Thursday, January 28, 2010

'वे दिन बहूत अच्छे थे'


'वे दिन बहुत अच्छे थे। काश लौट आते। तब कोई तकलीफ नहीं थी। जिन्दगी में उठा-पटक नहीं थी। वक्त मेहरबानी करे। वे दिन लौटा दे ।' अक्सर, ये शब्द सुनने को मिल ही जाते हैं। कोई पुराना दोस्त जब अचानक फ़ोनकर कहता है, पहचाना?, और आप कह बैठते हैं.'अबे तू। इतने दिनों के बाद। कहाँ है आजकल? ये तुम्हारा ही नंबर है। पहले क्या दिन थे यार दिनभर साथ रहना। कभी तेरे घर में मैंने शाम काटी तो कभी तूने मेरे घर में। वहीं अब जब सब है, तो हम साथ नहीं। काश लौट आते वे दिन।'
दरअसल, कई दिनों के बाद मेरे पास ऐसा ही एक फ़ोन आया। बात तो दस मिनट हुई मगर जो हुई झकझोड़ गई। ऐसा मेरे साथ नहीं, उम्मीद करता हूँ उसके साथ भी हुआ होगा। हम दोनों साथ ही पढ़े, खेले, झगड़े, मनाये गये, ज्यादा खेलने पर घरवालों द्वारा रुलाये गये।' दिन बीतते गये। हम बड़े हो गये। साथ ही भविष्य की चिंता होने लगी। पहले किताबों ने बात दिया। क्योंकि, वह बायो का था और मैं कॉमर्स पढना चाहता था। फिर भी हम मिले, पर पहले से थोड़ा कम। समय बदला और हो गये कामकाजी। घर से दूर। दोस्तों से कोशों दूर। मस्ती करने का तरीका बदला। बचपन में जैसा सोचा था वैसे तरीके अपनाए। हमें तो अब ज्यादा खुश होना चाहिए था। फिर ये कशिश कैसी? हमें पुराने दिन क्यों याद आ रहे हैं।
ये बात समझ से परे नहीं है। दरअसल, इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में, गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच, इन्क्रीमेंट और प्रमोशन की चाह में हम काफी कुछ पाकर भी एक चीज खो चुके हैं, जिसके बिना सब बेमानी है। वह है सुकून। दुनिया गवाह है, लोग कभी संतुष्ट नहीं हुए। हुए होते तो कलियुग न आता। ऐसे में बचपन के ख्वाब पूरे करने के बाद भी हमारा उन आँखों को याद करना लाजिमी है, जिन्होंने हमारे उन सपनों को परिणति तक पहुंचाने के लिए वक़्त-वक़्त पर हमारी हौंसलाफ्जाई की थी। सच बीते दिन कब पलकों के रास्ते दिल में उतर जाते हैं। कोई नहीं जानता। क्योंकि.......

Friday, January 22, 2010

शरद जी चीनी खा लो...



केंद्रीय खाद्य मंत्री शरद पवार को कुछ हो गया है। वे नेता होने के बावजूद झूठे आश्वासन नहीं दे रहे हैं। वे हर वह बात कर रहे हैं, जिससे कांग्रेस झक-झक में बनी रहे। ठीक है किसी को झूठे आश्वासन नहीं देना चाहिए। पाप लगता है। दरअसल, वे आजकल बेलाग-लपेट मुहफट अंदाज में मीडिया को ब्यान दे रहे हैं। पूछो आम तो बताते हैं इमली। कहते हैं हम कांग्रेस के साथ हैं मगर पत्रकारों के सामने केंद्र सरकार की खाल खिचवाने जैसे ब्यान दे रहे हैं। भला ही है भगवान् का की मुझे ऐसा कोई दोस्त नहीं मिला। अच्छा हाँ, शरद जी का नाम भले शरद हो मगर नाम से उलट वे अपनी जबान से ग्रीषम ऋतू की ही बारिश करते हैं। नाम के आगे पवार लगाते हैं। मगर देश के कई परिवार का महंगाई के आगे कमर तोड़ चुके हैं। मगर, प्रयास के नाम पर उल्टा जवाब देना बेहतरी से जानते हैं। तभी तो चीनी के दाम से दिल नहीं भरा तो दूध की कीमत बढाने की कवायद शुरू कर दी। देखते हैं कब तक कामयाब होते हैं एनसीपी के शरद। शरद जी मुंह से अच्छे बोल भी निकल सकेंगे जो मीठा खा लोगे


शरद बाबू को लेकर एक बात याद आ गयी ......


