्रक की तेज रफ्तार के शिकार हो गए थे। कुछ दिन तो पिता जी की कुछ जमा पूंजी से घर चलता रहा। मगर एक समय के बाद घर पर लेनदारों का तांता लगने लगा। मां को परेशान देख मैंने अपनी किताबों को घर की टांड़ पर फेंक दिया और पिता जी की वसीयत में मिले इस ठेले को सजाकर घर की जिम्मेदारी उठा ली है। अब मैं स्कूल नहीं जाता। न जाने क्यों अब हंसी भी नहीं आती। शाम ठेले पर और दिन मां के साथ सब्जी का ठेला लगाने के साथ व सुबह बच्चों को स्कूल जाते हुए देखते कट रहा है। मैं स्तब्ध था। कुछ समझ नहीं पा रहा था कि इस बच्चे को शाबाशी दूं या देश की शिक्षा व्यवस्था और एनजीओ की दुकानों को कोसूं, जो ऐसे ही न जाने कितने विशाल यादव को असमय ही 'छोटू' कहलाने के लिए जिंदगी की मझधार में छोड़ देते हैं। इस कोरे वायदे के साथ कि जल्द ही शिक्षा व्यवस्था को पूर्णतया घर-घर पहुंचाया जाएगा। न जाने अचानक ही अंडे का स्वाद कड़वा सा लगने लगा। मैंने रुपया दिया और वहां से रवाना हो लिया, मगर इस कहानी को लिखने के सिवाए मैं उस बच्चे के लिए कुछ न कर सका। मैं सवालों में था। आज की शाम सच में कई सवालों के साथ आंखों में बस गई। रात हो चली थी। घर पर सभी मेरा इंतजार कर रहे थे। मगर न जाने अब मेरे चेहरे की मुस्कान कहीं गुम हो चुकी थी। शाम को रात ने अपने आगोश में ले लिया था.....।

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...