Monday, June 19, 2017

एक गुमनाम ईमानदार...


कुछ खास होकर भी वो आम रहा
ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा।

उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की 
वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा।

कहने को तो उसके दोस्‍त बहुत थे 
फिर भी मरते दम तक गुमनाम रहा।

कंपकंपाती हंसी और नम आंखें लिये 
ताउम्र अकेली शाम का वो जाम रहा। 

कहते हैं शब्‍दों का फनकार था वो 
तब भी जीवन भर वो बेजुबान रहा।

पूछो तो उसके अजीज बस कहते हैं 
नजाने हुनरमंद हो क्‍यूं अंजान रहा। 

कुछ खास होकर भी वो आम रहा
ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। 
.............
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।

Saturday, June 10, 2017

भारत के राष्‍ट्रपतियों का विवादों से रहा है गहरा नाता

राजेंद्र प्रसाद


मूलत: बिहार के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्‍ट्रपति थे. 26 जनवरी 1950 से लेकर 12 मई 1962 तक राष्‍ट्रपति की जिम्‍मेदारी संभाली थी. वे अकेले ऐसे राष्‍ट्रपति रहे हैं जिन्‍होंने दो बार यह पदभार संभाला है.
भारत के पहले राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच हिंदू कोड बिल को लेकर विवाद गर्मा गया था. हालांकि, इस बीच दोनों के बीच मर्यादित रूप से ही विवाद नजर आया था. दरअसल, इस विवाद की शुरुआत हुई थी 15 सितंबर, 1951 को. उस दिन इस बिल को संसद के पटल में रखा गया था. मगर उसी दिन राजेंद्रजी ने प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था, 'मेरा यह अधिकार है कि जब भी संसद में कोई बिल पास हो तो मैं उसका परीक्षण करूं. मगर ऐसा करने के बाद यदि मैंने संसद में पारित बिल पर सवाल उठाया तो उससे सरकार पर सवाल उठेगा. ऐसे में मेरे उठाए गए कदम से सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी.' राजेंद्रजी की इस चिट्ठी को नेहरू ने गंभीरता से लिया. उन्‍होंने भी इसका त्‍वरित जवाब भेज दिया, जिसमें कहा गया था, 'यकीनन राष्‍ट्रपति को यह अधिकार है कि संसद में पारित किए गए किसी भी बिल पर अपना विचार व्‍यक्‍त करें मगर उन्‍हें फैसला लेते समय सरकार के हित का भी ध्‍यान रखना चाहिये.' इसके जवाब में राजेंद्रजी ने लिखा था, 'वह अपने अधिकारों का इस्‍तेमाल करने से हिचक नहीं रहे हैं.' कई दिनों तक चले इस पत्राचार युद्ध के साथ ही केंद्र सरकार और राष्‍ट्रपति के अधिकार को लेकर बहस का माहौल बन गया था. यह पहला मौका था जब बिल को लेकर राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री आमने-सामने आ गए थे.


सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन

सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन देश के दूसरे राष्‍ट्रपति रह चुके हैं. 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक राष्‍ट्रपति का पदभर संभालने वाले राधाकृष्‍णनजी को एक महान विचारक व लेखक के रूप में याद किया जाता है. वे दक्षिण भारत से ताल्‍लुक रखने वाले पहले राष्‍ट्रपति हैं.
बतौर उप-राष्‍ट्रपति रहते हुए राधाकृष्‍णनजी का कार्यकाल विवाद रहित रहा है. मगर राष्‍ट्रपति बनने के बाद उनका पंचवर्षीय कार्यकाल काफी चुनौती वाला साबित हो गया था. दरअसल, निर्विवाद तरीके से उप-राष्‍ट्रपति की भूमिका निभाने पर जवाहर लाल नेहरू ने उन्‍हें साल 1957 में ही राष्‍ट्रपति बनाने की इच्‍छा जताई थी. मगर मौलाना आजाद के नेतृत्‍व में विरोध होने के कारण उनकी यह मंशा पूरी नहीं हो सकी थी. मगर नेहरू ने 1962 में उन्‍हें राष्‍ट्रपति बनवा दिया था. हालांकि, उनके कार्यकाल की शुरुआत होते ही चीन से भारत का विवाद हो गया था. इधर नेहरूजी की मौत के बाद देश की स्‍थिति डगमगा गई. उधर, सितंबर 1965 में पाकिस्‍तान से हुआ युद्ध देश का अर्थव्‍यवस्‍था को काफी कमजोर कर गया. साथ ही, ताशकंद में लाल बहादुर शास्‍त्रीजी की मौत के बाद देश को गहरा झटका लगा था.


जाकिर हुसैन 

13 मई 1967 से लेकर 3 मई 1969 तक राष्‍ट्रपति की कुर्सी पर काबिज रह चुके जाकिर हुसैन अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनिवर्सिटी में बतौर वाइस चांसलर भी अपनी सेवा दे चुके हैं. उन्‍हें पद्मभूषण व भारत रत्‍न दोनों से सम्‍मानित किया गया था. उनका निधन कार्यालय में काम करते समय ही हो गया था. वे प्रथम मुस्‍लिम राष्‍ट्रपति होने के साथ ही सबसे कम समय तक राष्‍ट्रपति रहने के लिए भी जाने जाते हैं.
जाकिर हुसैन के जीवनकाल में विवादों का जिक्र इतिहास में भी न के बराबर मिलता है. हालांकि, उनकी असामयिक मृत्‍यु के बाद देश की राजनीति में उथल-पुथल का दौर जरूर शुरू हो गया था. जाकिरजी बेहद जमीनी और शिक्षा के व्‍यापक विस्‍तार के प्रति समर्पित सेवक थे. उन्‍होंने अपना पूरा जीवन महात्‍मा गांधीजी के आदर्शों पर चलते हुए गुजार दिया तथा देश विभाजन के समय भी उन्‍होंने मुस्‍लिम समुदाय को बंटने से रोकने में अहम भूमिका अदा की थी.



