Thursday, December 30, 2010

मुझको वह बचपन दे दो

सम्‍मुख तम की लाली
मार्ग मेरा खाली
मेरी मृत्‍यु होने वाली है
मुझको वह बचपन दे दो।
मनचाहा तर्पण दे दो
आत्‍म दिखे दर्पण दे दो
बाल्‍यकाल अर्पण कर दो
मुझको वह बचपन दे दो।
न मुझको तुम आयु दो
शक्ति न स्‍नायु दो
मनचाही बस वायु दो
मुझको वह बचपन दे दो।
हे राम! कहूं किलकारी से
लडखडाती वाणी से
पर मृत्‍यु दो मुझे बारी से
मुझको वह बचपन दे दो।
दो मां के आंचल की छांव
प्रथम पर मुख दूजे पर पांव
पिता की गोद जो लागे नांव
मुझको वह बचपन दे दो।
मन मेरा तब शुद्व था
क्षोभ, लोभ न क्रुद्व था
निर्बल-दुर्बल पर बुद्व था
मुझको वह बचपन दे दो।

Friday, December 24, 2010

सहर

ख्‍वाबों में तुम, लबों पर रूबाई है

हर नज्‍म लिखने से पहले तुम्‍हें सुनाई है

वक्‍त की मजार पर पूछ रहा हूं खुद से

ऐ खुदा तुझे मुझसे क्‍या रूसवाई है

चलो फिर आम की बागों में गुम हो जाएं

सडकों पर तो लूट और जगहंसाई है

उसने प्‍यार-मोहब्‍बत सब दिया टुकडों में

मैं खुद में शहर हूं, फिर भी तन्‍हाई है।

__________________________

-------------------------------------

Monday, December 6, 2010

खामोश साज हो तुम

बदलते वक्‍त की आवाज हो तुम
जो खामोशी में गूंजे वो साज हो तुम
किस बवंडर में जा उलझे हो यार
सच बताओ क्‍यों आज उदास हो तुम
कभी तुमने भरोसा न किया हम पर
फिर भी मेरे लिए लाजवाब हो तुम
कि सुबह की तलाश में जागा हूं रातभर
कि गुनगुनी शबनम सा एहसास हो तुम।
_______________________
---------------------------------

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...