Tuesday, January 18, 2011

यादों के झरोखों में मलाल का माहौल


खो गए हैं मौसम। बदल गया है माहौल। गुम हो गए हैं घरेलू पक्षी। बदल गया है रात का हाल। नहीं दिखते रात में टिमटिमाते तारे। इतना तीव्र और अनचाहा परिवर्तन हमारे कारण हुआ। प्रकृति हमसे सारी चीजें एक-एक करके वापिस लेती जा रही है। हम फिर भी मौन हैं। कुछ न करने की कसम खाए हुए हैं। सिर्फ कुछ यादों को सहेज के रखे हुए हैं। चार लोगों के बीच में उनकी चर्चा करते हैं कि भाई गौरैया नहीं दिखती, बचपन में खिचडी के दिन ठंड के कारण अम्‍मा से अक्‍सर नहाने के लिए डांट खाते थे। सभी एक साथ हामी भरते हैं। हां, खत्‍म हो गया वह माहौल। इसी के साथ जिम्‍मेदारियों की पूर्ति करते हुए हम अपनी अपने-अपने घर को रुख‍स्‍त हो जाते हैं।

सच कहूं तो मैं इन सबको बहुत याद करता हूं। बचपन में अचानक ही घर के अंदर गौरैया चहचहाते हुए घुस आती थी। हम भाई-बहन उसे घर से निकालने की कोशिश में उछल-कूद करते थे। जी में आता था कि पकडकर पाल लें उसे लेकिन पीछे से दादी या मां कहती थीं। उसे उसके रास्‍ते जाने दो। बेचारी डरी हुई है। हम मन मसोस कर रह जाते थे। न चाहते हुए भी घर का दरवाजा खोलकर उसे उधर की ओर भगाने की कोशिश करते थे। फिर हल्‍की सी हंसी के साथ उसे विदाई दे देते थे। गौरैया की उन यादों को हम सभी ने कभी जीया होगा।

आइए अब बात करते हैं, मौसम के बदल चुके मिजाज की। पहले सभी मौसमों की एक निश्चित तिथि हुआ करती थी। ठंड का मतलब ठंड, गर्मी का मतलब गर्मी और बरसात का मतलब होता जोरदार बरसात। हर मौसम की अलग-अलग तासीर और अलग-अलग मिठास। सभी का अपना मजा था। खिचडी के रोज, सुबह-सुबह उठते ही ठंड का कोपभाजन झेलना होता था। मां-पापा कहते थे, जल्‍दी से नहा ले मलिछ। आज पूजा का दिन है और हम कहते थे। हे भगवान, इतनी जोर की हवा चल रही है। उसमें भी दान-पूण्‍य। मर गए आज तो। कई बार तो उस दिन बारिश भी होती थी। बरसात का मौसम आते ही काले बादलों की बाढ सी आ जाती थी। छत पर बैठते हुए ठंडी हवा के तेज झोंकों में बाल उडते देखना और उसे महसूस करने का अपना ही मजा होता था। बारिश अब भी होती है लेकिन उसकी समयसीमा घट गई है। गरमी का मिजाज, अब कुछ ज्‍यादा गरमा गया है। इसकी समयसीमा बढती ही जा रही है। सभी मौसमों ने अपनी तारीखें बदल दी हैं। कोई आता है तो जाता नहीं और किसी के आने-जाने का एहसास ही नहीं होता। दिन-ब-दिन मौसम अपने मिजाज को खोते जा रहे हैं। हम फिर भी मौन हैं।

अब आइए रात की चर्चा करते हैं। रात में गर्दन को उपर उठाते ही ध्रूव तारा और सप्‍तऋ‍िषी के साथ आकाशगंगा की चमक को निहारने का मजा ही कुछ और होता था। तारों को देखकर हम भाई-बहन त्रिभुज और चतुर्भुज को तलाशा करते थे। एक से बढकर एक नक्‍शे देखते थे। जगमगाती थी हर रात। टिमटिमाते रहते थे तारे। मगर अब गाडी के धूंएं ने सबको ढांप लिया है। रात के कालेपन की खूबसूरती खो गई है। यूं लगता है जैसे इसका यौवन किसी ने चुरा लिया है। वो चोर कोई और नहीं, हम हैं।

