Tuesday, October 11, 2016

काश! इजहार कर देते...




नीरज तिवारी


वो हमसे चांद और सितारों की बात करते हैं
हम हकीकत में हैं उलझे, वो नजारों की बात करते हैं
वो खुद हथियार उठाते हैं.... हूंह...कुछ जम नहीं रहा। आज कुछ लिख क्‍यों नहीं पा रहा हूं। किसी भी शब्‍द का कोई तालमेल क्‍यों नहीं मिल रहा। सोचा था कि आज ही अपनी कोई नज्‍म लिख दूंगा लेकिन कुछ खालीपन सा महसूस हो रहा है। सब ठीक तो है ही। फिर ये शब्‍दों का सन्‍नाटा कैसा।कागज पर चंद लाइनें लिखने के बाद विजय कुछ बेचैन सा हो गया। वह अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। कमरे में यूं ही इधर-उधर चहलकदमी करने लगा। रह-रहकर उसके मन में तमाम खयाल आते। वो समझ ही नहीं पा रहा था कि आज उसके मन में किस खालीपन ने शब्‍दों की चोरी कर ली है।
इसबीच साप्‍ताहिक पत्रिका में नई नज्‍म भेजने का वादा भी करीब आ रहा था।
इधर विजय की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उधर, नंदा को भी कोई भी कुछ नहीं सूझ रहा था। नंदा एक सरकारी स्‍कूल में टीचर है। कभी उसे भी गाने लिखने और गुनगुनाने का शौक था। मगर आज वह सिर्फ अखबार और पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं की पाठक थी। वह हमेशा ही इस बात को लेकरएक कोफ्त में रहती थी कि जो वो करना चाहती थी उसे उसने नहीं किया। आज भी वह कुछ ऐसी ही उधेड़-बुन में लगी हुई थी। मन में शोर बढ़ता जा रहा था। वह बीते दिनों में खो रही थी। उसे भी कुछ न सूझा तो अपनी बालकनी में जा खड़ी हुई। उसके यहां काम करने वाली शबनम ने देखा किमालकिन बालकनी में टहल रही हैं तो वह झट से उनकी पसंद की ब्‍लैक टी ले आई। एक आहट के साथ ही शबनम ने नंदा से कहा, ‘मैडम जी, चाय लाई हूं।‘ नंदा भी शायद से यादों की खुमारी में खो चुकी थी। तभी तो शबनम को दो बार ‘मैडम जी, मैडम जी’ कहना पड़ा था। ऐसा लगा जैसे नंदा नींद सेजागी हो। उसने शबनम को थैंक्‍स कहकर चाय अपने हाथ में ले ली। दरअसल, शबनम जानती थी कि नंदा जब भी किसी सोच में घिर जाती थी तो उसे कुछ देर के बाद चाय की तलब लग जाया करती थी। मगर आज नंदा का मन कुछ ज्‍यादा ही भटक रहा था। उसने शबनम को घर जाने के लिए कहदिया। बोली, ‘तुम जाओ। मैं आज बाहर से ही कुछ मंगा लूंगी खाने के लिए।‘
शबनम के लिए ये एक नई चीज थी क्‍योंकि अमूमन नंदा जब भी परेशान होती थी तो शबनम को अपने ही पास रोक लिया करती थी। उससे रहा न गया तो पूछ बैठी, ‘क्‍या आज भी बाबूजी की याद आ रही है।‘ नंदा एकदम से कौंध गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके दुखती रग को जोर से दबा दिया है।वह सोच में पड़ गई। दरअसल, दो रोज पहले ही एक पुरानी पत्रिका में उसने विजय की लिखी एक गजल पढ़ी थी। उस गजल को पढ़कर नंदा पुरानी बातें सोचने लगी थी लेकिन स्‍कूल में बच्‍चों की परीक्षा की कॉपियां जांचने के चक्‍कर में उसे कुछ देर के बाद ही अपनी बीते कल को भूलकर आज मेंआना पड़ा था। लेकिन, रविवार का दिन उसका अपना दिन होता था। ऐसे में वह बीते पलों की परछाईं से आंख-मिचौली खेल रही थी। यादों के झूले में झूल रही थी। मगर शबनम ने जब विजय का ना लिया तो वह आज के उदास माहौल की हकीकत को जान गई। उसने हमेशा की तरह शबनम को टालदिया। लेकिन, अपने मन को संभाल न सकी। वह कॉलेज की उन यादों में खो गई। वह बालकनी में लगे सीसॉ पर बैठकर गुम सी हो गई। हाथ में रखी चाय की प्‍याली बिना खाली हुए ही ठंडी हो गई।
विजय और नंदा एक ही कॉलेज में बीए के स्‍टूडेंट थे। दोनों के विचार एक जैसे थे। दोनों को किस्‍से, कहानी, गाना, कविताओं और गजलों की दुनिया रास आती थी। उनकी पहली मुलाकात भी लाइब्ररी में हुई थी। एक ही किताब को, एक ही समय पर उन दोनों पढ़ने की भी ठानी थी। उस समय विजय नेनंदा से दोस्‍ती करने के लिए किताब छोड़ दी। मगर नंदा उससे प्‍यार कर बैठी। पसंद तो विजय भी करता था उसे मगर दोनों में से किसी ने भी पहला कदम उठाने की कोशिश नहीं की। ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा। दोनों के मन में ख्‍वाबों का महल बनता रहा। फिर भी किसी ने कुछ नहींकहा। बीए का पहला साल खत्‍म हो गया। छुट्टियों में दोनों को दूरियों का अहसास हुआ। दोनों ने ही भांप लिया कि अब उनका रिश्‍ता काफी अहम मोड़ पर आ चुका है। लेकिन, न तो इस बीच विजय ने नंदा को फोन किया और न ही नंदा ने विजय को। हालांकि, दोनों एक-दूसरे की दी हुई किताब कोपढ़ना नहीं भूले। बीए सेकेंड इयर के पहले दिन का भी दोनों ने बेसब्री से इंतजार किया। दोनों ने नई क्‍लास के पहले दिन एक-दूसरे के पसंदीदा रंगों वाले कपड़े भी पहने। लेकिन, उस दिन भी दोनों में से किसी ने अपनी दिल की बात को साझा नहीं किया। उस दिन भी दुआ-सलाम के बाद नई गजलों औरकिताबों पर चर्चा हुई और मन की बात मन में ही दबी रह गई। पहले दिन की ही तरह दूसरे साल का आखिरी दिन भी आ गया। रिश्‍ता यूं ही चलता रहा। छुट्टियों में बेचैनी बढ़ती ही गई। लेकिन, इस बार दोनों ने एक-दूसरे को फोन किया। अपनी रचनाओं के साथ ही दूसरों की लिखे गीतों और कविताओंके बोल सुनाए। इस बीच कभी अकेले तो कभी मिलकर गीत गुनगुनाए। चूंकि, दोनों ही अलग-अलग शहरों में रहते थे। ज्‍यादा आना-जाना भी नहीं करते थे। इसलिए कभी मिलने की योजना बनी ही नहीं। लेकिन, दोनों में मिलने की तड़प बनी रही। दोनों ही न जाने किस बात का इंतजार कर रहे थे।दोनों ही पहल करने से डर रहे थे। इस पहल न करने की कश्‍मकश में बीए थर्ड इयर का समय आ गया। ऐसा लगा जैसे एक साल पुराना पल फिर से लौट आया हो। फिर भी कोई बात नहीं हुई। बस, जो नया हुआ वो ये कि विजय ने नंदा को एक गुलाब देकर कुछ कहने की कोशिश की। तभी नंदा कीसहेलियों ने दोनों को घेर लिया और उनकी नज्‍में सुनने की जिद करने लगीं। दोनों ने अपनी नई रचनाएं सुनाकर एक-दूसरे के सामने अपने मन की तो कह दी लेकिन न तो किसी ने इजहार किया और न ही किसी ने इकरार।
