Monday, June 11, 2012

लेखकों को बदलनी होगी 'लेखनी'

नीरज तिवारी
किताबों के प्रति घटती लोकप्रियता चिंता का विषय है। युवा अब किताबों से दूरी बनाने लगे हैं। ज्ञान के इस अथाह सागर में गोते लगाने से परहेज करने लगे हैं। वे इससे दूर जा रहे हैं। लखनऊ की लाइब्रेरियों में भी अब पहले की तरह युवाओं की भीड़ नहीं उमड़ती। उमड़ती है तो सिर्फ सेवानिवृत्त बुजुर्गों की कुछ संख्या। किताबों के प्रति घटते इस लगाव को सिर्फ साहित्य का ही हनन नहीं कहा जा सकता। यह हनन है हमारे विचारों का। किताबों के पन्नों में काले अक्षरों में छुपे जीवन के सार का, जिसे पढऩे और अपनाने से लोग चूकने लगे हैं। वे इसे बोझिल मानने लगे हैं। ऐसा क्यों? किताबों के प्रति रूचि की गिरावट का विश्लेषण करना चाहिए। अब समय आ गया है कि लोगों को एक बार फिर किताबों की ओर आकर्षित किया जाए। शायद इसका कारण है लोगों को बदलते परिवेश के हिसाब से मनचाहा विषय न मिल पाना। विषयों के प्रति युवाओं के मन को टटोलते हुए लेखकों का न लिखना। ऐसे में उन्हें किताबों के इस मंच से जोडऩा काफी दुष्कर होता जा रहा है। युवाओं को अब हिंदी की किताबों में दिलचस्पी नहीं रही। वे अब भावनात्मक और गरीबी-अमीरी को दर्शाने वाले विषयों पर लिखी गईं पुस्तकों से कतराने लगे हैं। जाहिर, पुस्तक के मंचों पर भीड़ घटेगी ही।
सालभर कहीं न कहीं पुस्तक मेले आयोजित होते रहते हैं। इन मेलों में देशी पुस्तकों के प्रति लोगों का झुकाव क्ष्णिक होता है। वे अमुक लेखक की पुस्तक सिर्फ इसलिए खरीद लेते हैं कि अक्सर वे उनका नाम चर्चाओं में सुनते रहते हैं। मेरे एक पुस्तक के प्रेमी मित्र ने कहा था कि अक्सर पाठक पुस्तक की दुकानों में जाकर भावावेश में किताबों का चयन करता है। इससे वह नए विषयों को पढऩे से चूक जाता है। ऐसे में यदि पुस्तक उसके सामयिक विषयों को दर्शाती है तो ठीक अन्यथा वह किसी अलमारी या घर के सेंटर टेबल की शोभा बढ़ाने के काम आ जाती है। युवाओं में किताबों के प्रति घटती दीवानगी का यह दूसरा कारण हो सकता है। यानी भावावेश में आकर विषयों को चुनने के बजाय सिर्फ लेखक के नाम पर पुस्तक को खरीद लेने का चलन। इससे जाहिर है नए पाठकों को सदैव के लिए किताबों को पढऩे के प्रति प्रेरित नहीं किया जा सकता।
इन कारकों के अलावा भी पुस्तकों के प्रति घटते रूझान के कई कारक हैं। इनमें समय की कमी के बीच और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच मोटी-मोटी किताबों को सीने से लगाए रखने के लिए समय न निकाल पाना मुख्य कारक हो सकता है। साथ ही, मनोरंजन के साधनों में बाढ़ की तर्ज पर विकल्पों का भरमार होना सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है। मगर मेरा मानना है कि पुस्तकों के प्रति जिसके मन में जरा सी भी श्रद्धा होगी वह कहीं न कहीं से समय का जुगाड़ कर किताब के पन्नों को उलटने-पलटने का समय निकाल ही लेता है। ऐसे में हम इस लेख में सिर्फ उन्हीं की बात करेंगे जो पुस्तकों को पढऩे और विषयों को तलाशने में रूचि रखते हैं।