हमने ही बदला है मौसम के मिजाज को। गौरैया सरीखी अन्‍य प्रजातियों की चिडियाओं को मार डाला हमने। कारण, प्रदूषण है। इस गंदगी के जनक हैं हम। अब सिवाए पछताने के हम कुछ नहीं कर सकते। हम सिर्फ उन पलों को याद कर स‍कते हैं। कवियों की कल्‍पनाओं में उन्‍हें पढकर वाह-वाह कर सकते हैं। हमने ही बदला है मौसम का मिजाज। प्रकृति ने अच्‍छा किया जो इन यादों को हमसे छीन लिया। आप तो उन्‍हें भूल गए हैं। मैं उन्‍हें भूल नहीं पा रहा हूं, आप ही बताएं मैं क्‍या करूं??.....

Friday, January 7, 2011

माँ की जिन्दगी


खिडकी की ओर से एक आहट हुई। किसी ने कहा, ओ साथी रे तेरे....। मैं लेटा हुआ था। गहरी नींद में था मगर जाग रहा था। झटके से उठ बैठा। पिता जी को देखा। बगल के कमरे में भइया को पढते देखा।
फिर सभी ने खिडकी की ओर देखा। फिर मुझे देखा। मैं पानी पीने के बहाने कीचन में चला गया। जब
वापस कमरे में आया तो देखा क‍ि पिता जी अखबार के बजाए घडी की सुईयों को पढ रहे थे। अचानक
ही बोल पडे, स्‍कूल का काम खत्‍म हो गया। मैंने कहा, हां..... वो तो स्‍कूल में ही समय निकालकर कर
लेता हूं। उसके बाद ही सोता हूं। पिता जी की जिज्ञासा कुछ ज्‍यादा ही थी। कह उठे, तो कापी लाओ,
जरा दिखाओ तो देखें कि हमारे सुपुत्र जी कितना समय का सदुपयोग करते हैं। मैंने कहा, आज स्‍कूल से काम ही नहीं मिला था। उन्‍होंने कहा, मैं अभी तुम्‍हारी मां से यही कह रहा था कि जनाब से कापी
मांगूंगा तो यही जवाब मिलेगा। खैर, अब क्‍या विचार है? मैंने कहा, विचार तो कुछ खास नहीं। सोच रहा था कि घर के बाहर हो आउं। दिन ढले इसके पहले ही लौट आउंगा। पिता जी की इच्‍छा थी कि आज सुताई कर दें। मगर मम्‍मी ने तुरंत कहा, जाओ मगर लौट आना समय से।
यह घटना हर रोज खिडकी पर आहट होते ही घटती थी। हमेशा की तरह उस दिन भी मैं घर से भाग
गया। निकलते ही अपने उस साथी से मिला और कल दूसरा गाना गाकर बुलाने को कह दिया। मगर मन में हमेशा एक सवाल रहता था कि पिता जी भी कभी लडके थे फिर मेरी खेलने की आदत को कभी समझ क्‍यों नहीं पाते। मम्‍मी तो गांव की हैं, उन्‍हें तो बचपन से ही घर में कैद रहना पडा होगा।
ऐसे में उन्‍हें कैसे पता चल जाता है कि मैं बाहर जाना चाहता हूं, खेलना चाहता हूं। किताबों से बगावत
करना चाहता हूं। सवाल मन में काफी समय से था जो अब पहाड का रूप लेता चला जा रहा था। मगर चंचल में कोई सवाल और उसका जवाब कभी ज्‍यादा देर तक टिकता नहीं। जाहिर है, इस सवाल को भी जवाब चाहिए था। फिर भी मन में शान्ति बनी रही। मगर कुछ देर के लिए। हर शाम का वही क्रम चलता रहा। इस बीच मैं स्‍कूल से कालेज और कालेज से जाने कहां-कहां घूमता रहा। दिन बदलते चले गए। मैं शाम के बाद होने वाली रात में खोता रहा। कभी छह बजते ही घर लौट आने वाला वो लडका आज के किशोर के रूप में दस-ग्‍यारह