इस साल दोनों की करीबी बढ़ी। मगर इकरार किसी ने नहीं किया। दोनों ही जानते थे कि इसके बाद उनके मुलाकात की गुंजाइश कम जाएगी क्‍योंकि विजय के पिताजी रिटायर होने वाले थे। उनकी यही जिद थी कि विजय अब उनके साथ रहे। घर को देखते हुए अपने करियर की बुनियाद मजबूत करे।उधर, नंदा के घरवाले भी यही चाहते थे कि नंदा जल्‍द से जल्‍द अपने घर की जिम्‍मेदारियों को समझते हुए किसी नौकरी को तलाशे क्‍योंकि नंदा के पिता की मौत कई सालों पहले एक एक्‍सीडेंट में हो चुकी थी। उसकी मां आरती अब बुढ़ी हो चली थीं। अब उनका बुटीक का काम भले ही ठीक चल रहाथा लेकिन उनकी यही चाह थी कि अब नंदा अपने पांव पर खड़ी हो जाए ताकि उसकी शादी के लिए दहेज की व्‍यवस्‍था न करनी पड़े। नंदा और विजय दोनों ही अपने परिवार की जरूरत और मजबूरी को समझते थे। काश, दोनों अपने मन की बात को भी किसी से कह पाते। खैर जो हो ही न सका होउसके लिए दोनों को खलन तो होनी ही थी।
बीए थर्ड इयर करने के दौरान विजय ने कुछ पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। उसकी नज्‍मों को पाठक भी मिलने लगे। वह अपने पाठकों के प्‍यार भी प्रतिक्रियाओं में खोने लगा। वह धीरे-धीरे नंदा से भी दूर होने लगा। नंदा को थर्ड इयर के दौरान विजय की कमी महसूस होती रही। लेकिन, वहविजय की जिंदगी में दखल दिए बिना ही दूर होती रही। वह उसकी नई रचना को तलाश-तलशकर पढ़ती। जब भी कोई उसके सामने विजय की तारीफ करता तो कान लगाकर हर बात सुनती रही। हालांकि, नंदा पर उसकी मां का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। साल खत्‍म होने को था और घर लौटने कासमय भी आ रहा था। उधर, विजय अपनी शब्‍दों की दुनिया में खोता जा रहा था। जब थर्ड इयर का आखिरी समय आया तो दोनों ने भरे मन से एक-दूसरे से विदाई ली। नंदा कुछ कहने की ख्‍वाहिश में विजय से कॉलेज की कैंटीन के बाहर चलने के लिए कहती है। मगर विजय से दूर होने वाले उसकेकॉलेज के साथी पाठकों ने नई नज्‍में सुनने की जिद करने लगे। विजय ने भी वही गलती की जो उसे नहीं करनी थी। उसने नंदा को बाद में बात कहने की वादा करते हुए नज्‍में पढ़ने लगा। नंदा से विजय का ये रवैया न देखा गया। वह नाराज होकर अपने कमरे पर लौट आई। विजय की यादों को वहींछोड़ वह कब बस स्‍टेशन पहुंची और कब ट्रेन में सवार होकर अपने घर पहुंच गई, कुछ खबर ही नहीं लगी।
नंदा के यूं चले जाने के बाद विजय को उसकी कमी खली। फिर भी उसने अगले रोज नंदा के घर का नंबर डायल कर दिया। वह नंदा से बात करना चाहता था लेकिन उसने अपनी मां से कहलवा दिया कि वह घर पर नहीं है। सहेलियों के साथ कहीं बाहर गई है। कुछ दिनों तक विजय की कोशिश जारी रहीलेकिन नंदा भी अपनी जिद पर अड़ी रही। वह यही सोचती कि बीते तीन सालों में विजय ने उससे प्‍यार का इजहार नहीं किया। लड़का होने के नाते उसे ही पहल करनी चाहिए थी लेकिन कोई पहल नहीं की। ऐसे में अब फोन पर दोस्‍ती निभाने का सिलसिला अब खत्‍म कर देना चाहिए। नंदा की यहसोच कब विजय से उसकी दूरी बनती गई वह समझ नहीं सकी। उधर, नंदा का फोन पर आने से इंकार कर देना विजय के अहम पर वार कर गया। वह भी नंदा से नाराज हो गया। उसने सोचा कि अपनी हर नई नज्‍म में वह उसे ही अपने दिल की बात सुनाया करता था। फिर भी नंदा न कभी भी उससेप्‍यार का इजहार नहीं किया। वह अपने मन की बात को कबसे नंदा से कह चुका था। लेकिन, नंदा ही तो हमेशा अंजान बनी रही। इसी के साथ तीन साल से अधूरे प्‍यार के इस सफर में हिचकोले आने लगे। दोनों ही एक-दूसरे के दिल से कोसों दूर जाने लगे।
समय गुजरता रहा। कारवां चलता रहा। विजय अब एक नामी शायर की तर्ज पर जाना जाने लगा। नंदा ने भी अच्‍छी पढ़ाई कर टीचर की नौकरी पा ली। लेकिन, दोनों ने एक-दूसरे को हासिल की हुई मंजिल की कभी बधाई नहीं दी। दोनों ही एक-दूजे को बीता पल मानने लगे। फिर भी दोनों ने शादी नहींकी। विजय अपने शब्‍दों के सफर में हर रोज नई बुलंदी छूने लगा और नंदा स्‍कूल के बच्‍चों के बीच अपना सारा गम भुलाकर रम गई। लेकिन, वह नज्‍मों को पढ़ने के लिए समय निकाल लिया करती थी। उसने उस पहली किताब को भी खरीदा था जिसकी जिल्‍द पर शायर का नाम विजय लिखा हुआथा। ये अलग बात है कि प्रस्‍तावना में शायर की तस्‍वीर को देखते ही उसने गुस्‍से से किताब को एक किनारे रख दिया था। कब वह किताब सिरहाने से हटकर आलमारी में रखी तमाम किताबों के बीच समा गई, नंदा को पता ही नहीं चला। विजय के मन में भी नंदा का खालीपन तो बना रहा लेकिनउसने भी दूरी को मिटाने के लिए नंदा से मिलने की कोशिश नहीं की। ऐसा लगता था कि दोनों ही एक-दूसरे की पहल का आज भी इंतजार कर रहे थे। वर्ना शादी न करने का फैसला दोनों ने क्‍यों न लिया।
