Tuesday, November 15, 2011

मुस्कुराने का बहाना तलाशो



हम अपनी रोज की समस्याओं में इतना उलझे रहते हैं कि जीवन का सबसे अमूल्य वरदान हंसना ही भूल जाते हैं। इस बात का एहसास तब जाता होता है जब किसी पार्टी में एक छोटी सी बात पर देर तक ठहाके लगाने के बाद कई लोग एक साथ कह बैठते हैं यार बहुत दिन बाद इतना हंसने का मौका मिला। यकीन मानिए ऐसे मौकों पर आजकल मुझे बड़ी कोफ्त होती है कि हंसने का बहाना ही नहीं तलाश पाते हैं लोग। फील गुड का एहसास ही नहीं जगा पाते हैं लोग। न जाने किस धुन में खो जाते हैं लोग कि हंसना ही भूल जाते हैं लोग। कई प्रकार के सर्वे में भी पता चला है कि हंसते-मुस्कुराते रहने से दिल की गंभीर बीमारियों से निजात मिलता है। हमें अपनी रोजमर्रा की समस्याओं से लडऩे के लिए आत्मिक शक्ति यानी औरा भी हासिल होता है। इसीलिए अब मैंने घर हो या बाहर हंसने और हंसाने का बीड़ा उठा रखा है। यकीन मानिए, आजकल खुब हंस रहा हूं और जमकर हंसा रहा हूं। हां, मैं मानता हूं कि कई लोगों को मसखरा स्वभाव नहीं पसंद है, वे खड़ूस बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं। ऐसे लोगों का भगवान ही भला करे......। लिखा कम है, समझिएगा ज्यादा।
फिर मिलेंगे, राम-राम:-)

Monday, May 16, 2011

अपनी पहचान की जंग



हम सभी जन्‍म से लेकर अपनी मृत्‍यु तक किसी मुकाम की तलाश में भागते रहते हैं। बचपन में बेहतरीन छात्र बनने की कोशिश, थोडा बडे हुए तो अपने दोस्तों के बीच में अच्‍छे खिलाडी बनने की चाह। अच्‍छा लगता है जब आप अपने किसी दोस्‍त की गेंद पर छक्‍के और चौकों की बरसात करते हैं या ऐसे ही किसी और आउटडोर या इनडोर गेम में दोस्‍त को हराने का चस्‍का आपको सफलता की सीढी के नजदीक ले जाता है। उम्र बढती जाती है और लक्ष्‍य बदलता जाता है। धीरे-धीरे करियर के चुनाव का पडाव आता है और हम उसमें भी अपने आस-पास की भेंड चाल से इतर किसी नए रास्‍ते पर चलने की योजना बनाते हैं। ये सारे गुण उन्‍हीं के होते हैं जो कुछ कर दिखाना चाहते हैं। ये सारी कवायद सिर्फ और सिर्फ अपनी पहचान बनाने की होती है। यकीन मानो दोस्‍त सारी कोशिश अपनी पहचान बनाने की है।



करियर के चुनाव के बाद उस रास्‍ते पर चलते रहने के बाद हमारी पहचान हमारे संस्‍थान में हमारे पद और हमारे काम के आधार पर तय कर दी जाती है। जाहिर है हमारी पहचान हमारे संस्‍थान के नाम के साथ सिमट जाती है। क्‍या इसे हम अपनी कामयाबी और पहचान का मापदंड कहेंगे। मेरे बहुतेरे दोस्‍तों का कहना है कि नहीं, जिंदगी तो वही है जिसमें हमारी पहचान हमारी अपनी हो। हम किसी संस्‍थान के नाम से न जाने जाएं। हमारी पहचान यही हो कि हम जिस संस्‍थान में रहें वह हमारे नाम से जाना जाए। पहली बार इस बात को सुनने के बाद बडबोलेपन का एहसास होता है। लेकिन, बाद में इस बात पर गौर करें तो काफी हद तक ये बात सही लगती है। पहचान तो यही होनी चाहिए कि हम जहां जाएं वह जगह हमारे में नाम से जानी जाए। हां, इस बात को साबित करने के लिए अथक परिश्रम के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं है। कुछ भी दुनिया की इस भीड में अपने नाम का सिक्‍का जमाना किसी जंग से कम नहीं है। अंत में फिर वही बात कहूंगा कि सारी कवायद नाम बनाने की है। अपनी पहचान बनाने की है। बशर्ते उस नाम पर कभी शर्मिंदा न होना पडे। उसे सुनते ही गर्व हो। उसे सुनकर किसी के मन में भय न पनपे। सारी कवायद नाम की ही है। :-)

