Friday, May 26, 2017

सुकून की चाह में हम तरसते रहे

सुकून की चाह में हम तरसते रहे
हम तरसते रहे और वो गरजते रहे

सुनहरी शाम में याद उनकी आ गई
देखते ही देखते रात हमें खा गई

आज किसी नाम पर खुद को मैं वार दूं
खुद को भुला के उसकी जिंदगी संवार दूं

मेरी नब्‍ज है थमी और ख्‍वाब में जगा हूं मैं
फिर भी मेरा दिल कहे कि जिंदगी उधार दूं

ए खुदा बता मुझे कि क्‍या खता है हो गई
कि देखते ही देखते फिर सुबह हो गई।




No comments:

पढ़ें एक बच्चे और बुज़ुर्ग की जिंदादिल ज़िंदगी का कड़वा सच

यह कहानी है एक बच्चे और बुजुर्ग की। दोनों की ज़िंदगी अलग है। दोनों एक-दूजे से अंजान हैं। हालांकि, दोनों हंसमुख हैं। मैंने उन्हें कभी उदास...