Saturday, June 5, 2010

खुशी वो मुझे बेदाम दे गया

खामोश अदाओं से कोई साज दे गया
मैं निराश था वो मुझे आस दे गया
बौर देख ज्‍यों चिडिया चहक जाती है
ऐसी ही खुशी वो मुझे बेदाम दे गया
अब हमेशा होठों पर मेरी मुस्‍कान रहेगी
मुझ नासमझ को वो यही काम दे गया
जाना की रोशनी का अपना ही मजा है
मुझ बेनाम को वो 'नीरज' नाम दे गया
ऐसा नहीं कि मुझे हंसना नहीं आता
जिसे अपना कहा वही मुस्‍कान ले गया
पर अब भी उस हंसी पर हक मेरा है
आपसे जो मिला तो इमाम मिल गया

खामोश अदाओं से कोई साज दे गया
मैं निराश था वो मुझे आस दे गया
बौर देख ज्‍यों चिडिया चहक जाती है
ऐसी ही खुशी वो मुझे बेदाम दे गया
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इमाम के नाम समर्पित।
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ब्‍लॉगर साथियों मुझे दिल्‍ली में अपनी गजलों की किताब छपवानी है। मगर इस बारे में मुझे ज्‍यादा जानकारी नहीं है। हो सके तो इस बारे में मुझे सलाह दें। मैं आपका आभारी रहूंगा।

2 comments:

Shekhar Kumawat said...

bahut khub



फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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