Friday, May 28, 2010

डायरी में अनायास ही लिख दिया

यूं ही सोचा
घर चलूं
फिर सोचा किधर चलूं
मेरा घर तो छूट गया है
राह ने मुझे छत दिया है
सागर ने दे दी गहराई
जमीन से बिस्‍तर ले लिया है
आवारा हूं, बंजारा हूं पर वक्‍त का मारा नहीं
थका जरूर हूं मगर मैं अभी हारा नहीं
कोई तो मंजिल मुझे चूम लेगी
यही बस ख्‍वाहिश है
ए खुदा बस इतनी सी फरमाइश है
सोचा था घर चलूं
फिर याद आया किधर चलूं..................

Tuesday, May 11, 2010

वे तो मेरे आंसू हैं

जो सागर से भी भारी है
झरने जैसा जो जारी है
दुनिया जिससे हारी है
वे तो मेरे आंसू हैं।
वह बहा है जब मैं ठगा गया
सब कुछ जब मैं गंवा गया
जब पैरों के नीचे हवा गया
वे तो मेरे आंसू हैं।
धारा जिनमें भाव बहे
दुख-दर्दों का नाव दहे
पत्‍थर जिनको नहीं सहे
वे तो मेरे आंसू हैं।
जलन हो जिनमें ज्‍वाला सी
आकर्षण हो बाला सी
बने जहर जो हाला सी
वे तो मेरे आंसू हैं।
कोयले से जले हुए
मोम के जैसे गले हुए
मेरे भीतर जो पले हुए
वे तो मेरे आंसू हैं।
अब तू तो खुद से शर्मिंदा है
चहुंमुखी तेरी ही निन्‍दा है
पर रोकर मन मेरा जिंदा है
वे तो मेरे आंसू हैं।

Monday, May 10, 2010

दोस्‍त ने गद्दार कहा

बातों-बातों में उसने गद्दार कहा
हमने फिर भी उसे यार कहा
पलभर में वो सब भूल गया
हमने इसे उसका प्‍यार कहा
पर दिल में चूभ गई टीस सी
उसने हमें शक का शिकार कहा
किससे गिला करें, सफाई किसे दें
उसने हमें दिमाग से बीमार कहा

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Monday, May 3, 2010

हम दोस्‍तों का सिगरेट संकल्‍प


यकीन मानिए युवाओं को सिगरेट पीना बहुत पसंद हैं। बात उनकी हो रही है जो सिगरेट पीते हैं या पीने की चाह रखते हैं। मगर यह तो सिगरेट पीने वाला ही बता सकता है कि वह इससे कितना संतुष्‍ट है। इससे दिल को सूकुन मिले या न मिले मगर चंद रुपयों की उधारी जरूर मिल जाती है। ऐसे में मैं किसी और की नहीं अपने दोस्‍तों की और अपनी कहानी को आपके सामने रखना चाहता हूं। हम हर माह के अंत में सिगरेट छोड़ने का संकल्‍प लेते हैं। मगर महीने की शुरुआत यानी जब जेब गर्म हो जाया करती है तो उसे तिलांजलि देने की कोशिश भी नहीं करते। फिलहाल मैं सिगरेट छोड़ने के विचार में हूं। देखते हैं मैं सफल हो पाता हूं या नहीं। मगर सिगरेट को लेकर मैं आपसे कुछ घटनाएं बताना चाहता हूं। उम्‍मीद करता हूं आपको अपने बीते दिन याद आ जाएं।

