Sunday, May 28, 2017

'अब पहले जैसा स्‍वाद और सेवा कहां'

साभार: गूगल इमेज।
हम तरक्‍की के लिए कितना बदलते जा रहे हैं. अपनी जड़ों को ही खोते जा रहे हैं. इन दो किस्‍सों से शायद कुछ समझा जा सके...
पिताजी ने कुछ रोज पहले खाने में दाल-भात (चावल), चौलाई का साग, भिंडी की भुजिया, पापड़, अमिया की चटनी, तिलौरी (सफेद तिल का फ्राई नमकीन स्‍वाद का छोटा लड्डू), रायता, सलाद और गाय का शुद्ध देसी घी परोसने को कहा. खाना बहुत स्‍वादिष्‍ट था. वैरायटी देखकर मैंने पिताजी से पूछा कि आखिर इतनी तगड़ी व्‍यवस्‍था करने का कारण क्‍या है. उन्‍होंने कहा, 'मेरे बचपन में एक बार माताजी (मेरी दादी) की तबीयत खराब हो गई थी. दादाजी ने उन्‍हें अपने गांव से करीब 40 किलोमीटर मोतिहारी स्‍थित एक अस्‍पताल में भर्ती करा दिया. इस बीच करीब दस दिन तक मैं बाबूजी के साथ मोतिहारी में रहा था.' फिर वे कुछ ठहरकर कहते हैं, 'उस दौरान हम लोग मोतिहारी रेलवे स्‍टेशन से करीब दो या 300 मीटर दूर स्‍थित एक दूबे भोजनालय में खाने जाते थे. उस भोजनाल की खासियत यह थी कि वहां जमीन पर लिपाई करने के बाद पीढ़ा पर बैठाकर केले के पत्‍ते पर यही सब खिलाया जाता था. एक बार में पांच से सात या अधिकतम 11 लोगों को ही खाना खिलाया जाता था. उसके बाद जमीन की फिर लिपाई की जाती थी. उसके बाद ही अगली पांति में लोगों को बिठाकर खाना परोसा जाता था.' अंत में कहते हैं, 'कई दिन से सोच रहा था कि वही खाना खाऊं. इसीलिए ये सब बनाने को कहा था क्‍योंकि अब वैसा स्‍वाद और आवभगत कहां मिलता है.'
बात तो सही है, होटल में पहले प्रेम और श्रद्धा के भाव से खिलाया जाता था. मगर अब नहीं. ऐसा ही एक और किस्‍सा आपको सुनाना चाहूंगा. कुछ रोज पहले जौनपुर के जंघई क्षेत्र में जाना हुआ था. वहां मैं पहली बार करीब 13 साल पहले पिताजी के साथ दीदी की शादी का रिश्‍ता लेकर गया था. उस समय जब पहली बार वहां पहुंचा था तब स्‍टेशन के बाहर आते ही एक छोटे से होटल में चाय-समोसे के लिए ठहरा था. वहां पिताजी ने घर से बनाकर लाया हुआ परांठा खाना शुरू किया. इस बीच होटल वाले चाय लेकर आए. मैं तो हमेशा ही चटोरा रहा हूं सो वहां पहुंचते ही कुल्‍लहड़ की चाय और एक रुपये के छोटे मगर तीखे समोसे खाने में जुट गया था. वहीं, इस बार जब उसी होटल में पहुंचा तो उसका नजारा बदला हुआ नजर आया था. अब वह खपरैल की छत वाला होटल नहीं था. अब वह एक शानदार होटल में तब्‍दील हो चुका है. वहां अब लकड़ी की बेंच पर मेहमानों को नहीं बिठाया जाता बल्‍कि महंगी कुर्सियों पर बिठाते हैं. मगर वह स्‍वाद नहीं मिला. होटल की हर दीवार पर चस्‍पा संदेश था बाहर से लाई चीजों को यहां खाना मना है. मुझे तेरह साल पहले आने पर पापा के परांठे याद आ गये. वास्‍तव में कितना बदलते जा रहे हैं हम और हमारा समाज.

Friday, May 26, 2017

खनन ने बढ़ाया खेती का खर्च, बुआई से पहले उपजाऊ मिट्टी खरीदने को मजबूर हैं किसान

“पहले खेती में खाद-पानी की समस्या हुआ करती थी। मगर खनन ने हमारी दिक्कत बढ़ा दी है। मेरे खेत की उपजाऊ मिट्टी बरसात में बहर खनन वाले तालाब में समा गई है। ऐसे में खेती से पहले हम लोगों को उपजाऊ मिट्टी खरीदने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है।” सत्तावन वर्षीय हरकिशन रावत कुछ यूं अपना दर्द बयां करते हैं।

