Friday, April 20, 2018

हवाई ख़िदमत

तस्‍वीर काल्‍पनिक है...गूगल इमेज का साभार है।

यह कहानी सत्‍य घटना पर आधारित है. दरअसल, यह मेरे पड़ोस की ही घटना है. सलीम (काल्‍पनिक नाम) पेशे से कसाई है. वह लोगों को मटन और चिकन काट कर मुहैया कराता है. लोगों को सलीम की काटी गईं बोटियों का साइज हमेशा ही पसंद है. सलीम भी सबके स्‍वाद और पसंद को जान चुका है. वह अपने ग्राहकों को दूर से देखते ही उनके मुताबिक, मांस काटने की तैयारी शुरू कर देता है. यही कारण है कि उसका यह पेशा मेरे बचपन से लेकर जवानी तक लगातार गुलजार रफ्तार से चल रहा है.
हालांकि, मुझे सलीम और उसके यहां काम करने वाले दो नौकरों की एक आदत हमेशा ही कचोटती रहती थी. और वह आदत यह थी कि वह दिन में एक बार धंधे की शुरुआत के समय अपने बकरे को दुकान से कुछ दूरी पर बने पशुशाला से पैदल ही लेकर चलता है. यदि सलीम नहीं तो उसके यहां काम करने वाले दोनों नौकर भी यही करते हैं लेकिन उसके बाद वह दिनभर अपनी बाइक से तेज रफ्तार में अपने बकरों को बांधकर दुकान पहुचाता है. पहले मैंने इस बात को यह सोचकर दरकिनार कर दिया कि हो सकता है कि सुबह के समय धूप कम रहती है इसीलिए वह पैदल ही चला जाता होगा. खैर, रोजमर्रा की जिंदगी में इतना बारीकी से देखना भी किसी गुनाह से कम नहीं है. हालांकि, मेरी इस बात को लेकर दिलचस्‍पी हमेशा ही बनी रही.
जो भी हो, किसी बात का खुलासा तभी होता है जब उसका समय आ जाता है. मुझे भी मेरे सवाल का जवाब मिल गया. काफी कुरेदने पर सलीम की दुकान के बगल में बरसों से दर्जी का काम कर रहे (राम सिंह) ने बताया कि सलीम जब भी पैदल ही अपना पशु लेकर दुकान आता है तो वह बकरा होता है और जब भी वह गाड़ी से आता है तो बकरी. मैं सलीम को और उसकी अपने ग्राहकों के प्रति दिखाने वाली 'हवाई ख़िदमत' के बारे में ही सोचता रह गया. सच है, हम जो सोचते हैं वैसा कभी होता नहीं है. इस छोटी कहानी का भी कुछ यही कहना है. यानी जो दिखे उसे हमेशा हक़ीक़त समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. 

Tuesday, April 10, 2018

मुझे आता है ऐसे ही जीना...


मेहनतकश हाथों पर बहता ठंडा पसीना 
फूलती सांसें औ पसीने से महकता सीना 
लड़खड़ातीं कोशिशों से मुश्‍किल है जीना 
राह रोकतीं मुसीबतें पर मंजिल बुला रही
सपनों को आवाज देकर मुझको जगा रही 
कुछ क़दम चलकर सुस्‍ताता हूं, मुस्‍काता हूं
यूं बढ़ती थकान के बीच हौसला बढ़ाता हूं 
मैं वो मजदूर हूं, जो हार स्‍वीकारे कभी ना 
मेहनतकश हाथों पर जब बहता है पसीना 
फूलती हैं सांसें और महक उठता है सीना
दो जून की सूखी रोटी और ढेर सारा सुकून 
गरीबी ने मुझे सिखा दिया है ऐसे ही जीना
मैंने शिकस्‍त को भी स्‍वीकारा कभी ना 
मुझे आता है ऐसे ही जीना... 
मुझे आता है ऐसे ही जीना...

