Sunday, September 19, 2010

ऐसा मुझको साथी दो

सौर उर्जा सा ताजा हो
जिसकी बडी अभिलाषा हो
मिठी-मिठी भाषा हो
ऐसा मुझको साथी दो।
दुख में जो गाता जाए
हर पल जो भाता जाए
साथ सदा जाता जाए
ऐसा मुझको साथी दो।
प्रेम का जिसको होवे ज्ञान
मेरे सपनों को जो दे मान
मेरे अपनों का जो दे ध्‍यान
ऐसा मुझको साथी दो।
सांसों में जिसके हो गर्मी
चरित्र की हो धर्मी-कर्मी
पर बातों में होवे नर्मी
ऐसा मुझको साथी दो।
प्रेम का जो सम्‍मान करे
प्रेम खुशी से दान करे
साथ देने का मान करे
ऐसा मुझको साथी दो।
ढुंढ रहा जाने कब से
मैं मांग रहा जिसको हक से
पाउंगा उसको तप से
ऐसा मुझको साथी दो।

1 comment:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर रचना...

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