Saturday, April 16, 2011

अपनी खासियत पहचानो दोस्‍त


इस धरती पर जन्‍में हर शख्‍स में कुछ खास होता है। कई उसे समय रहते ही समझ जाते हैं और कई पूरी जिंदगी खुद की खासियत की तलाश में ही जीवन बिता देते हैं। कभी कुछ करते हैं और कभी कुछ। ले-देकर उम्र बढती जाती है और वे यही नहीं समझ पाते हैं कि वो धरती पर आए क्‍यों हैं। मगर मेरा मानना है कि हर किसी में कुछ खास होता है। पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं। इसलिए दोस्‍तों समय रहते ही अपनी खासियत को पहचान लो। परंपराओं से हटकर सोचो और कुछ कर दिखाओ। यकीन मानो तुम में कुछ खास है।

इसका सबसे अच्‍छा उदाहरण आपको अपने बिते दिनों में या आस-पास के परिवेश में मिल जाएगा। बस समय है कुछ हटकर सोचने का। हल्‍का सा नजरिया बदलने का। अपनी खूबी को पहचानने का। वही इंसान बडा होकर एक इंजीनियर बन सकता है जिसे बचपन में टीवी देखने से ज्‍यादा मजा अपने स्‍कूटर को खोलने में आता है। एक लेखक वही बन सकता है जो बचपन में ही अखबारों में छपे लेख पर नजर गडाए घंटों बिता दे। किसी और को देखकर उसका प्रोफेशन अपनाने से कोई कामयाब नहीं हो सकता। वो सिफ टाइम पास कर सकता है मगर कुछ बडा नहीं कर सकता। एक इंटरप्रीन्‍योर कभी नौकरी नहीं कर सकता। एक फोटोग्राफर कभी भी अच्‍छा जर्नलिस्‍ट नहीं बन सकता और एक जर्नलिस्‍ट कभी भी फोटोग्राफी की बारिकियों को नहीं जान सकता। हालांकि, जहां चाह वहां राह की तर्ज को मानने वाले कुछ भी कर सकते है। फिर भी अपने अंदर की खूबी को पहचानना सीखो। करो वही जिसके लिए भगवान ने तुम्‍हें भेजा है। किसी भी फैसले को किस्‍मत मत कहो करो वही जो दिल में आए।।। क्‍योंकि, य‍कीन मानो तुम में कुछ खास है।।।। एक ऐसी खासियत जो और किसी में नहीं है।

हां, खास बात यदि आपने अपना ज्‍यादातर समय खुद की खासियत की तलाश में ही काट दिया है तो हरिवंश राय बच्‍चन जी की ऐतिहासिक पुस्‍तक 'मधुशाला' में लिखी लाइन 'राह पकड तू एक चलाचल पा जाएगा मधुशाला' को अपना जीवन सूत्र बना लीजिए।।।।।

Sunday, February 6, 2011

सकारात्‍मक सोच और टीनएज


यूं ही सोच रहा था कि इंसान अपने किस उम्र में सबसे ज्‍यादा सकारात्‍मक होता है। जिज्ञासा शांत करने के लिए उम्र के हर पडाव के बारे में सोचता चला गया। काफी माथा-पच्‍ची की तो लगा कि टीनएज की अवस्‍था ही वह अवस्‍था है जिसमें सकारात्‍मक सोच हम पर हावी रहती है। तभी तो जिंदगी की दिशा हम उसी समय तय कर लेते हैं। इस अवस्‍था में कुछ भी नामुमकिन नहीं लगता। सब कुछ आसान सा लगता है। शायद बॉलीवुड भी हमें यही समझाना चाहता है तभी तो गाना बना, दिल तो बच्‍चा है जी। आइए जानते हैं कि किस तरह मैं अपने इस निर्णय तक पहुंच सका.....