मैं छोटा था। मेरा जूते का सोल अपना मुंह खोल बैठा। मम्मी मुझे प्यार बहूत करती थीं, या मैं नालायक बहूत था शायद इसीलिए मैं बिना एक रूपये लिए स्कूल नहीं जाता था। कंजूस भी बचपन से ही हूँ। उन रुपयों को कभी खर्चता नहीं था। इससे गाहे-बगाहे दोस्तों के बीच सिक्का खनका उन्हें जलाने का मौका मिल जाता था। खैर, मैंने तुरंत अपनी जेब में से सिक्के निकाले और मैं पहुँच गया मोची के पास, उसने तुरंत ही मेरे जूते का मुंह परदो कील मार दी। मैं खुश हो गया चलो जुगाड़ से जूता बन गया। मगर दो दिन के बाद वह मेरे पैरों को घाव देने लगा। कारन चाहे जो हो। मोची मुरख हो। कील खराब हो। कुछ भी। मगर दर्द तो मेरा ही पैर हो रहा था। पिताजी ने नये जूते खरीद कर दिए थे, इसलिए कह भी नहीं पा रहा था की मैंने रोड चलते पत्थर को ठोकर मार-मार के जूते की दशा और दिशा दोनों बदहाल कर दिया है। मैं दर्द झेलता रहा। दरअसल, ऐसा ही दर्द कांग्रेस का है। वह पवार के शब्दों का कील रूपी दंश झेलने को तैयार है। मगर, परित्याग करने को नहीं। खुदा जाने कांग्रेस कितना बड़ा पत्थर सीने पर रखकर शरद के ब्यान को मुखाग्नि देने को कैमरे और कलमों के सामने आती है। काश, माननीय मंत्री महोदय समझ सकते की उनकी इस तरह की बेबाक टिप्पणियों को आधार बनाकर लुटेरे सरीखे व्यापारी दाम बढ़ा देते हैं...

यकीन मानिए मुंह मीठा हो जाएगा, जो शरद जी चीनी खा लो... बात मानिए... खा लीजिये.... चलिए अच्छा दूध में मिलकर पी लीजिये।

Thursday, January 21, 2010

गागर में सागर, भारत देश

हमारे देश में घर-घर में अनेक उदाहरण हैं, जो जीना सिखाते हैं कब्र के सीने पर बैठकर। विश्वास नहीं आता तो जानिये। पाकिस्तान में मौत से आँख-मिचौली सा खेलता सरबजीत का परिवार। राष्ट्रीय खेल के नाम पर हौंकी नामक लाश को काँधे पर ढोते हमारे देश के हौंकी खिलाड़ियों का परिवार। अंत में बेशर्मी को पार चुके माननीय केंद्रीय खाद्य मंत्री शरद पवार। मैं इन साहब के परिवार को नहीं घसिटूंगा। कारण, कौन जाने यही अपने घर की शान बुझाने में विश्वास रखते हों। आप सोच रहे होंगे की इन परिवारों में ऐसा क्या है जो ये देश-विदेश के लिए बेहतरीन उदाहरण बन सकते हैं। हम इनके बारे में क्रमशः बात करेंगे।

