Saturday, October 11, 2014

अभी मुझको तपना है...

अब तक गोद में पला किया
नहीं किसी का भला किया
दिया नहीं बस लिया-लिया
                                   अभी मुझको तपना है।

अब तक माटी का ढेला था
हर पल से बस खेला था
जग मनोरंजन का मेला था
                                    अभी मुझको तपना है।
थोड़े दुख से रोता था
कर्म के  वक्त सोता था
पथ में कांटे बोता था
                                   अभी मुझको तपना है।
करता था मैं छांव की खोज
तुच्छ सी थी मेरी सोच
अब बढ़ा रहा हूं अपना ओज
                                  अभी मुझको तपना है।
अब सपनों को मैंने जाना है
मंजिल मुझको पाना है
सबसे आगे आना है
                                 अभी मुझको तपना है।
अब जिह्वा पर काबू पाना है
कर्म की चाक पर जाना है
वो पाना है जो अंजाना है
                                अभी मुझको तपना है।

Tuesday, September 23, 2014

उर्दू के विकास में मिर्जा हादी रूसवा का अमूल्य योगदान

मिर्जा मोहम्मद हादी रूसवा ने अपनी कलम से दुनिया में पहचान हासिल की. वे उर्दू कवि और कथा लेखक थे. उनके लिखे कई नाटकों ने काफी सुर्खियां बटोरी, जो उनकी जिंदगी की अमूल्य धरोहर बन गए. उनकी रचना में मुख्य रूप से धर्म, दर्शन और खगोल विज्ञान की झलक दिखती थी. वे उर्दू, फारसी, अरबी, हिब्रू, अंग्रेजी, लैटिन और ग्रीक भाषा के ज्ञानी थे. उन्हें अवध के निजाम ने भाषा के उत्थान के लिए अपनी सलाहकार समिति शामिल कर रखा था. वर्ष 1905 में प्रकाशित उमराव जनवरी अदा को उनका लिखा हुआ पहला उर्दू उपन्यास का गौरव हासिल है. इस उपन्यास की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी कहानी पर कई बार फिल्में बनाई गईं. फिर भी लोगों में इस उपन्यास के प्रति प्रेम अब भी बरकरार है. 


जीवन परिचय
मिर्जा मोहम्मद हादी रूसवा के जीवन का सही विवरण उपलब्ध नहीं है. इतिहासकारों द्वारा दी गई जानकारियों में काफी विरोधाभास मिलता है. रूसवा स्वयं लिखते हैं कि उनके पूर्वज फारस से भारत में आए थे. उनके परदादा अवध की सेना में उच्च पद पर थे. रूसवा के मुताबिक उनके पिता और दादा गणित और खगोल विज्ञान में खासी रुचि रखते हैं. उनका जन्म वर्ष 1857 में लखनऊ में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा घर में हरी प्राप्त की. जब वे मात्र 16 साल के थे तभी उनके मां-बाप का देहांत हो गया था. उनके बड़े भाई मिर्जा मोहम्मद जाकी की भी जल्द ही मौत हो गई थी. इसी बीच वे हैदर बख्श नाम के एक कैलीग्राफिस्ट के सम्पर्क में आ गए. हैदर ने रूसवा को भी अपनी कला सिखाकर उनके जीवनयापन का इंतजाम करवा दिया. साथ ही साथ रूसवा ने घर पर ही पढ़ते हुए अपनी मैट्रिक का एग्जाम पास कर लिया. इसके बाद उन्होंने मुंशी फाजिल का कोर्स किया. इसके बाद उन्होंने रुड़की स्थित थॉमस इंजीनियरिंग स्कूल से ओवरसियर डिप्लोमा हासिल किया. कुछ समय के लिए उन्होंने बलुचिस्तान में रेल की पटरियां बिछाने का भी काम किया. हालांकि, इस बीच उन्होंने लिखना और पढऩा नहीं छोड़ा. कुछ समय की नौकरी के बाद वे लखनऊ वापिस लौट आए और उन्होंने पढ़ाने और लिखने को ही अपना करियर बनाना तय किया. उसके बाद वे एक स्थानीय मिशनरी स्कूल में टीचर बन गए और फिर बाद में क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवक्ता भी बने. जहां वे गणित, विज्ञान, दर्शनशास्त्र और फारसी पढ़ाया करते थे. मगर कुछ समय के बाद उन्होंने लखनऊ छोड़कर हैदराबाद में जाना तय किया. वहां वे उस्मानिया यूनिवर्सिटी में अनुवादक के ब्यूरो के पद पर काबिज हुए. 21 अक्टूबर 1931 को उनकी टाइफाइड से मौत हो गई.