सकारात्‍मक सोच वाली उम्र की तलाश में मेरी नजर सबसे पहले बचपन पर पडी। इस अवस्‍था में सकारात्‍मकता और नकारात्‍मकता में विभेद करने की शक्ति ही नजर नहीं आई, क्‍योंकि इस अवस्‍था में हमें लक्ष्‍य खुद नजर नहीं आता बल्कि हमें हमारा लक्ष्‍य मां-बाप द्वारा दिखाया जाता है। हम वही करते हैं, जिसकी हमें आजादी होती है या जिसकी राह दिखाई जाती है। ऐसे में इस अवस्‍था से ऐसी सकारात्‍मक सोच की उम्‍मीद करना बेकार है। इसलिए इस विकल्‍प पर मैं ज्‍यादा देर तक नहीं रुक सका। आगे बढा तो नजर ठहरी जवानी पर। इस अवस्‍था को जिम्‍मेदारियों की पहचान का काल कहें तो बेहतर है। इस उम्र में हमें कदम दर कदम समस्‍याएं घेरती हैं, हमें इसी बीच मस्‍ती सूझती है और इंसान सही-गलत के चुनाव में भी पड जाता है। जो सही को चुना तो सफल और जो चूके तो समझो हुए चौपट। इसलिए इस अवस्‍था में हर चीज सकारात्‍मक लगता है, ऐसा कहना सही नहीं होगा।

इस विकल्‍प के बाद अगला पडाव दिखा बुढापा। इस अवस्‍था में मुझे सिवाए परिपक्‍वता और जिम्‍मेदारियों की इतिश्री से ज्‍यादा कुछ समझ में नहीं आया। मेरा सवाल अब भी मुझसे जवाब की मांग कर रहा था। मैं सोचता चला गया और अंत में विकल्‍प आया टीनएज। अचानक ही लगने लगा कि इसी उम्र में ही तो सपने हमेशा सकारात्‍मक लगते हैं। जी हां, उम्र की इसी अवस्‍था में हमें सभी सपने हकीकत सरीखे मालूम पडते हैं। कुछ भी कठिन नहीं लगता। बस एक धुन होती है सपनों को जीने की। और हम उसे जी जाते हैं। करियर का मनचाहा चुनाव कर भावी भविष्‍य की उधेड-बुन शुरू कर देते हैं। लेकिन, समय के साथ इंसान अपने टीनएज को खो बैठता है। उसे हर चीज नामुमकिन सी लगने लगती हैं। इसीलिए बेहतर है कि हम अपनी सोच को सकारात्‍मक बनाए रखने के लिए हमेशा उस टीनएज को जिंदा रखें। हालांकि, समय की मांग को देखते हुए परिपक्‍वता को भी अपनाते रहना चाहिए। क्‍योंकि, उस इंसान का कोई अस्तित्‍व नहीं है जो समय की आग में तपकर परिपक्‍व नहीं होना चाहता। इसलिए दोस्‍तों आप सबसे मैं यही कहूंगा कि उम्र के किसी भी पडाव में अपने उस टीनएज को जिंदा रखने की कोशिश कीजिए। विश्‍वास न हो तो जरा अपनी उस अवस्‍था के दिनों को याद करके देखिए। सब रंगीन सा लगने लगेगा। मंजिल को पाने की ख्‍वाहिश भी दोगुनी रफ्तार में दौड पडेगी।


