Sunday, May 6, 2018

मैं और वक़्त...


खुद में ही लम्हा-लम्हा सिमटता गया मैं 
बदलते वक़्त में कुछ यूं मिटता गया मैं 

फरमाइशें तो बहुत की थीं मेरे सपनों ने 
मगर हद में हर पल कुछ घटता रहा मैं 

चलो फिर जुगनू की तलाश में गुम हों 
पर बचपन के जोश को खोता रहा हूं मैं 

न जाने मुक़ाम कब मयस्समर होगी मुझे 
हर जंग में थोड़ा-थोड़ा निपटता गया मैं 

शिकायतें मेरी कभी सामने भी कह देना 
सच सुनने को ता-ज़िंदगी लिखता रहा मैं 

कभी फुर्सत मिले तो मुझे भी सुन लेना 
तुम्‍हारे इंतज़ार में बस ज़िंदा रहा हूं मैं  

मेरी क़लम ने मुझे कभी सोने न दिया 
स्याही की धार में बस चींखता रहा मैं...

Saturday, May 5, 2018

यादें, हमेशा साथ रहें...


झूठे-सच्‍चे हर किस्‍से यूं याद रहे 
कड़ी धूप में नेक इरादे साथ रहे

बातें बचपन की तुम भूल न जाना
नए सफर पर डगर वही है याद रहे 

कुछ ग़म की बातें मेरी सुन तो लो
मेरे अनुभव इसी बहाने तेरे पास रहे

तोहफे लेना-देना हम तो बिसरा बैठे
चिट्ठी की महक हमेशा यूं साथ रहे

क्‍या जानो बदली में तपन क्‍या है 
बैठो थोड़ी देर तो यह भी बात कहें..

Saturday, April 28, 2018

रिश्‍ते का गाढ़ापन...


रिश्‍तों की महत्‍ता उसकी पीड़ा में है। दर्द जितना ज्‍यादा हो, समझो रिश्‍ते में प्रेम उतना ही गाढ़ा है। किसी को खोने का डर हमेशा ही मन में कोलाहल सा ला देता है। यूं भी इन दिनों मन कुछ उदास सा रहता है। सोचता हूं, इतना दर्द तो कभी मन में ठहराया ही नहीं था तो आखिर ये मेरे हृदय में समाया कब? पापा की तबीयत ने मुझे कुछ डरा सा दिया है। पहले उनके टोकने से चिढ़ होती थी और अब उनकी खामोशी ने बेचैन कर दिया है। आजकल, पापा मुझसे कुछ कहते भी नहीं। मुझे विश्‍वास ही नहीं हुआ कि आज जब दोपहर में दुकान बंद करके खाना खाने घर पहुंचा तो उन्‍होंने घर में मेरे आते ही टीवी का रिमोर्ट मुझे थमा दिया। न बिक्री के बारे में कुछ पूछा और न ही कोई सलाह दी, जिससे मुझे चिढ़ रहती है। उनका यह बदला हुआ चरित्र मन में सैकड़ों सवाल खड़े कर रहा है। हर पल मुझे डरा रहा है। इस बीच बिहार में अपने पैतृक गांव जाने की बातें करना और हरिद्वार में दीदी-जीजा के घर हो लेने की इच्‍छा जताना, मुझे आशंका से भर दे रहा है। मोबाइल पर घर का नंबर दिखते ही मन कांप जाता है। शुक्र है, लबली सिर्फ खाने में क्‍या बनाना है, यही पूछती है। रात को सोते समय ऐसा लगता है कि मम्‍मी-पापा दोनों ही दरवाजा खटखटा रहे हैं। बीते दो-तीन रातों से आंख लगते ही कुछ ऐसा ही भ्रम मुझे जगा देता है। रात के सन्‍नाटे में छत पर टहलने लगा हूं, पापा को खोने का डर मेरी सारी इच्‍छाशक्‍ति को तोड़ दे रहा है। लेकिन, मैं इस बात को अच्‍छी तरह जानता हूं कि पापा ने जीवन में कभी किसी को खुद से जीतने नहीं दिया। अब उनकी बारी अपनी इस बीमारी को हराने की है और मुझे पूरा यकीन है कि वह ऐसा कर दिखाएंगे...