अब बात करते हैं विषयों के प्रति लोगों में कौन सा विकल्प सबसे ज्यादा अपनाया जा रहा है। इस दिशा में सोचने पर पता चलता है कि लोगों में अब चंद्रकांता और भूतनाथ सरीखे जादू-टोने वाले विषयों को पढऩे का कोई लगाव नहीं रह गया है। वे अब रिश्तों को पर्दे के पीछे से देखने वाली दब्बू महिला और दबंग पुरुष की जीवनशैली और उठापटक वाले विषयों पर आधारित पुस्तकों को भी नहीं पढऩा चाहते। वे गरीबी पर 'पीएचडीÓ कराने वाली कहानियों को भी नहीं पढऩा चाहते, क्योंकि अब वे दिन चले गए हैं जब पर्दे के पीछे से नायिका की नजर धूप को तलाशते हुए बीत जाया करती थी। साथ ही जमींदारी की आंच में आम आदमी की गरीबी को सुलगते दिखाने वाले विषयों को भी पाठक नकार रहा है। वे अब खुले विचारों पर आधारित और 'मेट्रो लाइफÓ पर आधारित कहानियों को पढऩा चाहते हैं। इसका सीधा प्रमाण हम फिल्मों से देख सकते हैं। फिल्में समाज का आइना होती हैं। वही फिल्में सफलता के आयाम रचती हैं, जिनमें लोगों को अपनी कहानी नजर आती है। अब लोग वास्तविक कहानियों को देखना और पढऩा चाहते हैं। यही कारण है कि चेतन भगत की लिखी कहानियों में युवा खुद को जोड़ते हुए पढऩा पसंद करते हैं जबकि कई अन्य ज्वलंत विषयों की पुस्तकें बाजार में आती और जाती रहती हैं मगर पाठक उनकी चर्चा तक नहीं करते। साफ है कि विषयों के प्रति लेखकों को नवीनता लानी ही होगी। उन्हें पाठकों की पसंद को देखते हुए हिंदी की कहानियों को भी वही दिशा देनी होगी, जिसमें नायक और नायिका अपने घर और समाज के प्रति बिगुल बजाते हुए, कंधे से कंधा मिलाते हुए समाज से लड़ पड़ते हैं न कि मन की बात को मन में ही दबाये हुए जीवन काट देने का किरदार निभाते हैं। आज का समाज विषयों में क्रांतिकारी विचारधारा चाहता है। वह गरीबी और रिश्तों में उलझते हुए किरदारों को नहीं पढऩा चाहता। वह पढऩा चाहता है तो सिर्फ रिश्तों को डंके की चोट पर समाज में मनवाने वाले किरदारों की जीवनी। लेखकों को बदलते हुए समाज की नब्ज को समझते हुए अपने कलम को नया रुख देना होगा। उन्हें भाषा में ज्ञान का पुट करने की बजाय उन्हें आम बोलचाल की भाषा पर कहानी को मढऩा होगा। मैं यह नहीं कहता कि इससे पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग किताबों की ओर भागा चला आएगा। मगर इससे इतना तो तय है कि पाठकों का एक बहुत बड़ा वर्ग भविष्य पन्नों को उलटने-पलटने के लिए उमड़ पड़े, कि शुरुआत हो जाएगी।
अंत में केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल के दामों में किए गए 'खेल' यानी पहले 7.50 रुपये प्रति लीटर के भाव से महंगा करना और फिर दो रुपये प्रति लीटर का भाव घटाते हुए लोगों को लुभाने के प्रयास पर और उनकी आर्थिक दिक्कतों का मजाक उड़ाने के बारेे में एक शेर.....

एक टूटी दरख्त के बदन ढंकते पत्ते भी झाड़ ले गए,
हम जिंदगी के मारे थे वो जिंदगी उधार ले गए।
बदकिस्मत तो 'नीरज' थे जो उन्हें चोर भी न कह सके,
वो तो रेंगती हुई जिंदगी से छीनकर रफ्तार ले गए।

एक गुमनाम ईमानदार...

कुछ खास होकर भी वो आम रहा ईमानदारी की जिद में बदनाम रहा। उसे गैरों से कभी उम्‍मीद ही न की  वो तो अपनों में भी सिर्फ नाम रहा। ...