Thursday, October 28, 2010

झगडा करती रहती है

अजीब बात पर लडती है
फिर भी खूब अकडती है
जब बात कहूं कुछ प्‍यार भरी
तो मुझ पर हंस पडती है
मैं तंग हूं उस नादां से
वो मुझको उल्‍लू कहती है
जब डपट पडूं किसी बात पर मैं
तो वो चुप-चुप रहती है
छा जाए सन्‍नाटा सा
फिर वो खुदबुद-खुदबुद करती है
मैं जब घुटनों पर गिर पडता हूं
तो फिर वो लल्‍लू कहती है
न जाने क्‍या वो सोच रही
वो हर पल को बस नोंच रही
वो मुझसे जीने को कहती है
पर किसी दुख को सहती है
खुलकर कह दो सारी बात
बस इतनी अभिलाषा है
जीवन तो है बडा मधुर
क्‍यों कहती घोर निराशा है?
क्‍यों कहती घोर निराशा है?
क्‍यों कहती घोर निराशा है?

1 comment:

shikha shukla said...

nice poem neeraj, koshish jarte raho kabhi to kah degi..............kabhi to usji nirasha khushiyo me baslegi...............
http://baatbatasha.blogspot.com/

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