इस शीर्षक के तहत मैं अभी और लेख लिखूंगा।।।।

Tuesday, January 18, 2011

यादों के झरोखों में मलाल का माहौल


खो गए हैं मौसम। बदल गया है माहौल। गुम हो गए हैं घरेलू पक्षी। बदल गया है रात का हाल। नहीं दिखते रात में टिमटिमाते तारे। इतना तीव्र और अनचाहा परिवर्तन हमारे कारण हुआ। प्रकृति हमसे सारी चीजें एक-एक करके वापिस लेती जा रही है। हम फिर भी मौन हैं। कुछ न करने की कसम खाए हुए हैं। सिर्फ कुछ यादों को सहेज के रखे हुए हैं। चार लोगों के बीच में उनकी चर्चा करते हैं कि भाई गौरैया नहीं दिखती, बचपन में खिचडी के दिन ठंड के कारण अम्‍मा से अक्‍सर नहाने के लिए डांट खाते थे। सभी एक साथ हामी भरते हैं। हां, खत्‍म हो गया वह माहौल। इसी के साथ जिम्‍मेदारियों की पूर्ति करते हुए हम अपनी अपने-अपने घर को रुख‍स्‍त हो जाते हैं।

सच कहूं तो मैं इन सबको बहुत याद करता हूं। बचपन में अचानक ही घर के अंदर गौरैया चहचहाते हुए घुस आती थी। हम भाई-बहन उसे घर से निकालने की कोशिश में उछल-कूद करते थे। जी में आता था कि पकडकर पाल लें उसे लेकिन पीछे से दादी या मां कहती थीं। उसे उसके रास्‍ते जाने दो। बेचारी डरी हुई है। हम मन मसोस कर रह जाते थे। न चाहते हुए भी घर का दरवाजा खोलकर उसे उधर की ओर भगाने की कोशिश करते थे। फिर हल्‍की सी हंसी के साथ उसे विदाई दे देते थे। गौरैया की उन यादों को हम सभी ने कभी जीया होगा।

आइए अब बात करते हैं, मौसम के बदल चुके मिजाज की। पहले सभी मौसमों की एक निश्चित तिथि हुआ करती थी। ठंड का मतलब ठंड, गर्मी का मतलब गर्मी और बरसात का मतलब होता जोरदार बरसात। हर मौसम की अलग-अलग तासीर और अलग-अलग मिठास। सभी का अपना मजा था। खिचडी के रोज, सुबह-सुबह उठते ही ठंड का कोपभाजन झेलना होता था। मां-पापा कहते थे, जल्‍दी से नहा ले मलिछ। आज पूजा का दिन है और हम कहते थे। हे भगवान, इतनी जोर की हवा चल रही है। उसमें भी दान-पूण्‍य। मर गए आज तो। कई बार तो उस दिन बारिश भी होती थी। बरसात का मौसम आते ही काले बादलों की बाढ सी आ जाती थी। छत पर बैठते हुए ठंडी हवा के तेज झोंकों में बाल उडते देखना और उसे महसूस करने का अपना ही मजा होता था। बारिश अब भी होती है लेकिन उसकी समयसीमा घट गई है। गरमी का मिजाज, अब कुछ ज्‍यादा गरमा गया है। इसकी समयसीमा बढती ही जा रही है। सभी मौसमों ने अपनी तारीखें बदल दी हैं। कोई आता है तो जाता नहीं और किसी के आने-जाने का एहसास ही नहीं होता। दिन-ब-दिन मौसम अपने मिजाज को खोते जा रहे हैं। हम फिर भी मौन हैं।

अब आइए रात की चर्चा करते हैं। रात में गर्दन को उपर उठाते ही ध्रूव तारा और सप्‍तऋ‍िषी के साथ आकाशगंगा की चमक को निहारने का मजा ही कुछ और होता था। तारों को देखकर हम भाई-बहन त्रिभुज और चतुर्भुज को तलाशा करते थे। एक से बढकर एक नक्‍शे देखते थे। जगमगाती थी हर रात। टिमटिमाते रहते थे तारे। मगर अब गाडी के धूंएं ने सबको ढांप लिया है। रात के कालेपन की खूबसूरती खो गई है। यूं लगता है जैसे इसका यौवन किसी ने चुरा लिया है। वो चोर कोई और नहीं, हम हैं।