दरअसल, राजधानी के सरोजनीनगर ब्लॉक के नटकुर गाँव में मिट्टी के अवैध खनन की समस्या काफी समय से बरकरार है। ग्राम समाज की जमीन पर अंधाधुन तरीके से किए जा रहे खनन का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। खनन की वजह से तालाब में तब्दील हुए मैदानों में उसके आस-पास के खेतों की उपजाऊ मिट्टी बरसात में बह जाती है। ऐसे में इस क्षेत्र के कृषक खेती से पहले अपनी खेतों में माटी खरीदने को मजबूर हैं।

इस बारे में हरकिशन बताते हैं, “मेरे खेत के करीब में ही ग्राम समाज की जमीन है। इस जमीन पर सुबह-शाम मनमाने तरीके से अवैध खनन का काम किया जा रहा है। चूंकि, इस काम में दबंग लोग जुड़े रहते हैं, ऐसे में विरोध भी नहीं कर पाते हैं। मगर बरसात के समय मेरे और मेरे जैसे अन्य किसानों की खेतों की मिट्टी इसमें बहकर समा जाती है।” वे अपनी बात पूरी करते हुए कहते हैं, “ऐसे में हमें खेती करने से पहले अपनी खेतों में दूसरी जगहों से मिट्टी लाकर ऊपरी परत तैयार करनी पड़ती है। जाहिर है, हमारे लिए खेती का खर्च अब और बढ़ गया है। खाद-पानी के लिए रुपए जुटाने के साथ ही अब मिट्टी के लिए भी रुपए जुटाना पड़ रहा है।”

वहीं, इस बारे में सुभाष गौतम (37 वर्ष) नाम के किसान बताते हैं, “अवैध खनन का विरोध करने पर हम लोगों की कोई सुनता नहीं है। ऊपर से दबंगों की धमकी के चलते हम भी कुछ दिनों के बाद बोलना बंद कर देते हैं। रात में बेतरतीब तरीके से किया जाने वाला अवैध खनन दिन में भी बदस्तूर जारी रहता है।”

उधर, अवैध खनन के ही शिकार हुए छोटे कृषक रामकृपाल कुशवाहा (43 वर्ष) बताते हैं, “मेरा खेत मुल्लाहीखेड़ा गाँव में है। मेरे खेत के चारों ओर बाग है। ऐसे में रात में वहां ठहरना उचित नहीं होता है। करीब दो महीने पहले मेरी खेत में से रातोंरात कई ट्राली मिट्टी चुरा ली गई। मुझे दिन में इसकी जानकारी लगी।” वे कहते हैं, “मेरे खेत में अब एक बड़ा सा गड्ढा बन गया है। उसमें दोबारा खेती करने के लिए मुझे मिट्टी खरीदनी पड़ेगी लेकिन मेरे पास उतने रुपए भी नहीं हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं।”

इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर खनन से जुड़े एक मजदूर ने बताया, “हर थाने में मिट्टी खोदाई का रुपया भेजा जाता है। दिन में डंफर से मिट्टी ढोना मना है मगर रात में दस बजे के बाद से सुबह उजाला होने से पहले तक जितनी चाहे उतनी मिट्टी की खोदाई की जा सकती है।”

वे आगे बताते हैं, “हम लोग रातभर मिट्टी खोदकर लोगों को बेचते हैं। इस बीच एक थाने को चार से पांच हजार रुपए देने होते हैं जबकि मिट्टी की सप्लाई यदि किसी दूसरे थाने के क्षेत्र में करनी पड़ती है तो वह ढाई से तीन हजार रुपए लेता है। एक बार रुपया दे देने के बाद किसी भी चौराहे पर पुलिस गाड़ी नहीं राकती है।”

साधारण कद-काठी वाले शास्त्रीजी के इरादे चट्टान की तरह थे मजबूत

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के गुणों के बारे में बखान करना सूरज को दीया दिखाने समान है। वह भी ऐसे समय में जब भारत-पाकिस्तान के बीच तल्ख रिश्तों में और गर्माहट आ गई है तब शास्त्री जी के बोले गए बोलों से देशवासियों को और मजबूती मिल सकती है। वे भले ही एक साधारण कद-काठी के इंसान दिखते थे मगर उनके हौसले की दीवार इतनी मजबूत थी कि बड़ी से बड़ी परेशानी भी उनके सामने घुटने टेक देती थी। यही कारण है कि जब शास्त्री जी ने कुर्सी संभाली थी तब देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने के साथ ही उसकी सुरक्षा को भी मजबूत करने का दायित्व उन्होंने बखूबी संभाला था। ऐसे में आइए शास्त्री जी के दिए बोलों से उनके व्यक्तित्व को जानने की कोशिश करते हैं…

