Wednesday, November 24, 2010

बिहार चाहे विकास

बिहार में नीतीश कुमार की जीत को आम जीत न कहें तो बेहतर है। यह जीत दर्शाती है कि बिहार की जनता को अब बारुद की गमक और बंदूक व लाठी की गूंज नहीं, विकास पथ की दरकार है। नीतीश के जरिए उसे उन्‍नत राज्‍य चाहिए। सपाट सडकों पर तरक्‍की भरी रफ्तार चाहिए। बिहार के लोगों को अब नया बिहार चाहिए।

Wednesday, November 3, 2010

पढ लेते तो पत्रकार न होते

सच कह रहा हूं। मन में आजकल ऐसे ही विचार आते हैं कि पढ लेते तो पत्रकार न होते। तब पिता जी की बात क्‍यों नहीं सुनी जब वे किताब थमाने के लिए बेचैन रहते थे। इंटर में आने के बाद वे सरकारी
नौकरी का फार्म भरने को कहते थे। मगर आदत से मजबूर हम फिर कोताही कर बैठे। आज पछता रहे हैं। दीपावली में सभी अपने घर जा रहे हैं और हम खबर बना रहे हैं। सच कहूं पेशा तो यह अच्‍छा है
मगर पैसा नहीं है। ये थी मेरी और मेरे साथी पत्रकारों की दर्द भरी दास्‍तां। अब सुनिए मेरे एक मित्र का हाल, जो पढने में अव्‍वल नहीं थे लेकिन आज उनसे बडा पारिवारिक सफल कोई नहीं। सुकून की जिंदगी जीते हैं। घर की शादी में भी नाचते हैं और पडोसी की शादी में भी धूम मचाते हैं। दरअसल, इसका कारण साफ है कि उन्‍होंने अपने पिता जी की बात सुन ली थी। उन्‍होंने किताबों से दिल लगाते हुए सरकारी नौकरी का फार्म भर दिया था। नतीजा, वही मनचाही जिंदगी जी रहे हैं। जब इच्‍छा होती है छुट्टी ले लेते हैं। घर पर जाने के लिए ज्‍यादा सोचना नहीं पडता। मजे से जिंदगी काट रहे हैं। वहीं, हम उन्‍हें देख के ललचा रहे हैं। काश, हम भी सरकारी दामाद बन जाते। कम से कम दीपावली में घर तो जा पाते। किसी भी शहर में जाना होता तो हरा-हरा नोट दिखाते और ट्रांसफर करा लेते। मगर अब तो जिंदगी बदल सी गई है। सच है साथियों जो जीवन में ज्‍यादा पढाई नहीं करता वो पत्रकार बनने के बाद पूरे जीवन पढाई ही करता रहता है। जिंदगी जीने की जद्दोजहद ही करता रहता है। अपना मन मारता रहता है और दूजों के हक के लिए लडता रहता है। तो अंत में यही कहूंगा, पढ लो मेरे यार मत बनना पत्रकार।

Monday, November 1, 2010

हंगामा है क्‍यों बरपा थोडी सी जो रंग ली है


चारों तरफ चर्चा है कि रुडकी इंजीनियरिंग कॉलेज में बडा गडबड हुआ है। लडकों ने लडकियों के होठों को अनोखे तरह से रंग जो दिया है। भइया, कोई ज्ञानी जरा इतना बताए इसमें हर्ज क्‍या है? चर्चा करने का अधिकार मीडिया के माध्‍‍यम से समाज के ठेकेदारों को कबसे मिल गया। इस रोमांटिक विष‍य पर चर्चा का अधिकार सिर्फ उन छात्र-छात्राओं के घरवालों को है। यदि उन्‍‍हें दिक्‍‍कत है तो दिक्‍‍कत जताने दो नहीं तो शांत हो जाओ ठेकेदारों, जवानी को जीने दो। न जाने क्‍‍या हंगामा सा बरपा रखा है थोडी सी जो रंग ली है।

हद है यार, किसी को अपने मन की आजादी ही नहीं देते। यदि कोई अपना होंठ अपने किसी प्रिय के होठों में दबी लिपिस्टिक से लाल करवा रहा है तो तुम्‍‍हें काहे की दिक्‍कत मजा करने दो उन्‍हें। अरे दिन-रात मेहनत करके उक्‍त कालेज में दाखिला पाने की मेहनत उन्‍होंने की है। अब जीवन जीने का तरीका दुनिया सिखाएगी। सच बताओ, समाज के ठेकेदारों उस तस्‍‍वीर को देखते ही पर्सनल फोल्‍डर में सेव किया की नहीं। किया न, अब जबान पर ताला लग गया। जवाब दो। खैर, अब ये बताओ कि उन्‍‍होंने गलती क्‍‍या की। जरा-जरा सी बात पर लोगों को परेशान करना। उनके उडते मन को पिंजडे में बांधना। ये सब करने से मिलता क्‍‍या है? कभी तुमने किसी लडकी को गलत निगाह से नहीं देखा। देखा होगा। नहीं देखा तो मामला संगीन कहूंगा। मेरे ठेकेदार भाइयों दुनिया को बदलने दो। मन की शांति जिसमें मिले लोगों को वही करने दो। न जाने क्‍‍या हंगामा सा बरपा रखा है, जो थोडी सी रंग ली है। जिसको बुरा लगे वो कमेंट दे सकता है। कोई कमेंट नहीं हटाउंगा। सबको बोलने का अधिकार है मेरे राज में।

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...