हमने ही बदला है मौसम के मिजाज को। गौरैया सरीखी अन्‍य प्रजातियों की चिडियाओं को मार डाला हमने। कारण, प्रदूषण है। इस गंदगी के जनक हैं हम। अब सिवाए पछताने के हम कुछ नहीं कर सकते। हम सिर्फ उन पलों को याद कर स‍कते हैं। कवियों की कल्‍पनाओं में उन्‍हें पढकर वाह-वाह कर सकते हैं। हमने ही बदला है मौसम का मिजाज। प्रकृति ने अच्‍छा किया जो इन यादों को हमसे छीन लिया। आप तो उन्‍हें भूल गए हैं। मैं उन्‍हें भूल नहीं पा रहा हूं, आप ही बताएं मैं क्‍या करूं??.....

Friday, January 7, 2011

माँ की जिन्दगी


खिडकी की ओर से एक आहट हुई। किसी ने कहा, ओ साथी रे तेरे....। मैं लेटा हुआ था। गहरी नींद में था मगर जाग रहा था। झटके से उठ बैठा। पिता जी को देखा। बगल के कमरे में भइया को पढते देखा।
फिर सभी ने खिडकी की ओर देखा। फिर मुझे देखा। मैं पानी पीने के बहाने कीचन में चला गया। जब
वापस कमरे में आया तो देखा क‍ि पिता जी अखबार के बजाए घडी की सुईयों को पढ रहे थे। अचानक
ही बोल पडे, स्‍कूल का काम खत्‍म हो गया। मैंने कहा, हां..... वो तो स्‍कूल में ही समय निकालकर कर
लेता हूं। उसके बाद ही सोता हूं। पिता जी की जिज्ञासा कुछ ज्‍यादा ही थी। कह उठे, तो कापी लाओ,
जरा दिखाओ तो देखें कि हमारे सुपुत्र जी कितना समय का सदुपयोग करते हैं। मैंने कहा, आज स्‍कूल से काम ही नहीं मिला था। उन्‍होंने कहा, मैं अभी तुम्‍हारी मां से यही कह रहा था कि जनाब से कापी
मांगूंगा तो यही जवाब मिलेगा। खैर, अब क्‍या विचार है? मैंने कहा, विचार तो कुछ खास नहीं। सोच रहा था कि घर के बाहर हो आउं। दिन ढले इसके पहले ही लौट आउंगा। पिता जी की इच्‍छा थी कि आज सुताई कर दें। मगर मम्‍मी ने तुरंत कहा, जाओ मगर लौट आना समय से।
यह घटना हर रोज खिडकी पर आहट होते ही घटती थी। हमेशा की तरह उस दिन भी मैं घर से भाग
गया। निकलते ही अपने उस साथी से मिला और कल दूसरा गाना गाकर बुलाने को कह दिया। मगर मन में हमेशा एक सवाल रहता था कि पिता जी भी कभी लडके थे फिर मेरी खेलने की आदत को कभी समझ क्‍यों नहीं पाते। मम्‍मी तो गांव की हैं, उन्‍हें तो बचपन से ही घर में कैद रहना पडा होगा।
ऐसे में उन्‍हें कैसे पता चल जाता है कि मैं बाहर जाना चाहता हूं, खेलना चाहता हूं। किताबों से बगावत
करना चाहता हूं। सवाल मन में काफी समय से था जो अब पहाड का रूप लेता चला जा रहा था। मगर चंचल में कोई सवाल और उसका जवाब कभी ज्‍यादा देर तक टिकता नहीं। जाहिर है, इस सवाल को भी जवाब चाहिए था। फिर भी मन में शान्ति बनी रही। मगर कुछ देर के लिए। हर शाम का वही क्रम चलता रहा। इस बीच मैं स्‍कूल से कालेज और कालेज से जाने कहां-कहां घूमता रहा। दिन बदलते चले गए। मैं शाम के बाद होने वाली रात में खोता रहा। कभी छह बजते ही घर लौट आने वाला वो लडका आज के किशोर के रूप में दस-ग्‍यारह