1. जैसा मैं दिखता हूँ उतना साधारण मैं हूँ नहीं।

2. आर्थिक मुद्दे हमारे लिए सबसे जरूरी है, जिससे हम अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी और बेराजगारी से लड़ सके।

3. हमारी ताकत और मजबूती के लिए सबसे जरूरी काम है वो लोग में एकता स्थपित करना है।

4. लोगों को सच्चा लोकतंत्र और स्वराज कभी भी हिंसा और असत्य से प्राप्त नहीं हो सकता।

5. क़ानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना बरकरार रहे और भी मजबूती भी।

6. यदि कोई एक व्यक्ति भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सिर शर्म से झुकाना पड़ेगा।

7. आज़ादी की रक्षा केवल सैनिकों का काम नहीं है। पूरे देश को मजबूत होना होगा।

8. हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट है। अपने देश में सबके लिए स्वतंत्रता और संपन्नता के साथ समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना और अन्य सभी देशों के साथ विश्वशांति और मित्रता का संबंध रखना।

9. देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है।

10. हमारी ताकत और स्थिरता के लिए हमारे सामने जो ज़रूरी काम हैं उनमें लोगों में एकता और एकजुटता स्थापित करने से बढ़कर कोई काम नहीं है।

11. जो शाशन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर किस तरह प्रतिक्रिया करनी है। अंतत: जनता ही मुखिया होती है।

12. हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के लिए शांति और शांतिपूर्ण विकास में विश्वास रखते हैं।

13. मेरी समझ से प्रशासन का मूल विचार यह है कि समाज को एकजुट रखा जाए ताकि वह विकास कर सके और अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ सके।

प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्रीजी ने उठाए थे ये बड़े क़दम

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी के बारे में कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन्हें कोई नहीं जानता। मसलन, वे मूलत: ब्राह्मण नहीं बल्कि श्रीवास्तव थे। आइए उनके बारे में कुछ ऐसे अन्य तथ्यों के बारे में भी जानें, जिसकी वजह से आज भी उन्हें महान कहा जाता है…

जय जवान, जय किसान के नारे का सच?

जब शास्त्रीजी वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे तब भारत में गरीबी बहुत थी। उस समय हमारे देश में दूसरे देशों से अनाज खरीदा जाता था। उस दौरान नॉर्थ अमेरिका से पीएल-480 योजना के तहत अनाज खरीदा जाता था। वहीं, जब उनके पदभार संभालने के एक वर्ष बाद यानी साल 1965 में देश को सूखे की मार भी झेलनी पड़ी थी। नौबत यह बन आई थी कि शास्त्रीजी को पूरे देश में लोगों से एक दिन के लिए उपवास रखने की अपील करनी पड़ी थी ताकि मजबूर लोगों के लिए एक दिन के भोजन का इंतजाम हो सके। वहीं, युद्ध के कारण देश को आर्थिक तंगी का तो सामना करना ही पड़ रहा था। ऐसे में उन्होंने नारा दिया था, “जय जवान, जय किसान”। इस नारे के बाद देश के किसानों ने जहां अन्नदाता होने का जिम्मा बखूबी निभाया वहीं, जवानों ने भी देश को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी को सकुशल अंजाम दिया।


शास्त्रीजी का अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन से हुआ था विवाद

यह मसला करीब वर्ष 1965 के अंत और उनके देहांत की तारीख 11 जनवरी, 1966 के मध्य का है। इस दौरान शास्त्रीजी ने एक अमेरिकी पत्रकार को दिए साक्षात्कार में कह दिया था, “अमेरिका द्वारा वियतनाम में किए जा रहा युद्ध कहीं से भी उचित नहीं है। यह अमेरिका के आक्रामक रवैया को दर्शाता है।” चूंकि, उस समय हमारे में देश में पर्याप्त अनाज नहीं उत्पाद किया जाता था। अमेरिका से ही हमें एक योजना के तहत खाद्य पदार्थ का आयात कराना पड़ता था। फिर भी उन्होंने अमेरिका के खिलाफ सच बोलने से परहेज नहीं किया। मगर उनके साक्षात्कार से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत में अनाज मुहैया कराना बंद कर दिया। उस समय देश को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा था। फिर, एक रणनीति के तहत संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका से अपील करनी पड़ी थी कि वह भारत में अपने खाद्य पदार्थों का निर्यात पूर्व की तरह जारी रखे। मगर शास्त्रीजी ने सच बोलने के लिए कभी भी खुद को गलत नहीं माना।

मूलत: वे शास्त्री नहीं थे

लाल बहादुर शास्त्रीजी का जन्म वाराणसी के रामनगर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। चूंकि, उन्हें जातिगत व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं था। इसीलिए उन्होंने अपने नाम से जाति का त्याग कर दिया था। मगर जब उन्होंने काशी विद्यापीठ से स्कॉलर यानी शास्त्री की पढ़ाई पूरी कर ली तब उन्हें इसकी उपाधि दे दी गई। हालांकि, बड़ी संख्या में आज भी लोग यही मानते हैं कि शास्त्रीजी मूलत: ब्राह्मण थे।