पहला सरबजीत का परिवार : हम कई बार अखबार में पढ़ते हैं की फ़लां सेवानिवृत्त बुजुर्ग अपने पेंसन के इंतज़ार में ही चाल बसे। किसी बाबू ने चिलां शर्मा जी को इसलिए पेंसन कार्यालय का चक्कर लगवाया, क्योंकि उन्होंने उसे घुस नहीं दिया। वे थक-हारकर प्रशासन रूपी रावन के आगे अपना शीश कटवा देते हैं। खासकर, जब उनके घर में उनसे जीवन के अंतिम चरण में भी यही उम्मीद की जाती हजी की वे बाजार से सब्जी तो अपने पैसे से ही ला सकते हैं। इससे हटकर यदि हमारी न्यायपालिका की बात की जाए तो न जाने कितने बेगुनाह सिर्फ इसलिए सजा काटने को मजबूर हैं क्योंकि वे गरीब हैं। वहीँ, सरबजीत का परिवार भारत देश के गाँव में बैठकर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपने पिता-पति को छुद्वान के लिए लड़ रहे हैं। वे घर बैठे ही पाकिस्तान को उसकी मनमानी (सरबजीत को फांसी पर लटकाना ) नहीं करने दे रहे हैं। काश, देश-दुनिया का हर परिवार ऐसे ही सीना ताने तानाशाहियों का मुकाबला कर सकता।

दूसरा हमारे हौंकी खिलाड़ी : बचपन में पढ़ा था की भारत का राष्ट्रीय पशु शेर, पक्षी मोर, मिठाई जलेबी और खेल हौंकी। शायद, बहुविकल्पीय में अंतिम वाला प्रश्न यानी खेल पूछा भी गया था। मैंने सही जवाब दिया होगा। मुझे नंबर भी पूरे मिले होंगे। अब भी ऐसा ही होता है। मगर हकीक़त क्या है। अब यह खेल राष्ट्रीय नहीं बल्कि यूँ ही एक नंबर का अंक मार्कशीट में बढवाने के लिए रह गया है। इसका खुलासा तो तभी हो गया था जब हौंकी पर आधारित फिल्म 'चक दे इंडिया' का गाना हौंकी पर कम और क्रिकेट की ख़बरों में ज्यादा बजा। कारण, वही 'भूखे पेट हो न गोपाला, ले लो अपनी कंठ माला'। इसी क्रम में अब महिला हौंकी खिलाडियों ने भी बगावत क बिगुल फूँक दिया है। देखते हैं यह खेल कोर्स से बाहर निकल हकीक़त में कब तक राष्ट्रीय खेल बन पाता है। देखते हैं, कब इसी प्रकार देश के सभी पिछड़े खिलाड़ी अपने हक के लिए खड़े होते हैं।

तीसरे और सबसे अनोखे पवार साहब : न जाने ये मंत्री साहब किस कुंठा के शिकार हैं। इनके पास गरीब जनता को देने के लिया झूटे आश्वासन तक नहीं हैं। गजब है। जब मुंह खोला बुरा ही बोला। कभी कहते मैं ज्योतिषी नहीं हूँ। कभी कहते दूध महंगा हो जाएगा। सब्जी पर कंट्रोल नहीं। सर्कार महंगाई से हार गयी है। वगैरह-वगैरह। मैं इनसे सिर्फ दो सवाल पूछना चाहता हूँ। पहला, भैया अच्छा बोलने में टैक्स लगता है क्या। दूसरा काहे, कांग्रेस की फांस बने हो। ये दुनिया के सबसे बड़े उदाहरण हैं, बिना सोचे बोलने वालों के। क्या दुनिया में लोग इनसे सोचे-समझे बिना न बोलने की कला नहीं सीख सकते। ये सवाल नहीं हिदायत है। पहले सोचो फिर बोलो। काश, मंत्री जी, समझ सकते की इनके इन बयानों से महंगाई को बल मिलता है।

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शरद जी के बारे में अगले पोस्ट में शब्द गर्जना की जाएगी.... नमस्कार।