Monday, April 9, 2018

अलविदा


कोपलों में अब भी कुछ हसरतें ले रही हैं करवटें 
नींद में भी गिनते रहे मखमली चादर की सिलवटें 
दोस्‍ती कुछ ऐसी हुई उनसे दुश्‍मनी के साथ-साथ
चार कदम चलकर वो खो गए घर जाती मोड़ पर
अब कुछ तो अहसास उनको भी हुआ ही होगा
वरना कोई यूं ही अलविदा कहकर रोता नहीं... 

Sunday, April 8, 2018

सलीका

बड़ा कठिन है धारा के खिलाफ तैरना
बहुत ही आसान है धारा संग बह जाना
सब कह देना ही कारगर तरीका नहीं
चुप रहना भी बोलने का एक सलीका है
नाराज होना तो पल भर का सरल जादू है
दर्द में हंस देना ही अनुभव है, खेल है
बात-बात पर बिदकना भी कोई जीना है
भटकाव को भी बहकाने का हुनर सीखो
देखो जिंदगी बदलती चली जाएगी...
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#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।  

Saturday, July 8, 2017

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।    

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 
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आज का पोस्‍ट अवध के अश्‍लील इतिहास को बयां करता है. मगर यह कहना उचित होगा कि यह इतिहास भले ही अश्‍लील हो मगर नवाबों का रंगीन मिजाज और उनकी कला के प्रति प्रेम को बयां करने के लिए काफी कारगर है. यह प्रथा थी 'हिचकारे' की. आलम यह था कि हिचकारों को जितना धन नवाब और राजा देते थे उतना तो वे अपनी कनीजों और वेश्‍याओं पर भी खर्च नहीं किया करते थे. 

दरअसल, फैजाबाद में नवाब शुजाउद्दौला के हरम में बेतादाद स्‍त्रियों के प्रवेश, तरुण रति कामना में तमाम लड़कों को ख्‍वाजासरा (जनान-खाने की रखवाली करने वाला) बना देना आदि प्रक्रियाएं इसी सफर की शुरुआत कही जा सकती है. अवध के प्रथम बादशाह गाजाउद्दीन हैदरन अपनी सनकी व्‍यवहार व अफीम की लत के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, उनकी बेगमों की भी अच्‍छी खासी संख्‍या थी. वहीं, उनके बेटे बादशाह नसीरुद्दीन हैदर अपनी औरत परस्‍ती व एय्याशियों के लिए मशहूर रहे थे. नई-नई लड़कियों को ब्‍याह कर लाना उनका शौक था. यहां तक की एक समय के बाद उन्‍होंने दुल्‍हन को विदाई के लिए जाना भी छोड़ दिया था. शादी के नाम पर उनकी तलवार ही गाजे-बाजे के साथ ससुराल भेज दी जाती थी. फिर दुल्‍हन की डोली सीधे उनके शयन कक्ष में भेज दी जाती थी. 

इस तरह के रसिक क्रिया-कलापों को सबसे अधिक प्रोत्‍साहन मिला 'जान-ए-आलम' के जमाने में. इस दौर को अवध के इतिहास में विलासिता की पराकाष्‍ठा के तौर पर जाना जाता था. नवाब वाजिद अली शाह की पुस्‍तक परीखाना में इस विलासिता के बारे में काफी गहराई से वर्णन किया गया है. मर्दानगी बरकरार रखने वाली दवाओं के सौदागर आज तक वाजिद अली शाही गोलियां और किमाम उनके नाम से बेच रहे हैं. 

इन दवाओं के अलावा यौन इच्‍छा को बढ़ाने के लिए लखनऊ में एक नई परम्‍परा की शुरुआत की गई थी. इसे हिचकारों का नुस्‍खा कहा जाता है. हिचकारे एक पद हुआ करता था. इस पर मालिश करने वाले लड़कों की तैनाती की जाती थी. उनके पास स्‍त्रियों की अत्‍यधिक सोहबत करने से थके हुए लोगों में भी जोश जगाने का हुनर होता था. 