Friday, April 20, 2018

हवाई ख़िदमत

तस्‍वीर काल्‍पनिक है...गूगल इमेज का साभार है।

यह कहानी सत्‍य घटना पर आधारित है. दरअसल, यह मेरे पड़ोस की ही घटना है. सलीम (काल्‍पनिक नाम) पेशे से कसाई है. वह लोगों को मटन और चिकन काट कर मुहैया कराता है. लोगों को सलीम की काटी गईं बोटियों का साइज हमेशा ही पसंद है. सलीम भी सबके स्‍वाद और पसंद को जान चुका है. वह अपने ग्राहकों को दूर से देखते ही उनके मुताबिक, मांस काटने की तैयारी शुरू कर देता है. यही कारण है कि उसका यह पेशा मेरे बचपन से लेकर जवानी तक लगातार गुलजार रफ्तार से चल रहा है.
हालांकि, मुझे सलीम और उसके यहां काम करने वाले दो नौकरों की एक आदत हमेशा ही कचोटती रहती थी. और वह आदत यह थी कि वह दिन में एक बार धंधे की शुरुआत के समय अपने बकरे को दुकान से कुछ दूरी पर बने पशुशाला से पैदल ही लेकर चलता है. यदि सलीम नहीं तो उसके यहां काम करने वाले दोनों नौकर भी यही करते हैं लेकिन उसके बाद वह दिनभर अपनी बाइक से तेज रफ्तार में अपने बकरों को बांधकर दुकान पहुचाता है. पहले मैंने इस बात को यह सोचकर दरकिनार कर दिया कि हो सकता है कि सुबह के समय धूप कम रहती है इसीलिए वह पैदल ही चला जाता होगा. खैर, रोजमर्रा की जिंदगी में इतना बारीकी से देखना भी किसी गुनाह से कम नहीं है. हालांकि, मेरी इस बात को लेकर दिलचस्‍पी हमेशा ही बनी रही.
जो भी हो, किसी बात का खुलासा तभी होता है जब उसका समय आ जाता है. मुझे भी मेरे सवाल का जवाब मिल गया. काफी कुरेदने पर सलीम की दुकान के बगल में बरसों से दर्जी का काम कर रहे (राम सिंह) ने बताया कि सलीम जब भी पैदल ही अपना पशु लेकर दुकान आता है तो वह बकरा होता है और जब भी वह गाड़ी से आता है तो बकरी. मैं सलीम को और उसकी अपने ग्राहकों के प्रति दिखाने वाली 'हवाई ख़िदमत' के बारे में ही सोचता रह गया. सच है, हम जो सोचते हैं वैसा कभी होता नहीं है. इस छोटी कहानी का भी कुछ यही कहना है. यानी जो दिखे उसे हमेशा हक़ीक़त समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. 

Tuesday, April 10, 2018

मुझे आता है ऐसे ही जीना...


मेहनतकश हाथों पर बहता ठंडा पसीना 
फूलती सांसें औ पसीने से महकता सीना 
लड़खड़ातीं कोशिशों से मुश्‍किल है जीना 
राह रोकतीं मुसीबतें पर मंजिल बुला रही
सपनों को आवाज देकर मुझको जगा रही 
कुछ क़दम चलकर सुस्‍ताता हूं, मुस्‍काता हूं
यूं बढ़ती थकान के बीच हौसला बढ़ाता हूं 
मैं वो मजदूर हूं, जो हार स्‍वीकारे कभी ना 
मेहनतकश हाथों पर जब बहता है पसीना 
फूलती हैं सांसें और महक उठता है सीना
दो जून की सूखी रोटी और ढेर सारा सुकून 
गरीबी ने मुझे सिखा दिया है ऐसे ही जीना
मैंने शिकस्‍त को भी स्‍वीकारा कभी ना 
मुझे आता है ऐसे ही जीना... 
मुझे आता है ऐसे ही जीना...

Monday, April 9, 2018

अलविदा


कोपलों में अब भी कुछ हसरतें ले रही हैं करवटें 
नींद में भी गिनते रहे मखमली चादर की सिलवटें 
दोस्‍ती कुछ ऐसी हुई उनसे दुश्‍मनी के साथ-साथ
चार कदम चलकर वो खो गए घर जाती मोड़ पर
अब कुछ तो अहसास उनको भी हुआ ही होगा
वरना कोई यूं ही अलविदा कहकर रोता नहीं... 

Sunday, April 8, 2018

सलीका

बड़ा कठिन है धारा के खिलाफ तैरना
बहुत ही आसान है धारा संग बह जाना
सब कह देना ही कारगर तरीका नहीं
चुप रहना भी बोलने का एक सलीका है
नाराज होना तो पल भर का सरल जादू है
दर्द में हंस देना ही अनुभव है, खेल है
बात-बात पर बिदकना भी कोई जीना है
भटकाव को भी बहकाने का हुनर सीखो
देखो जिंदगी बदलती चली जाएगी...
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#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।  

मैं और वक़्त...

खुद में ही लम्हा-लम्हा सिमटता गया मैं  बदलते वक़्त में कुछ यूं मिटता गया मैं  फरमाइशें तो बहुत की थीं मेरे सपनों ने  मगर हद में...