लेखन में योगदान 
रूसवाजी की लेखनी लैला-मजनू को वर्ष 1887 में प्रकाशित किया गया था. यह प्रेम पर लिखी गई एक कविता थी. मगर इस कविता को ज्यादा प्रसिद्धि नहीं मिली. इसकी आलोचकों ने जमकर निंदा की. फिर भी उन्होंने कविता लिखने की कला को नहीं छेाड़ा. जीवन के अंतिम पलों तक वे कविता लिखने के काम में सक्रिय रहे. अफसाई राज का पहला प्रकाशन वर्ष 1902 में किया गया. इसके तीन साल के बाद उनकी उर्दू में लिखा फेमस नॉवेल उमराव जान अदा का प्रकाशन हुआ. इसके बाद उन्हें काफी सराहना मिली. तदोपरांत जात-ए-शरीफ और शरीफ जादा नाम से उनकी दो और रचनाओं का प्रकाशन हुआ. मगर ये उतनी सफलता हासिल नहीं कर सकीं. हालांकि, इन रचनाओं को भी उर्दू पाठकों के एक बड़े वर्ग ने काफी सराहा. रूसवाजी ने धार्मिक और दार्शनिक विषयों पर काफी कुछ लिखा है. फिर भी वे आर्थिक रूप से उतनी सफलता अर्जित नहीं कर सके, जिसके वे हकदार थे.


दोहन के दंश से छटपटाते श्रमिकों का दिन है आज

विश्वकर्मा पूजा के दिन जगह-जगह लोग लोहे की मशीनों और गाडिय़ों की पूजा करेंगे. तमाम फैक्ट्रियों में उत्सव सा माहौल होगा. पूजा-पाठ के बाद खाने-पीने की उचित व्यवस्था होगी. कंपनियों को सजाया जाएगा. सुबह से लेकर शाम तक चहल-पहल होगी. फैक्ट्रियों के हूटर बजाते सायरनों को सुनकर आज के दिन कोई भी मजदूर टूटे मन से घर से रवाना नहीं होगा. वह पूरी ऊर्जा के साथ पूजन सामग्री लिए अपनी कर्मस्थली की ओर भागा जाएगा. उसके इंतजार में उसके बच्चे और बीवी दोपहर के बाद राह तकेंगे. वे इंतजार करेंगे कि उनके घर में मिठाई आएगी और खुशियां बांटीं जाएंगी. 

चौबीस घंटे की खुशी 
मगर अजीब सी बात है कि ठीक चौबीस घंटे के बाद वही फैक्ट्री मजदूर अपनी दुर्दशा के लिए कंपनी मैनेजमेंट को कोसेगा. वह चिढ़ जाएगा सायरन का आवाज सुनते ही. वह मरे हुए मन से अपनी साइकिल चलाकर घर से रवाना हो जाएगा. मात्र एक दिन की इस खुशहाली के पीछे के कारणों की तलाश करना बड़ा ही आसान है. कारण वही है मिल मालिकों का धन प्रेम. मजदूर के पसीने से उन्हें चिढ़ है. वे कभी नहीं चाहते कि एक मजदूर कभी भी आर्थिक मजबूती पाकर उनके सामने खड़ा हो सके. तभी तो महंगाई के इस दौर में भी चार अंकों के आंकड़े की तनख्वाह को पाने के लिए भी उन्हें हर पल अपने स्वाभिमान से समझौता करना पड़ता है. वे डरते हैं मैनेजमेंट के लोगों के पैरों की आहट सुनकर. श्रमिकों को स्वावलंबी बनाने का दम भरने वाले राजनेता भी उनकी इस बदहाली के लिए कुछ नहीं करते. वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाते जिससे मजदूरों को उनका वाजिब हक मिल सके.

उन्‍हें मिलना चाहिए हक 
विश्वकर्मा पूजा के दिन ही वे सिर्फ खुशियां मनाते हैं. मिठाई खाते हैं और गम हल्का करते हैं. सिर्फ कुछ घंटों की इस खुशहाली को मजदूर जीवन भर जी सकें, इसके लिए उन्हें एक मजबूत पायदान की आवश्यकता है. उन्हें एकजुट होकर अपनी दयनीय स्थिति और शोषण के खिलाफ मिल मालिकों से सामना करना होगा. राजनेताओं को सिर्फ जुबानी ही नहीं जमीनी तौर पर भी श्रमिकों के पक्ष में खड़ा होना पड़ेगा. जिंदगी को खुशहाल तरीके से जीने के लिए उन्हें सिर्फ विश्वकर्मा पूजा के दिन सम्मान पाने की जरुरत नहीं है. ये उनका हक है और यह हक उन्हें मिलना ही चाहिए.