Tuesday, January 19, 2010

घर छोड़ते ही रिश्तों की तलाश


मेरे एक बड़े भाईसाहब हैं। वे मेरे पहले अखबारी संस्थान में गुरु भी रहे। अभी भी हैं। न जाने उनमें ऐसा क्या है जो मुझे उनसे बात करना। डांट खाना। मजाक करना और झगड़ा करना बहूत पसंद है। अकसर हम छोटी-छोटी बातों में लड़ भी जाते हैं। वे मुझे हमेशा डांटते रहते हैं और मैं हँसता रहता हूँ। हालाँकि, मेरा घरेलु वयव्हार काफी सख्त है। मगर न जाने उनमें ऐसा क्या है की मैं उनकी कड़ी से कड़ी बात क भी विरोध नहीं कर पाता। आप सोच रहे होंगे। ऐ तो आपसी बात है, इसमें जगजाहिर करने जैसा क्या है। मगर आप दिल पर हाथ रखकर बोलिए क्या आपके जीवन ऐसा ही कोई रिश्ता नहीं है, जो अनजाने में ही बना हो, लेकिन हरदिल अजीज हो। सोच में पड़ गये न। दरअसल, हम सभी की जिन्दगी में एक रिश्ता ऐसा कहीं न कहीं बन ही जाता है। उसे कभी हम भइया, कभी बहन, कभी दोस्त, कभी बाबा और कभी अनाम ही रहने देते हैं। इस फेहरिश्त में दो प्यार करने वालों का फ़िलहाल कोई जिक्र नहीं है। क्योंकि, वह तो रूहानी रिश्ता है।
यूँ सोच रहा था की घर छोड़ बाहर जाने पर ऐसे रिश्ते बनते कैसे हैं? जवाब मिला घर की तलाश में। जी हाँ, घर से दूर होने पर हम हर अनजान चेहरे में एक रिश्ता तलाशने लगते हैं। जैसे- ठेले पर सब्जी बेचने वाला एक बुजुर्ग अचानक ही काका हो जाता है। घर के बगल में रहने वाली अंटी अचानक ही मान की तरह सर्दी-बुखार होते ही नुश्खे बताने लगती हैं। इन रिश्तों की खोज घर की तलाश में होती है। अपनों से दूर इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में अपनों की तलाश कभी आपने भी की होगी। हो सकता है की कर रहे हों.....
उन भाईसाहब की एक बात और बतलाना चाहूँगा। वे मुझसे हमेशा कहते, नीरज जिन्दगी को लेकर गंभीर हो जाओ और मैं उनकी इस बात को सिगरेट के छलों की तरह उड़ा देता। उनकी इस नसीहत का जवाब मैं अपनी बेशरम सी हंसी से देता। आज जब जीवन के प्रति गंभीर होना चाहता हूँ तो वे मुझे सलाह नहीं दे पाते। मुझसे दूर जो हैं। या मैं यह कहूं की वे मुझे अब गंभीर रूप में देख ही नहीं पाते, क्योंकि वे मुझसे दूर जो हैं। संभवतः यही कारण है की लोग कहते हैं बड़ों की बात तुरंत मान लेनी चाहिए। दरअसल, वे फिलहाल मुंबई में हैं और दिल्ली में।
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अंत में बशीर बद्र का एक शेर याद आ गया...

दालानों की धूप और छतों की शाम कहाँ
घर के बहार जाओगे तो घर जैसा आराम कहाँ
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मगर, घर के बहार ऐसे ही अनकहे रिश्ते हमारी रिश्तों की प्यास को तृप्त कर देतें हैं.....