वीवी गिरि 

भारत के तीसरे राष्‍ट्रपति जाकिर हुसैनजी की असामयिक मृत्‍यु के बाद वीवी गिरि जी को देश का चौथा प्रथम नागरिक बनने का अवसर मिला था. गिरिजी का इस पद पर नियुक्‍त होना ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रभुत्‍व वाले कार्यकाल की शुरुआत के रूप में देखा जाता है. आपने तीन मई 1969 से लेकर 20 जुलाई 1969 तक राष्‍ट्रपति के पद का भार संभाला था.
दरअसल, अगस्त 1969 में हुए पांचवें राष्ट्रपति के चुनाव में. यह पहला मौका था, जब राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन के असामयिक निधन के कारण किसी राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में ही चुनाव कराने की ज़रूरत पड़ गई थी. इस चुनाव का दृश्य अद्भुत था, जब ‘स्वतंत्र’ उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे उपराष्ट्रपति वीवी गिरि ने कांग्रेस पार्टी के ‘आधिकारिक’ उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को शिकस्त दी थी. इसे 1967 के आरंभ और चौथे आम चुनाव के समय से शुरू हुए सियासी घटनाक्रम के संदर्भ में ही समझा जा सकता है. 50 साल पहले हुए इस चुनाव ने कई मायनों में एक युग के अंत की घोषणा की. हालांकि, कार्यवाहक राष्‍ट्रपति के पद से वीवी गिरिजी ने कुछ माह के बाद ही इस्‍तीफा दे दिया था.



मोहम्‍मद हिदायतुल्‍लाह 

देश के 11वें मुख्‍य न्‍यायाधीश रह चुके मोहम्‍मद हिदायतुल्‍लाहजी को वीवी गिरि के इस्‍तीफे के बाद राष्‍ट्रपति का पदभार सौंपा गया था. उन्‍होंने 24 अगस्‍त 1969 से 24 अगस्‍त 1974 तक राष्‍ट्रपति पद का जिम्‍मा संभाला था. भारत के पहले मुस्लिम मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हिदायतुल्‍लाहजी ने दो अवसरों पर भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्यभार संभाला था.
भारत ज्ञानकोश के मुताबिक, भारत के संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति निर्वाचन के संबंध में तो आवश्यक नियम बनाए थे, लेकिन उन्होंने एक भूल कर दी थी. उन्होंने उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति पद का दावेदार मान लिया, यदि किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाता है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति पद किसे और कैसे प्रदान किया जाए? यह स्थिति 3 मई, 1969 को डॉ. ज़ाकिर हुसैन के राष्ट्रपति पद पर रहते हुए मृत्यु होने से उत्पन्न हुई. तब वाराहगिरि वेंकट गिरि को आनन-फानन में कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया, जिसका संविधान में प्रावधान था लेकिन भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पद हेतु निर्वाचन किया जाता है. कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने के बाद भी वीवी गिरि राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना चाहते थे. मगर इसके लिए वह कार्यवाहक राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति पद का त्याग करके ही उम्मीदवार बन सकते थे. ऐसी स्थिति में दो संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए जिसके बारे में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं की गई थी. प्रथम प्रश्न यह था कि कार्यवाहक राष्ट्रपति रहते हुए वीवी गिरि अपना त्यागपत्र किसके सुपुर्द करें और द्वितीय प्रश्न था कि वह किस पद का त्याग करें- उपराष्ट्रपति पद का अथवा कार्यवाहक राष्ट्रपति का? तब वीवी गिरि ने विशेषज्ञों से परामर्श करके उपराष्ट्रपति पद से 20 जुलाई 1969 को दिन के 12 बजे के पूर्व अपना त्यागपत्र दे दिया. यह त्यागपत्र भारत के राष्ट्रपति को सम्बोधित किया गया था. यहां यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि कार्यवाहक राष्ट्रपति पद पर वह 20 जुलाई, 1969 के प्रात: 10 बजे तक ही थे. यह सारा घटनाक्रम इस कारण सम्पादित हुआ क्योंकि 28 मई 1969 को संसद की सभा आहूत की गई और अधिनियम 16 के अंतर्गत यह क़ानून बनाया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों की अनुपस्थिति में भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा इनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण कराई जा सकती है. इसी परिप्रेक्ष्य में नई व्यवस्था के अंतर्गत यह सम्भव हो पाया कि राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिक्त रहने की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया जा सकता है. इस व्यवस्था के पश्चात्त सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मुहम्मद हिदायतुल्लाह भारत के नए कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण कर सके. इस प्रकार 1969 को पारित अधिनियम 16 के अनुसार रविवार 20 जुलाई 1969 को प्रात:काल 10 बजे राष्ट्रपति भवन के अशोक कक्ष में इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई. कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने से पूर्व एम. हिदायतुल्लाह को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद छोड़ना पड़ा था. तब उस पद पर जेसी शाह को नया कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था. इन्हीं कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय ने एम. हिदायतुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई. वह 35 दिन तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद पर रहे. 20 जुलाई 1969 के मध्याह्न से 24 अगस्त 1969 के मध्याह्न तक का समय इनके कार्यवाहक राष्ट्रपति वाला समय था. इस प्रकार अप्रत्याशित परिस्थिति के चलते इन्हें कार्यवाहक राष्ट्रपति का पदभार संभालना पड़ा.


वीवी गिरि 

देश के पांचवे राष्‍ट्रपति के तौर पर चुने जाने के बाद 24 अगस्‍त 1969 से 24 अगस्‍त 1974 तक देश के प्रथम नागरिक की भूमिका का सफलतापूर्व निर्वहन किया था.


फखरूद्दीन अली अहमद 

24 अगस्‍त 1974 से 11 फरवरी 1977 तक राष्‍ट्रपति पद काबिज रहे फखरुद्दीन अली अहमद की भी कार्यालय में ही मौत हो गई थी. उनके कार्यकाल को देश में इमरजेंसी (आपातकाल) के लिए याद किया जाता है.
भारत में 26 जून 1975 का दिन काले दिवस के रूप में जाना जाएगा. इसी दिन देश में संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों को समाप्त कर 21 माह का आपातकाल घोषित कर दिया गया था. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल लागू किया तो डंडे का राज चालू हो गया. आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) की आवाज उठाने वालों को जेल में ठूंस दिया गया. इतना ही नहीं उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए पुलिस ने डंडे के बल से उनके व्यवसाय को ध्वस्त कर परिजनों का उत्पीड़न कर रहे थे. मीसा बंदी कहते हैं कि उस समय डंडे का राज चल रहा था, दशहत इतनी अधिक थी कि अन्याय व उत्पीड़न के विरोध में कोई कुछ नहीं बोलता था.


