Sunday, July 22, 2012

साजी, जांबाजी और अब अंदाजी ने छोड़ा साथ



नीरज तिवारी

मृत्यु होना स्वाभाविक है मगर कुछ मौतें ऐसी होती हैं जो किसी भी उम्र में हों फिर भी दिल में एक टीस सी दे जाती हैं कि भगवान ने उन्हें हमसे जल्दी ही छीन लिया। इन्हीं दुखद घटनाओं में हमने पिछले एक माह (13-06-2012 से 18-07-2012) में तीन हस्तियों को खो दिया। इस फेहरिस्त में सबसे पहले नाम आता है उम्दा साजी मेहंदी हसन (18-07-1927 से 13-06-2012, 84 वर्ष) का जिन्होंने अपने स्वर लहरियों से कई दशकों तक गजल की आराधना की और श्रोताओं के श्रवणों में अमर हो गए। इस दुखद घटना से अभी फिल्म जगत उबर भी नहीं पाया था कि ऊपरवाले ने बालीवुड को एक समय में अपने जांबाजी के दम पर जीतने वाले योद्धा एवं हिंदी फिल्मों के स्टार की रूप में दर्ज जांबाज दारा सिंह (19-11-1928 से 12-07-2012, 83 वर्ष) को हमसे छीन लिया। इस जांबाजी की मौत को बर्दाश्त कर ही रहे थे कि भगवान ने बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार एवं बेहतरीन अंदाजी राजेश खन्ना (29-12-1942 से 18-07-2012, 69 वर्ष) को भी अपने पास बुला लिया। यकीनन, ये सभी मौतें देशवासियों के लिए किसी रत्न को खो देने से कम नहीं है। इन मौतों की टीस सालों तक हमें सालती रहेगी। ...और यही वे मौतें हैं जो अपनी पूरी जिंदगी जीने के बाद भी अल्पायु में हुई मौत सा एहसास दे रही हैं।

अजीब इत्तिफाक है कि इन तीनों दिग्गजों में एक बात समान थी कि वे मध्यमवर्गीय परिवार की जरूरतों से लड़ते हुए इस मुकाम तक पहुंचे थे। सबसे पहले बात करते हैं गजल के बादशाह मेहंदी हसन की, जिन्होंने गरीबी में जीते हुए हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे का दंश झेलते हुए अपनी संगीत साधना को जारी रखा और देखते ही देखते सुरों की महफिल में एक अदीप्त सितारे के समान जगमगाने लगे। इनकी चमक ने न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि हिंदुस्तान का भी नाम दुनिया के कोने-कोने में रोशन कर दिया। इस अमर साजी ने अपने पूरे जीवनकाल में एक से बढ़कर एक तमगे जीते। इनमें पाकिस्तान के जनरल अयुब खान के हाथों दिया गया 'तमगा-ए-इम्तियाज' फिर जनरल जीयाउल हक द्वारा नवाजा गया 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस' और अंत में जनरल परवेज मुशर्रफ की ओर से दिया गया सम्मान 'हिलाल-ए-इम्तियाज' का नाम सर्वोपरी है। इसके अलावा भी उन्होंने कई पुरस्कारों को अपनी झोली जगह में दी, जिनमें भारत के जालंधर में वर्ष 1973 में नवाजा गया 'सहगल अवार्ड', नेपाल में वर्ष 1983 में नवाजा गया 'गोरखा दक्षिणा बहु' भी शामिल हैं। हसन साहब वर्ष 1957 से लेकर 1999 तक संगीत की आराधना कर श्रोताओं का दिल जीतते रहे। मगर अपनी नासाज तबीयत के कारण इन्होंने वर्ष 1999 के बाद से गजल गायकी लगभग बंद ही कर दी। वे फेंफड़े, छाती और यूरीनरी संबंधी बीमारी से बुरी तरह से ग्रसित थे। इनके जीवन का एक दुखद पहलु यह भी है कि लंबे समय तक दुनिया में गजल उस्ताद रहे मेहंदी हसन अंत में अकेलेपन और आर्थिक तंगी के शिकार हो गए थे। विश्व के लिए हसन साहब की मौत यकीनन एक अदीप्त सूर्य के बादल में ढंक जाने से जैसा ही है क्योंकि इनके सुर आज भी हमें उनके जिंदा होने का एहसास कराते हैं।

