Friday, May 28, 2010

डायरी में अनायास ही लिख दिया

यूं ही सोचा
घर चलूं
फिर सोचा किधर चलूं
मेरा घर तो छूट गया है
राह ने मुझे छत दिया है
सागर ने दे दी गहराई
जमीन से बिस्‍तर ले लिया है
आवारा हूं, बंजारा हूं पर वक्‍त का मारा नहीं
थका जरूर हूं मगर मैं अभी हारा नहीं
कोई तो मंजिल मुझे चूम लेगी
यही बस ख्‍वाहिश है
ए खुदा बस इतनी सी फरमाइश है
सोचा था घर चलूं
फिर याद आया किधर चलूं..................

1 comment:

Udan Tashtari said...

बढ़िया रचना,,

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