Thursday, September 23, 2010

ये रात बडी ही काली है

दिखता दूर सवेरा है
अंधियारे ने घेरा है
ये कालचक्र का फेरा है
ये रात बडी ही काली है।
इक ज्‍योति का तम में साथ
सिर पर मेरी मां का हाथ
चला करूं मैं सारी रात
ये रात बडी ही काली है।
साथ में न कोई दिखता है
मन तो रात में बिकता है
फिर जीने का जी करता है
ये रात बडी ही काली है।
मेरे मन को डर है सता रहा
साहस के गीत सुना रहा
पर अंधियारा है डरा रहा
ये रात बडी ही काली है।
तम पार करूं मैं दो वरदान
न खो जाउं जरा भी ज्ञान
ठोकर से न टूटे ध्‍यान
ये रात बडी ही काली है।
अंधियारे को पार किया
लोभ अधर्म न लिया दिया
समंदर जैसा किया-किया
ये रात बडी ही काली है।

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