बजे की रात में भी घर पर नहीं होता था। खैर, वो अपनी मर्यादा जानता था क्‍योंकि उसके घर में संस्‍कार की जड काफी मजबूत थी। जिसे वो कभी नहीं छोडना चाहता। एक समय आया मैं अब जीवन में कुछ करने की चाह में घर से दूर जाने की सोचने लगा। धीरे-धीरे घर वालों से दूर भी होने लगा। मगर जिम्‍मेदारी के करीब रहना मेरा संस्‍कार था। पिता जी से इजाजत मांगी तो उन्‍होंने बिना कुछ कहे, इजाजत भी दे दी। कहा, जाओ। आओ या न आओ, तुम्‍हारी मर्जी। मेरे रोकने से रुकोगे तो पूरे जीवन ताना दोगे कि मेरे पिता ही मेरे दुश्‍मन हैं। खैर, मुझे इसमें उनकी नाराजगी कम और अपनी आजादी का फरमान ज्‍यादा सुनाई दिया। मगर आज मां कुछ नहीं बोली।
वो मेरा चेहरा देख रहीं थी कि मैं उन्हें छोडकर बाहर जा रहा हूं। मैंने मां से कहा, परसों शाम को दिल्‍ली जाउंगा। फलां ट्रेन से जाना तय हुआ है। मम्‍मी कुछ बेहतरीन बना देना। वो लाल मिर्च का अचार भी रख देना। वहां, बाहर से खरीदकर खाना होगा। मुझे आपके हाथ का ही बनाया हुआ अचार खाना है। मां बोली, रुक जा। क्‍यों जा रहा है? यहां किस बात कमी है? आज मां के मुंह से ऐसी बात सुनकर बचपन का वो तीखा सवाल जाग उठा। तुरंत पूछ बैठा, मम्‍मी आप तो कहती थी कि जाओ मगर समय से लौट आना मगर आज आप ही मुझे रोक रही हो। उन्‍होंने कहा, पता होता कि तू मेरे जाने देने से इतना दूर चला जाएगा तो उस समय भी अपना मार लेती। मैं कुछ समझ नहीं पाया कि मां किस मन की बात कर रही है। फिर पूछ बैठा, कैसा मन, मैं तो अपने घर से बाहर निकलने की बात करता था। मन की बात तो मेरी होती थी। इसमें आपका मन कहां से आया। अब वो रूंधे गले बोल पडीं, मैं तुझमें खुद को देखती थी। लगता था तू अपने दास्‍तों के साथ घर के बाहर नहीं है। मुझे लगता था कि मैं घर के बाहर खेल रही हूं। जो मैं करना चाहती थी। बचपन में। मगर तेरे मामा और नाना की आंखों का डर मुझे घर के बाहर कभी जाने ही नहीं देता था। हो भी क्‍यों न हम ब्राह्मण जो ठहरे। संभ्रांत ब्राह्मण। इसलिए मैंने तुझे कभी घर के बाहर जाने से नहीं रोका। मगर अब तू मुझे छोडकर जा रहा है। मैं जान गया कि मां मुझमें खुद को जी रही थी। आंखों के सपने मुझपर हावी थे, इसलिए खुद को रोक नहीं सकता था। मगर आज मां ने मुझे एक लक्ष्‍य दे दिया कि कभी किसी के मन को मत रोको। उसे वो सब करने दो जिसमें उसकी खुशी हो। तब से यही कर रहा हूं, लोगों को खुश रखने की कोशिश। मगर अब मुझे घर की याद आती है। मैं घर जाना चाहता हूं मगर जिम्‍मेदारी मुझे घर जाने से रोकती है। मां अब भी बुला रही है। उसे क्‍या पता कि मैं तो अब भी उनकी जिंदगी ही जी रहा हूं। मगर इस बीच मैं अपनी जिन्दगी कभी जी ही नहीं पाया........ फिर भी इस धरती पर मुझसे ज्यादा सुखी कोई नही है।

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...