Wednesday, December 19, 2007


प्रभात हो चली है
भवरों
ने कमलों को त्यागा
राका दूजे ध्रुव को भागा
अँधेरे ने प्राण को त्यागा
प्रभात हो चली है।
चंचलता से चल रहा समीर
स्पर्श से मन हो रहा अधीर
आलस ने त्यागा शरीर
प्रभात हो चली है।
सन्यासी चले गंगातीर
नमाज़ पढ़ रहे सूफी पीर
निद्रा बहा रही है नीर
प्रभात हो चली है।
तारकदल हो गए विलीन
आज की सोच बनी नवीन
कल कि बातें हैं प्राचीन
प्रभात हो चली है।
मन उमंग से भर गया
आशीष से आत्म तर गया
पद कर्मछेत्र को चल गया
प्रभात हो चली है।

Monday, December 17, 2007

प्रभात हो चली है



भवरों ने कमलों को त्यागा
राका दूजे ध्रुव को भागा
अँधेरे ने प्राण को त्यागा
प्रभात हो चली है

... आज के लिए बस इतना ही, पूरी कविता पढ़नी हो तो कभी फुरसत से बैठेंगे
आपका अजीज
नीरज

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...