Saturday, July 8, 2017

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।    

आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। हर रोज, थोड़ा-थोड़ा... 
.
आज का पोस्‍ट अवध के अश्‍लील इतिहास को बयां करता है. मगर यह कहना उचित होगा कि यह इतिहास भले ही अश्‍लील हो मगर नवाबों का रंगीन मिजाज और उनकी कला के प्रति प्रेम को बयां करने के लिए काफी कारगर है. यह प्रथा थी 'हिचकारे' की. आलम यह था कि हिचकारों को जितना धन नवाब और राजा देते थे उतना तो वे अपनी कनीजों और वेश्‍याओं पर भी खर्च नहीं किया करते थे. 

दरअसल, फैजाबाद में नवाब शुजाउद्दौला के हरम में बेतादाद स्‍त्रियों के प्रवेश, तरुण रति कामना में तमाम लड़कों को ख्‍वाजासरा (जनान-खाने की रखवाली करने वाला) बना देना आदि प्रक्रियाएं इसी सफर की शुरुआत कही जा सकती है. अवध के प्रथम बादशाह गाजाउद्दीन हैदरन अपनी सनकी व्‍यवहार व अफीम की लत के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, उनकी बेगमों की भी अच्‍छी खासी संख्‍या थी. वहीं, उनके बेटे बादशाह नसीरुद्दीन हैदर अपनी औरत परस्‍ती व एय्याशियों के लिए मशहूर रहे थे. नई-नई लड़कियों को ब्‍याह कर लाना उनका शौक था. यहां तक की एक समय के बाद उन्‍होंने दुल्‍हन को विदाई के लिए जाना भी छोड़ दिया था. शादी के नाम पर उनकी तलवार ही गाजे-बाजे के साथ ससुराल भेज दी जाती थी. फिर दुल्‍हन की डोली सीधे उनके शयन कक्ष में भेज दी जाती थी. 

इस तरह के रसिक क्रिया-कलापों को सबसे अधिक प्रोत्‍साहन मिला 'जान-ए-आलम' के जमाने में. इस दौर को अवध के इतिहास में विलासिता की पराकाष्‍ठा के तौर पर जाना जाता था. नवाब वाजिद अली शाह की पुस्‍तक परीखाना में इस विलासिता के बारे में काफी गहराई से वर्णन किया गया है. मर्दानगी बरकरार रखने वाली दवाओं के सौदागर आज तक वाजिद अली शाही गोलियां और किमाम उनके नाम से बेच रहे हैं. 

इन दवाओं के अलावा यौन इच्‍छा को बढ़ाने के लिए लखनऊ में एक नई परम्‍परा की शुरुआत की गई थी. इसे हिचकारों का नुस्‍खा कहा जाता है. हिचकारे एक पद हुआ करता था. इस पर मालिश करने वाले लड़कों की तैनाती की जाती थी. उनके पास स्‍त्रियों की अत्‍यधिक सोहबत करने से थके हुए लोगों में भी जोश जगाने का हुनर होता था. 

राजपूत युग में जिस तरह रणभूमि में उतरने वाले राजा का उत्‍साहवर्धन चारण या भाट किया करते थे उसी तरह अवध के पतनशील युग में रति क्रिया के दौरान नवाबों में जोश जगाने के लिए हिचकारे प्रयुक्‍त किए जाते थे. वे सहवास कर रहे नवाब के पलंग के नीचे लेट जाया करते थे. फिर जब पलंग के ऊपर नवाब संभोग कर रहे होते थे तब ये हिचकारे अश्‍लील काव्‍य गाकर उनमें जोश पैदा करते थे. हालांकि, उस दौरान उन्‍हें पलंग के नीचे से बाहर आने की इजाजत नहीं होती थी. ये अपने काव्‍य की रचना से पुरुष की मर्दानगी का खूब बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया करते थे. वे काव्‍य के बीच में तरह-तरह से अश्‍लील आवाजें भी निकाला करते थे. नवाबी दौर के गुंचा, दिलबर, प्‍यारे, घमासान गुलगुले आदि उस दौर के चर्चित हिचकारे थे. 
इन्‍हीं में से एक संगम नामक एक हिचकारे के अश्‍लील काव्‍य उस समय सबसे ज्‍यादा चर्चा में आए थे. संगम अपने हुनर में बहुत माहिर था. यहां यह बताना जरूरी है कि हिचकारों का प्रवेश कभी घर के आंगन में या ब्‍याहता बीबियों के संदर्भ में नहीं होता था. हिचकारे बाजारू औरतों के आस-पास या फिर देह संसर्ग के अन्‍य ठिकानों पर ही अपना काम करते थे.
.
अंत में संगम के गाए अश्‍लील दोहे की एक झलक... 
.
तन गोरा मुख सांवरा, बसे सरोवर तीर 
पहिल लड़ाई उइ लड़ें, एक नाम दुई बीर।
और करे अपराध कोई, और कोई फल पाहिं 
नैन सैन करि झुकि रहे, उरज उमेंठे जाहिं।  
.
.
(पुस्‍तक साभार: आपका लखनऊ)
#लिखने_की_बीमारी_है।।।।।

No comments:

हिचकारा : लखनऊ का अश्‍लील और गौरवपूर्ण काव्‍य प्रेम

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।                                                          साभार: गूगल इमेज।     आइए जानें लखनऊ का विशाल इतिहास। ह...