Note: फोटो का क्रेडिट गूगल इमेज के नाम है!!! भविष्‍य काल में यह लेख इसलिए लिखा गया है ताकि यह हमेशा नवीन रहे।।।। 

मौलाना हसरत मोहानी ने इंकलाब जिंदाबाद का दिया नारा

इंकलाब जिंदाबाद का नारा देकर युवाओं को राह दिखाने वाले मौलाना हसरत मोहानी का जन्म उन्नाव के मोहान में हुआ था. क्रांतिकारी विचारधारा रखने वाले और उर्दू शायरी में एक मुकाम हासिल करने वाले मौलानाजी का 76 वर्ष की आयु में 13 मई 1951 को लखनऊ में निधन हो गया था. वर्ष 1921 में उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था. 

शिक्षा एवं करियर 
उनका असली नाम सैयद फैजुल हसन था. मगर उर्दू शायरी के लिए वे मौलाना हसरत मोहानी उपनाम का इस्तेमाल करते थे. आगे जाकर इसी नाम से उन्हें जाना जाने लगा. उनके पूर्वज इरान के निशापुर के रहने वाले थे. उन्होंने भगवान कृष्ण से सम्बंधित भी कई रचनाएं की थीं. वे मथुरा में कृष्ण जन्माष्टमी भी मनाया करते थे. वे बचपन से पढऩे में काफी कुशाग्र थे. उन्होंने अपने पहले स्टेट लेवल एग्जाम में टॉप किया था. आगे की पढ़ाई के लिए वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए थे. इसी बीच वे मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली के सम्पर्क में आए. उनकी शिक्षिका तस्लीम लखनवी और नसीम देहलवी का भी उन पर काफी प्रभाव पड़ा.

लेखनी में योगदान 
उनकी लिखी नज्म की पुस्तक कुल्लियत-ए-हसरत मोहानी को काफी सराहना मिली. उन्हीं की लिखी गजल चुपके-चुपके रात दिन को आज भी कई लोग पसंद करते हैं. गजल गायक गुलाम अली की आवाज ने इस गजल और भी ज्यादा शोहरत मिली. वर्ष 1982 में बनाई गई फिल्म निकाह में भी इनके जीवन को पर्दे पर दिखाया गया.

राजनीति में रहे सक्रिय
वर्ष 1921 में क्रातिकारी शहीद राम प्रसाद बिस्मिल अपने शाहजहांपुर के अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ अहमदाबाद में एक कांग्रेस की बैठक में गए थे. उनके साथ वरिष्ठ कांग्रेसी प्रेम कृष्ण खन्ना और क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खान भी मौजूद थे. बिस्मिल साहब ने इस दौरान मौलाना हसरत मोहानी के साथ मिलकर पूर्ण स्वराज को लेकर अपने विचार प्रकट किए. मगर महात्मा गांधी ने पूर्ण स्वराज हासिल करने के लिए युवाओं के उस तरीके को पसंद नहीं किया. यह बिस्मिलजी की कांग्रेस को एक लिबरल पार्टी के तौर पर पेश करने की एक सफल वजह बनी. इसके बाद से हसरत मोहानीजी भी स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे. वे पहले ऐसे मुस्लिम थे, जिन्होंने पूर्ण स्वराज (आाजदी-ए-कामिल) के लिए आवाज बुलंद करने के लिए जाने गए. वर्ष 1921 में वे ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रेसीडेंट चुने गए.

कम्युनिस्ट आंदोलनों में रहे सक्रिय
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में भी मौलानाजी का अहम योगदान था. ब्रिटिश सरकार का दुष्प्रचार करने के लिए उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था. खासकर ब्रिटिश पॉलीसिज के खिलाफ उन्होंने एक आर्टिकल लिखने पर उन्हें सजा दी गई.

जीवन के अंतिम क्षण
मौलाना हसरत मोहानी की मृत्यु 13 मई 1951 को लखनऊ में हुई थी. उसी साल मौलाना नुसरत मोहानी ने हसरत मोहानी मेमोरियल सोसाइटी की स्थापना की. करांची, सिंध और पाकिस्तान में हसरत मोहानी जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम पर कई पुस्तकालयों की स्थापना की गई. उनकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करांची में एक खराब सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया. मगर आज की तारीख में उस सड़क को फाइनेंशियल हब के तौर पर जाना जाता है.