दोनों के बीच कुछ नया नहीं हुआ। बस तारीखें बदलती रहीं। इधर नंदा की मां और उधर विजय के पिता ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। विजय के पिता के मरहूम होने की खबर तो नंदा को अखबारों से मिल गई लेकिन विजय को नंदा पर आई आफत के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। ऐसा समयभी आया जब दोनों एक-दूसरे को महीने दो महीने पर याद करने लगे। विजय की रचनाओं में उसे नंदा का जिक्र भी कम हो गया। उसके एकांकी जीवन का उदासपन उसकी गजलों में दिखने लगा। कहानियों में भी सन्‍नाटा सा छा गया। पाठकों ने विजय को और हाथोंहाथ लिया। सभी से दर्द का मसीहाकहते। सभी उसकी रचनाओं के इंतजार में रहने लगे। हालांक, नंदा अब विजय के दिली पाठकों में नहीं रह गई थी। उसे विजय के बारे में किसी से सुनना भी अच्‍छा नहीं लगता था। उसने ने उस रोज भी टीवी बंद कर दिया था जब विजय को एक न्‍यूज चैनल पर ‘बदलते साम्‍प्रदायिक माहौल मेंसाहित्‍य के योगदान’ विषय पर चर्चा के लिए बुलाया गया था। अब तो दोनों ही नहीं जानते थे कि उनके जीवन का रुखापन उनका ही पैदा किया हुआ था। ये अलग बात थी कि जब उन्‍हें कुछ समय मिलता खुद के बारे में सोचने के लिए तो वे दोनों एक-दूसरे के बारे में सोचते जरूर थे।
लैंडलाइन पर फोन का दौर गुजर चुका था। इंटरनेट की दुनिया में भी ऑरकुट बिछड़ चुका था। फेसबुक और व्‍हाट्सएप्‍प का दौर आ चुका था। दोनों की जिंदगी में जवानी का दौर जा चुका था। लेकिन, स्‍मार्टफोन रखना तो दोनों की मजबूरी थी। दोनों ही बदलते वक्‍त में भले ही अपने मन पर जमींअहम की पर्त को साफ न कर पाए हों लेकिन दुनिया से मिलकर चलने का दस्‍तूर तो उन्‍हें निभाना ही था। विजय की लिखी रचनाएं भी यूट्यूब और व्‍हाट्सएप्‍प पर शेयर की जाती थीं। गाहे-बगाहे नंदा भी ऐसे मैसेज या यूट्यूब के लिंक को टच कर लिया करती। लेकिन, आज भी दोनों ने एक-दूसरे कोफेसबुक पर फ्रेंड रिक्‍वेस्‍ट नहीं भेजी। अहम की दीवार अब इस कदर बरकरार रही। दोनों ही इस बात से अंजान रहे कि उनमें से किसी ने शादी की या नहीं। नंदा ने तो कभी जानने की कोशिश ही नहीं की और विजय ने इसे जरूरी नहीं समझा। हालांकि, नंदा कुछ लोगों के मुंह से यह सुन चुकी थी, ‘शायदही कोई शायर ऐसा होगा जो वफा में यकीन रखता होगा क्‍योंकि ये न तो रिश्‍तों को कोई तवज्‍जो देते हैं और न ही अपनी शब्‍दों की दुनिया से बाहर आने की कोशिश करते हैं।‘ यूं भी नंदा को अब विजय से कोई रिश्‍ता रखने की इच्‍छा नहीं थी। उधर, विजय भी नंदा को याद कर बस एक-दो नज्‍में बनालेता था क्‍योंकि अब तो उसकी रचनाओं में सिर्फ दर्द ही झलका करता था। पाठक उसी के आदी हो चुके थे। पाठक और श्रोता अब विजय से अब मोहब्‍बत की रूबाइयां पढ़ने और सुनने की ख्‍वाहिश ही नहीं रखते थे।
नंदा अब सिर्फ एक आदर्श टीचर और विजय सिर्फ दर्द भरी नज्‍मों के लिए जाने जाते थे। लेकिन, दोनों के जीवन का सूनापन हर कोई नहीं जानता था। जब भी उनसे कोई शादी के बारे में पूछता तो वे हस के टाल देते। कहते, ‘कोई काबिल मिला हीं नहीं।‘ ये अलग बात है कि वे कभी इस बात का वाजिबजवाब भी नहीं तलाश पाए कि आखिर उन्‍होंने शादी क्‍यों नहीं की।
धीरे-धीरे जिद के आगे जवानी दम तोड़ चुकी थी। दोनों ही बूढ़े हो चले थे। ऐसे में वह दौर भी आया जब उन्‍हें उनकी जिंदगी का अकेलापन बोझ सा लगने लगा। दोनों ही सामान से भरे घर में सन्‍नाटा का शोर सुनने लगे। दोनों ही एक-दूसरे की कमी को महसूस करने लगे। बुढ़ापा अपने साथ एक अंजाना सा डर भी लाता है असहाय होने का। इसीलिए लोग परिवार और बच्‍चों की ख्‍वाहिश करते हैं। बुढ़ापे में अकेलापन एक बीमारी का रूप ले लेता है। उन दोनों को भी परिवार की कमी खलने लगी थी। हो भी क्‍यों न, विजय को अब मंच पर गाने का अवसर कम मिलने लगा था क्‍योंकि आधुनिकताकी दौड़ में लोग शब्‍दों से दूरी से बढ़ाने लगे थे। इधर नंदा भी रिटायर होने की कगार पर थी। उसे अब अपने घर से डर लगता था कि रिटायरमेंट के बाद उसका समय कैसेट कटेगा। परिवार न बनाने की यह गलती उन दोनों पर उम्र के अंत पड़ाव पर भारी पड़ रहा था। दोनों ही एक-दूसरे को याद करकेअपने आज में लौट आते। मगर बीते पलों में खोने और आज में लौटने का यह सिलसिला कब आज में कम और बीते पलों में ज्‍यादा बीतने लगा, दोनों समझ ही नहीं पाए।
शबनम ने भी इस बात को भांप लिया था। वह जान चुकी थी कि विजय बाबू को नंदा मैडम आज भी भुला नहीं पाई हैं। इस तरह की शाम जब नंदा बालकनी में टहलने लगती थी शबनम के लिए पहले महीनों में कुछ घंटे फिर सप्‍ताह में और अब आए दिन देखने की बात हो चली थी। तभी शबनम नेनंदा से बिना झिझक के पूछ लिया था, ‘बाबूजी की याद आ रही है क्‍या।‘ भले ही नंदा ने उसे टाल दिया हो लेकिन इस सच को दोनों ही अच्‍छी तरह जानती थीं। विजय भी इस सच को जानता तो था पर मानने को तैयार नहीं था। वह आज भी नंदा से पहल की उम्‍मीद लगाए हुए था। शायद, नंदाभी....लेकिन इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता था कि शायद दोनों एक-दूसरे को परिवार वाला समझते थे।
शबनम जा चुकी थी। चाय की प्‍याली अब भी भरी थी। बीते दिनों में नंदा गुम थी और विजय भी सिगरेट का पैकेट खाली कर नज्‍में लिखने की तमाम कोशिशों में मात खा चुका था। दोनों ही सच को स्‍वीकार नहीं कर रहे थे। दोनों ही रह-रहकर कभी खुद से तो कभी एक-दूसरे से पूछना चाह रहे थे, ‘आखिर उन्‍होंने इजहार क्‍यों नहीं किया? काश उन्‍होंने ही अपनी ओर से पहल करते हुए पहले इजहार कर दिया होता।’
खैर, यादों का गुबार छंट रहा था और विजय अपनी डेस्‍क पर नज्‍म लिखने के लिए लौट आया...लोग चांद-सितारों की बात करते हैंहम तन्‍हा रहने वालों से जज्‍बातों की बात करते हैं
ये और है कि हमें किसी का साथ नहीं मिला
फिर भी हम जुगनू से रात रोशन करने की बात करते हैं
हूंह....बात अब भी नहीं बन रही। कुछ देर के बाद लिखने बैठुंगा। ये सोचकर विजय फिर घर से बाहर निकल आया। कुछ नई लाइनें सोचकर एक फिर कमरे में लौट आया। नज्‍म पूरी हुई और दिन का अंत हो गया। इस तरह बीते कई बरसों में गुजरे दिनों की तरह एक और दिन गुजर गया।