इस फेहरिस्त में दूसरे पायदान पर काबिज हैं भारत का नाम कुश्ती के क्षेत्र में अमर करने वाले दारा सिंह का। इनका जन्म वर्तमान में अमृतसर के धर्मुचक गांव में हुआ था। जीवन के 83 बसंत देखने वाले इस भारतीय ने अपने समय में लंबा संघर्ष और अथक प्रयास करते हुए बॉलीवुड में अपना कीर्तिमान दर्ज कराया था। कुश्ती में तत्कालीन विश्व विख्यात किंग-कांग को मात देने वाले दारा सिंह ने बॉलीवुड में भी लंबी पारी खेलते हुए अपने फौलादी शरीर के दम पर दर्शकों का दिल जीत लिया। इन्होंने अपने जीवनकाल में कई उपाधियों को अपने नाम दर्ज किया। इनमें 'रूस्तम-ए-पंजाब', 'रूस्तम-ए-हिंद' और 'आयरनमैन ऑफ इंडियन सिनेमा' का खिताब है। इन्होंने अपना करियर तीन चरणों में जीया था। इनके करियर का पहला चरण बतौर कुश्ती पहलवान के रूप में (1946-1983), दूसरा अभिनेता के रूप में (1952-2012) और बतौर तीसरा राजनीतिज्ञ के रूप में (2003-2009) तक रहा था। सिख धर्म के इस पहलवान ने टेलीविजन की दुनिया में चार चांद लगाते हुए भारतीय टेलीविजन जगत के अमर धारावाहिक 'रामायण' में भगवान हनुमान के चरित्र को इस कदर जीवंत कर दिया था कि बाजारों में इनकी तस्वीर हनुमान जीके रूप में बिकने लगी। इन तस्वीरों को कई चहेतों ने अपने घरों में मंदिर तक में जगह दे डाली। इस तरह अपनी ख्याती में बढ़ोत्तरी करने के बाद इन्होंने देश के कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण की। इस तरह इन्होंने अपने जीवन को अमर करते हुए देशवासियों के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ दी, जो चीरकाल तक हमें सालती रहेगी। वे हृदयाघात लगने के बाद काफी इलाज के बावजूद भी नहीं बचाए जा सके थे।

इन दो मौतों के दर्द को अभी झेल ही रहे थे कि बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार के रूप में जाने जाने वाले राजेश खन्ना जी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। बॉलीवुड के लिए इस दर्द को सहना सबसे ज्यादा कठिन रहा। इस नामी सितारे को अकेलेपन ने मार दिया। एक समय में लोगों के दिलों पर राज करने वाले एक साधारण युवक राजेश खन्ना ने एक टैलेंट हंट शो के जरिये बॉलीवुड में मौका पाने के बाद उस जमाने के नामी सितारों की रोशनी को हल्का कर दिया और बॉलीवुड में प्रेम दृश्यों को एक नया आयाम दिया। इन्होंने न सिर्फ बॉलीवुड में बनायी जा रही तत्कालीन फिल्मों को नया आयाम दिया बल्कि फिल्मकारों को अमीरों के प्रेम पर आधारित कहानियों से हटाते हुए मध्यमवर्गीय परिवार में पलने वाले प्रेम के प्रति आकर्षित किया। देखते ही देखते इन्होंने अपने कदमों में कीर्तिमानों की झड़ी लगा दी। वैवाहिक जीवन का भरपुर सुख न उठा पाने वाले इस सुपरस्टार ने हिंदी फिल्मों में कुछ पात्र तो ऐसे जीवंत कर दिए कि वे फिल्म जगत में सदा के लिए अमर हो गए। इनकी एक झलक के लिए लड़कियां मुंबई स्थित इनके घर के बाहर घंटों खड़ी रहती थीं। कहा जाता है कि खून से लिखे खतों का इनके घर आने का सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। यही कारण है कि इस अनमोल 'नगीने' की मौत ने पूरे देश को गम के साये में डुबो दिया। सभी घंटों तक टीवी पर नजरें लगाकर इनकी मौत की खबर सुनते रहे। बड़ी संख्या में इनकी शव यात्रा में शरीक होकर अपना प्रेम दर्शाया।

इन तीनों ही जिंदगियों का लखनऊ से बड़ा ही गहरा रिश्ता रहा। लखनऊ की तहजीब और लाजवाब खानपान के दीवाने इन सितारों की मौत ने अवधवासियों को भी झकझोर दिया। देश इन हस्तियों और इनकी प्रतिभा को युगों-युगों तक याद करता रहेगा। शायद यही कारण है कि ये सितारे जीए तो अपनी पूरी जिंदगी मगर इनकी मौत हमें अकास्मयिक और अल्पायु में हुई मृत्यु सा आभास कराती रहेंगी।