रचनाएं
1. कुल्लियत-ए-हसरत मोहानी (हसरत मोहानीजी का काव्य संग्रह) 
2. शरह-ए-कलाम-ए-गालिब (मशहूर शायर गालिब की रचनाओं की व्याख्या)
3. नुकात-ए-सुखन (कविताओं के महत्वपूर्ण पहलुओं की व्याख्या)
4. मुसाहिदात-ए-जिंदान

Wednesday, September 10, 2014

ऐसी मुझको मदिरा दो

ऐसी मुझको मदिरा दो

न हो मुझको कोई रोष
न दे मुझको कोई दोष
बढ़ा किये जा मेरा कोष
                              ऐसी मुझको मदिरा दो। 
न कभी मैं लडख़ड़ाऊं
सीधी राह चला जाऊं
सदा सम्मान मैं पाऊं
                              ऐसी मुझको मदिरा दो। 

न हो जाति का कोई मान
दुर्बल को दिया दूं दान
 बना रहे आंगन का मान
                                ऐसी मुझको मदिरा दो। 
आंखें रहीं चढ़ी सदा
कभी न हो कम-ज्यादा
कभी घटे न मर्यादा
                          ऐसी मुझको मदिरा दो। 
वाणी में रहे महक-महक
पिया करूं मैं चहक-चहक
गर्मी जिसमें दहक-दहक
                             ऐसी मुझको मदिरा दो। 
फूल के रंग से रंगा हुआ
कामाग्नि में पका हुआ
तेरी पलकों से छना हुआ
                            ऐसी मुझको मदिरा दो। 

(19/04/2006 को मैंने लिखी थी यह कविता)

Saturday, June 14, 2014

देखा तुमने......मुझे जीना आता है

मन में मलाल था, इसलिए बदला लिया. मन में एकतरफा इकरार था, इसलिए बदला लिया. उसकी खुशियों को खत्म करने का सवाल था, इसलिए बदला लिया. आप भी सोच रहे होंगे कि मैं किस बदले की बात कर रहा हूं. किसके प्रति मुझमें इतनी नफरत थी जो मैं जहर उगल रहा हूं, तो पाठकों आपको बता दूं कि ये मेरे मन के नहीं उन हैवानों के मन की बात है जो किसी लड़की पर सिर्फ इसलिए तेजाब फेंक देते हैं, क्योंकि उन्होंने उसे नकार दिया था. मगर इसे कुदरत का खेल ही कहेंगे कि ऐसी कई बहादुर बालाएं हैं, जिन्होंने हार न मानते हुए अपनी जिंदगी को एक नई दिशा दी है. उन्होंने एसिड अटैक की उस जलन को जीतते हुए ऐसे निकृष्ट मानसिकता के हमलावरों
                                                                                    को मुंहतोड़ जवाब दिया है.

मिल गया लक्ष्य
ऐसी पीड़ा को हराने में सफल रहने वाली इन बालाओं को मेरा सलाम है. उन्होंने इस क्रूर कृत्य के दंश को सहने के बाद ऐसी अन्य पीडि़तों को मदद पहुंचाने की ठान ली है. वे स्टॉप एसिड अटैक नाम की ऐसी ही मुहिम को चलाते हुए लोगों को जागरूक कर रहे हैं. वे ऐसी मानसिकता के लोगों को यह बता रहे हैं कि क्या हुआ जो तुमने मुझसे मेरा खूबसूरत जीवन ले लिया? भले ही तुम्हारी वजह से अब मैं एक साधारण सी खुशहाल जिंदगी नहीं जी सकती. मगर मुझमें वह माद्दा है कि मैं अपने पैरों पर खड़ी होकर दिखाऊंगी. तुमने तो मुझे एक बार हमला करके जलन की पीड़ा दी है. मगर मैं तुम्हें अपराधी होने की हीन भावना के साथ अपनी कामयाब जिंदगी दिखाऊंगी. तुम्हें हर पल तेजाब की जलन महसूस कराऊंगी. मैं तुम पर हर पल मुस्कुराऊंगी. तुम्हारे सामने सफलता की ऐसी इमारत बनाऊंगी जिसके आगे तुम्हारे अस्तित्व के लिए कोई स्थान नहीं होगा. तुम हर रोज अपनी ही नजरों में गिरते जाओगे और मैं खिलखिलाऊंगी.
तेजाब से किए गए हमले में जान बचने के बाद जब वह (अनाम) दोबारा खुद को जीना सिखा रही थी, तब शायद वह यही सोच रही होगी. और....उसने ऐसा कर भी दिया.

 अंत में एक बार फिर स्टॉप एसिड अटैक को मेरा सलाम......

Friday, April 18, 2014

छोटे बिल्डर्स ने जीता विश्वास

अपना घर. स्वर्ग से सुंदर माहौल. अपनत्व का एहसास. जीवन में बहुत कुछ पाने का एहसास कराता है. तभी तो किसी ज्ञानी ने कहा है, 'धरती कहती छूकर देखिए, फिर मेरा कमाल देखिए.Ó जी हां, अपना आशियाना बनाने और उसे पाने की ख्वाहिश सभी की होती है. यही एक कारोबार ऐसा है, जो सालभर बिना किसी रुकावट के चलता रहता है. मगर समय के हिसाब से उपरोक्त कही गई क
हावत में आज काफी फेरबदल की आवश्यकता है. मसलन, पहले इस कहावत का मतलब होता था कि इंसान जमीन खरीदे, फिर उस पर घर का निर्माण कराए. गृह प्रवेश के साथ ही उसे मकान मालिक का ओहदा नसीब हो जाता था. यह एक बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाती थी. मगर आज जब रियल इस्टेट सेक्टर इतना बूम कर रहा है तो बहुत सी नकारात्मक बातों ने भी जन्म ले लिया है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण है, जमीन, मकान या फ्लैट खरीदने में बरती जाने वाली सावधानी. ऐसे में सिटी में बड़े बिल्डर्स के प्रति लोगों की दीवानगी कम होती जा रही है. ऐसा क्यों, आइये जानते हैं...