Wednesday, August 10, 2016

...तो दोस्‍तों से मुफ्त में गपशप कराता रहेगा एफबी

प्रभात खबर के सुरभि परिशिष्‍ट में 7 जुलाई, 2016 को प्रकाशित।
नीरज तिवारी 

फ्रेंडशिप डे पर जाहिर है सभी एक-दूसरे को विश करने के लिए मैसेज करेंगे। सोशल मीडिया के सभी प्‍लेटफॉर्म्‍स को अपडेट करेंगे। इस बीच सबसे ज्‍यादा फेसबुक हिट होगा। हो भी क्‍यों न, आखिर आज के समय में दूर रहने वाले दो अपनों को फेसबुक ही जो मिलाता है। मगर एफबी पर होने वाली दोस्‍तों से गपशप के बीच अक्‍सर ऐसा सुनने को मिलता है कि जल्‍द ही एफबी अपने हर यूजर्स से रुपये चार्ज करेगा। आए दिन अफवाहों से लबरेज ऐसे मैसेज भी पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। ऐसे में ‘प्रभात खबर’ के इस अंक में हम आपको बताएंगे कि एफबी कभी अपने यूजर्स से कोई रुपया चार्ज नहीं करेगा क्‍योंकि उसकी कमाई का जरिया अपनों से मिलाना ही नहीं बल्‍कि विज्ञापन व उससे संबंधित अन्‍य काम हैं। आइये, इस बारे में तफ्शील से समझने की कोशिश करते हैं...


1.     विज्ञापन
एफबी की कमाई का मुख्‍य स्रोत विज्ञापन है। इस सोशल मीडिया के माध्‍यम से बड़ी संख्‍या में नामी कंपनियां भी अपना प्रचार कर मुनाफा बटोर रही हैं। यह अपने यूजर्स के लाइक किए गए ब्रांड को ध्‍यान में रखकर उनकी पसंदीदा कंपनी के नए प्रोडक्‍ट्स आदि के बारे में उनके होम पेज के दायीं ओर विज्ञापन प्रसारित करता रहता है। यह यूजर्स की एक्‍टिविटी के मुताबिक भी उनकी होम पेज पर विज्ञापन दिखाता है। इसके एवज में वह उक्‍त कंपनियों से चार्ज वसूल करता है और यूजर बिना कुछ खर्च किए नए-नए उत्‍पादों से अपडेट होता रहता है। यहां यह जानना जरूरी है कि एफबी पर गूगल की तरह ‘क्‍लिक एंड हिट’ के फॉर्मूला पर कमाई नहीं किया जाता। यानी आपके वही विज्ञापन दिखाया जाता है, जिसमें आपकी दिलचस्‍पी हो। यानी यदि किसी को घूमना पसंद है तो उसके होम पेज पर ट्रेवल कंपनियों के विज्ञापन दिखाये जाते हैं। बता दें कि फोर्ड, एचएसबीसी, सैमसंग, ग्रुपॉन व अमेरिकन एक्‍सप्रेस सहित कई नामी कंपनियां एफबी को भारी रकम देकर अपना प्रचार करवा रही हैं।

वहीं, एफबी पर विज्ञापन का दूसरा तरीका ‘सेल्‍फ सर्विंग ऐड्स’ है। यानी यूजर अपना विज्ञापन स्‍वयं बनाकर उसे एफबी की मदद से प्रचारित करता है। यूजर्स का एक बड़ा तबका इस तरह से एफबी की कमाई का स्रोत बना हुआ है। हालांकि, इस तरह से प्रचार करवाने वालों में छोटे व्‍यापारियों की संख्‍या ज्‍यादा है।  

2.     मोबाइल विज्ञापन
एफबी की ओर से हाल में जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, वह अपनी कमाई का एक तिहाई हिस्‍सा मोबाइल विज्ञापन से करता है। हाल ही में एफबी ने एप्‍पल की तरह खुद का एप्‍प सेंटर भी लांच किया है, जिसकी मदद से कोई भी अपने मोबाइल में मनचाहा एप्‍प डाउनलोड कर सकता है। इसके बदले में एप्‍प को बनाने वाले एफबी को फीस देते हैं। इस एप्‍प सेंटर में लोगों को एडमॉब और आईएड की मदद से विज्ञापन देने के लिए निमंत्रण भी दिया जाता है।
3.     विज्ञापन के अलावा कमाई के अन्‍य मार्ग
एफबी इन दिनों गेम्‍स, गिफ्ट शॉप, फेसबुक क्रेडिट्स और कुछ फीचर एप्‍लीकेशन के जरिये भी कमाई कर रहा है। इनके बारे में भी विस्‍तार से समझने की कोशिश करते हैं...
क.  फेसबुक गेम्‍स
एफबी पर इन दिनों फार्मविले, माफिया वार्स, सिटी विले, एम्‍पायर व अलाइस जैसे कई गेम्‍स यूजर्स के सिर चढ़कर ख्‍याति बटोर रहा है। खास बात यह है कि एफबी पर इन गेम्‍स को खेलने के लिए करोड़ों लोग शुल्‍क भी मुहैया कराते हैं। यह सभी खेल ‘जिंगा’ नाम के एक डेवलपर ने बनाए हैं। एफबी इस कंपनी से 30 फीसदी बतौर फीस वसूल करता है।