केंद्रीय मंत्री पद पर रहते हुए शास्त्रीजी ने रचे कई आयाम

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने कैबिनेट में शास्त्रीजी को भी शामिल किया हुआ था। उस दौरान उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए थे, जो आज भी अनुसरण किए जाते हैं। इन्हीं में से एक वाक्या यह है कि जब शास्त्रीजी ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर थे तब उन्होंने एक महिला को कंडक्टर के पद पर तैनात करते हुए पुरुषों के सामने महिलाओं का कद बढ़ाया था। यानी वे महिला उत्थान के लिए पहले से ही काफी प्रयासरत थे। यही नहीं, शास्त्रीजी ने यह विचार दिया था कि जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन उग्र हो जाए तो उस पर लाठीचार्ज से बेहतर है कि पानी का तेज बौछार किया जाए। वे सत्ता के खिलाफ किए जाने वाले संग्राम को कानून का उल्लंघन नहीं जनता का अधिकार मानते थे।


प्रधानमंत्री शास्त्रीजी का देश को संबोधित पहला भाषण

हर राष्ट्र के सामने एक समय ऐसा आता है जब वह ऐसी जगह खड़ा होता है जहां से उसे एक इतिहास का चौराहा नजर आता है। और उसे यह तय करना होता है कि अब वह कौन सी राह चुने। मगर हमारे पास कोई संशय या संकोच का स्थान नहीं है। हमें दाएं या बांए देखने की भी जरूरत नहीं है। हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट नजर आ रहा है। जिसपर सामाजिक प्रजातंत्र का एक घर बनता हुआ दिख रहा है। जहां सभी के लिए स्वतंत्रता और समृद्धि है। साथ ही, विश्वभर में सभी देशों के साथ शांति और मित्रता बनाने का अवसर दिख रहा है।
लाल बहादुर शास्त्री, प्रधानमंत्री, भारत

नोटों पर ‘सोनम की बेवफाई’ लिखने से देश को होता है हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान

आजकल सोशल मीडिया में एक मैसेज वायरल हो चला है कि सोनम गुप्ता बेवफा है। लोग नोटबंदी के इस दौर में जब बैंकों और एटीएम के बाहर लाइन लगाने को मज़बूर हैं तो इस वायरल मैसेज ने सभी को गुदगुदाया है। मगर लोगों के इस मसखरेपन से आरबीआई को कितना घाटा होता है, इसका पता चलते ही आप ऐसा करना उचित नहीं कहेंगे। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई करीब हर वित्तीय वर्ष में देश की कुल मुद्रा संख्या का बड़ा हिस्सा दोबारा छापता है, जिसका खर्च करोड़ों में होता है। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर अतिरिक्त बोझ है।


... तो नहीं मानते आरबीआई की गाइडलाइन

आरबीआई की ओर से जारी किए गए गाइडलाइन में हमेशा ही देशवासियों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे देश की मुद्रा को गंदा न करें। उस पर कुछ न लिखें। उसे न तो तोड़-मरोड़कर रखें और न ही फटने दें। मगर लोग नोट को गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं। जब मन चाहता है उस पर कुछ लिख देते हैं। मानकों के विपरीत जाकर उसे ऐसे रखते हैं कि वह फटने की कगार पर पहुंच जाता है। यहां तक कि कुछ दिनों के बाद ही वह गलने लगता है।

कुछ समय के बाद वे नोट बैँकों में पहुंचते हैं तो उनके बदले धारक को नई करेंसी दे दी जाती है। फिर आरबीआई की ओर से नई करेंसी की छपाई की जाती है। इसके लिए बाकायदा टेंडर तक निकाले जाते हैं। ऐसे में देश की अर्थव्यस्था पर बहुत बड़ा बोझ पड़ता है। नोटों की यह छपाई आरबीआई के लिए बड़ा खर्च बन जाती है। इस कारण देश की मुद्रा का एक अच्छा-खासा हिस्सा करेंसी की छपाई पर खर्च करना पड़ता है।


2000 और 1000 की नोट का छपाई खर्च बराबर

वर्तमान में देश में दस की सर्वाधिक करेंसी देश में चल रही हैं। इनकी संख्या करीब 32 हजार लाख है। वहीं, 500 और 1000 की नोटों की संख्या करीब 15 हजार लाख व सात हजार लाख है। वहीं, दस रुपए की एक नोट को छापने में आरबीआई को एक रुपए, 500 रुपए के नोट पर 2.5 रुपए और 1000 की नोट छपाई के लिए 3.2 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। यह आंकड़ा वर्ष 2012 में रुपए की छपाई में आए खर्च के संदर्भ में बताया गया था। वहीं, 2000 की नोट को छापने में उतना ही खर्च आता है जितना कि एक हजार रुपए की नोट में लगता है।