नामी बिल्डर्स का त्यागें भ्रम
जी हां, आपको कुछ अजीब लगेगा. मगर यह बात सत्य है. आज के दौर में चंद नामी बिल्डर्स को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी अपने कमिटमेंट में काफी पीछे हो गए हैं. ज्यादातर बिल्डर्स अपने कस्टमर्स से आंख-मिचौली खेल रहे हैं. समय पर पजेशन न देना. कस्टमर्स जब अपना हक जताते हैं तो बिल्डर्स उन्हें तमाम तरह की परेशानियों से वास्ता करा देते हैं. बिल्डर्स के झूठे वादों ने कइयों को शिकार बनाया है. सिटी में ही ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपनी सम्पत्ति का पूरा पेमेंट करने के बाद भी पजेशन पाने के लिए धक्के खा रहे हैं. कई मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं. इन हालातों पर गौर किया जाए तो यह कहना लाजिमी है कि चुनिंदा नामी बिल्डर्स को छोड़कर बाकियों पर भरोसा करना ठीक नहीं है.

छोटे बिल्डर्स पर जताएं भरोसा
अपनी पहचान बनाने की जंग में छोटे बिल्डर्स आज सच्चे साबित हो रहे हैं. वे कस्टमर्स के बीच अपनी शाख को बनाने के लिए अपने छोटे प्रोजेक्ट्स को समय पर ही पूरा कर देते हैं. ऐसे बिल्डर्स के कस्टमर्स भी उनसे काफी खुश पाए जाते हैं. हो भी क्यों न, वे पजेशन आसानी से देते हैं. पेमेंट लेने के मामले में बड़े बिल्डर्स से मुकाबले ज्यादा रिलायबल होते हैं. सिटी में ऐसे कई मामले देखे गए हैं जब बड़े बिल्डर्स के प्रोजेक्ट्स के मुकाबले छोटे बिल्डर्स ने अपना वादा समय रहते पूरा किया है.

आसान होती है पहुंच
बड़े बिल्डर्स के साथ एक और समस्या होती है. उनके पास कस्टमर्स को पहुंचने ही नहीं दिया जाता है. कई बार कस्टमर शिकायत करता रहता है लेकिन उनके कर्मचारी अपने मालिकों तक सच्चाई नहीं जाने देते. ऐसे में बड़े बिल्डर्स की शाख पर बट्टा तो लगेगा ही. वहीं, छोटे बिल्डर्स के बारे में देखा गया है कि वे कस्टमर के हमेशा टच में रहते हैं. वे कस्टमर्स की जरूरत को समझते हुए उनकी सारी जरूरतें पूरी करते हैं. वे कस्टमर्स को संतुष्ट करने के मामले में बड़े बिल्डर्स पर भारी पड़ते हैं. उनकी हर शिकायत या समस्या पर फौरन कार्रवाई करते हैं.

मजबूत होता है निर्माण
किसी भी घर की खासियत होती है उसका निर्माण कार्य. निर्माण कार्य जितना मजबूत होगा आशियाना उतना ही मजबूत होगा. बड़े बिल्डर्स के प्रोजेक्ट में कई बार पाया गया है कि कुछ सालों के बाद कुछ न कुछ दिक्कत नजर आने लगती है मगर छोटे बिल्डर्स के प्रोजेक्ट्स में ऐसी चूक नहीं पाई जाती है. चूंकि, उन्हें अपने नवीनतम काम के आधार पर ही बाजार में शाख बनानी होती है. यही कारण है कि वे अपने काम के प्रति पूरी सावधानी बरततें हैं. वे ऐसी कोई भी चूक नहीं करते, जिससे उनका आगामी प्रोजेक्ट प्रभावित हो. साथ ही, कस्टमर्स की आसान पहुंच होने से उनकी मजबूरी होती है कि वे अपने काम में पूरी ईमानदारी बरतें. वहीं, बड़े बिल्डर्स के खातों में ऐरी कमियों की भरमार दर्ज रहती है.
जैसा वादा, वैसा पजेशन
कई बार देखा गया है कि बड़े बिल्डर्स जब कस्टमर्स से डील करते हैं तब जिस फ्लैट को बुक करते हैं उसे वे कुछ माह के बाद बदल देते हैं. मसलन, किसी ने यदि आठवें फ्लोर का फ्लैट बुक किया है तो वे कुछ माह के बाद लेटर भेजकर सूचित करते हैं कि अमुक फ्लैट किसी कारणवश आपको नहीं दिया जा सकता है. आप उससे हटकर किसी और फ्लोर का फ्लैट ले लीजिए. भोलाभाला कस्टमर अक्सर बड़े बिल्डर्स की चिकनी बातों में फंस जाते हैं और बिना किसी पचड़े में फंसे हुए दूसरे फ्लैट पर पजेशन लेने को तैयार हो जाते हैं. वहीं, छोटे बिल्डर्स ऐसी गलतियां नहीं करते. वे अपने सीमित संसाधनों का ख्याल रखते हुए अनर्गल वादे नहीं करते. सिटी में ऐसे बहुत ही कम मामले पाए गए हैं जब किसी छोटे बिल्डर ने अपने कस्टमर के सामने ऐसा मामला रखा हो.