ख.  फेसबुक गिफ्ट शॉप
ऑनलाइन मार्केटिंग की तर्ज पर एफबी पर भी गिफ्ट्स आदि का कारोबार किया जाता है। इसके लिए एफबी ने बाकायदा थर्ड पार्टी से समझौता तक कर रखा है। इसमें दोस्‍त एक-दूजे को गिफ्ट्स भिजवाते हैं। इसके लिए एफबी ने कई तरह के उत्‍पाद बनाने वाली कंपनियों आदि से समझौता कर रखा है। इसके तहत एफबी अपने यूजर्स के ऑर्डर मसलन खिलौने, जन्‍मदिन व अन्‍य अवसरों पर बांटे जाने वाले कार्ड आदि का कारोबार करता है। यानी फ्रेंडशिप डे के अवसर पर जब आप अपने दोस्‍तों के लिए अपने एफबी अकाउंट के जरिए गिफ्ट ऑर्डर कर रहे होंगे तो उधर एफबी की कमाई बढ़ती जाएगी। यहां यह जानना जरूरी है कि एफबी पर ऑर्डर बुक होने के बाद उसे आपके दोस्‍त तक पहुंचाने का जिम्‍मा इसी सोशल मीडिया कंपनी का होता है।

ग.   फेसबुक क्रेडिट्स
एफबी के कमाई के स्रोतों में फेसबुक क्रेडिट्स का अहम योगदान होता है। यह एफबी पर गिफ्ट्स खरीदने या गेम्‍स खेलने के लिए यूजर्स को आसानी से भुगतान कर कमाई करने का माध्‍यम है। यानी एफबी जब आपको क्रेडिट के माध्‍यम से कुछ भुगतान करता है तो उसके बदले में वह आपसे कमाई करता है।

...तो अब आप सभी इस बात को तो बेहतरी से जान चुके हैं कि एफबी कभी भी आपसे आपके दोस्‍तों को मिलवाने के एवज में रुपये नहीं वसूलेगा क्‍योंकि उसने अपनी कमाई का स्रोत विज्ञापन आदि को बना रखा है। अब देर न कीजिए इस दिलचस्‍प सोशल नेटवर्किंग मीडिया का इस्‍तेमाल कर अपने दोस्‍तों को मजेदार वीडियोज, स्‍टेटस व फोटोग्राफ्स में टैग कर ‘हैप्‍पी फ्रेंडशिप डे’ की शुभकामनाएं दीजिए।
-------------------------------------------------------------------------------------
कुछ जानकारी एफबी के बारे में...
यह तो सभी जानते हैं कि एफबी वर्तमान में लोगों को सोशल मीडिया का चस्‍का लगाकर बड़ी तेजी से तरक्‍की करने वाला कारोबार है। कुछ समय पहले एक अफवाह ने जोर पकड़ा था कि एफबी एक पेड मेम्‍बरशिप साइट है। मगर एफबी की ओर से एक आधिकारिक बयान जारी करके इस अफवाह को सिरे से खारिज किया गया था। आज भी एफबी पर मुफ्त में अपनों से चैटिंग कर लोग दूरियों को भुलाकर अपना दर्द व खुशी को साझा करते हैं। वर्ष 2004 में मार्क जुकरबर्ग ने इस सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट की शुरुआत की थी। आज की तारीख में इसके एक अरब से भी ज्‍यादा यूजर्स हैं। साथ ही, दुनियाभर में लोगों के मनोरंजन करने का सबसे पसंदीदा सोशल मीडिया बना हुआ है। वहीं, इसका लोग व्‍यक्‍तिगत और प्रोफेशनल दोनों तरीके से इस्‍तेमाल कर चौबीसों घंटे रिश्‍ते बनाने और कमाई करने में व्‍यस्‍त रहते हैं।
एफबी को लोगों में बढ़ती दिलचस्‍पी को देखते हुए 70 से अधिक भाषाओं में उपलब्‍ध कराया जाता है। यानी यह किसी वर्ग विशेष के लिए ही नहीं बल्‍कि कई भाषायी समुदायों के लिए बनाया गया है। यही कारण है कि इसके यूजर्स की संख्‍या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। आज की तारीख में एफबी पर आपके नाम का पेज होना एक आवश्‍यकता सी बन गई है। इसमें कंपनी की ओर से अपने हर यूजर की जानकारियों को पूरी सुरक्षा के साथ डाटाबेस में अपडेट किया जाता है। इस अभेद सुरक्षा को देखकर ही लोग अपने विचारों, वीडियोज और तस्‍वीरों को लोगों के बीच साझा कर अपना संदेश सब तक पहुंचाते हैं। एफबी पर लोगों की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए कई ऑनलाइन बिजनेस करने वालों ने एफबी पर अपनी सक्रियता को बढ़ाकर विज्ञापन आदि के जरिये कमाई बढ़ा रहे हैं। वहीं, कमोबेश सभी वेबपोर्टल्‍स ने अपनी साइट पर यूजर्स का ट्रैफिक बढ़ाने के लिए एफबी की सदस्‍यता ले रखी है।
------------------------------------------------------------------------------------------
आंकड़ों में समझें एफबी का मुनाफा
1.     एफबी ने अप्रैल-जून तिमाही के जो नतीजे घोषित किए हैं, उसमें बताया गया है कि कंपनी को पिछले वर्ष के मुकाबले 186 प्रतिशत ज्‍यादा मुनाफा हुआ है।
2.     कंपनी ने एफबी, व्‍हाट्सएप्‍प, मैसेंजर और इंस्‍टाग्राम के दुनियाभार के 471 करोड़ यूजर्स के जरिये एक लाख करोड़ रुपये से ज्‍यादा का कारोबार किया है।
3.     तिमाही मुनाफा 100 करोड़ से 200 करोड़ डॉलर तक पहुंचाने के मामले में फेसबुक ने गूगल को पछाड़ दिया है। यह आंकड़ा पार करने में कंपनी को सिर्फ छह माह ही लगे जबकि गूगल को साढ़े तीन साल लगे हैं।
4.     बेहतर मुनाफा कमाने से एफबी का शेयर 7 फीसदी उछला है। अब कंपनी का मार्केट कैप 24 लाख 79 हजार करोड़ रुपये के पार हो गया है। ऐसे में एफबी अमेरिका की लिस्‍टेड कंपनियों में मार्केट कैप के हिसाब से चौथी बड़ी कंपनी में शुमार हो चुकी है।
5.     एफबी के मुताबिक, एफबी पर रोज 100 करोड़ पोस्‍ट डाली जाती है। इस पर रोज 800 करोड़ वीडियोज देखे जाते हैं और यूजर्स प्रतिदिन 10 करोड़ घंटे के वीडियो देखते हैं।


-------------------------------------------------------------------------------------