वर्ष 2015 में सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हो गया था कि आरबीआई ने एक जवरी 2016 से कटे-फटे और लिखापढ़ी किए गए नोटों को स्वीकार करना बंद कर दिया है। लोगों ने ऐसी करेंसी को बाजार से बाहर किया जाना मान लिया था। तब तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने एक मीडिया में यह बयान दिया था कि आरबीआई हर तरह के नोट को स्वीकार करने के लिए प्रतिबद्ध है। लोग कटे-फटे और लिखापढ़ी किए गए नोटों को बाजार से बाहर किए जाने वाले मैसेज को नकार दें। हालांकि, उन्होंने यह भी जरूर कहा था, “यदि कोई शख्स बैंक कर्मचारी के सामने ही नोट पर कुछ लिखता है तो बैंक उस नोट को स्वीकार नहीं करेगा।” इसका कारण बताते हुए उन्होंने स्वीकार किया था कि नोटों की छपाई में देश को काफी खर्च उठाना पड़ता है। हालांकि, आम नागरिकों को नोटों की छपाई के इस खर्च को वहन नहीं करना पड़ता है। इसीलिए लोग करेंसी की कद्र नहीं करते हैं और उस पर अपनी मनमर्जी करते रहते हैं। इस संबंध में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर केसी चक्रबर्ती ने हाल में बयान दिया है, “रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से आए दिन इस बात की जानकारी जारी की जाती है कि लोग करेंसी को किसी भी हाल साफ-सुथरा रखें मगर लोग इसे मानते नहीं। जो गलत है।”

जानें क्या कहती है आरबीआई की क्लीन नोट पॉलिसी


  • कोई भी बैंक में न तो नोटों को स्टैपल करेगा और न ही बैंक स्टैपल करके नोट मुद्रा धारक को सौंपेगा।
  • बैंक नोटों का बंडल धारक को सौंपते समय एक ऐसे पैकेट में देगा जिसमें नोट कहीं से मुड़े या दबे नहीं।
  • नोटों की गिनती के बाद उस पर कुछ भी लिखना सख्त मना है।
  • धारक को दिया जाने वाला कैश पूरी तरह से साफ-सुथरा हो। उसमें कोई कटा-फटा या गंदा न हो।
  • किसी भी बैंक को नोट के ऊपर वाटरमार्क या मुहर लगाने से भी मना किया गया है।
  • नोट यदि पचास प्रतिशत तक भी फटा होगा तब भी आरबीआई को उसे स्वीकार करना होगा। इसके बदले में धारक को नई देनी होगी।

नोटों की छपाई का समझें पूरा गणित

इस संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार कमर वाहिद नक़वी योजना आयोग के पूर्व सदस्य सौमित्र चौधरी के मार्फत लिखते हैं कि 31 मार्च 2016 को हज़ार रुपये मूल्य के कुल 633 करोड़ नोट और पांच सौ रुपये मूल्य के कुल 1571 करोड़ नोट चलन में थे। अनुमान है कि अक्टूबर 2016 तक इन नोटों की संख्या में 5.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। इस हिसाब से नोटबंदी के पहले हज़ार रुपये मूल्य के नोटों की संख्या 668 करोड़ और पांच सौ रुपये के मूल्य के नोटों की संख्या 1658 करोड़ बैठती है। चूंकि, छोटी-बड़ी हर मुद्रा मिलाकर जितने मूल्य की मुद्रा चलन में थी, उसका 86 प्रतिशत हिस्सा पुराने पांच सौ और हज़ार के नोटों का था। पुराने हज़ार रुपये के नोट को छापनेवाले भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लि. में ही अब दो हज़ार रुपये के नोट छापे जा रहे हैं। इसकी क्षमता दो शिफ़्ट में काम कर 133 करोड़ नोट प्रति माह छापने की है। वहीं, पांच सौ के नोटों छापने वाले सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड की क्षमता सौ करोड़ नोट प्रति माह नोट छपाई की है। इसीलिए हमेशा याद रखें कि लक्ष्मी ने सिर्फ अपना रूप बदला है स्वरूप नहीं। ऐसे में देश की करेंसी का सम्मान करें। उस पर व्यर्थ के संदेश न लिखें। देश की आर्थिक शक्ति को कमजोर न करें। उससे मजाक़ तो न ही करें।