राजपूत युग में जिस तरह रणभूमि में उतरने वाले राजा का उत्‍साहवर्धन चारण या भाट किया करते थे उसी तरह अवध के पतनशील युग में रति क्रिया के दौरान नवाबों में जोश जगाने के लिए हिचकारे प्रयुक्‍त किए जाते थे. वे सहवास कर रहे नवाब के पलंग के नीचे लेट जाया करते थे. फिर जब पलंग के ऊपर नवाब संभोग कर रहे होते थे तब ये हिचकारे अश्‍लील काव्‍य गाकर उनमें जोश पैदा करते थे. हालांकि, उस दौरान उन्‍हें पलंग के नीचे से बाहर आने की इजाजत नहीं होती थी. ये अपने काव्‍य की रचना से पुरुष की मर्दानगी का खूब बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया करते थे. वे काव्‍य के बीच में तरह-तरह से अश्‍लील आवाजें भी निकाला करते थे. नवाबी दौर के गुंचा, दिलबर, प्‍यारे, घमासान गुलगुले आदि उस दौर के चर्चित हिचकारे थे. 
इन्‍हीं में से एक संगम नामक एक हिचकारे के अश्‍लील काव्‍य उस समय सबसे ज्‍यादा चर्चा में आए थे. संगम अपने हुनर में बहुत माहिर था. यहां यह बताना जरूरी है कि हिचकारों का प्रवेश कभी घर के आंगन में या ब्‍याहता बीबियों के संदर्भ में नहीं होता था. हिचकारे बाजारू औरतों के आस-पास या फिर देह संसर्ग के अन्‍य ठिकानों पर ही अपना काम करते थे.
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अंत में संगम के गाए अश्‍लील दोहे की एक झलक... 
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तन गोरा मुख सांवरा, बसे सरोवर तीर 
पहिल लड़ाई उइ लड़ें, एक नाम दुई बीर।
और करे अपराध कोई, और कोई फल पाहिं 
नैन सैन करि झुकि रहे, उरज उमेंठे जाहिं।  
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ)
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।

Wednesday, July 5, 2017

क्‍या खत्‍म हो जाएगा अफ्सपा कानून का फरमान?