बीडी जट्टी 

राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद की असामयिक मौत के बाद देश के कार्यवाहक राष्‍ट्रपति के पद पर आसीन रहने वाले बीडी जट्टी का कार्यकाल भी विवादों से अछूता नहीं रहा है. दरअसल, अप्रैल 1977 में जब केंद्रीय गृह मंत्री चरण सिंह ने नौ राज्‍यों की असेंबली को भंग करने का विवादास्‍पद निर्णय लिया था तब इन्‍होंने अहम भूमिका निभाई थी. उस समय जट्टी ने केंद्रीय कैबिनेट की ओर से दिए गए इस सुझाव को स्‍वीकार करने से इंकार कर दिया था. उस समय उन्‍होंने यह दलील देते हुए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था कि राष्‍ट्रपति का काम सिर्फ कैबिनेट के सुझावों को स्‍वीकार करना ही नहीं है. राष्‍ट्रपति का पद राजनीतिकरण के लिए ही नहीं है बल्‍कि कानून के दायरे में रहते देश के संचालन का निष्‍पक्ष भूमिका निभाना भी है. आपने 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तक कार्यवाहक राष्‍ट्रपति की भूमिका निभाई थी.



नीलम संजीव रेड्डी

एनएस रेड्डी आंध्र प्रदेश के पहले मुख्‍यमंत्री होने के साथ ही लोकसभा अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं. उन्‍होंने 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982 तक राष्‍ट्रपति की भी भूमिका अदा की थी.
नीलम संजीव रेड्डी भारत के ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्हें राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होते हुए प्रथम बार विफलता प्राप्त हुई और दूसरी बार उम्मीदवार बनाए जाने पर राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. प्रथम बार इन्हें वीवी गिरि के कारण बहुत कम अंतर से हार स्वीकार करनी पड़ी थी. तब यह कांग्रेस द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए थे और अप्रत्याशित रूप से हार गए. दूसरी बार गैर कांग्रेसियों ने इन्हें प्रत्याशी बनाया और यह विजयी हुए। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब वीवी गिरि को राष्ट्रपति चुनाव जीतने में सफलता प्रदान कराई, तब यह लगा था कि नीलम संजीव रेड्डी ने एक ऐसा मौक़ा गंवा दिया है, जो अब उनकी ज़िन्दगी में कभी नहीं आएगा. मगर समय ने नीलम संजीव रेड्डी जैसे हारे हुए योद्धा को विजयी योद्धा के रूप में परिवर्तित कर दिया. यह भारतीय राजनीति के ऐसे अध्याय बनकर सामने आए, जो अनिश्चितता का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते हैं. संजीव रेड्डी भारत के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति थे, जो निर्विरोध निर्वाचित हुए.



ज्ञानी जैल सिंह

ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल शुरू से अंत तक विवादों से घिरा हुआ था. उनके कार्यकाल में ही स्‍वर्ण मंदिर में छुपाए गए हथियार व खालिस्‍तानी आतंकियों को पकड़ने के लिए ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार चलाया गया था. इस कारण उन पर रबर स्‍टैंप राष्‍ट्रपति होने का भी आरोप लगाया गया था. इंदिरा गांधी की भी हत्‍या इन्‍हीं के कार्यकाल में की गई थी और उसके बाद सिखों का नरसंहार भी इन्‍हीं के समय में हुआ था. यही कारण है कि ज्ञानी जैल सिंह को अब तक का सबसे कमजोर राष्‍ट्रपति कहा जाता है. उस समय में प्रधानमंत्री राजीव गांधी से इनका विधेयकों को पारित न करने पर विवाद  भी हो गया था. फिर भी इनके कार्यकाल को ही राजीव गांधी सरकार के कुछ कठोर फैसलों को सफल न होने देने के लिए सराहा भी जाता है. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987 तक रहा था.


आर वेंकटरमन

स्‍वतंत्रता संग्राम में हिस्‍सा लेने के लिए वर्ष 1942 में जेल जाने वाले रामास्‍वामी वेंकटरमन ने 25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992 तक राष्‍ट्रपति का पदभार संभाला था. उन्‍होंने स्‍वतंत्र भारत के पहले वित्‍त मंत्री एवं औद्योगिक व बाद में रक्षा मंत्री का दारोमदार भी निभाया था.
उपराष्ट्रपति बनने के लगभग 25 माह बाद कांग्रेस को देश का राष्ट्रपति निर्वाचित करना था. ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त होने वाला था. इसी के तहत 15 जुलाई, 1987 को वह भारतीय गणराज्य के आठवें निर्वाचित राष्ट्रपति घोषित किये गए. 24 जुलाई, 1987 को इन्होंने उपराष्ट्रपति से त्यागपत्र दे दिया. 25 जुलाई, 1987 को मध्याह्न 12:15 पर संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आरएस पाठक ने इन्हें राष्ट्रपति के पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. इस समय वेंकटरमण ने सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा और काली शेरवानी धारण कर रखी थी. इन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में शपथ ग्रहण की.
उपराष्ट्रपति बनने के लगभग 25 माह बाद कांग्रेस को देश का राष्ट्रपति निर्वाचित करना था. ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त होने वाला था। इसी के तहत 15 जुलाई, 1987 को वह भारतीय गणराज्य के आठवें निर्वाचित राष्ट्रपति घोषित किये गए. 24 जुलाई, 1987 को इन्होंने उपराष्ट्रपति से त्यागपत्र दे दिया। इन्होंने अंग्रेज़ी भाषा में शपथ ग्रहण किया था.



शंकर दयाल शर्मा 


25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997 तक राष्‍ट्रपति के पद पर रहने वाले शंकर दयाल शर्मा के कार्यकाल में ही अयोध्‍या में विवादित बाबरी मस्‍जिद का ढांचा गिराया गया था. उस जब ढांचा आरएसएस के कारसेवकों ने गिरा दिया था तब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्‍हा राव  से मदद के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में सम्‍पर्क किया. मगर वहां से उन्‍हें कोई मदद नहीं थी. इसके बाद उन सभी ने राष्‍ट्रपति भवन में जाकर मदद की गुहार लगाई. लेकिन, शंकर दयाल शर्मा उन सभी लोगों के सामने फूट-फूटकर रोने लगे. इसके बाद उन्‍होंने एक पत्र सबको दिखाया जिसमें लिखा गया था कि उत्‍तर प्रदेश सरकार को भंग करके जल्‍द से जल्‍द वहां राष्‍ट्रपति शासन लगाया जाए. मगर उनके इस पत्र पर कोई कदम नहीं उठाया गया था. उन्‍होंने तब स्‍वीकार किया था कि वे राष्‍ट्रपति होते हुए भी प्रधानमंत्री से मुलाकात नहीं कर पा रहे हैं. हालांकि, कुछ समय बाद यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने एक बयान दिया कि राष्‍ट्रपति को ढांचा गिराए जाने की सूचना पहले ही मिल गई थी. इस बयान को लेकर भी तब तत्‍कालीन राजनीति गर्मा गई थी. उपरोक्‍त घटनाक्रम पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं.