तिरंगा फहराने से पहले एक बार जरूर पढ़ लें राष्ट्रध्वज की ये गाइडलाइंस

गृह मंत्रालय की ओर से जारी गाइडलाइंस में कई ऐसे निर्देश दिए गए हैं जिनका पालन न करके अमूमन हर वर्ष हम सभी जाने-अनजाने गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के झंडे का अपमान कर बैठते हैं। आइए संविधान में बयां किए गए तिरंगा फहराने की गाइडलाइंस को बारीकी से जानते हैं…


  1. मंत्रालय के मुताबिक, कागज के झंडे ही फहराए जाएं। हालांकि, आजकल प्लास्टिक के झंडे का इस्तेमाल बढ़ गया है। इस संदर्भ में देशवासियों को सख्त निर्देश जारी कर कागज के झंडे का ही यूज करने की हिदायत दी गई है।
  2. किसी व्यक्ति या वस्तु को सलामी देने के लिए झंडे को झुकाना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
  3. कमर के नीचे तिरंगे के रंग का कपड़ा पहनना भी पूरी तरह से वर्जित रखा गया है।
  4. कुशन, रूमाल, नैपकीन आदि पर तिरंगे की छपाई करके उपयोग करना मना है।
  5. किसी प्रतिमा, स्मारक या वक्ता मेज पर झंडे को बिछाना या लपेटना सख्म मना है।
  6. जान-बूझकर झंडे को जमीन छूने देना या पानी में सराबोर होने देना भी दंडनीय अपराध माना जाता है।
  7. भारतीय झंडे को किसी नाव, रेलगाड़ी या वाहन के टॉप, बगल या पिछले भाग पर लपेटना मना है।
  8. जो कोई भी राष्ट्रीय गान को गाने से रोकता है या ऐसा गाता है कि उससे गायन में व्यवधान पैदा होता है तो अपराध की संज्ञा में माना जाता है।
  9. राष्ट्रीय झंडे को तीनों रंगों को आयताकार में समान लंबाई-चौड़ाई में तैयार किया गया हो। साथ ही, चक्र को इस प्रकार से प्रिंट या कढ़ाई किया जाए जो सफेद पट्टी के केंद्र में हो व झंडे के दोनों ओर से साफ-साफ नजर आता हो।
  10. राष्ट्रीय झंडे को आकार आयताकार ही होना चाहिए। साथ ही, उसके लंबाई और चौड़ाई का आकार 3:2 का होना चाहिए।
  11. फहराने के लिए समुचित आकार के झंडे का इस्तेमाल किया जाए। 450 गुणा 300 एमएम के आकार का झंडा किसी वीवीआईपी को लाने व ले जाने हवाई जहाजों पर लगाया जाता है। 225 गुणा 150 एमएम आकार के झंडे मोटर कारों व 150 गुणा 100 एमएम आकार के झंडे मेजों के लिए निर्धारित किए गए हैं।
  12. झंडे पर किसी प्रकार के अक्षर को नहीं लिखना है। ऐसा करने पर दोषी पर संविधान में प्रदत्त दंड के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी।
  13. झंडे का प्रयोग किसी भवन में पर्दा लगाने के लिए नहीं किया जाएगा।
  14. झंडे को जान-बूझकर इस तरह से फहराना जिससे कि केसरिया रंग नीचे की ओर हो जाए दंडनीय अपराध माना गया है।
  15. फटा और मैला-कुचैला झंडा नहीं फहराया जाएगा।
  16. झंडे को किसी अन्य झंडे के साथ या अन्य झंडों के साथ एक ही ध्वज दंड पर फहराना सख्त मना है।
  17. झंडा यदि मैला या फट जाए तो उसे जलाकर या किसी सम्मानजनक तरीके से नष्ट करने का प्रावधान रखा गया है।
  18. यदि झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाए कि जब वक्ता का मुंह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिनी ओर रहे अथवा झंडे के पीछे दीवार के साथ और उससे लेटी हुई स्थिति में प्रदर्शित किया जाए।
  19. संविधान में कुछ ही लोगों को अपने वाहन में झंडा लगाने के लिए स्वीकृत किया गया है। इनमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, उपराज्यपाल, विदेशों में नियुक्त भारतीय दूतावासों के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री व अन्य कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्रियों, राज्यमंत्रियों, उप मंत्रियों, लोकसभा व राजयसभा के अध्यक्षों, राज्य विधान परिषदों के उप सभापतियों, सुप्रीम कोर्ट के जजों, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश ही शामिल किए गए हैं।
  20. जब कोई विदेशी गणमान्य व्यक्ति सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई कार में सवार हो तो राष्ट्रीय झंडा कार के दाईं ओर व संबंधित देश का झंडा कार के बाईं ओर लगाया जाना सुनिश्चित किया गया है।