नीरज तिवारी 

विवादित अफ्सपा (AFSPA) कानून को केंद्र सरकार धीरे-धीरे समाप्‍त करने की योजना में है. इस कानून को लेकर कई बरसों से विभिन्‍न सामाजिक संगठन आवाज बुलंद करते रहे हैं. हालांकि, सेना ने इसे देश विरोधी ताकतों को काबू में रखने का अचूक 'हथियार' ही माना है. सबसे पहले ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए अफ्सपा को अध्यादेश के जरिए 1942 में पारित किया था.
दरअसल, गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, आर्म्‍ड फोर्सेस स्‍पेशल पावर एक्‍ट यानी अफ्सपा को असम व अरूणांचल प्रदेश से टुकड़ों-टुकड़ों में हटाने की कोशिश में है. इस संदर्भ से मंत्रालय ने भाजपा शासित राज्‍यों से उनकी राय मांगी है. हालांकि, जम्‍मू कश्‍मीर में इस कानून को हटाने की रणनीति पर चर्चा नहीं की गई है. इस बारे में मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि अब राज्‍यों की राय का इंतजार किया जा रहा है. इसके बाद ही कोई उचित कदम उठाया जाएगा. इस बारे में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू का कहना है कि अरूणांचल प्रदेश से इस कानून को हटाने के लिए केंद्र पूरी तरह से तैयार है. हालांकि, नगालैंड व म्‍यांमार में इस राहत को लाने की कोई योजना नहीं है. 
बता दें कि अफ्सपा कानून के तहत आर्मी व अन्‍य केंद्रीय बलों को इसका पूरा अधिकार हासिल होता है कि वह विवादित क्षेत्रों में किसी को भी कानून की खिलाफत करने पर गोली मार सकते हैं. बिना किसी सर्च वॉरेंट के घरों की तलाशी ली जा सकती है. शक के आधार पर ही किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है. यही कारण है कि विभिन्‍न सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों को यह कानून रास नहीं आता है. वहीं, सेना ने इसे एक काबिल कानून की संज्ञा दे रखी है. यहां यह भी जानना जरूरी है कि यह कानून नगालैंड, असम, मणिपुर (इम्‍फाल के सात विधानसभा क्षेत्रों को छोड़कर) में लागू है. वहीं, अरूणांचल प्रदेश के 16 थानाक्षेत्रों में प्रभावित है. उधर, असम के तिरप, लौंगडिंग और चैंगलैंग जिलों में इस कानून को लागू किया गया है. इससे इतर त्रिपुरा ले वर्ष 2015 में इस कानून को अपने यहां से हटा दिया था. साथ ही, मेघालय का सीमावर्ती क्षेत्र जो असम के बीस किलोमीटर के दायरे में आता है वहां इसे लागू किया गया है. 
भारत में संविधान की बहाली के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रहे अलगाववाद, हिंसा और विदेशी आक्रमणों से प्रतिरक्षा के लिए मणिपुर और असम में वर्ष 1958 में अफ्सपा लागू किया गया था. वर्ष 1972 में कुछ संशोधनों के साथ इसे लगभग सारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में लागू कर दिया गया. अस्सी और नब्बे के दशकों में पंजाब और कश्मीर में भी राष्ट्रविरोधी तत्वों को नष्ट करने के लिए अफ्सपा के तहत सेना को विशेष अधिकार प्रदान किए गये. इस क़ानून के सेक्शन 3, 4, 6 और सेक्शन 7 पर विवाद रहा है. सेक्शन 3 के अंतर्गत केंद्र सरकार को ही किसी क्षेत्र को ‘डिस्टर्बड’ घोषित करने का अधिकार है. राज्य सरकारों की इसमें कोई ख़ास भूमिका नहीं होती. वहीं सेक्शन 4 आर्मी को बिना वारंट के हिरासत में लेने, किसी भी वाहन की जांच का अधिकार और उग्रवादियों के ठिकानों का पता लगाकर नष्ट करने का अधिकार देता है. सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम का सेक्शन 6 फ़ौज को संबंधित व्यक्ति की संपत्ति जब्त करने और गिरफ्तार करने का अधिकार देता है जबकि सेक्शन 7 के अनुसार इन मामलों में अभियोजन की अनुमति केवल केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृति के बाद ही होती है. 
