Friday, February 6, 2015

किरण ने 'बेदी' के लिए तमगा 'त्यागा'

नीरज तिवारी
कभी केजरीवाल की जय-जयकार करती थीं किरण बेदी
दिल्ली के दंगल में एक बात तो साफ है कि इस चुनावी रणभेरी में कई चेहरे बेनकाब हो रहे हैं। मसलन, किरण बेदी, जिन्होंने अपने करियर में हमेशा ही झूठी उपलब्धि हासिल करके रखी कि उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी का चालान किया था। उन्होंने सालों तक यह बात छुपाकर रखी कि उन्होंने वह चालान नहीं किया था। उन्होंने कभी भी किसी भी मंच से खड़े होकर इस बात को स्वीकार नहीं किया कि उनके बारे में जो यह निर्भयी आईपीएस अफसर होने की गाथा गाई जाती थी वह गलत है। उन्होंने हमेशा ही इस इतिहास को अपनी सफलता का तमगा बनाए र
खा। अलबत्ता उन्होंने अपने इस कथित इतिहास को अपने ट्वीटर अकाउंट की प्रोफाइल में सजा रखा था। इसमें यह बात जानने योग्य है कि ज बवह आम आदमी पार्टी के मंच से भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ जहर उगला करती थीं तब भी वह अपनी इस झूठी गाथा को लोगों के सामने बयां नहीं कर पाईं। उन्होंने दूसरों पर तमाम तरीके के आरोप तो मढ़े लेकिन कभी अपने गिरेबान में झांक कर देखने की जरूरत नहीं समझी। हो सकता है कि एक अच्छी महिला आईपीएस अफसर हों। हो सकता है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कई झंडे गाड़े हों, मगर यह तो अब कभी भी नहीं हो सकता कि वह इंदिरा गांधी के अपने प्रकरण के बारे में जनता से आंखें मिला सकें। उन्होंने अपने इस एक झूठ से दिल्ली की जनता के साथ ही बड़ी संख्या में लोगों का दिल तोड़ा है। इत्तिफाक से इसमें मैं भी शामिल हूं।

समय को देख बदलती गईं फैसला
दरअसल, आम आदमी पार्टी के मंच के ऐसे ही कई सितारों ने राजनीति की दिशा में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने के साथ ही यदि अपने अंदर छुपे ही भ्रष्ट मानसिकता को भी त्याग दिया होता तो ऐसी घटनाओं के बारे में पुनरावृत्ति होने के आसार ही नहीं होते। अच्छा हुआ जो किरण बेदी ने भाजपा का दामन थाम लिया। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यदि चुनाव के बाद मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल और योगेंद्र यादव यदि किरण बेदी को मनचाहा पद न देते तो उनके दल के अंदर और भी भयावह दलदल बन जाता। जो केजरीवाल के दल के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता। दरअसल, किरण बेदी के अंदर पद और चर्चा में बने रहने की भूख कभी खत्म नहीं हुई। यदि ऐसा न होता तो किरण अपनी आईपीएस की बेदी पर बैठे रहने के दौरान इंदिरा गांधी प्रकरण का उजागर कर चुकी होतीं। वह अपने रिटायरमेंट से कुछ समय पहले किसी और को दिल्ली का डीजीपी बनाए जाने पर नाक-भौं न सिकोड़तीं। वह केजरीवाल के साथ बने रहतीं। उन्हें जब लगा कि अन्ना आंदोलन से जुड़कर वह सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए मीडिया में सुर्खियां बटोर लेंगी तो उन्होंने अन्ना हजारे के साथ मंच साझा कर लिया। जब उन्हें यह लगा कि वह अन्ना के साथ रहकर कोई बड़ा लाभ नहीं हासिल कर पाएंगी तो उन्होंने अरविंद केजरीवाल और स्वयंभू समाजसेवियों के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी की नींव डाल दी। मगर उनकी इच्छाओं का अंत यहीं नहीं हुआ। उन्हें एक बार फिर जब यह एहसास हो गया कि केजरीवाल की पार्टी में मुख्यमंत्री का पद सिर्फ केजरीवाल ही हासिल करेंगे तो उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए पहले किरण बेदी ने अन्ना हजारे के विचारों को अपनाया। फिर उनकी खिलाफत करते हुए अरविंद केजरीवाल को सही करार दिया। और अब तो हद ही हो गई क्योंकि संसदीय चुनाव के दौरान जिन नरेंद्र मोदी को झूठा, फेंकू और गुजरात के नाम पर लोगों को बरगलाने वाला करार दिया था। आज वह उन्हीं मोदी की तारीफ करते नहीं थकतीं। उन्होंने भारत देश की उन असंख्य बेटियों का ख्वाब तोड़ा है जो यह मानती आ रही थीं कि उन्हें अपनी शिक्षा और काबिलियत के दम पर किरण बेदी की तरह नाम कमाना है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि किरण बेदी ने भाजपा का चोला ओढ़ने के साथ ही एक मंच से बयान दिया था कि उनकी यह किस्मत है कि उन्हें भाजपा ने अपना लिया। यानी वह तो किस्मत का दिया ही खा रही हैं। उन्होंने कोई भी सफलता अपनी मेहनत के दम पर हासिल नहीं की है। बेहतर होगा कि दिल्ली की जनता को ऐसा मुख्यमंत्री न मिले। किरण बेदी हार जाएं तो उन्हें इस बात का इल्म हो जाएगा कि उन्होंने लोगों के सामने झूठी शान का दिखावा करके अपनी कितनी बड़ी ख्याति और साख खो दी है। 