किश्तें कम, काम ज्यादा
बड़े बिल्डर्स के प्रोजेक्ट्स बाजार में काफी हाई-फाई दामों में बिकते हैं. कारण भी साफ है. उन्हें अपने प्रोजेक्ट्स को लेकर इतना विज्ञापन करना पड़ता है कि वे चाहकर भी अपने प्रोजेक्ट्स का दाम कम नहीं कर पाते. कंपनी विज्ञापनों में जितना भी खर्चा करती है, वह सब कस्टमर्स से ही वसूला जाता है. ऐसे में महंगे दामों पर घर खरीदना और लंबे समय तक पजेशन का इंतजार करना आम आदमी पर काफी भारी पड़ता है.

खत्म नहीं होता इंतजार
आम आदमी बेहतरीन लाइफस्टाइल पाने का दीवाना होता है. यही कारण है कि बड़े बिल्डर्स की मनमानी को भी वे आसानी से एक्सेप्ट कर लेते हैं. ऊंची कीमतों पर मिलने वाले फ्लैट्स को लेने के लिए वे महंगी ईएमआई भरते हैं. वे हवा में बन रहे प्रोजेक्ट्स पर लंबे समय तक बैंक का कर्ज चुकाते रहते हैं. ऐसे में सबसे ज्यादा दिक्कत के शिकार वे लोग होते हैं जो किराये के कमरों या घरों में रहकर फ्लैट बुक कराते हैं. फिर पजेशन न मिलने तक बैंक से लिया गया होम लोन और घर का किराया दोनों चुकाते हैं. पजेशन मिलने में देरी होती जाती है और वे इस दोहरी मांग को भरते हुए आधे होते जाते हैं. उन्हें एक अच्छी लाइफस्टाइल को पाने की चाह की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. ऐसे में यदि प्रोजेक्ट किसी कानूनी विवाद में फंस जाता है तो वे सिवाय हाथ मलने के कुछ नहीं कर पाते हैं. उनके नसीब में रह जाता है तो सिर्फ इंतजार करना और कर्ज भरते रहना.

बदल रहा बाजार
उपरोक्त कारण तो बड़े और छोटे बिल्डर्स की हकीकत को बयां करने वाले बानगी ही हैं. समस्याएं तो कहीं ज्यादा हैं. यही कारण है कि पिछले करीब सात-आठ सालों से देखा जा रहा है कि लोग बड़े बिल्डर्स से दूरियां बना रहे हैं. बाजार में छोटे बिल्डर्स की पकड़ मजबूत होती जा रही है. वे तेजी से अपने प्रोजेक्ट पर प्रोजेक्ट पूरे करते जा रहे हैं. सिटी में ही ऐसे कई छोटे बिल्डर्स हैं जो कस्टमर्स की पहली पसंद बन गए हैं. उनका नया प्रोजेक्ट आते ही बाजार में धूम मचाने लगता है. वे बड़ी ही असानी से सफलता के झंडे गाड़ते जा रहे हैं.

Friday, March 28, 2014

कब आएगी तमीज????

