Friday, May 26, 2017

प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्रीजी ने उठाए थे ये बड़े क़दम

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी के बारे में कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन्हें कोई नहीं जानता। मसलन, वे मूलत: ब्राह्मण नहीं बल्कि श्रीवास्तव थे। आइए उनके बारे में कुछ ऐसे अन्य तथ्यों के बारे में भी जानें, जिसकी वजह से आज भी उन्हें महान कहा जाता है…

जय जवान, जय किसान के नारे का सच?

जब शास्त्रीजी वर्ष 1964 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे तब भारत में गरीबी बहुत थी। उस समय हमारे देश में दूसरे देशों से अनाज खरीदा जाता था। उस दौरान नॉर्थ अमेरिका से पीएल-480 योजना के तहत अनाज खरीदा जाता था। वहीं, जब उनके पदभार संभालने के एक वर्ष बाद यानी साल 1965 में देश को सूखे की मार भी झेलनी पड़ी थी। नौबत यह बन आई थी कि शास्त्रीजी को पूरे देश में लोगों से एक दिन के लिए उपवास रखने की अपील करनी पड़ी थी ताकि मजबूर लोगों के लिए एक दिन के भोजन का इंतजाम हो सके। वहीं, युद्ध के कारण देश को आर्थिक तंगी का तो सामना करना ही पड़ रहा था। ऐसे में उन्होंने नारा दिया था, “जय जवान, जय किसान”। इस नारे के बाद देश के किसानों ने जहां अन्नदाता होने का जिम्मा बखूबी निभाया वहीं, जवानों ने भी देश को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी को सकुशल अंजाम दिया।


शास्त्रीजी का अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन से हुआ था विवाद

यह मसला करीब वर्ष 1965 के अंत और उनके देहांत की तारीख 11 जनवरी, 1966 के मध्य का है। इस दौरान शास्त्रीजी ने एक अमेरिकी पत्रकार को दिए साक्षात्कार में कह दिया था, “अमेरिका द्वारा वियतनाम में किए जा रहा युद्ध कहीं से भी उचित नहीं है। यह अमेरिका के आक्रामक रवैया को दर्शाता है।” चूंकि, उस समय हमारे में देश में पर्याप्त अनाज नहीं उत्पाद किया जाता था। अमेरिका से ही हमें एक योजना के तहत खाद्य पदार्थ का आयात कराना पड़ता था। फिर भी उन्होंने अमेरिका के खिलाफ सच बोलने से परहेज नहीं किया। मगर उनके साक्षात्कार से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत में अनाज मुहैया कराना बंद कर दिया। उस समय देश को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा था। फिर, एक रणनीति के तहत संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका से अपील करनी पड़ी थी कि वह भारत में अपने खाद्य पदार्थों का निर्यात पूर्व की तरह जारी रखे। मगर शास्त्रीजी ने सच बोलने के लिए कभी भी खुद को गलत नहीं माना।

मूलत: वे शास्त्री नहीं थे

लाल बहादुर शास्त्रीजी का जन्म वाराणसी के रामनगर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। चूंकि, उन्हें जातिगत व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं था। इसीलिए उन्होंने अपने नाम से जाति का त्याग कर दिया था। मगर जब उन्होंने काशी विद्यापीठ से स्कॉलर यानी शास्त्री की पढ़ाई पूरी कर ली तब उन्हें इसकी उपाधि दे दी गई। हालांकि, बड़ी संख्या में आज भी लोग यही मानते हैं कि शास्त्रीजी मूलत: ब्राह्मण थे।


केंद्रीय मंत्री पद पर रहते हुए शास्त्रीजी ने रचे कई आयाम

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने कैबिनेट में शास्त्रीजी को भी शामिल किया हुआ था। उस दौरान उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए थे, जो आज भी अनुसरण किए जाते हैं। इन्हीं में से एक वाक्या यह है कि जब शास्त्रीजी ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर थे तब उन्होंने एक महिला को कंडक्टर के पद पर तैनात करते हुए पुरुषों के सामने महिलाओं का कद बढ़ाया था। यानी वे महिला उत्थान के लिए पहले से ही काफी प्रयासरत थे। यही नहीं, शास्त्रीजी ने यह विचार दिया था कि जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन उग्र हो जाए तो उस पर लाठीचार्ज से बेहतर है कि पानी का तेज बौछार किया जाए। वे सत्ता के खिलाफ किए जाने वाले संग्राम को कानून का उल्लंघन नहीं जनता का अधिकार मानते थे।


प्रधानमंत्री शास्त्रीजी का देश को संबोधित पहला भाषण

हर राष्ट्र के सामने एक समय ऐसा आता है जब वह ऐसी जगह खड़ा होता है जहां से उसे एक इतिहास का चौराहा नजर आता है। और उसे यह तय करना होता है कि अब वह कौन सी राह चुने। मगर हमारे पास कोई संशय या संकोच का स्थान नहीं है। हमें दाएं या बांए देखने की भी जरूरत नहीं है। हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट नजर आ रहा है। जिसपर सामाजिक प्रजातंत्र का एक घर बनता हुआ दिख रहा है। जहां सभी के लिए स्वतंत्रता और समृद्धि है। साथ ही, विश्वभर में सभी देशों के साथ शांति और मित्रता बनाने का अवसर दिख रहा है।
लाल बहादुर शास्त्री, प्रधानमंत्री, भारत

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