केआर नारायण

14 जुलाई, 1997 को हुए राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा जब 17 जुलाई, 1997 को घोषित हुआ तो पता चला कि नारायणन को कुल वैध मतों का 95 प्रतिशत प्राप्त हुआ था. यह एकमात्र ऐसा राष्ट्रपति चुनाव था जो कि केन्द्र में अल्पमत सरकार के रहते हुए भी समाप्त हुआ. इसमें पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार थे. शिवसेना के अतिरिक्त सभी दलों ने नारायणन के पक्ष में मतदान किया, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह कहते हुए इनका विरोध किया कि उन्हें भारतीय संस्कृति की जीत का आधार उनका दलित होना है. इससे पूर्व कोई भी दलित राष्ट्रपति नहीं बना था.
अपने राष्ट्रपति काल के दौरान आर नारायणन ने दो बार संसद को भंग करने का कार्य किया लेकिन ऐसा करने के पूर्व इन्होंने अपने अधिकार का उपयोग करते हुए राजनीतिक परिदृश्य को संचालित करने वाले लोगों से परामर्श भी किया था. तब यह नतीजा निकाला कि उन स्थितियों में कोई भी राजनीतिक दल बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में नहीं था. यह स्थिति तब उत्पन्न हुई थी, जब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने इन्द्रकुमार गुजराल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार के बहुमत में होने का दावा दांव पर लग गया. इन्द्रकुमार गुजराल को 28 नवम्बर, 1997 तक सदन में अपने बहुमत का जादुई आंकड़ा साबित करना था. प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल बहुमत सिद्ध करने में असमर्थ थे, अत: उन्होंने राष्ट्रपति को परामर्श दिया कि लोकसभा भंग कर दी जाए. नारायणन ने भी परिस्थितियों की समीक्षा करते हुए निर्णय लिया कि कोई भी दल बहुमत द्वारा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. अत: गुजराल का परामर्श स्वीकार करते हुए उन्होंने लोकसभा भंग कर दी. इसके बाद हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी सकल पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई, जिसके पास में सबसे ज़्यादा सांसद थे. भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को एनडीए का भी समर्थन प्राप्त था. अत: नारायणन ने वाजपेयी से कहा कि वह समर्थन करने वाली पार्टियों के समर्थन पत्र प्रदान करें, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि उनके पास सरकार बनाने के लायक़ बहुमत है. अटल बिहारी वाजपेयी समर्थन जुटाने में समर्थ थे और इस आधार पर उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया. साथ ही यह शर्त भी थी कि 10 दिन में वाजपेयी अपना बहुमत सदन में साबित करें. 14 अप्रैल, 1999 को जयललिता ने राष्ट्रपति नारायणन को पत्र लिखा कि वह वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले रही हैं. तब नारायणन ने वाजपेयी को सदन में बहुमत साबित करने को कहा. 17 अप्रैल को वाजपेयी सदन में बहुमत साबित करने की स्थिति में नहीं थे. इस कारण वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 तक रहा था.



एपीजे अब्‍दुल कलाम 

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की जायदाद पर पिछले दिनों उनके संबंधियों के बीच विवाद की खबरें आई थी. लेकिन, एक रिपोर्ट के मुताबिक आम जिंदगी में बेहद सीधे और सरल रहे कलाम की जायदाद ना के बराबर थी. उनकी जायदाद में कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसपर विवाद या दावेदारी की जा सके. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजेपी अब्दुल कलाम की जिंदगी में सिर्फ चंद जरुरत की चीजें ही थी और बहुत ज्यादा भौतिक चीजें उनके पास नहीं थी. उनके पास जो जरुरी चीजें थी उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे जायदाद का नाम दिया जा सके.
रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टर कलाम के पास कोई भी संपत्ति नहीं थी. उनके पास जो चीजें थी उसमें 2500 किताबें, एक रिस्टवॉच, छह शर्ट, चार पायजामा, तीन सूट और मोजे की कुछ जोड़ियां थी. हैरानी की बात तो यह है कि उनके पास फ्रीज तक नहीं था. डॉक्टर साहेब के पास टीवी, कार और एयर कंडीशनर तक भी नहीं था. पूर्व राष्ट्रपति कलाम का जीवन काफी सरल था. ना तो उन्होंने विलासितापूर्ण जीवन जीया और ना ही वह घोर अभाव में रहे. उनकी कमाई का मुख्य स्रोत वह रॉयल्टी था जो उनकी लिखी चार किताबों से उन्हें हासिल होती थी. उन्हें पेंशन भी मिलता था. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक था.



प्रतिभा देवी सिंह पाटिल

भारत की पहली महिला राष्‍ट्रपति होने का गौरव हासिल करने वालीं प्रतिभा पाटिल राजस्‍थान की गवर्नर भीर चुकी थीं. उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 से 25 जुलाई 2012 तक था.
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपने कार्यकाल में 23 देशों का दौरा किया, जिसमें 205 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि इससे पहले एपीजे अब्दुल कलाम ने सात बार विदेश यात्रा की. हालांकि इस दौरान उन्होंने 17 देशों का दौरा किया. इन बातों की जानकारी पहले एक सूचना अधिकार की याचिका से सामने आई थी. अपनी विदेश यात्राओं को लेकर चौतरफा निंदा की शिकार होने वालीं प्रतिभा पाटिल प्रतिभा पाटिल के साथ सबसे पहला विवाद तब जु़ड़ा जब उन्होंने राजस्थान की एक सभा में कहा कि राजस्थान की महिलाओं को मुगलों से बचाने के लिए परदा प्रथा आरंभ हुई. इतिहासकारों ने कहा कि राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार प्रतिभा का इतिहास ज्ञान शून्य है जबकि मुस्लिम लीग जैसे दलों ने भी इस बयान का विरोध किया. समाजवादी पार्टी ने कहा कि प्रतिभा पाटिल मुसलिम विरोधी विचारधारा रखती हैं. प्रतिभा दूसरे विवाद में तब घिरी जब उन्होंने एक धार्मिक संगठन की सभा में अपने गुरू की आत्मा के साथ कथित संवाद की बात कही. प्रतिभा के पति देवी सिंह शेखावत पर स्कूली शिक्षक को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने का आरोप है. उन पर हत्यारोपी अपने भाई को बचाने के लिए अपनी राजनीतिक पहुंच का पूरा पूरा इस्तेमाल करने का भी आरोप है. उन पर चीनी मिल कर्ज में घोटाले, इंजीनियरिंग कालेज फंड में घपले और उनके परिवार पर भूखंड हड़पने के संगीन आरोप हैं. साथ ही, इन पर और भी कई आरोप लगते रहे हैं.



