Sunday, June 6, 2010

मैं अजनबी हूं

प्‍यार के दिल में मैं अजनबी हूं
पहचानो मुझे इश्‍क मैं वही हूं
तेरी हर खुशी का ख्‍याल है मुझे
पर तेरे लिए ही मैं कुछ नहीं हूं
यादों में अपनी ताक-झांककर
मैं वहीं हूं और कहीं नहीं हूं
जोर न दो जज्‍बात-ए-दिल पर
कभी तो तुम कहोगे, मैं सही हूं
बदलेंगे हालात मुझे यकीन है
कभी तो तुम कहोगे कि मैं वही हूं।

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ब्‍लॉगर साथियों मुझे दिल्‍ली में अपनी गजलों की किताब छपवानी है। मगर इस बारे में मुझे ज्‍यादा जानकारी नहीं है। हो सके तो इस बारे में मुझे सलाह दें। मैं आपका आभारी रहूंगा।

3 comments:

अनामिका की सदाये...... said...

sunder s.sahkt panktiya.

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया!

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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