चंद दोस्‍तों की दोस्‍ती की बुनियाद से हुई थी फेसबुक की शुरुआत

कोई नहीं जानता था कि मार्क जुकरबर्ग की एक छोटी सी कोशिश आज विश्‍व का सबसे पसंदीदा सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का रूप धारण कर लेगा। एफबी की शुरुआत मार्क ने तब की थी जब वे हार्वर्ड में कंप्‍यूटर साइंस के छात्र थे। उनकी की खोज में उनके साथ पढ़ाई कर रहे एडुवर्डो सैवरिन, डस्‍टिन मोस्‍कोविट्ज और क्रिस हग्‍स ने भी साथ रहे थे। यानी आज की तारीख में दोस्‍तों को मिलाने का सबसे बड़ा प्‍लेटफार्म बनने के पीछे भी चंद दोस्‍तों की महत्‍वाकांक्षी सोच रही है। हालांकि, जब इसकी शुरुआत हुई थी तब इसका नाम फेसमैन रखा गया था। उस समय मार्क द्वितीय वर्ष के छात्र थे जब इसकी नींव रखी गई थी। हालांकि, उस समय के फेसमैन में तब कॉलेज कैम्‍पस के छात्रों की दो तस्‍वीरों को जोड़कर एक ऑनलाइन गेम खेला जाता था। जिसमें, अन्‍य छात्र यह टैग देते थे कि दोस्‍तों की यह जोड़ी ‘हॉट’ है या ‘नॉट’ है। देखते ही देखते यह ख्‍याति बटोरने लगा। मगर इसी बीच उनकी इस मुहिम को तब करारा झटका लग गया जब उनपर कॉलेज के डाटाबेस को हैक कर छात्र-छात्राओं की तस्‍वीरों को चुराकर फेसमैन पर प्रसारित करने का आरोप लगने लगा। यह आरोप लगते ही फेसमैन को 28 अक्‍टूबर 2003 को लांच करने के कुछ दिनों के बाद ही बंद करना पड़ गया था। हालांकि, इस बीच फेसबुक की नींव पड़ चुकी थी। बस, अब उसे दोबारा लांच करने के लिए जुकरबर्ग हर तरह की जुगत में मशगूल हो गए। वहीं, डाटा चुराने के गंभीर आरोप लगने के बाद जुकरबर्ग को कॉलेज से निष्‍काशन भी झेलना पड़ा। मगर कुछ दिनों के बाद ये सारे आरोप बेबुनियाद साबित हुए और जुकरबर्ग हर इल्‍जाम से बरी हो गये।
इसी के साथ 4 फरवरी 2004 को जुकरबर्ग ने ‘दफेसबुक’ के नाम से लांच कर दिया। सभी दोस्‍तों के बीच एक बार फिर खुशी की लहर दौड़ पड़ी। मगर बदकिस्‍मती ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। नई वेबसाइट की लांचिंग के मात्र छ: दिनों के बाद ही जुकरबर्ग पर हार्वर्ड में पढ़ाई कर रहे उनके तीन वरिष्‍ठ छात्रों कैमरॉन विंकलोव्‍स, टायलर विंकलोव्‍स और दिव्‍य नरेंद्र ने उनके आइडिया को चुराकर यह वेबसाइट लांच करने का आरोप जड़ दिया। आरोप में कहा गया था कि जुकबर्ग ने अपने दोस्‍तों के साथ मिलकर उनके ‘हार्वर्ड कनेक्‍शन’ नाम के वेबपोर्टल की कॉपी तैयार की है। हालांकि, काफी जद्दोजहद के बाद कोर्ट के बाहर इस पूरे मामले का निपटारा किया गया। इसमें तय किया गया कि कॉलेज का कोई भी छात्र दफेसबुक का सदस्‍य नहीं बनेगा। इसके बाद जुकरबर्ग ने अपने दोस्‍त एडुवर्डो सैवरिन को इसके लिए पूंजी एकत्र करने, डस्‍टिन मोस्‍कोविट्ज को बतौर प्रोग्रामर, एंड्रू मैक्‍कुलम पर ग्राफिक आर्टिस्‍ट का जिम्‍मा डालकर इसे व्‍याप्‍क रूप देने में व्‍यस्‍त हो गए। धीरे-धीरे यह वेबसाइट अपने क्षेत्र के हर कॉलेज व युनिवर्सिटीज में विख्‍यात हो गई।
साल 2004 में ही सीन पार्कर नाम के एक शख्‍स ने इस साइट को फाइनेंस किया। वह कंपनी का प्रसीडेंट बन गया। कंपनी का नाम बदलकर ‘फेसबुक’ कर दिया गया। इसकी ख्‍याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2005 में इस कंपनी का डोमेन नेम फेसबुक डॉट कॉम खरीदने के लिए दो लाख डॉलर का भुगतान करना पड़ा था। मुनाफा कमाने के बाद जुकरबर्ग ने सभी प्रकार के भुगतान कर कंपनी का सीईओ का पद हासिल कर लिया।
आज आलम यह है कि यूजर एफबी की सेवा या एप्‍प पर जो भी वीडियो या विज्ञापन देखता है, इससे कंपनी की कमाई होती है। कंपनी ने एफबी, व्‍हाट्सएप्‍प, मैसेंजर व इंस्‍टाग्राम के हर यूजर से 256 रुपये यानी 471 करोड़ यूजर्स से तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये कमाकर कई रिकॉड्र्स ध्‍वस्‍त कर दिए हैं।


Monday, March 7, 2016

‪#‎wakeupindia

आज काफी कुछ सीखने को मिला। दरअसल, तबीयत कुछ नासाज थी। इसीलिये सुबह भी देर से हुई। शिवरात्रि का दिन हो और शिवालय न जाऊं, ऐसा मैंने बचपन से नहीं होने दिया। शिव मंदिर में महाशिवरात्रि के दिन जाना, बहुत ही आनंद देता है। खास बात यह भी थी कि चूंकि लखनऊ में मेरा जहां घर पड़ता है, वह शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र का मजा देता है। मगर इस बार मन मसोस कर रह गया।
दरअसल, कस्बे में रहने की खूबी ही यही है कि आपको हर तरह का परिवेश देखने, समझने और जीने को मिल जाता है। महाशिवरात्रि के दिन बचपन से ही मैं अपने दोस्तों के साथ पास के बाग और छोटी झाडि़यों वाले जंगलों में जाकर धतूर, बेर, बेलपत्र और बेल तोड़ा करता था। मेरा पूरा परिवार और सच कहूं तो बाग-बगिया से लौटते समय राह में टकराने वाले कमोबेश हर शख्स को मैं पूजा के लिए कुछ सामग्री दे दिया करता था। मगर हर साल पेड़ों की संख्या कुछ कम होती गई। दोस्त भी कमाने के चक्कर में शहर छोड़ते गए। ऐसे में पिछले वर्ष तक मैं बाग से पूजन सामग्री लेकर आता रहा। मगर आज जब जागा तो पता चला कि अब तो उधर की ओर कोई पेड़ बचा ही नहीं है। घर में कुदरत से मिलने वाली पूजन सामग्री को बाजार से खरीदकर लाया गया था। मैंने पूजा करने का मन त्याग दिया। न जाने क्यों मगर कुछ चुभ गया। तब समझ में आया कि हम जो बस्तियों को यूं ही बढ़ाते जा रहे हैं, उसके साथ ही हम क्या गंवाते जा रहे हैं।
सीखने का क्रम अभी जारी ही रहा। शाम के समय मैं मन हल्का करने के लिए खेतों की ओर चल पड़ा। देखा कुछ पेड़ काटे जा रहे थे। पता चला कि वहां पर कोई सज्जन अपना बसेरा बनाने वाले हैं। मन नहीं हुआ टहलने का तो घर लौट आया। जब न्यूक सुनने के लिए प्राइम टाइम शुरू होने का इंतजार खत्म हुआ तो पता चला कि एनडीटीवी बीते कुछ दिनों से ऑन एयर नहीं है। उधर, जी टीवी पर सुधीर जी अपने मातहत सुभाष चंद्रा के साथ मिलकर खबरों का डीएनए पेश कर रहे थे। इसमें जो सीखना था वह सीखा।
खैर, बात से सुभाष जी ने सही कही कि देशवासियों को अब चुप नहीं रहना चाहिए। मसलन, जहां कहीं भी खेत और बगिया को उजाड़ कर नियम के विपरीत कागज बनवाकर बस्ती बसाई जा रही हो, उसके खिलाफ बोलें। देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता के मसले पर हकीकत को समझें और अपने विचारों को उड़ान दें। फिर विचारों को शब्दों में उकेरें या बुलंद जुबान दें। जमीनी स्तर पर ‪#‎wakeupindia‬ तभी हो पाएगा। मगर एक सच बताने की बड़ी इच्छां हो रही है, वह यह कि #wakeupindia तभी सफल हो सकेगा जब देश भ्रष्टााचार से मुक्त हो सकेगा। सरकारी नौकरी सिर्फ विज्ञापनों में दिखने के बजाय बेरोजगारों को सच में मिलने लगे तो समझ लीजिएगा कि सरकार ने भी कह दिया है #wakeupindia।
वैसे एनडीटीवी बंद क्यों हुआ, इस पर कोई जानकारी हो तो शेयर करें।