प्रणब मुखर्जी 

देश के राष्ट्रपति का नाम हाल ही में विवाद में घसीट लिया गया था. एसार के अधिकारियों के कुछ कथित इंटरनल ईमेल्स में इस बात का जिक्र किया गया है कि प्रणव मुखर्जी की ओर से इस बात का दबाव डाला गया था कि स्टील से लेकर ऑइल सेक्टर तक में सक्रिय इस ग्रुप में एक व्यक्ति को नौकरी दी जाए. ईमेल के एक दूसरे ट्रेल में दिखाया गया है कि एसार ने लंदन में अपने ग्रुप की एक कंपनी में इंटर्नशिप के लिए मुखर्जी की एक ग्रैंड डॉटर के लिए वीजा के इंतजाम में कितनी फुर्ती दिखाई थी. राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता ने इस मामले में कुछ भी कहने से मना कर दिया था, जबकि राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों ने कहा कि इन ईमेल्स के स्रोत के बारे में उन्हें पक्के तौर पर कुछ नहीं मालूम है. एसार के एक प्रवक्ता ने कहा कि ग्रुप की कंपनियों में सभी नियुक्तियां कैंडिडेट्स की योग्यता के आधार पर होती हैं और जिन लोगों का जिक्र ईमेल्स में है, वे सभी संबंधित पदों के लिए पूरी तरह योग्य थे और उन्हें अपॉइंट करने का निर्णय किसी दबाव में नहीं लिया गया था. आपका कार्यकाल 25 जुलाई 2012 को शुरू हुआ था. कुशल राजनीतिज्ञ रह चुके प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में भी छोटे-छोटे विवादों का साया मंडराता रहा है.


नोट : सभी तस्‍वीरें गूगल इमेज से साभार हैं. 

Friday, June 9, 2017

राष्‍ट्रपति की कितनी होती है सैलरी?

भारत का राष्‍ट्रपति भवन। (साभार : गूगल इमेज)
भारत के अगले राष्‍ट्रपति के चुनने के लिए कवायद शुरू हो चुकी है. ऐसे में यह तो जानना बनता ही है कि विश्‍व के चर्चित राष्‍ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों की तनख्‍वाह कितनी है...


भारत
राष्ट्रपति : प्रणब मुखर्जी
वेतन
सालाना : 1,800,000.00 रुपये
मासिक : 150,000.00 रुपये
साप्ताहिक : 34,615.00 रुपये
प्रतिदिन : 4,931.00 रुपये


युनाइटेड स्टेट
राष्ट्रपति : डोनाल्ड ट्रंप
वेतन
सालाना : 25,685,358.00 रुपये
मासिक : 2,140,447.00 रुपये
साप्ताहिक : 493,949.00 रुपये
प्रतिदिन : 70,371.00 रुपये


रूस
राष्ट्रपति : ब्लादिमीर पुतिन
वेतन
सालाना : 9,893,180.00 रुपये
मासिक : 824,432.00 रुपये
साप्ताहिक : 190,253.00 रुपये
प्रतिदिन : 27,105.00 रुपये


जर्मनी
चांसलर : एंजेला मर्केल
वेतन
सालाना : 16,282,793.00 रुपये
मासिक : 1,356,899.00 रुपये
साप्ताहिक : 313,131.00 रुपये
प्रतिदिन : 44,610.00 रुपये


चीन
राष्ट्रपति : शी जिनपिंग
वेतन
सालाना : 1,290,839.00 रुपये
मासिक : 107,570.00 रुपये
साप्ताहिक : 24,824.00 रुपये
प्रतिदिन : 3,537.00 रुपये


नीदरलैंड्स
प्रधानमत्री : मार्क रूट
वेतन
सालाना : 11,340,204.00 रुपये
मासिक : 945,017.00 रुपये
साप्ताहिक : 218,081.00 रुपये
प्रतिदिन : 31,069.00 रुपये


रूस
प्रधानमंत्री : दमित्री मेदवेदेव
वेतन
सालाना : 9,856,081.00 रुपये
मासिक : 821,340.00 रुपये
साप्ताहिक : 189,540.00 रुपये
प्रतिदिन : 27,003.00 रुपये



आयरलैंड
प्रधानमंत्री : एंडा केनी
वेतन
सालाना : 13,363,513.00 रुपये
मासिक : 1,113,626.00 रुपये
साप्ताहिक : 256,991.00 रुपये
प्रतिदिन : 36,612.00 रुपये


टर्की
राष्ट्रपति : रिसेप ताईप एर्डोगन
वेतन
सालाना : रुपये 10,772,437.00
मासिक : रुपये 897,703.00
साप्ताहिक : रुपये 207,162.00
प्रतिदिन : रुपये 29,514.00


स्लोवेनिया
प्रधानमंत्री : बोरूट पाहोर
वेतन
सालाना : रुपये 4,672,002.00
मासिक : रुपये 389,334.00
साप्ताहिक : रुपये 89,846.00
प्रतिदिन : रुपये 12,800.00




जिम्‍बॉब्‍वे
राष्‍ट्रपति : रॉबर्ट मुगाबे
वेतन
सालाना : रुपये 14,383,800.00
मासिक : रुपये 1,198,650.00
साप्ताहिक : रुपये 276,612.00
प्रतिदिन : रुपये 39,408.00



कोलंबिया
राष्‍ट्रपति : जुआन मैनुअल सैंटोस
वेतन
सालाना : रुपये 8,706,496.00
मासिक : रुपये 725,541.00
साप्ताहिक : रुपये 167,433.00
प्रतिदिन : रुपये 23,853.00


लिबेरिया
राष्‍ट्रपति : एलेन जॉनसन सरलीफ
वेतन
सालाना : रुपये 5,779,206.00
मासिक : रुपये 481,600.00
साप्ताहिक : रुपये 111,139.00
प्रतिदिन : रुपये 15,833.00


