Tuesday, July 4, 2017

लखनऊ के चिकन का बड़ा रोचक है इतिहास

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 
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लखनऊ हमेशा से ही अपने इमामबाड़ों चिकन की कारीगरी के लिए जाना जाता है। इन दोनों के बीच का गहरा रिश्‍ता भी है। दरअसल, राजधानी के वजीरबाग के पास उजड़ा पड़ा 'मुगल साहिबा का इमामबाड़ा' अब उजाड़ नजर आता है। मगर यह इमामबाड़ा अस्‍तरकारी की कला का बेहतरीन नमूना है। इसे बेशुमार नर्मनाजुक गुलबूटों का एक संग्रहालय कहा जा सकता है। इस इमामबाड़े के दरवाजे और दीवार तो अब समय से लड़ते हुए व रखरखाव के अभाव में ढेर हो चुके हैं मगर इसके अवशेष को देखने पर ही इसमें की गई नक्‍काशीदार कारीगरी बरबस सोचने पर मजबूर कर देती है। आलम यह है कि चिकन के कारीगरों ने करीब 150 साल तक इसमें से डिजाइन को नकल कर चिकन के कपड़ों पर उकेरा है। आज भी इसकी टूटी-फूटी दरो-दीवार से चिकन की कारीगरी के लिए फूल व पत्‍तियों का डिजाइन नकल किया जाता है। 
फारसी का एक शब्‍द है चाकिन है। इसका अर्थ होता है बेलबूटे उभारना। यही शब्‍द भारत में चिकन का शब्‍द बन गया। साम्राज्ञी नूरजहां ईरानी नस्‍ल की वह शिया बेगम हैं जिन्‍होंने चिकन को अवध में नया आयाम दिलाया था। महल की दीवार व छतों पर की गई नक्‍काशी को कपड़ों पर उकेरने की कला इन्‍हीं की देखरेख में फला-फूला था। इस काम के लिए उन्‍होंने कुछ हुनरमंद औरतों को अपने हरम में तैनात कर रखा था। दिल्‍ली से लखनऊ आने पर उन्‍होंने राजधानी में चिकन के काम की नींव रखी थी। राजधानी का खदरा क्षेत्र चिकन शिल्‍प का जन्‍मस्‍थान माना जाता है। इसी क्षेत्र में शाहान-ए-अवध का रनिवास था जो हुस्‍नबाग कहलाता था या फिर 'दौलत सरा-ए-सुल्‍तानी' के नाम से जाना जाता था। मलिकाओं की इस जनानी कोठियों में उनकी कनीजों के हाथों चिकन कारीगरी का काम परवान चढ़ता रहा। नतीजतन, लखनऊ के डालीगंज के इसी 'मीठी खिचड़ी' नाम के इलाके की औरतों की इस कारीगरी का नमूना चिकन आर्ट लंदन के अलबर्ट म्‍यूजियम में रखा गया है। 
चिकन का काम अवध की औरतों का पसंदीदा काम रहा है। इस हुनर को महल की बेगमों ने अपनी खादिमाओं से सीखा था और फिर बहू-बेटियों को सिखाया। धीरे-धीरे महल का यह शौक गरीबों तक पहुंचने लगा। आलम यह हुआ कि एक समय के बाद मल्‍लिकाओं का यह शौक गरीब महिलाओं की आजीविका का साधन बन गया। राजधानी के मुफ्तीगंज, ठाकुरगंज, तोपखाना, टूड़ियागंज, हुसैनाबाद, चौपटियां, सआदतगंज, शीशमहल, रईस मंजिल, मौलवीगंज, रस्‍सीबटन, मदहेगंज और लाहौरगंज की पर्देदार औरतों ने इस कारीगरी को दुनियाभर में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। 
आजादी के बाद जनवरी, 1948 में महात्‍मा गांधी जी ने काखीतान वाले एक चिकन कारीगर को पुरस्‍कृत किया था। इसके बाद लखनऊ चिकन को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पुरस्‍कार दिए जाने लगे। वर्ष 1965 में लखनऊ के चिकन उस्‍ताद फैयाज खां अपने काम की बारीकी के लिए पहली बार राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सम्‍मानित किए गए थे. वहीं, साल 1979 में हसन मिर्जा साहब उर्फ पनके बाबू को यही सम्‍मान दिया गया। उनको 'अनोखी चिकन' का आविष्‍कारक माना जाता है। इस चिकनकारी में बारीक से बारीक कपड़े में भी बिना सुई पार किए कारीगरी की जाती है। यानी कपड़े के उलट में कारीगारी का कोई धागा या टांका नहीं दिखाई देता है। 
चिकनकारी में 36 तरह के टांकों का इस्‍तेमाल होता है जिनमें मुर्री, बखिया, उल्‍टी बखिया, जाली तेपची तथा धूमकटी, हथकटी, फंदा, चना-पत्‍ती, धनिया, लौंग, पत्‍ती, पंखड़ी, कील, बिजली और कंगन प्रमुख हैं। मगर इन दिनों चिकन का जो काम सस्‍ते दरों पर किया जाता है उसे बखिया कहते हैं। 
अवध के चिकन के प्रमुख खरीदार देशों में पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान, हॉलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्‍पेन, रूस, कनाडा, अमेरिका तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देश हैं। चिकन का ये सफर बड़ा लंबा है। कारीगर औरतों के बेबस हाथों में से होकर दलालों और व्‍यापारियों की मजबूत मुट्ठियों में से होता हुआ बाजारों में खरीददारों तक पहुंचा है। मगर दुख की बात यह है कि चिकन के ये कारीगर आज भी सरकारी उपेक्षाओं के चलते भुखमरी के शिकार हैं। 
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(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ, लेखक: डॉ. योगेश प्रवीन )
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।। (तस्‍वीर चिकन कारीगरी की।)

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