Friday, March 4, 2016

ईपीएफ पर सरकार की बेवकूफियत

एनडीए सरकार की कोशिश आम आदमी के ईपीएफ से खिलवाड़ है. फोटो गूगल से उधार है.
मेरा मानना है कि ऐसा कोई भी रुपया जिसका आप उपभोग नहीं कर पाते हैं तो उस धन का आपके लिये होना या न होना एक समान है। इसीलिये मैं मरने के बाद इंश्योरेंस कंपनी की ओर से परिवार को जारी किये जाने वाले फंड को दिली तौर पर तो अच्छा फैसला मानता हूं मगर दिमागी तौर पर नहीं, क्योंकि उस रकम को जमा करने वाला तो बिना किसी उपभोग के ही चल बसा। खैर, यह मेरी व्यक्तिगत सोच हो सकती है। वहीं, मेरे लिये अब उपभोग से तड़पकर रह जाने वाले रकमों की इस सूची में ईपीएफ की रकम को जोड़ देना बेहतर होगा, गवर्नमेंट ने कुछ ऐसा प्लान किया है, जिससे कि कर्मचारी जीवन के अंतिम दिनों को सुदृढ़ बनाने के लिये जिस ईपीएफ पर निर्भर रहता है उसकी निकासी को भी टैक्स के घेरे में ला खड़ा किया है। सरकार की ओर से असमंजसता को जाहिर करते हुये दलीलें तो दी जा रही हैं मगर ईपीएफ पर टैक्स का पहरा हटाने की बात अब तक नहीं की गई है।

केंद्र सरकार के दूसरे आम बजट में यूं तो किसानों को वरीयता देते हुये अच्छा क्रांतिकारी कदम उठाया गया है। मगर ईपीएफ की निकासी पर टैक्स का पहरा लगा देना कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। पूरी जिंदगी जिस फंड को एक कर्मचारी हर महीने की तंगी से जूझते हुये इकट्ठा करता है, उसे लेने के समय भी 60 फीसदी हिस्‍से पर टैक्‍स की सख्ती लागू करना सरकार की ज्यादती ही है। 60 साल तक कतरा-कतरा जीने के बाद रुपया निकालने के समय कानूनी शिकंजा कसना, मेरी समझ से परे है। इस संबंध में सरकार की ओर से जल्‍द ही सकारात्‍मक कदम उठाते हुये ईपीएफ की निकासी पर टैक्स का दायरा खत्म कर देना चाहिये। हो सकता है कि सरकार का गणित मुझे समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन, बुढ़ापे के समय भी अपना जमाधन पाने से बचने के लिये टैक्स देना, मैं और मेरे जैसे साधारण कर्मचारी यकीनन नहीं समझना चाहेंगे।


हर महीने कर्मचारी यह सोचते हैं कि भले ही सैलरी से वह रकम जो ईपीएफ के लिये काटी जा रही है, वह ज्यादा है मगर कुछ तो बचत हो रही है। वह स्वयं को हमेशा यही दलील देता है कि एक समय के बाद शरीर कमजोर हो जाएगा तो वही रकम हमें राहत देगी। वह पूरा जीवन उस रकम को सपने का धन समझकर भुलाये रहता है। मगर सरकार ने ईपीएफ को भी आयकर के दायरे में लाकर आम आदमी के उस भरोसे के साथ खिलवाड़ किया है। इस संबंध में उचित फैसला किया जाना चाहिये। आम आदमी को इस बारे में सरकार इस बारे में अपना पूरा स्पष्टीकरण दे तो बेहतर होगा। रही बात पंद्रह हजार रुपये की आमदनी वालों को राहत देने की तो सरकार को यह समझना चाहिये कि मिनिमम वेज पर महंगाई इतनी ज्यादा हावी है कि वह हर महीने जिंदगी में ख्वाहिशों की न्यूनता को मुंह चिढ़ाती सी प्रतीत होती है। ऐसे में उन्हें राहत देने से बेहतर है कि सरकार कुछ ऐसा प्रावधान करे कि जनता को लाचारगी का अहसास न हो, उसके बाद मजे से टैक्स लेते रहो। यदि का जनता की जेब भरने में सरकार कामयाब होती है तो जनता भी खुले दिल से आयकर का जिम्मा निभाने को तैयार है।

Friday, February 26, 2016

डराते हैं 'राष्ट्रप्रेमी'

ये देश जितना तुम्‍हारा है उतना मेरा भी है हुजूर
न जाने कब तुझसे छिन जाए ये सत्‍ता का गुरूर।