अदूरदर्शी हैं केजरीवाल
वहीं, आप के सिरमौर अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनावी घोषणापत्र को जिस अंदाज में जनता के सामने परोसा है उसे देखकर लगता है कि आप वाले बिना किसी विश्लेषण के ही नतीजे हासिल कर लेते हैं। कमाई का श्रोत कम और घोषणाओं का अंत ही नहीं होता। लोगों को आज की तारीख में झूठ बोलने वाला भी ऐसा चाहिए जो यह जानता हो कि आटा गूंथने के लिए कितने पानी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह तो सही है कि कोई भी चुनावी घोषणापत्र किसी भी दल के नेता द्वारा जीत जाने के बाद पूरा नहीं किया जाता। मगर जनता से ऐसा भी क्या झूठ बोलना कि वे आप पर हंसने लगें। अंत में मैं केजरीवाल को किरण बेदी और बिन्नी जैसे पद के लालची लोगों से दूर रहने की सलाह देने के साथ ही यह सुझाव भी देना चाहूंगा कि बेहतर होगा यदि वह लोगों को विकास का पथ दिखाने से पहले उसके काल्पनिक पहलुओं को भी जांच लें। इस दंगल में भाजपा ने किरण बेदी पर दांव लगाकर उन्हें बली का बकरा तो घोषित कर ही दिया। साथ ही, केजरीवाल ने अपने मैनिफेस्टो के आधार पर यह जता दिया कि उनमें दूरदर्शिता का अभाव कूट-कूटकर भरा हुआ है।

चुटकुला तो बनता ही है...
अंत में एक चुटकुला याद आ गया, केजरीवाल ने किरण बेदी को एक चिट्ठी लिखी कि क्या बेदी जी आप यदि हमारी पार्टी में रहती तो कम से कम आपसे इंदिरा गांधी का चालान करने का तमगा तो कोई न छीनता। आपने तो भाजपा को अपनाते ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि को गंवा दिया। अभी भी समय है नहीं तो यह भाजपा आपसे कहीं पहली महिला आईपीएस होने का भी गौरव न छीनवा ले। 
आपका शुभचिंतक 
अरविंद केजरीवाल
रायते कर शौकीन, आम आदमी

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प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...