बजे की रात में भी घर पर नहीं होता था। खैर, वो अपनी मर्यादा जानता था क्‍योंकि उसके घर में संस्‍कार की जड काफी मजबूत थी। जिसे वो कभी नहीं छोडना चाहता। एक समय आया मैं अब जीवन में कुछ करने की चाह में घर से दूर जाने की सोचने लगा। धीरे-धीरे घर वालों से दूर भी होने लगा। मगर जिम्‍मेदारी के करीब रहना मेरा संस्‍कार था। पिता जी से इजाजत मांगी तो उन्‍होंने बिना कुछ कहे, इजाजत भी दे दी। कहा, जाओ। आओ या न आओ, तुम्‍हारी मर्जी। मेरे रोकने से रुकोगे तो पूरे जीवन ताना दोगे कि मेरे पिता ही मेरे दुश्‍मन हैं। खैर, मुझे इसमें उनकी नाराजगी कम और अपनी आजादी का फरमान ज्‍यादा सुनाई दिया। मगर आज मां कुछ नहीं बोली।
वो मेरा चेहरा देख रहीं थी कि मैं उन्हें छोडकर बाहर जा रहा हूं। मैंने मां से कहा, परसों शाम को दिल्‍ली जाउंगा। फलां ट्रेन से जाना तय हुआ है। मम्‍मी कुछ बेहतरीन बना देना। वो लाल मिर्च का अचार भी रख देना। वहां, बाहर से खरीदकर खाना होगा। मुझे आपके हाथ का ही बनाया हुआ अचार खाना है। मां बोली, रुक जा। क्‍यों जा रहा है? यहां किस बात कमी है? आज मां के मुंह से ऐसी बात सुनकर बचपन का वो तीखा सवाल जाग उठा। तुरंत पूछ बैठा, मम्‍मी आप तो कहती थी कि जाओ मगर समय से लौट आना मगर आज आप ही मुझे रोक रही हो। उन्‍होंने कहा, पता होता कि तू मेरे जाने देने से इतना दूर चला जाएगा तो उस समय भी अपना मार लेती। मैं कुछ समझ नहीं पाया कि मां किस मन की बात कर रही है। फिर पूछ बैठा, कैसा मन, मैं तो अपने घर से बाहर निकलने की बात करता था। मन की बात तो मेरी होती थी। इसमें आपका मन कहां से आया। अब वो रूंधे गले बोल पडीं, मैं तुझमें खुद को देखती थी। लगता था तू अपने दास्‍तों के साथ घर के बाहर नहीं है। मुझे लगता था कि मैं घर के बाहर खेल रही हूं। जो मैं करना चाहती थी। बचपन में। मगर तेरे मामा और नाना की आंखों का डर मुझे घर के बाहर कभी जाने ही नहीं देता था। हो भी क्‍यों न हम ब्राह्मण जो ठहरे। संभ्रांत ब्राह्मण। इसलिए मैंने तुझे कभी घर के बाहर जाने से नहीं रोका। मगर अब तू मुझे छोडकर जा रहा है। मैं जान गया कि मां मुझमें खुद को जी रही थी। आंखों के सपने मुझपर हावी थे, इसलिए खुद को रोक नहीं सकता था। मगर आज मां ने मुझे एक लक्ष्‍य दे दिया कि कभी किसी के मन को मत रोको। उसे वो सब करने दो जिसमें उसकी खुशी हो। तब से यही कर रहा हूं, लोगों को खुश रखने की कोशिश। मगर अब मुझे घर की याद आती है। मैं घर जाना चाहता हूं मगर जिम्‍मेदारी मुझे घर जाने से रोकती है। मां अब भी बुला रही है। उसे क्‍या पता कि मैं तो अब भी उनकी जिंदगी ही जी रहा हूं। मगर इस बीच मैं अपनी जिन्दगी कभी जी ही नहीं पाया........ फिर भी इस धरती पर मुझसे ज्यादा सुखी कोई नही है।

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...