दक्षिण अफ्रीका
राष्‍ट्रपति : जैकब जुमा
वेतन
सालाना : रुपये 13,581,220.00
मासिक : रुपये 1,131,768.00
साप्ताहिक : रुपये 261,177.00
प्रतिदिन : रुपये 37,209.00


स्‍पेन
प्रधानमंत्री : मारियानो राज्‍वॉय ब्रेड
वेतन
सालाना : रुपये 5,692,921.00
मासिक : रुपये 474,410.00
साप्ताहिक : रुपये 109,479.00
प्रतिदिन : रुपये 15,597.00


अंगोला
राष्‍ट्रपति : जो एडुआर्डो डॉस सैंटोस
वेतन
सालाना : रुपये 5,206,101.00
मासिक : रुपये 433,842.00
साप्ताहिक : रुपये 100,117.00
प्रतिदिन : रुपये 14,263.00



मैक्‍सिको
राष्‍ट्रपति : एनरिक पेना नीटो
वेतन
सालाना : रुपये 10,532,176.00
मासिक : रुपये 877,681.00
साप्ताहिक : रुपये 202,542.00
प्रतिदिन : रुपये 28,855.00


बांग्‍लादेश
प्रधानमंत्री : शेख हसीना
वेतन
सालाना : रुपये 953,058.00
मासिक : रुपये 79,421.00
साप्ताहिक : रुपये 18,328.00
प्रतिदिन : रुपये 2,611.00


हौंडरस
राष्‍ट्रपति : जुआन ऑरलैंडो हरनैनडेज
वेतन
सालाना : रुपये 2,754,755.00
मासिक : रुपये 229,563.00
साप्ताहिक : रुपये 52,976.00
प्रतिदिन : रुपये 7,547.00



बुल्‍गारिया
राष्‍ट्रपति : रोजेन प्‍लेनेलिव
वेतन
सालाना : रुपये 2,281,428.00
मासिक : रुपये 190,119.00
साप्ताहिक : रुपये 43,874.00
प्रतिदिन : रुपये 6,250.00



पाकिस्‍तान
राष्‍ट्रपति : सैयद ममनून हुसैन
वेतन
सालाना : रुपये 609,648.00
मासिक : रुपये 50,804.00
साप्ताहिक : रुपये 11,724.00
प्रतिदिन : रुपये 1,670.00


स्‍वीडन
प्रधानमंत्री : फ्रेडरिक रेनफेल्‍डट
वेतन
सालाना : रुपये 13,453,113.00
मासिक : रुपये 1,121,093.00
साप्ताहिक : रुपये 258,714.00
प्रतिदिन : रुपये 36,858.00



जापान
प्रधानमंत्री : शिंजो आबे
वेतन
सालाना : रुपये 13,016,055.00
मासिक : रुपये 1,084,671.00
साप्ताहिक : रुपये 250,309.00
प्रतिदिन : रुपये 35,660.00

(नोट: सभ्‍ाी आंकड़े वेजइंडिकेटर फाउंडेशन की ओर से जारी किए गए हैं.)



देखें वह वीडियो जब भारत के पहले राष्‍ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने संभाली थी कुर्सी...
https://www.youtube.com/watch?v=I4Sw3o8M0f8

Sunday, May 28, 2017

'अब पहले जैसा स्‍वाद और सेवा कहां'

साभार: गूगल इमेज।
हम तरक्‍की के लिए कितना बदलते जा रहे हैं. अपनी जड़ों को ही खोते जा रहे हैं. इन दो किस्‍सों से शायद कुछ समझा जा सके...
पिताजी ने कुछ रोज पहले खाने में दाल-भात (चावल), चौलाई का साग, भिंडी की भुजिया, पापड़, अमिया की चटनी, तिलौरी (सफेद तिल का फ्राई नमकीन स्‍वाद का छोटा लड्डू), रायता, सलाद और गाय का शुद्ध देसी घी परोसने को कहा. खाना बहुत स्‍वादिष्‍ट था. वैरायटी देखकर मैंने पिताजी से पूछा कि आखिर इतनी तगड़ी व्‍यवस्‍था करने का कारण क्‍या है. उन्‍होंने कहा, 'मेरे बचपन में एक बार माताजी (मेरी दादी) की तबीयत खराब हो गई थी. दादाजी ने उन्‍हें अपने गांव से करीब 40 किलोमीटर मोतिहारी स्‍थित एक अस्‍पताल में भर्ती करा दिया. इस बीच करीब दस दिन तक मैं बाबूजी के साथ मोतिहारी में रहा था.' फिर वे कुछ ठहरकर कहते हैं, 'उस दौरान हम लोग मोतिहारी रेलवे स्‍टेशन से करीब दो या 300 मीटर दूर स्‍थित एक दूबे भोजनालय में खाने जाते थे. उस भोजनाल की खासियत यह थी कि वहां जमीन पर लिपाई करने के बाद पीढ़ा पर बैठाकर केले के पत्‍ते पर यही सब खिलाया जाता था. एक बार में पांच से सात या अधिकतम 11 लोगों को ही खाना खिलाया जाता था. उसके बाद जमीन की फिर लिपाई की जाती थी. उसके बाद ही अगली पांति में लोगों को बिठाकर खाना परोसा जाता था.' अंत में कहते हैं, 'कई दिन से सोच रहा था कि वही खाना खाऊं. इसीलिए ये सब बनाने को कहा था क्‍योंकि अब वैसा स्‍वाद और आवभगत कहां मिलता है.'
बात तो सही है, होटल में पहले प्रेम और श्रद्धा के भाव से खिलाया जाता था. मगर अब नहीं. ऐसा ही एक और किस्‍सा आपको सुनाना चाहूंगा. कुछ रोज पहले जौनपुर के जंघई क्षेत्र में जाना हुआ था. वहां मैं पहली बार करीब 13 साल पहले पिताजी के साथ दीदी की शादी का रिश्‍ता लेकर गया था. उस समय जब पहली बार वहां पहुंचा था तब स्‍टेशन के बाहर आते ही एक छोटे से होटल में चाय-समोसे के लिए ठहरा था. वहां पिताजी ने घर से बनाकर लाया हुआ परांठा खाना शुरू किया. इस बीच होटल वाले चाय लेकर आए. मैं तो हमेशा ही चटोरा रहा हूं सो वहां पहुंचते ही कुल्‍लहड़ की चाय और एक रुपये के छोटे मगर तीखे समोसे खाने में जुट गया था. वहीं, इस बार जब उसी होटल में पहुंचा तो उसका नजारा बदला हुआ नजर आया था. अब वह खपरैल की छत वाला होटल नहीं था. अब वह एक शानदार होटल में तब्‍दील हो चुका है. वहां अब लकड़ी की बेंच पर मेहमानों को नहीं बिठाया जाता बल्‍कि महंगी कुर्सियों पर बिठाते हैं. मगर वह स्‍वाद नहीं मिला. होटल की हर दीवार पर चस्‍पा संदेश था बाहर से लाई चीजों को यहां खाना मना है. मुझे तेरह साल पहले आने पर पापा के परांठे याद आ गये. वास्‍तव में कितना बदलते जा रहे हैं हम और हमारा समाज.

