Sunday, July 2, 2017

लखनऊ से गहरा नाता है मुजरे का...

नरगिस।
 आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 

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उत्‍तर मध्‍य काल में लखनऊ का चौक अपनी गुलजार बाजारों के लिए ही नहीं बल्‍कि नाच-गाने और मुजरों के घरानों के लिए भी बहुत प्रसिद्ध रहा है। चौक ठंडी सड़क के आस-पास शाहगंज, बिल्‍लोचपुरा, कंघीवाली गली, चावलवाली गली, बजाजा, टकसाल, सराय, बांस, मेवे वाली सराय और हिरन बाग आदि इलाकों में तवायफें रहा करती थीं। अमीनाबाद की गन्‍नेवाली गली, भूसामंडी और नएगांव के आस-पास तवायफें रहती थीं। 
हालांकि, समय के साथ ही कला और नाज की अदायगी को अश्‍लीलता से देखा जाने लगा था। मगर हकीकत तो यही थी कि मुजरों में अभद्र व्‍यवहार के लिए कोई जगह नहीं थी। मुजरों की महफिल व तवायफों का कोठा तहजीब के घराने हुआ करते थे। वहां बड़े-बड़े नवाबजादे, ताल्‍लुकेदारों के बेटे व लाट साहब के लड़के शऊर व सलीका यानी तहजीब सीखने जाया करते थे। 
लखनऊ के नवाबी दौर में सुंदरी, उजागर, मुन्‍नी बेगम, मोती, सोना, पियाजू, महबूबन और हुसैनी डोमनी नाम की प्रसिद्ध तवायफें हुई हैं। चूने वाली हैदरी, हुसैन बांदी और कनीजजान के इमामबाड़े आज न होकर भी मशहूर हैं, इससे उनकी शोहरत का अंदाजा लगाया जा सकता है। लखनऊ की मशहूर तवायफ उमराव जान के दौर में ही लखनऊ के नवाबों के पांव उखड़े थे और अंग्रेजी हुकूमत अमल में आई थी। 
ब्रिटिश शासनकाल में भी कोठों का दौर कायम रहा। कहा जाता है कि गदर में हुई मौतों के चलते तवायफों की संख्‍या बहुत बढ़ गई थी। मशहूर अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दन बाई छोटी जद्दन कही जाती थीं। वह चौक के कोठे पर मेवेवाली सराय में रहती थीं। यहीं पंजाब से लखनऊ में डॉक्‍टरी की पढ़ाई करने आए मोहन बाबू से उन्‍हें इश्‍क हो गया। फिर दोनों ने इलाहाबाद में शादी कर ली। आगे चलकर उनकी बेटी नरगिस ने बॉलीवुड को एक नया मुकाम दिया था। साथ ही, जद्दन बाई ने ही बैठकर मुजरा सुनाने की प्रथा शुरू की थी जैसा कि हम सब फिल्‍मों में देखते हैं। उससे पहले तवायफें अपने सभी साजिंदों (तबला व ढोलक बजाने वालों) के साथ मंच पर खड़े होकर कार्यक्रम पेश किया करते थे। लखनऊ में बनाए जाने वाले मिट्टी के खिलौने व पुरानी तस्‍वीरों में आज भी साजिंदे खड़े देखे जा सकते हैं। 
रेहाना।
मशहूर एक्‍ट्रेस रेहाना भी राजधानी के चौक की देन हैं। कहा जाता है कि लखनऊ में कभी रेहाना ने अपने उस्‍ताद लड्डन मिर्जा के साथ तीस रुपये में अपने कान के बूंदे गिरवी रखकर मुंबई जाने का खर्च जुटाया था। फिर फिल्‍मों में सफल होने के बाद करीब दस साल बीतने पर उन्‍होंने अपने बूंदे छुड़ाए थे। 
मगर समय के साथ ही मुजरों की इस संस्‍कृति को बहुत बदनाम किया जाने लगा। वर्ष 1958 में मुजरों का ऐतिहासिक दौर सिमटने लगा। धीरे-धीरे ये कला भी गुम हो गई। 
मुजरे का दर्द समझने के लिए यह शेर ही काफी है.... 
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एक हंसी आईना यूं, आईने से कहता है 
तेरा जवाब तो मैं हूं, मेरा जवाब कोई नहीं। 
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ, लेखक: डॉ. योगेश प्रवीन )
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।। (तस्‍वीर मशहूर अदाकारा नरगिस और रेहाना की है।)

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