साल 2005 में जीवन रेड्डी कमेटी और वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्टों में सेना और सुरक्षाबलों पर काफी गंभीर आरोप लगाए थे. इसी आधार पर अफ्सपा पर रोक लगाये जाने की मांग की गई थी, जिससे रक्षा मंत्रालय और सेना ने असहमति जताते हुए सिरे से नकार दिया. यह एक्ट सुरक्षा बलों को सशक्त करता है. इसी वजह से नगालैंड, पंजाब और कश्मीर में शांति बहाली में काफी सफलता मिली है. माना जाता है कि अधिकतर आरोप अलगाववादियों की साजिश के तहत लगाये जाते हैं और सिर्फ तीन फीसदी मामलों में ही सेना पर लगाए गए आरोप सही पाए गये हैं. जम्मू-कश्मीर के नेशनल कांफ्रेसं, पीडीपी और वाम दलों सहित देश के कई राजनीतिक दलों ने अफ्सपा एक्ट में संशोधन की मांग की है. हालांकि इस पर केंद्र सरकारों ने कभी सहमति नहीं जताई है. यही नहीं वर्ष 2000 में इम्फाल में कथित तौर पर असम राइफल्स के जवानों ने 10 लोगों पर गोली चला दी थी. इसके विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मीला पिछले 16 सालों से आमरण अनशन कर रही थीं. हाल में हुये विधानसभा चुनाव में भी उन्‍होंने इस कानून के खिलाफ लड़ने का मन बनाते हुए चुनाव लड़ने का मन बनाया था. मगर जनता ने उन्‍हें अस्‍वीकार करते हुए इतने कम वोट दिए जिससे उनकी जमानत तक जब्‍त हो गई. इसके बाद बुद्धिजीवी वर्गों में इस बात को लेकर बहस ने जोर पकड़ लिया था कि जनता की भलाई के लिए इतने बरसों तक अनशन करने के बाद जनता ने इतनी बुरी तरह से क्‍यों नकार दिया.  
इस विवादित कानून को लेकर अब तक कई कमेटियों का गठन किया जा चुका है. इसके तहत जनवरी 2013 में गठित की गई सतोष हेगड़े कमीशन ने मणिपुर में हुए छह एनकाउंटर की जांच की थी. आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए सभी लोगों में एक भी ऐसा आदमी नहीं था जिसका कोई आपराधिक इतिहास रहा हो. आयोग ने अपनी सिफारिश में यह भी कहा था कि इस कानून को 'डिस्‍टर्ब' क्षेत्र में लागू करने के बाद हर छह माह पर जरूरत के मुताबिक संसोधित किया जाना चाहिए. वहीं, जस्‍टिस जीवन रेड्डी आयोग ने अफ्सपा कानून को घृणा और उत्‍पीड़न का सबसे बड़ा साधन करार दिया था. हालांकि, केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई फैसला नहीं है. वहीं, अफ्सपा कानून के तहत किए गए एक एनकाउंटर की सुनवाई में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने अपने ऐतिहासि फैसले में कहा था, 'अफ्सपा कानून के तहत ऑर्म्‍ड फोर्सेस यदि किसी का एनकाउंटर करती है तो यह जांच का विषय होना चाहिए. इससे इस बात का कोई संबंध नहीं है कि गोली का शिकार एक आम आदमी है या आतंकी. कानून सभी के लिए समान है. लोकतंत्र को कायम रखने के लिए यह जरूरी है.'
यूं तो अफ्सपा कानून को लेकर तमाम तरह की समर्थन में या विरोध में दलीलें दी जा चुकी हैं. मगर किसी भी सेना से हाथ बांधकर आपराधिक तत्‍वों को शांत रखने की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है. ऐसे में अफ्सपा में कुछ संशोधन की बात तो जरूर की जा सकती है मगर इसे पूर्णतया हटा देना देश की आंतरिक सुरक्षा के नजरिये से उचित नहीं होगा. 