सुकून की चाह में हम तरसते रहे

सुकून की चाह में हम तरसते रहे
हम तरसते रहे और वो गरजते रहे

सुनहरी शाम में याद उनकी आ गई
देखते ही देखते रात हमें खा गई

आज किसी नाम पर खुद को मैं वार दूं
खुद को भुला के उसकी जिंदगी संवार दूं

मेरी नब्‍ज है थमी और ख्‍वाब में जगा हूं मैं
फिर भी मेरा दिल कहे कि जिंदगी उधार दूं

ए खुदा बता मुझे कि क्‍या खता है हो गई
कि देखते ही देखते फिर सुबह हो गई।




हाशिये पर खुशी है हाशिए पर हम

हाशिये पर खुशी है हाशिए पर हम

हाशिया ही ख्‍वाब है, वही लेगा दम

उससे नाराज हैं अभी ज्‍यादा कभी कम

आंखों का क्‍या कभी सूखी अभी नम

हाशिये पर खुशी है हाशिए पर हम-3

मेरा सफर शुरू हो गया


मैं अब नही थकुंगा
गलतियों को, नही भुलूँगा
कर्मपथ पे चला करूँगा
मेरा सफर शुरू हो गया
किस्मत मेरे पास है
मन में हर्षोल्लास है
अब हर पल बडा ही खास है
मेरा सफर शुरू हो गया
मन मेरा शांत है
चारों ओर एकांत है
संग मेरे कान्त है
मेरा सफर शुरू हो गया
खुशियों को खींच लाता हूँ
ख़ुशी बाँट ख़ुशी पाता हूँ
अब चैन से सो पाता हूँ
मेरा सफर शुरू हो गया
आलस बिल्कुल बेकल है
आज ही आज नही कल है
क़दमों में, नभ - जल -थल है
मेरा सफर शुरू हो गया
चलता ही मैं जाऊंगा
जो चाहूँ वो पाऊंगा
तभी स्वर्ग मैं पाऊंगा
मेरा सफर शुरू हो गया

Thursday, May 25, 2017

आओ चलें...

तितली बनकर आओ हर सीमा पार करें
भूल हर दीवार-ओ-गम गुलिस्‍तां पार करें
उस देश की धरती जहां सभी खुशहाल रहें
आओ हम उस ग्रह पर नाम गुलजार करें
बाग बहार सब कितने भूल रहे हम सब
आओ दोस्‍त हम-तुम हर पल गुलजार करें
बिना शिकायत जो सम्‍बंधों को जी जाये
उस दुनिया की ओर चलो रफ्तार करें

Tuesday, May 23, 2017

नक्‍सलियों से नहीं कश्‍मीर के पत्‍थरबाजों से होती है नफरत : भारतीय जवान

भारतीय सेना पर पत्‍थर बरसाती कश्‍मीरी छात्राएं. (साभार: गूगल इमेज)
दोस्त अगर फौजी हो तो एक घंटा भी साथ में गुजारने पर दुनियाभर के किस्से मिल जाते हैं. आज भी कुछ ऐसा ही हुआ. करीब छह माह बाद एक लंगोटिया दोस्त से मुलाकात हुई. वह फौज में है. कुछ देर के हालचाल बताने और पूछने के बाद अपने-अपने अनुभव के बारे में बातें होने लगीं. वह अपनी नौकरी के दौरान पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों में गुजारे वक्त के बारे में बताने लगा. इस बीच उसने एक से बढ़कर एक किस्से सुनाये. कभी जंगल में रात के समय तैनाती के समय नक्सलियों की आहट पर रोंगटे खड़े हो जाने वाले किस्से तो कभी नदी के बीचोबीच मछली पकड़ कर चट्टान पर सींक घुसेड़ कर उसे पकाने की बातें. इस बीच जंगली हाथी के दौड़ाने और रातभर हिरण व अन्य जानवरों की चमकती आंखों के बीच मात्र टॉर्च की रोशनी में अपनी ड्यूटी पूरी करने की कथा. हर कहानी को सुनने के दौरान हम सभी दोस्त मुंह खोलकर देखते और सुनते रहते. उसके अनुभवों में एक किस्सा ऐसा भी था जिसमें वह जिस पेड़ पर बैठा सुस्ता रहा था उसी पेड़ पर मात्र दो-ढाई मीटर की दूरी पर एक सांप डालियों पर लटका अटखेलियां कर रहा था. जैसे ही उसकी नजर उस सांप पर पड़ी वह कूद-फांदकर वहां से भागा. फिर भी तमाम दिक्कतों के बीच उसने बताया कि सेना के जवान अपनी नौकरी पूरी तन्मयता से निभाते हैं. इस दौरान हम सभी दोस्त एक दूसरी ही दुनिया में गुलाटी मारने लगे थे. खासकर, सचिन वर्मा को इन बातों में बड़ी मौज आ रही थी. वह हर किस्सागोई के बीच में कोई न कोई द्विअर्थी चुटकुला तलाश लेता था. मगर किस्सों के अंत में मेरे फौजी दोस्त ने बड़े दुख से बताया कि नीरज सबसे ज्यादा बुरा कश्मीर की सुंदर वादियों में अपने ही देश के नौजवानों के हाथों पत्थकर खाने का दुख होता है. बुरा तब लगता है जब वहां का पांच साल का बच्चा भी जोर से चींखता और तुतलाता हुआ कहता है कि ‘लेकर रहेंगे आजादी’. उसने कहा, ‘इतना गुस्सा तो नक्सलियों को देखकर भी नहीं लगता. मोदी सरकार से हम जवानों को एक ही उम्मीद थी कि वह हमें प्रतिरक्षा करने की छूट देगी. मगर ये सरकार भी यही कर रही है जो बीती सरकारें करती आई हैं. चुपचाप होकर जवानों की मौत का तमाशा देख रही हैं.’ इसके बाद मैं खामोश था. दोस्त भी चुप था. महफिल खत्म हो गयी, इस बात के बाद की मोदी सरकार ही घाटी से धारा 370 को हटवाने का दम रखती है. उसके बाद ही जम्मू-कश्मीर में सब ठीक हो सकेगा. जी हां, धारा 370 को खत्म करने की ही मोदी सरकार से आखिरी आस है. 

