Friday, November 20, 2009

अभी नहीं तो कभी नहीं.

अभी नहीं तो कभी नहीं। सच मानिये बात अब बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की नहीं, पागल सांढ़ को नकेल कसने की है। यहाँ बात हो रही है शिवसेना की। कभी यहाँ हमला, तो कभी वहां हमला। जब चाहा किसी को भी अपने मुखपत्र के माध्यम से डरा दिया। धमका दिया। एक बार फिर इस दुस्साहसिक राजनितिक दल ने लोकतंत्र को बीच सभा में द्रौपदी की तरह अपमानित किया है। उसपर भी तुर्रा यह की खुल्लम-खुल्ला आईबीएन के मुंबई कार्यालय पर हमले की जिम्मेदारी लेते हुए। शर्म तक नहीं आई।
गलती किसकी है जो ये इतने हिम्मती हुए। इन्हें तब क्यों नहीं रोका गया जब ये पनप रहे थे। उसी समय अन्य राजनितिक दलों ने इन्हें पीछे से बल दिया। नतीजतन, आज ये आदेश देते हैं और लोकतंत्र के मुखिया गर्दन हिलाते है। इनके खिलाफ किसी प्रकार की कार्यवाई की मांग करना ख़ुद को धोखा देने सरीखा है। सभी जानते हैं की कोख में पल रहे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को जब हम नहीं रोक पा रहे हैं, तो इन्हें रोकना आसान नहीं। मगर मीडिया एक काम तो कर ही सकती है। वह है बहिष्कार। इस प्रकार के लोगों को समाज से निकाल फेंकने के लिए मीडिया को इन्हें तड़ीपार करना ही होगा। अन्यथा ये दिन प्रति दिन लोकतंत्र को दीन-हीन करते जायेंगे।
इससे इतर मान लेते हैं कि चैनल ने ग़लत रिपोर्टिंग की होगी। उसने सचिन के नाम को भुनाने कि कोशिश कि होगी। लेकिन शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने कौन सा अपने मुखपत्र 'सामना' के माध्यम से फूलों कि वर्षा कि थी। इसके अलावा यह भी तो एक सत्य है कि शिवसेना को सिर्फ़ आईबीयन ने ही ही नहीं लताड़ा था, बल्कि इसकी चौतरफा निंदा कि गयी थी। तो फ़िर यही चैनल क्यूँ। खिन ऐसा इसलिए तो नहीं क्योंकि आईबीयेन लोकमत एक मराठीभाषी चानेल होने के बावजूद सच कह गया।

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...