Tuesday, July 4, 2017

लखनऊ के चिकन का बड़ा रोचक है इतिहास

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 
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लखनऊ हमेशा से ही अपने इमामबाड़ों चिकन की कारीगरी के लिए जाना जाता है। इन दोनों के बीच का गहरा रिश्‍ता भी है। दरअसल, राजधानी के वजीरबाग के पास उजड़ा पड़ा 'मुगल साहिबा का इमामबाड़ा' अब उजाड़ नजर आता है। मगर यह इमामबाड़ा अस्‍तरकारी की कला का बेहतरीन नमूना है। इसे बेशुमार नर्मनाजुक गुलबूटों का एक संग्रहालय कहा जा सकता है। इस इमामबाड़े के दरवाजे और दीवार तो अब समय से लड़ते हुए व रखरखाव के अभाव में ढेर हो चुके हैं मगर इसके अवशेष को देखने पर ही इसमें की गई नक्‍काशीदार कारीगरी बरबस सोचने पर मजबूर कर देती है। आलम यह है कि चिकन के कारीगरों ने करीब 150 साल तक इसमें से डिजाइन को नकल कर चिकन के कपड़ों पर उकेरा है। आज भी इसकी टूटी-फूटी दरो-दीवार से चिकन की कारीगरी के लिए फूल व पत्‍तियों का डिजाइन नकल किया जाता है। 
फारसी का एक शब्‍द है चाकिन है। इसका अर्थ होता है बेलबूटे उभारना। यही शब्‍द भारत में चिकन का शब्‍द बन गया। साम्राज्ञी नूरजहां ईरानी नस्‍ल की वह शिया बेगम हैं जिन्‍होंने चिकन को अवध में नया आयाम दिलाया था। महल की दीवार व छतों पर की गई नक्‍काशी को कपड़ों पर उकेरने की कला इन्‍हीं की देखरेख में फला-फूला था। इस काम के लिए उन्‍होंने कुछ हुनरमंद औरतों को अपने हरम में तैनात कर रखा था। दिल्‍ली से लखनऊ आने पर उन्‍होंने राजधानी में चिकन के काम की नींव रखी थी। राजधानी का खदरा क्षेत्र चिकन शिल्‍प का जन्‍मस्‍थान माना जाता है। इसी क्षेत्र में शाहान-ए-अवध का रनिवास था जो हुस्‍नबाग कहलाता था या फिर 'दौलत सरा-ए-सुल्‍तानी' के नाम से जाना जाता था। मलिकाओं की इस जनानी कोठियों में उनकी कनीजों के हाथों चिकन कारीगरी का काम परवान चढ़ता रहा। नतीजतन, लखनऊ के डालीगंज के इसी 'मीठी खिचड़ी' नाम के इलाके की औरतों की इस कारीगरी का नमूना चिकन आर्ट लंदन के अलबर्ट म्‍यूजियम में रखा गया है। 
चिकन का काम अवध की औरतों का पसंदीदा काम रहा है। इस हुनर को महल की बेगमों ने अपनी खादिमाओं से सीखा था और फिर बहू-बेटियों को सिखाया। धीरे-धीरे महल का यह शौक गरीबों तक पहुंचने लगा। आलम यह हुआ कि एक समय के बाद मल्‍लिकाओं का यह शौक गरीब महिलाओं की आजीविका का साधन बन गया। राजधानी के मुफ्तीगंज, ठाकुरगंज, तोपखाना, टूड़ियागंज, हुसैनाबाद, चौपटियां, सआदतगंज, शीशमहल, रईस मंजिल, मौलवीगंज, रस्‍सीबटन, मदहेगंज और लाहौरगंज की पर्देदार औरतों ने इस कारीगरी को दुनियाभर में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। 
आजादी के बाद जनवरी, 1948 में महात्‍मा गांधी जी ने काखीतान वाले एक चिकन कारीगर को पुरस्‍कृत किया था। इसके बाद लखनऊ चिकन को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पुरस्‍कार दिए जाने लगे। वर्ष 1965 में लखनऊ के चिकन उस्‍ताद फैयाज खां अपने काम की बारीकी के लिए पहली बार राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सम्‍मानित किए गए थे. वहीं, साल 1979 में हसन मिर्जा साहब उर्फ पनके बाबू को यही सम्‍मान दिया गया। उनको 'अनोखी चिकन' का आविष्‍कारक माना जाता है। इस चिकनकारी में बारीक से बारीक कपड़े में भी बिना सुई पार किए कारीगरी की जाती है। यानी कपड़े के उलट में कारीगारी का कोई धागा या टांका नहीं दिखाई देता है। 
चिकनकारी में 36 तरह के टांकों का इस्‍तेमाल होता है जिनमें मुर्री, बखिया, उल्‍टी बखिया, जाली तेपची तथा धूमकटी, हथकटी, फंदा, चना-पत्‍ती, धनिया, लौंग, पत्‍ती, पंखड़ी, कील, बिजली और कंगन प्रमुख हैं। मगर इन दिनों चिकन का जो काम सस्‍ते दरों पर किया जाता है उसे बखिया कहते हैं। 
अवध के चिकन के प्रमुख खरीदार देशों में पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान, हॉलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्‍पेन, रूस, कनाडा, अमेरिका तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देश हैं। चिकन का ये सफर बड़ा लंबा है। कारीगर औरतों के बेबस हाथों में से होकर दलालों और व्‍यापारियों की मजबूत मुट्ठियों में से होता हुआ बाजारों में खरीददारों तक पहुंचा है। मगर दुख की बात यह है कि चिकन के ये कारीगर आज भी सरकारी उपेक्षाओं के चलते भुखमरी के शिकार हैं। 
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ, लेखक: डॉ. योगेश प्रवीन )
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।। (तस्‍वीर चिकन कारीगरी की।)

हवाई ख़िदमत

तस्‍वीर काल्‍पनिक है...गूगल इमेज का साभार है। यह कहानी सत्‍य घटना पर आधारित है. दरअसल, यह मेरे पड़ोस की ही घटना है. सलीम (काल्‍पनिक ना...