जुबान ही है जो पान खिलाता है और जुबान ही है जो लात दिलाता है. यह बात मुझको तो बचपन में ही सिखा दी गई थी. उम्मीद करता हूं कि आपने भी सुनी होगी. मगर अजीब बात है कि देश को चलाने का अधिकार मांगने वाले नेताओं ने इस कहावत को सुना ही नहीं. तभी तो आए दिन कोई न कोई अपनी अमर्यादित भाषा से एक नए विवाद को जन्म दे देता है. अभी हाल ही में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वाराणसी से चुनावी ताल ठोंक रहे नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बार फिर अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया गया. इससे न सिर्फ वही नेता बल्कि कांग्रेस पार्टी भी पशोपेश में आ गई. मुझे यह समझ में नहीं आता कि इन लोगों को सद्बुद्धि कब आएगी?
दिग्विजय और पवार का जवाब नहीं
भाजपा पर उट-पटांग कमेंट करने वालों में दिग्विजय सिंह और शरद पवार दोनों का जवाब नहीं. दोनों ही कुछ न कुछ बक ही देते हैं. बस मुंह खोला और जहर उगल दिया. कितना आसान है इनके लिए नेशनल न्यूज में छा जाना. कुछ दिनों पहले तो शरद पवार ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए यहां तक कह दिया था कि ऊंगली पर से स्याही मिटाओ और बार-बार वोट करो. खैर, चुनाव आयोग का खौफ जैसे ही सताने लगा, महानुभाव ने फौरन ही अपने बयान से इतिश्री कर ली. कहा, मैंने उस अंदाज में नहीं कहा था. खैर, अपनी बातों को कहने के बाद पलट जाना तो इन नेताओं का पैदायशी अधिकार है. और अपने अधिकार का इस्तेमाल करना इनका हक है.
राज ठाकरे भी कम नहीं
अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने वालों की फेहरिस्त में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे का भी रिकॉर्ड कम आकर्षक नहीं है. यूपी और बिहार वालों को मुंबई से हटाने के लिए इन्होंने हद दर्जे की नीच शब्दों का इस्तेमाल किया. मगर मुंबई के पढ़े-लिखे वर्ग को शायद इनकी बात न्यायोचित नहीं लगी. तभी तो यूपी और बिहार के लोग वहां अपनी क्वालिटी के दम पर रहकर कमा-खा रहे हैं.
यह तो सिर्फ बानगी है...
गैरजिम्मेदाराना और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने वालों में भाजपा के कई नेताओं का भी नाम आता है. उनमें विनय कटियार सरीखे एक से बढ़कर एक दिग्गज नेता शामिल हैं. कुल मिलाकर इस लेख से मैं अपने पाठकों को सिर्फ यही बताना चाहता हूं कि वे ऐसी भाषाओं को जारी करने वाले नेता के भावों को देखें. न कि उनके कथनी को सुनकर जोश में आएं, क्योंकि वे सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसे अनर्गल बयानों की बारिश करते हैं. पढ़े-लिखे युवाओं को चाहिए कि वे ऐसी भाषाओं को सुनने के बाद अपना आपा न खोएं. वे सिर्फ अपनी सोच और समझ के आधार पर ही वोट करें. स्वयं एवं अपने हित-मित्रों को प्रेरित करें.
फोटो:: गूगल की देन है...

Tuesday, January 14, 2014

मुझे आज भी इंतजार है....

अजीब सा तथ्य है जीवन का। न कोई उम्मीद और न कोई रास्ता। जब आंख खुली तो दिखा सिर्फ एक अंधेरों से भरा रास्ता। साथ जो मिला वह था रिश्तों का वास्ता। ठीक है कुछ तो ऐसा है जो किसी भी कथ्य पर भारी है। ज्ञान की रोशनी में दिखने वाला कच्चा सच कभी भी हजम नहीं हुआ। मगर उन्हीं अधूरी इच्छाओं और कवायद को आधार बनाकर जीवन को जीने का माध्यम बनाया गया। हम बने भी। हम समय आने पर विरोधियों के खिलाफ तने भी। फिर भी मन में एक कसक तो बनी ही रह गई। जीवन कुछ ऐसा नजर आता है जिसमें आसमान को छूने की ख्वाहि
श लिए हुए उछाल तो बहुत मारी गई है, लेकिन बिना किसी छुअन की एहसास लिए हुए ही हरारत के दर्द को झेलने का एहसास हो रहा है। मैं कदमों को रोक कर, वर्तमान के पलों को यादों की बिसराई में झोंककर और हकीकत के सीने में अपनी मरीचिका सरीखी मंजिलों रूपी छूरे को भोंक कर सोचता हूं तो एक टीस सी सीने में उठ जाती है। सोचता हूं कि उम्रं के इस पड़ाव में क्या खोया और क्या पाया तो रेत के अंजुरी से सरक जाने का एहसास होने लगता है। लगता है कि जीवन में सिवाय खोने के मैंने तो कुछ पाया ही नहीं। अंत में मुझे नसीब क्या हुआ, रिश्तों की कड़वाहट और सफेदपोश चरित्र को जीने की चाहत। मगर सच्चाई क्या है, मैंने तो जीवन भर सिवाय खुद को लोगों को ठगने का अवसर देने के अलावा कुछ किया ही नहीं। मगर अब बहुत हो गया। अब मुझे इस घिनवाद से भरी और असंख्य सड़े अंडों की सड़ांध से भरी जिंदगी को हर हाल में बदलना है। मैं बदल दूंगा इन परिस्थितियों को। सफलता को पाने वाली एहसास की स्थिति को मुझे पाना ही है। यही मेरी जिद है। इस जिद को पूरा किए बिना मुझे चैन नहीं आने वाला। यही वह जद्दोजहद होगी जो मुझे संतुष्टि का स्वाद चखाएगी। इसके लिए मुझे तुम्हारा साथ चाहिए। कुछ ऐसा ही मैं उस दिन भी कहना चाहना था। मैं उस दिन भी एक बच्चे की तरह तुम्हारी गोद में सिर रखकर रोना चाहता था। लेकिन, तुम्हारे पास तो मेरे लिए कुछ था ही नहीं। तुम मुझसे नाराज थी। कुछ बोलना ही नहीं चाहती थी। तुम कभी न टूट पाने वाली नींद की आगोश में थी। मैं उस दिन भी तुम्हारे सिरहाने बैठा, जागने का एहसास कर रहा था और आज भी तुम्हारे जागने का इंतजार कर रहा हूं।  