Wednesday, July 11, 2012

बिल्‍ली शेर को खा गई, वो बदकिस्‍मती को भा गई

[मेरे एक मित्र प्‍यार के शिकार हो गए। काफी दिनों के बाद अचानक मिल गए तो मैंने लपक लिया। पूछा, कहां थे बंधुवर,  तो बोल पडे मत पूछो यार हम क्‍या से क्‍या हो गए। कभी चौतरफा चिल्‍लाते थे आज मुख-बधिर से बीमार हो गए। हालत जनाब कि बयां कर रही थी कि प्‍यार का शिकार हैं। हमने चुटकी ली तो भरे मन से  सुनाते चले गए अपना हाल-ए-दिल।............... अब पेशेवर पत्रकार हूं तो खुलासा कर रहा हूं कि उन्‍होंने क्‍या कहा। एक सेकेंड, इसे स्टिंग मत समझिएगा उनसे पूछकर ही छाप रहा हूं। दोस्‍त हैं वो मेरे। इसका गुमान है मुझे।]

नोट: आगे के शब्‍द मेरे गुमनाम दोस्‍त के हैं.......... तो पढिए।

बडा मजा आया कुछ दिन की गुमनामी में। ये गुमनामी कुछ दिन नहीं, महीनों चली। कभी इंसान बना, कभी भगवान और कभी कुत्‍ता। हाए, वो चीज ही ऐसी है कि रूप लेता चला गया और खुद को खोता चला गया। मगर याद बहुत आई......... आप सबकि जनाब। आखिर आती भी क्‍यों न आपने मुझे उसी रूप में स्‍वीकारा जिस
रूप में मैं हूं। कम से कम कठपुतली का नाच नचाने की कोशिश तो नहीं की। हाए.................. आइए आपको बताता हूं कि इन दिनों किस घाट का पानी पी रहा था। खैर, रहने दीजिए घाट की बात। इन दिनों क्‍या नहीं कर सका वो जानिए......... सबसे ज्‍यादा जो काम करता था वो काम नहीं कर सका यानी सुकून से रहना। लोगों को खुश रखना। खुश रहना। बीच में लक्ष्‍य से भटकाव का एहसास हुआ तो सोचा शायद यही लक्ष्‍य है। मगर वो लक्ष्‍य नहीं मरिचिका थी। हाए.................................... । समय-समय पर सोचा कि शायद मैं गलत हूं। मगर कोई अपनी गलती को स्‍वीरकारता कहां है। खैर, दुनिया का नियम भी है कि जो दुत्‍कारे उसी के पास जा प्‍यारे, तो जाने दिया। सच कहूं तो मैं भी दुत्‍कारा गया। कभी शब्‍दों से कभी बातों से मारा गया। मगर कुत्‍ता बनना तय था तो क्‍या करते। उसे कभी मेरा भरोसा न था। उसे मैं चटनी लगता था। खैर, मैं चटनी नहीं पूरी थाल हूं। इस बात का एहसास उसे अब कहां होगा। देखा फिर भटकाव आ गया नीरज भाई। मुझे शायद वो साबुन समझती है, जिससे हाथ धो लो और बाथरूम, फ्लस या वॉश बेसिन में बहा दो। मगर मैं तो घी हूं न। जब हाथ में लगूंगा तो चिकनाई दिखाउंगा ही। मुझे कोई इस्‍तेमाल नहीं कर सकता। खैर, मैंने बात को काटा और पूछा हुआ क्‍या? तो बोले मुझे भी नहीं पता।कहानी का अंत क्‍यों किया, तो बोले वो समझती ही नहीं मुझे। मजाक और मुझमें बडा अंतर है। अस्‍ितत्‍व खो सकता हूं स्‍वाभिमान नहीं। मैं समझ गया कि मामला कुछ ज्‍यादा ही गंभीर है तो ज्‍यादा छेडा नहीं। बस इतना कहकर उन्‍हें समझा दिया कि कोई बात नहीं बेटा बिल्‍ली शेर को खा गई, वो बदकिस्‍मती को भा गई जो उसने तेरा प्‍यार ठुकरा दिया। इतना प्‍यार तो कोई पत्‍थर से भी कर देता तो आलम ये होता कि वो जी उठता। मगर राह पकडने से पहले मंजिल और मरिचिका में अंतर पहचानना सीखें। फिर जीने की कोशिश करें।दोस्‍त का चेहरा उदास था, मेरा वो बडा खास था। मगर उसको खुद में ज्‍यादा
विश्‍वास था, तो हमने कहा, मौज करो यार! झटके में भी अब मत करना प्‍यार।

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...