Wednesday, January 6, 2010

मैं हरिद्वार गया था, अमर ने इस्तीफा दे दिया


मैं हरिद्वार गया था। पिछले लेख में इसकी चर्चा कर चूका हूँ। मगर अपनी यात्रा का पूरा ब्यौरा नहीं दे पाया था। पेशे से पत्रकार हूँ इसलिए बताये बिना मानूंगा नहीं। डेल्ही से बस में सवार होकर मैं हरिद्वार अपनी दीदी के घर पहुंचा। जाते समय मुझे सिर्फ अपनी भांजी और भांजे का चेहरा याद आ रहा था, लेकिन लौटते समय उनके साथ ही हरिद्वार के हर चौराहे की याद आ रही थी।
मेरी बहन क घर कनखल में है। जहाँ माता पार्वती सटी हुईं थीं। कुछ दूरी पर दक्ष मंदिर है। विशालकाय, खुबसूरत और गंगा के पानी से धुला हुआ। दक्ष मंदिर पहुँचने के लिए माता आनंदमयी द्वार से प्रवेश करना होता है। वहीँ गंगा जी के पानी को मुख्य धरा से मोड़कर एक नहर का रूप दिया गया है। इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था की गयी है की पानी आनंदमयी द्वार के प्रवेश पूल के नीचे आकर जमा होता है। इस कारण वहां पानी का जमाव हो जाता है, जिसमें छोटी-बड़ी मछलियों का झुण्ड जमा हो जाता है। मेरी बहन ने बताया की स्थानीय लोग इन मछलियों को चीनी मिला आटा खिलाते हैं। हाँ, बता देना जरूरी है की यहाँ मछलियों का शिकार नहीं किया जाता। खैर, मुझे जानकारी देने के साथ ही मेरी बहन घर से तैयार कर के लाई हुई आटे की लोई मुझे दे देती है। मैं उस लोई के छोटे-छोटे टुकड़े कर पानी में फेंकने लगता हूँ। कुछ देर बाद आटे की मीठी गोली पाने के लिए मछलियाँ पानी में कूदने लगीं। सच, इस दृश्य को मैं पूरी उम्र नहीं भुला सकता।
अब आगे बढ़ते हैं। दक्ष मंदिर की तरफ। अपनी आदत से मजबूर मैं बहन के साथ मंदिर तो गया पर मुझे ज्यादा सुकून गंगा जी के पानी में पैर डुबो के बैठने में मिला। दीदी कुछ नाराज भी हुई, मगर मुझे आदत सी हो गयी है। शाम के समय मंदिर के पिछले हिस्से से दिखने वाली पहाड़ों को देखकर मन को सुकून मिल रहा था। तभी बच्चों ने भूख लगने की बात कही और हमें घर वापस लौटना पड़ा। सुबह के समय मंदिर का नजारा देखने की ख्वाहिश में मैं अगले दिन सुबह पांच बजे ही घर से निकल पड़ा। पैदल घूमते हुए सुबह के समय हवा की शुद्धता को महसूस करना तो मैं भूल ही गया था। दरअसल, डेल्ही में समय का अभाव और गाड़ियों के धुएं ने माहौल ही कुछ ऐसा बना रखा है।.............. हरिद्वार से जुडी आगे की बातें अगले अध्याय में लिखूंगा। अब कुछ सामाजिक बात...

सपा को पहचान दिलाने वाले अमर सिंह ने सपा के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। उम्र के इस पड़ाव में आखिर मुलायम सिंह में ऐसी क्या कठोरता आ गयी है की लोग उनसे अलग होते जा रहे हैं। यह बात मैं आपसे पूछ नहीं रहा हूँ, मुलायम को सलाह दे रहा हूँ। इस धरतीपुत्र को ऐसा क्या हुआ की इनकी रासायनिक और भौतिक खाद कहे जाने वाले इनके मित्र इनसे दूर होते जा रहे हैं। मीडिया में यह भी खबर आयी की अमर ने अपनी कोई झ्ट्कामार तकनीक क इस्तेमाल किया है, पार्टी को अपनी हैसियत का परिचय देने के लिए। मगर शाम तलक आभास हो गया की अबकी मामला कुछ संगीन है.... आगे न जाने क्या होगा....
अरे हाँ, एक बात तो मैं बताना ही भूल गया। बोर्डर पर हमारे सैनिकों के लिए अभी तक जैकेट नहीं खरीदे गये हैं शायद, मई या जून तक ले लिया जाएगा। फिलहाल, उन्हें अपने कपड़ों से काम चलाना होगा। अरे हमारे नेताओं को सालभर जैकेट खरीदने की फुर्सत ही नहीं मिल पायी थी। मीडिया भी बेमतलब उन्हें निशाने पर लिए रहती है। नेता जी, आप सभी से अनुरोध है कि आप पत्रकारों पर ध्यान मत दीजिये। गर्मी आते ही लोग भूल जायेंगे कि हमारे सैनिकों को ठण्ड के मौसम में जैकेट कि जरूरत थी...