Friday, May 26, 2017

खनन ने बढ़ाया खेती का खर्च, बुआई से पहले उपजाऊ मिट्टी खरीदने को मजबूर हैं किसान

“पहले खेती में खाद-पानी की समस्या हुआ करती थी। मगर खनन ने हमारी दिक्कत बढ़ा दी है। मेरे खेत की उपजाऊ मिट्टी बरसात में बहर खनन वाले तालाब में समा गई है। ऐसे में खेती से पहले हम लोगों को उपजाऊ मिट्टी खरीदने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है।” सत्तावन वर्षीय हरकिशन रावत कुछ यूं अपना दर्द बयां करते हैं।

दरअसल, राजधानी के सरोजनीनगर ब्लॉक के नटकुर गाँव में मिट्टी के अवैध खनन की समस्या काफी समय से बरकरार है। ग्राम समाज की जमीन पर अंधाधुन तरीके से किए जा रहे खनन का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। खनन की वजह से तालाब में तब्दील हुए मैदानों में उसके आस-पास के खेतों की उपजाऊ मिट्टी बरसात में बह जाती है। ऐसे में इस क्षेत्र के कृषक खेती से पहले अपनी खेतों में माटी खरीदने को मजबूर हैं।

इस बारे में हरकिशन बताते हैं, “मेरे खेत के करीब में ही ग्राम समाज की जमीन है। इस जमीन पर सुबह-शाम मनमाने तरीके से अवैध खनन का काम किया जा रहा है। चूंकि, इस काम में दबंग लोग जुड़े रहते हैं, ऐसे में विरोध भी नहीं कर पाते हैं। मगर बरसात के समय मेरे और मेरे जैसे अन्य किसानों की खेतों की मिट्टी इसमें बहकर समा जाती है।” वे अपनी बात पूरी करते हुए कहते हैं, “ऐसे में हमें खेती करने से पहले अपनी खेतों में दूसरी जगहों से मिट्टी लाकर ऊपरी परत तैयार करनी पड़ती है। जाहिर है, हमारे लिए खेती का खर्च अब और बढ़ गया है। खाद-पानी के लिए रुपए जुटाने के साथ ही अब मिट्टी के लिए भी रुपए जुटाना पड़ रहा है।”

वहीं, इस बारे में सुभाष गौतम (37 वर्ष) नाम के किसान बताते हैं, “अवैध खनन का विरोध करने पर हम लोगों की कोई सुनता नहीं है। ऊपर से दबंगों की धमकी के चलते हम भी कुछ दिनों के बाद बोलना बंद कर देते हैं। रात में बेतरतीब तरीके से किया जाने वाला अवैध खनन दिन में भी बदस्तूर जारी रहता है।”

उधर, अवैध खनन के ही शिकार हुए छोटे कृषक रामकृपाल कुशवाहा (43 वर्ष) बताते हैं, “मेरा खेत मुल्लाहीखेड़ा गाँव में है। मेरे खेत के चारों ओर बाग है। ऐसे में रात में वहां ठहरना उचित नहीं होता है। करीब दो महीने पहले मेरी खेत में से रातोंरात कई ट्राली मिट्टी चुरा ली गई। मुझे दिन में इसकी जानकारी लगी।” वे कहते हैं, “मेरे खेत में अब एक बड़ा सा गड्ढा बन गया है। उसमें दोबारा खेती करने के लिए मुझे मिट्टी खरीदनी पड़ेगी लेकिन मेरे पास उतने रुपए भी नहीं हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं।”

इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर खनन से जुड़े एक मजदूर ने बताया, “हर थाने में मिट्टी खोदाई का रुपया भेजा जाता है। दिन में डंफर से मिट्टी ढोना मना है मगर रात में दस बजे के बाद से सुबह उजाला होने से पहले तक जितनी चाहे उतनी मिट्टी की खोदाई की जा सकती है।”

वे आगे बताते हैं, “हम लोग रातभर मिट्टी खोदकर लोगों को बेचते हैं। इस बीच एक थाने को चार से पांच हजार रुपए देने होते हैं जबकि मिट्टी की सप्लाई यदि किसी दूसरे थाने के क्षेत्र में करनी पड़ती है तो वह ढाई से तीन हजार रुपए लेता है। एक बार रुपया दे देने के बाद किसी भी चौराहे पर पुलिस गाड़ी नहीं राकती है।”

साधारण कद-काठी वाले शास्त्रीजी के इरादे चट्टान की तरह थे मजबूत

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के गुणों के बारे में बखान करना सूरज को दीया दिखाने समान है। वह भी ऐसे समय में जब भारत-पाकिस्तान के बीच तल्ख रिश्तों में और गर्माहट आ गई है तब शास्त्री जी के बोले गए बोलों से देशवासियों को और मजबूती मिल सकती है। वे भले ही एक साधारण कद-काठी के इंसान दिखते थे मगर उनके हौसले की दीवार इतनी मजबूत थी कि बड़ी से बड़ी परेशानी भी उनके सामने घुटने टेक देती थी। यही कारण है कि जब शास्त्री जी ने कुर्सी संभाली थी तब देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने के साथ ही उसकी सुरक्षा को भी मजबूत करने का दायित्व उन्होंने बखूबी संभाला था। ऐसे में आइए शास्त्री जी के दिए बोलों से उनके व्यक्तित्व को जानने की कोशिश करते हैं…

1. जैसा मैं दिखता हूँ उतना साधारण मैं हूँ नहीं।

2. आर्थिक मुद्दे हमारे लिए सबसे जरूरी है, जिससे हम अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी और बेराजगारी से लड़ सके।

3. हमारी ताकत और मजबूती के लिए सबसे जरूरी काम है वो लोग में एकता स्थपित करना है।

4. लोगों को सच्चा लोकतंत्र और स्वराज कभी भी हिंसा और असत्य से प्राप्त नहीं हो सकता।

