Saturday, January 17, 2015

विकृत बच्‍ची की कब्र को बना दिया मंदिर

बच्‍ची के जन्‍म के साथ ही शुरू हाे गया था धर्म का धंधा
उत्‍तर प्रदेश के लखनऊ जिले के सरोजनी नगर क्षेत्र स्थित मुल्लाहीखेड़ा गांव में 11 मई, 2000 दिन वृहस्पतिवार को को राम नरेश और श्रीमति के घर में ही एक विकृत बच्ची का जन्म हुआ। उस बच्ची का शरीर कुछ ऐसा था कि वह पलथी मारकर बैठी हुई थी। उस सिर उसके धड़ में धंसा हुआ था। बच्ची का ऐसा रूप देखकर ग्रामीणों में हलचल मच गई। चर्चा का बाजार कुछ ऐसा गर्म हुआ कि कुछ घंटे में ही लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। देखते ही देखते वहां लोगों ने चढ़ावा चढ़ाना शुरू कर दिया। मगर परिजनों के काफी जुगत के बाद भी उस अबोध को बचाया न जा सका। फिर क्या था, आस्था पर अंधविश्वास की चादर चढ़ गई और मुल्लाहीखेड़ा से ही सटे बिजनौर रोड स्थित ग्रामसमाज की जमीन पर बच्ची के शव को दफना कर कालीजी के मंदिर का निर्माण कर दिया गया।

और हो गया काली मंदिर का निर्माण
हर साल लगता है मेला
इस घटना के बाद परिजनों ने चंदा जमाकर और स्थानीय लोगों व ईट भट्ठों की मदद से एक मंदिर का निर्माण कराना शुरू कर दिया। जन्म से 24 घंटे के बाद से शुरू हुआ अंधविश्वास का यह पूजन आज मंदिर का रूप ले चुका है। बच्ची के पिता पेशे से नाई थे। मगर फिलवक्त वे एक कंपनी में मजदूरी करते हैं। वहीं, इस कथित मंदिर पर हर वर्ष नवरात्रि के समय एक मेले का आयोजन करते हैं। इस दौरान किसी वर्ष रामचरितमानस का पाठ किया जाता है तो कभी कीर्तन। इसके लिए बाकायदे चंदा जमा किया जाता है। लोग अपनी हैसियत के मुताबिक, उस बच्ची की कब्र से मुरादें मांगते हैं और भजन-पूजन करते हैं। 

मंदिर के विकास को लेकर है दुविधा
ग्रामसमाज की जमीन पर धर्म के नाम पर चल रहे इस काम के विकास के लिए लोग ज्यादा मदद नहीं करते। ऐसा कहते हैं बच्ची के दादा प्रेम और उसकी मां श्रीमति। उनका कहना है कि लोग धर्म के नाम पर अब भी चंदा देने से थोड़ा संकोच करते हैं। फिर भी मंदिर का विकास हर साल दो  कदम आगे की दिशा तय कर लेता है। पूरे परिवार का यही सपना है कि जल्द से जल्द इस मंदिर को भव्य रूप देकर उस विकृत बच्ची का सपना पूरा कर लिया जाए। हालांकि, उस नवजात के सपने के बारे में उन्हें कैसे पता चला के सवाल पर वे चुप्पी साध लेते हैं।

पिता पर होती है सवार
अन्य किस्से-कहानियों की तरह इस मंदिर के साथ भी एक कहानी पता चलती है। पूछने पर बच्ची के दादा प्रेम बताते हैं कि आज भी वक्त-बेवक्त उस बच्ची की आत्मा अपने पिता पर सवार हो जाती है। वह उनसे मंदिर का त्वरित निर्माण और उसके ज्यादा से ज्यादा प्रचार की आवश्यकता के लिए आदेश देती है। उस दौरान बच्ची के पिता लोगों के भविष्य के बारे में भी बताना शुरू कर देते हैं। कई लोग इस दौरान उनसे अपना भाग्य जानने के लिए एकत्र होते हैं और चढ़ावा चढ़ाकर लौट जाते हैं। यानी 24 घंटे तक जिंदा रहने वाली एक विकृत बच्ची ने परिवार को जीवन जीने का लक्ष्य और मंदिर के निर्माण का रास्ता दिखा दिया। हालांकि, इस पूरे मसले पर पूछने पर प्रधान संतोष सिंह कुछ नहीं बोलते। वे बस आस्था और लोगों के विश्वास की दुहाई देकर चुप हो जाते हैं।


एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...