रूम में हम चार लोग रहते हैं। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। सभी सिगरेट के महारथी हैं। पल भर में सिगरेट की डिब्‍बी को खाली करने की सभी कलाओं के हम ज्ञाता हैं। दिन की शुरुआत आंख खोलने पर ही मानते हैं। भले सूर्यदेव कितनी ही देर से मुखड़ा दिखा रहे हों। उससे हमें कोई लेना-देना नहीं होता। बस आंख खुली और हमने सुबह होने की घोषणा कर दी। भले शाम के छह बज रहे हों। खैर, अब सुबह के नित्‍य कर्मों से निपटना तो है ही। इसके लिए सिगरेट चाहिए। यदि हमारे पास अपनी सिगरेट है तो ठीक नहीं तो शुरू होती है खरीद-फरोख्त। साथ वाले से कहा सिगरेट है। उसने तपाक से कहना है नहीं है या है भी तो एक ही है। खुद के लिए रखी है। जरूरत है तो ले लो मगर चार वापस करनी होगी। लो बेमतलब में सुबह-सुबह ही बिक गए। फिर खाना खाने के बाद एक सिगरेट चाहिए। उससे पहले तो चाहिए ही चाहिए। फिर उस समय से लेकर ऑफिस आने तक सिगरेट पीना एक बूरी लत सी बन चुकी है। ऑफिस में कुर्सी छोड़कर और बाहर भागकर सिगरेट पीना ही है। जैसे लगता है कि उसी के लिए जी रहे हैं। लगातार पी रहे हैं। फिर रात में खाना खाने के पहले और बाद में सिगरेट की तलब बेचैन कर देती है। उसे भी शांत करना ही है, करते भी हैं। देखते-देखते महीने का अंत हो जाता है और पनवाड़ी और दूसरे दुकानदार हमारा इंतजार करने लगते हैं। फिर हम अपनी खुशी से उनकी मुराद पूरी करते हुए जेब ढीली कर देते हैं। उस समय हम पान वाले से भी कहते हैं कि हम जल्‍द ही सिगरेट छोड़ देंगे। रूम पर लौटने के बाद आपस में भी कहते हैं कि सिगरेट छोड़ देना चाहिए। सभी हामी भरते हैं और एक सिगरेट सुलगा लेते हैं। फिर अगले दिन से पुरानी दिनचर्या को अपना लेते हैं। मगर अब मैं आप सभी से कहता हूं कि सिगरेट पीना और पिलाना दोनों ही बुरी आदतें हैं। कभी सोचिए उन रुपयों से आप हर महीने कुछ और कर सकते हैं जो आपके पास नजर तो आएगा। इसलिए आप सभी अनुरोध है कि इस आदत को अपनाइए मत और यदि अपना चुके हैं तो छोड़ दीजिए। मैंने तो इसे त्‍यागने का संकल्‍प ले लिया है।

बेबस कदम और मंजिल

बेबस कदमों से मंजिल को चला हूं मैं
मन है सोने का पर लोहे में ढला हूं मैं
कहीं उजाला करता होगा मेरा भी इंतजार
उस उजाले के लिए सालों जला हूं मैं
मिट गई तन्‍हाई मेरी खो गया याराना
खुदा जाने किस रिश्‍ते से छला हूं मैं
सूखी नजरों को अब दरिए ही दुहाई चाहिए
आपकी ही तरह मां की गोद में पला हूं मैं

Saturday, May 1, 2010

गरीबी करती मीठे रिश्‍ते

आजकल एक शौक अपना लिया है। देर रात चाय पीने की तलब से बेचैन हो उठता हूं। ऐसे में रूम के कीचन में भोर के तीन या चार बजे के करीब कुछ बनाना शोभा नहीं देता। फिर तलब भी शांत करनी होती है। इसलिए घर के कुछ दूर पर लगने वाले एक चाय और पराठा के ठेले पर एक प्‍याली चाय की अर्जी दे आता हूं। वहां, ऐसे तो कुछ खास नहीं मिलता मगर रुपये के लिहाज से जो स्‍वाद मिल जाता है वह अपने आप में ही काफी मजेदार होता है।
आइए अब उस ठेले पर हिमालय सरीखे व्‍यवसाय के बारे में कुछ जानकारी देता हूं। उसे ठेले को एक दंपति मिलकर चलाते हैं। पति के मुताबिक, वह उत्‍तर प्रदेश के हरदोई जिले का रहने वाला है, जबकि उसकी शादी कानपुर में हुई है। इससे इतर एक बात बताना चाहूंगा कि उनके हाथों में कोई यादगार स्‍वाद नहीं है। मगर उन दोनों की सूझबूझ और हंसी मजाक कर चाय पराठा बनाने और खिलाने के तरीके ने मुझे मुरीद सा कर दिया है। उन दोनों को देर रात कब किस समय कौन सा ग्राहक कहां से छूटकर आ रहा है। वह क्‍या खाएगा, क्‍या नहीं खाएगा और चाय पीएगा की नहीं या फिर सिगरेट में दिलचस्‍पी है या नहीं तक का पूरा ब्‍यौरा याद रखते हैं।
चलिए यह बात भी साधारण हुई कि उन्‍हें तो पैसा कमाना है तो याद रखना ही होगा। मगर एक चीज जो मैं कभी नहीं भूलूंगा वह है उन दोनों का गरीबी में भी हंसी मजाक कर लेने का हसीन तरीका। सच गरीबी में इंसान अपने परिवार को जितना समय दे देता है उतना रईस नहीं। वहीं, घर के पास एक नाईन टू नाईन नाम का बेहतरीन रेस्‍टोरेंट भी है। उसे भी दो बेटे और मां-बाप वाला एक परिवार चलाता है। मगर वे हंसते हुए किसी का स्‍वागत नहीं करते। वे हमेशा एक-दूसरे को हिसाब देने में ही व्‍यस्‍त रहते हैं। ऐसे में उनके बीच प्‍यार कहीं से भी नहीं झलकता। भगवान करे आम आदमी ही बना रहूं। मगर रईसियत के साथ। शेष फिर कभी.......

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...