अस्तित्व को बचाने की जुगत करते जेएनयूवाइट्स    फोटो क्रेडिट: गूगल इमेज
इसमें कोई शक नहीं है कि केंद्र में सत्‍ता परिवर्तन होने के बाद विश्‍वस्‍तर पर हमारे देश का नाम रोशन हुआ है। मगर अपने देश में अचानक ही ‘राष्‍ट्रद्रोहियों’ की संख्‍या बड़ी तेजी से बढ़ गई है। बयानों की मानें तो यह संख्‍या दिन-प्रतिदिन बहुत ही चिंताजनक रफ्तार में बढ़ती ही जा रही है। आलम यह है कि हर गली में भगवाधारी देशभक्‍त होने का प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं। चारों ओर हिंदुत्‍व को छोड़ अन्‍य विचारधारा को मानने वालों को संकीर्णता की नजर से देखने वालों की पौबारह हो रही है। कोई किसी को भी बड़ी आसानी से देश का दुश्‍मन करार दे रहा है। चौराहे पर खुद को यदि भाजपा का समर्थित न जताओ तो भगवाप्रेमी उसे हिकारत की नजर से देख रहे हैं। एक स्‍वतंत्र विचार को पोषित करना आज जान का खतरा बन चुका है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग बिना किसी जमीनी तहकीकात किये आंख बंदकर फरमान की तर्ज पर खबरें प्रसारित करने में जुटा हुआ है। जो पूर्णत: एकपक्षीय सी प्रतीत हो रही हैं। देश की सम्‍प्रभूता और अखंडता के लिये इन कृत्‍यों को आज जितना जायज बनाया जा रहा है। बरसों पुरानी तर्कों के आधार पर इसे जितना आवश्‍यक करार दिया जा रहा है। वह स्‍वयं में देशद्रोह है।

नफरत का यह बीज लोगों की मानसिकता को दूषित कर रहा है। हर तबके को कई खंडों में बांट रहा है। जरूरत है कि इस मसले पर राजनीति के फेर में पड़ने के बजाय उसकी सच्‍चाई को समझने के लिये विश्‍लेषण किया जाए। आवश्‍यकता यह नहीं है कि जो हो रहा है उसे बिना कोई प्रश्‍न पूछे स्‍वीकार कर लिया जाए। सम्‍पन्‍न और सुखी समाज की कामना के लिये यह बहुत आवश्‍यक है कि हर तथ्‍य को गहराई से समझने के बाद स्‍वीकारा या नकारा जाए। यह तो तय है कि बिहार में विधानसभा चुनाव के दौरान देश की छवि को धूमिल करते हुये सहिष्‍णुता का मुद्दा उठाया गया। देश में डर का माहौल जताया गया। भले ही आम लोगों के जीवन में इसका कोई व्‍यापक प्रभाव न पड़ा हो, मगर उन्‍हें माहौल में डर दिखाया गया। देश की छवि को धूमिल करने का कारण भी सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक था। उस समय केंद्र सरकार को मौका नहीं मिल रहा था और अब कम्‍युनिस्‍टों को अवसर की दरकार है। विषय भी देशप्रेम का है। हम भावुक भारतीयों के लिये यह ऐसा वाद है जिसके लिये हम हर कुतर्क को भी स्‍वीकार करने को तैयार हैं। किसी को नहीं मालूम की जेएनयू में आयोजित की गई दो दिनों की संगोष्ठियों में वामपंथी विचारधारा को मानने वाले छात्रसंघ अध्‍यक्ष कन्‍हैया कुमार ने क्‍या कहा, मगर उन्‍हें यह जरूर मालूम है कि वह राष्‍ट्रद्रोही है। हमारे देश के संविधान की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उसके विशाल हृदय में हर वर्ग के लिये न्‍यायोचित स्‍थान सुनिश्चित किया गया है। मगर उस संविधान के आधार पर समाज और देश का निर्माण या संचालन कराने वाले तंत्र ने सबकुछ खोखला कर रखा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कन्‍हैया को जांच में दोषी पाए जाने पर सख्‍त से सख्‍त सजा मिलनी चाहिये। साथ ही, इस मसले पर आरोप सिद्ध होने पर ऐसा दंड का प्रावधान किया जाना चाहिये जो एक नजीर साबित हो सके। मगर बिना जांच किये सिर्फ शोरगुल और शक के आधार पर दोषी बना देना, निंदनीय है। भारत के लोकतांत्रिक संविधान में इस बिनाह पर किसी को भी सजायाफ्ता बनाना, सबसे बड़ा अपराध होगा। हकीकत तो यह है कि राष्‍ट्रप्रेम के लिये जरूरी नहीं है कि आप किसी खास विचारधारा या धर्म को अपनाएं। जरूरी तो यह है कि आप बिना किसी धर्म को अपनाए ही अपने देश के प्रति प्रेम और सम्‍मान साबित करते हैं।

अब जेएनयू का मसला मात्र चंद छात्रों के कथित देशविरोधी नारों तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि अब यह दो विचारधारा की लड़ाई में तब्‍दील हो चुकी है। उत्‍तरी और दक्षिणी छोर जिस तरह कभी नहीं मिल सकते या जिस तरह गगन और जमीन एक दूसरे का पर्याय नहीं बन सकते ठीक उसी तर्ज पर दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारधारा का आपस में कभी मिलन या समझौता नहीं हो सकता है। एक धर्म के आधार पर अपने सिद्धांतों की विवेचना करता है तो दूसरा धर्म को अफीम करार देता है। इन हालातों में देश की जनता को अब पूरे मामले में अपना नजरिया खुद बनाने के लिये संकल्पित होना चाहिये। यह राष्‍ट्रद्रोह है या राजनीति, इसका फैसला भी जनता अपने विवेक से ले तो बेहतर है। हालांकि, इस वैचारिक और शारीरिक संग्राम में या तो देश में वामपंथ का अंत हो जाएगा या फिर इसके लिये एक नया ‘सूर्योदय’ आएगा। उधर, राममंदिर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का जबसे ‘पहरा’ लग गया है तबसे भाजपा और आरएसएस के लिये राजनीति करने के लिये मुद्दों का अभाव हो गया था। ऐसे में दोनों ही विपरीत विचारधारा को मानने वाले दलों के लिये जेएनयू का मसला एक निर्णायक मौका है। अत: जनता को सिर्फ राजनेताओं की दलीलों पर ही नहीं अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेना होगा। इस बीच गलियों में, चौराहों पर या नुक्‍कड़ों में राष्‍ट्रभक्‍त होने का प्रमाणपत्र जारी करने वालों पर कानून का शिकंजा कसना बहुत जरूरी है। यदि समय रहते ऐसा न किया गया तो वह दिन भी दूर नहीं जब हर ओर से यही आवाज आने लगेगी ‘डराते हैं राष्‍ट्रप्रेमी’।
जय हिंद।।।।।




Monday, February 15, 2016

मैं खुद को वक्त का गुलाम समझता हूं

फोटो गूगल से 'उधार' है।
मैं खुद को वक्त का गुलाम समझता हूं इसीलिये हर ‘खास’ को ‘आम’ समझता हूं। 
कि नहीं जरूरत मुझे तेरे मयखाने की रईस मैं पानी की हर बूंद को जाम समझता हूं।
क्यूं फिक्र करूं किसी बादशा के सुखन की मजलूम-ओ-मजदूर को महान समझता हूं।
मुझे किसी रंगीन दुनिया की ख्वाहिश नहीं आसमां को आजादी का फरमां समझता हूं।
कद्र करो हर पल कि फना होने से पहले मैं राह के पत्थर को ही इनाम समझता हूं।
चलो बादल, तितली, जुगनू की बात करें सिक्कों को नफरत का पैगाम समझता हूं।

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...