Tuesday, January 5, 2010

दिन दोपहर में गुम हो जाना ठीक नहीं
पथरीले पथ पर पांव बढ़ाना ठीक नहीं
फूँक-फूँककर कदम बढ़ाओ नया शहर है
हर किसी से हाथ मिलाना ठीक नहीं
अपने दिल को थाम के रखो ऐ 'नीरज'
हर पनघट पर प्यास बुझाना ठीक नहीं
किसी की हस्ती देख मत किस्मत को रो
छोटी चादर में पांव फैलाना ठीक नहीं
चल दिए जब नये सफ़र, पर तब क्या डर
मंजिल से पहले सुस्ता जाना ठीक नहीं
तुम्हें मिलेंगे हर रोज नये हमदर्द और दोस्त
पर हर पत्थर को शिवलिंग बतलाना ठीक नहीं

Monday, January 4, 2010

ठण्ड में चाय बना चश्मा


वाह री ठण्ड। आजकल ठिठुरने में ज्यादा समय लग जाता है, बनिस्पत सोने में। ठण्ड का कहर बढ़ता जा रहा है। लोगों को और अपने अखबार के साथियों को बोलते सुना और लिखते देखा की त्राहिमाम-त्राहिमाम। भैया मेरे एक बात बताओ, जाड़े में ठण्ड न होगी तो क्या मई में होगी। खैर, अपनी-अपनी सोच। आपको बताना चाहूँगा की मैं हाल के दिनों में हरिद्वार गया था। सच बताऊँ तो एक उर्जा का एहसास हो रहा है। कई दिनों से ऑफिस से घर और घर से ऑफिस जा-जाकर मन उचट गया था। इस बीच कई चीजें देखीं। मंदिर देखे, साफ़-सुथरी गंगा देखी (पहली बार)। मैं ऋषिकेश भी गया। पर्वत से छनकर आते सूरज की रौशनी को पलकों में बाँध लेने का जी कर रहा था। माफ़ कीजिये मैं यादे सहेज सका दृश्य नहीं। इन नजारों के बीच एक चीज और देखी चाय की दुकान। सच समाज में फैले और बने अमीरी और गरीबी की खाई को समझने और समझाने का सबसे आसान उदाहरण है यह जगह। सोच में पड़ गये क्या? जी, हाँ। चाय की दूकान बैठे हुए मैं एक हिंदी का चुरमुराया हुआ अखबार पढने लगता। यह सिलसिला करीब एक हफ्ते तक चलता रहा। एक रोज मेरी नजर एक बूढ़े आदमी पर पड़ी। इत्तेफाक की बात है कि उसी समय एक मध्यम दर्जे कि कार भी आकर रुकी। चार में से तीन युवक बाहर आये। उन्होंने कहा कि सनसनाती हवा में चौराहे पर चाय पीने का अपना ही मजा है। वे चाय पीने लगे। उधर, वह बुढ़ा गरीब भी चाय मांगने लगा। मैं अखबार से बाहर निकल कर, उन चारों में खो गया। ध्यान दिया तो देखा। उन लड़कों और उस बूढ़े में सिर्फ इतना अंतर था कि वह बुढ़ा खुद को चाय से गरम कर रहा था और वे तीनों मस्ती करने आये थे। सच, प्याली वही, चाय वही। मगर, इतना बड़ा अंतर.......... निशब्द होना बेहतर है। हाँ, वह बुढ़ा कुछ देर पहले आया था, लेकिन उसे चाय तीनों के बाद मिली थी। अब आप भी खिन जाइएगा तो देखियेगा। आपकी मस्ती किसी कि जिन्दगी भी हो सकती है।

अंत में कुछ कमेन्ट मिले, सभी को धन्यवाद। सुझाव और शिकायत मिले तो प्यास बनी रहती है.....

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...