Sunday, January 12, 2014

छिछले 'विश्वास' की 'कांग्रेस कुमार' को छिछली चुनौती



आम आदमी पार्टी को दिग्गजों का साथ मिल रहा है. लोग बड़ी तेजी से इस उभरती और लगभग उभर चुकी पार्टी का दामन थाम रहे हैं. अच्छी बात है, बदलाव की बयार चल रही है. इस पार्टी की सबसे बड़ी खासियत है कि यह जनता के बीच कराए गए सर्वेक्षण के आधार पर फैसले लेती है. ऐसा पहली बार हो रहा है जब सत्ता के गलियारों के फैसले में आम जनता का मत लिया जा रहा है. मुझे इस पार्टी की यही बात सबसे ज्यादा पसंद है. मगर इस पार्टी के एक स्वयंभू युवा नेता कुमार विश्वास का लखनऊ आगमन पर राहुल गांधी के क्षेत्र के संसदीय चुनाव लडऩे का फैसला मेरी समझ में नहीं आया. दरअसल, मेरा मानना है कि कुमार विश्वास भले ही एक अच्छे कवि हैं. वे एक अच्छे वक्ता हैं. वे टीआरपी बटोरने के सारे टिप्स के भी पारखी हैं. लेकिन, वे एक अच्छे नेता नहीं हो सकते. वे आरोप लगा सकते हैं लेकिन किसी के आरोपों को न्याय नहीं दिला सकते. वे अरविंद केजरीवाल के की छाया तक नहीं हो सकते. ऐसे में वे किस गुमान के आधार पर राहुल गांधी को टक्कर देने की ठान बैठे. ऐसा नहीं है कि राहुल एक बड़े जनाधार वाले नेता हैं. उनकी हरकतें तो ऐसी लगती हैं जैसे वे विधायक की हरकतों से ऊपर ही नहीं उठ पा रहे हैं. उन्हें चुनौती देना कोई बड़ी बात नहीं है. मगर कुमार विश्वास को खुद पर इतना विश्वास कैसे हो गया कि वे अमेठी से चुनाव लडऩे की ताल ठोंक रहे हैं. उन्हें आप पार्टी से जुड़े रहकर राज्यसभा में मनोनीत होने का इंतजार करना चाहिए. उन्हें अपने ऊपर इतना दंभी विश्वास नहीं रखना चाहिए. यह फैसला लेकर उन्होंने खुद को हाशिए पर भेजने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. उनके अंदर अभी छिछलेपन की बू आती है. सस्ती लोकप्रियता बटोरने की तकनीक नजर आती है. हां, मैं कुमार विश्वास की लिखी भावपूर्ण, कर्णप्रिय और रसभरी कविताओं की पंक्तियों को मजे लेकर पढ़ता हूं. वे अगर आम आदमी पार्टी का लिटरेचर संभाले तो उन्हें शोभा देगा. इस तरह चुनाव में उतरकर आम आदमी पार्टी का टिकट बर्बाद करने और यूपी में बनने वाली भावी बुनियाद में तेजाब डालने का काम नहीं करना चाहिए. उन्हें तो अभी सधी हुई भाषा का इस्तेमाल करना सीखना चाहिए. उन्हें अभी जनाधार को पाने के लिए जन के दर्द और जनसमस्याओं का अंत करने विचारों को रट्टा मारकर याद करना चाहिए. कुमार विश्वास के अतिविश्वास में आकर लिए गए इस फैसले को मेरा मानना है कि बहुतेरे लोग गले के नीचे नहीं उतार पाएंगे. छिछली राजनीति करने वाले राहुल गांधी को छिछले स्तर की समझ रखने वाले कुमार विश्वास की चुनौती सच में किसी चुटकुले से कम नहीं है.

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...