क्‍यों मनाते हैं लखनऊ में बड़ा मंगल?

लखनऊ में ज्‍येष्‍ठ माह के हर मंगलवार को जगह-जगह भंडारे और प्‍याऊ की व्‍यवस्‍था की जाती है. इन दिनों कोई भूखा नहीं सोता. अच्‍छा है. मगर क्‍या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी?
पुराने लखनवी जो ग्रामीण क्षेत्र के हैं, उनसे मैंने राजधानी में आयोजित होने वाले इस पुण्‍य प्रतापी आयोजन की शुरुआत के बारे में पूछा. जवाब मिला, लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्रों में बरसों बरस पहले से हर साल नया अनाज आने पर ज्‍येष्‍ठ माह के हर मंगलवार को किसानों की ओर से गुर-चना बांटा जाता था. मगर इस गुर-चना में चना नहीं होता था. इसमें किसान अपनी खेत की नयी उपज की गेहूं को भुनवाता था. फिर उस भुने गेहूं में गुड़ मिसवा (मिला) दिया जाता था. इसके बाद घर के बच्‍चे उसे अपने गले में एक कपड़ा बांधकर लटका लेते थे फिर घरों से निकल पड़ते थे. राह चलते जो दिख जाए उसे गुर-चना दिया जाता था. यानी ये तो हो गया बड़ा मंगलवार पर पेट भरने का इतिहास.
अब जानिये इसके आगे की कहानी. फिर हुआ यूं कि ग्रामीण क्षेत्रों की इस धन्‍य परम्‍परा से राजधानी के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले पंजाबी और सिंधी परिचित हुए. उन्‍होंने इन दिनों शर्बत बांटने की परम्‍परा शुरू कर दी. धीरे-धीरे बड़ा मंगल मनाने का क्रेज बढ़ता गया. इसमें पूर्वांचलियों और बिहारियों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लेना शुरू कर दिया. अब चूंकि पूरबियों को ठोस खाना खाना और खिलाना पसंद है, इसीलिए अब चारों ओर पूड़ी-सब्‍जी का बोलबाला हो गया है. है न रोचक, हमारी राजधानी में बड़ा मंगल मनाने का इतिहास.
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अंत में बड़ा मंगल से जुड़ी कुछ खास बातें.
1. कुछ लोग भंडारा कराते हैं 100 किलोग्राम आलू का मगर हांकते समय बताएंगे कि 10 कुंतल के ऊपर लग गया है. फिर यह भी कह देंगे कि भगवान के काम में गुणा-भाग काहे का.
2. भंडारा करवाता कोई और है मगर उसमें 101 रुपया देने के बाद लोग ऐसे प्रचारित करते हैं कि सारा बोझ उन्‍होंने ही अकेले अपने कंधे पर उठा लिया था.
3. कइयों को मैंने देखा है कि भंडारा कराते समय यदि कोई अमीर दिख जाएगा तो बड़े प्रेम से खिलाएंगे लेकिन रिक्‍शा चलाने वाले या भिखारियों को डंडा हांक कर लाइन लगवाते हैं.
(उपरोक्‍त तीनों प्रकार के लोगों से विनम्र निवेदन है कि वे भंडारा न करें बल्‍कि घूम-घूमकर प्रसाद भक्षण करें. हनुमानजी से न सही मगर उनके गदा से तो डरें.)

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...