Monday, December 6, 2010

खामोश साज हो तुम

बदलते वक्‍त की आवाज हो तुम
जो खामोशी में गूंजे वो साज हो तुम
किस बवंडर में जा उलझे हो यार
सच बताओ क्‍यों आज उदास हो तुम
कभी तुमने भरोसा न किया हम पर
फिर भी मेरे लिए लाजवाब हो तुम
कि सुबह की तलाश में जागा हूं रातभर
कि गुनगुनी शबनम सा एहसास हो तुम।
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1 comment:

Maan Sengar said...

ग़ज़ल दिल से समझी जा सकती है. अच्छी है.

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