5. क़ानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना बरकरार रहे और भी मजबूती भी।

6. यदि कोई एक व्यक्ति भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सिर शर्म से झुकाना पड़ेगा।

7. आज़ादी की रक्षा केवल सैनिकों का काम नहीं है। पूरे देश को मजबूत होना होगा।

8. हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट है। अपने देश में सबके लिए स्वतंत्रता और संपन्नता के साथ समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना और अन्य सभी देशों के साथ विश्वशांति और मित्रता का संबंध रखना।

9. देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है।

10. हमारी ताकत और स्थिरता के लिए हमारे सामने जो ज़रूरी काम हैं उनमें लोगों में एकता और एकजुटता स्थापित करने से बढ़कर कोई काम नहीं है।

11. जो शाशन करते हैं, उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर किस तरह प्रतिक्रिया करनी है। अंतत: जनता ही मुखिया होती है।

12. हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के लिए शांति और शांतिपूर्ण विकास में विश्वास रखते हैं।

13. मेरी समझ से प्रशासन का मूल विचार यह है कि समाज को एकजुट रखा जाए ताकि वह विकास कर सके और अपने लक्ष्यों की तरफ बढ़ सके।

प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्रीजी ने उठाए थे ये बड़े क़दम

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी के बारे में कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन्हें कोई नहीं जानता। मसलन, वे मूलत: ब्राह्मण नहीं बल्कि श्रीवास्तव थे। आइए उनके बारे में कुछ ऐसे अन्य तथ्यों के बारे में भी जानें, जिसकी वजह से आज भी उन्हें महान कहा जाता है…

जय जवान, जय किसान के नारे का सच?

जब शास्त्रीजी वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे तब भारत में गरीबी बहुत थी। उस समय हमारे देश में दूसरे देशों से अनाज खरीदा जाता था। उस दौरान नॉर्थ अमेरिका से पीएल-480 योजना के तहत अनाज खरीदा जाता था। वहीं, जब उनके पदभार संभालने के एक वर्ष बाद यानी साल 1965 में देश को सूखे की मार भी झेलनी पड़ी थी। नौबत यह बन आई थी कि शास्त्रीजी को पूरे देश में लोगों से एक दिन के लिए उपवास रखने की अपील करनी पड़ी थी ताकि मजबूर लोगों के लिए एक दिन के भोजन का इंतजाम हो सके। वहीं, युद्ध के कारण देश को आर्थिक तंगी का तो सामना करना ही पड़ रहा था। ऐसे में उन्होंने नारा दिया था, “जय जवान, जय किसान”। इस नारे के बाद देश के किसानों ने जहां अन्नदाता होने का जिम्मा बखूबी निभाया वहीं, जवानों ने भी देश को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी को सकुशल अंजाम दिया।


शास्त्रीजी का अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन से हुआ था विवाद

यह मसला करीब वर्ष 1965 के अंत और उनके देहांत की तारीख 11 जनवरी, 1966 के मध्य का है। इस दौरान शास्त्रीजी ने एक अमेरिकी पत्रकार को दिए साक्षात्कार में कह दिया था, “अमेरिका द्वारा वियतनाम में किए जा रहा युद्ध कहीं से भी उचित नहीं है। यह अमेरिका के आक्रामक रवैया को दर्शाता है।” चूंकि, उस समय हमारे में देश में पर्याप्त अनाज नहीं उत्पाद किया जाता था। अमेरिका से ही हमें एक योजना के तहत खाद्य पदार्थ का आयात कराना पड़ता था। फिर भी उन्होंने अमेरिका के खिलाफ सच बोलने से परहेज नहीं किया। मगर उनके साक्षात्कार से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत में अनाज मुहैया कराना बंद कर दिया। उस समय देश को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा था। फिर, एक रणनीति के तहत संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका से अपील करनी पड़ी थी कि वह भारत में अपने खाद्य पदार्थों का निर्यात पूर्व की तरह जारी रखे। मगर शास्त्रीजी ने सच बोलने के लिए कभी भी खुद को गलत नहीं माना।

मूलत: वे शास्त्री नहीं थे

लाल बहादुर शास्त्रीजी का जन्म वाराणसी के रामनगर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। चूंकि, उन्हें जातिगत व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं था। इसीलिए उन्होंने अपने नाम से जाति का त्याग कर दिया था। मगर जब उन्होंने काशी विद्यापीठ से स्कॉलर यानी शास्त्री की पढ़ाई पूरी कर ली तब उन्हें इसकी उपाधि दे दी गई। हालांकि, बड़ी संख्या में आज भी लोग यही मानते हैं कि शास्त्रीजी मूलत: ब्राह्मण थे।


केंद्रीय मंत्री पद पर रहते हुए शास्त्रीजी ने रचे कई आयाम

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने कैबिनेट में शास्त्रीजी को भी शामिल किया हुआ था। उस दौरान उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए थे, जो आज भी अनुसरण किए जाते हैं। इन्हीं में से एक वाक्या यह है कि जब शास्त्रीजी ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर थे तब उन्होंने एक महिला को कंडक्टर के पद पर तैनात करते हुए पुरुषों के सामने महिलाओं का कद बढ़ाया था। यानी वे महिला उत्थान के लिए पहले से ही काफी प्रयासरत थे। यही नहीं, शास्त्रीजी ने यह विचार दिया था कि जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन उग्र हो जाए तो उस पर लाठीचार्ज से बेहतर है कि पानी का तेज बौछार किया जाए। वे सत्ता के खिलाफ किए जाने वाले संग्राम को कानून का उल्लंघन नहीं जनता का अधिकार मानते थे।


प्रधानमंत्री शास्त्रीजी का देश को संबोधित पहला भाषण

हर राष्ट्र के सामने एक समय ऐसा आता है जब वह ऐसी जगह खड़ा होता है जहां से उसे एक इतिहास का चौराहा नजर आता है। और उसे यह तय करना होता है कि अब वह कौन सी राह चुने। मगर हमारे पास कोई संशय या संकोच का स्थान नहीं है। हमें दाएं या बांए देखने की भी जरूरत नहीं है। हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट नजर आ रहा है। जिसपर सामाजिक प्रजातंत्र का एक घर बनता हुआ दिख रहा है। जहां सभी के लिए स्वतंत्रता और समृद्धि है। साथ ही, विश्वभर में सभी देशों के साथ शांति और मित्रता बनाने का अवसर दिख रहा है।
लाल बहादुर शास्त्री, प्रधानमंत्री, भारत

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...