Wednesday, July 5, 2017

क्‍या खत्‍म हो जाएगा अफ्सपा कानून का फरमान?


नीरज तिवारी 

विवादित अफ्सपा (AFSPA) कानून को केंद्र सरकार धीरे-धीरे समाप्‍त करने की योजना में है. इस कानून को लेकर कई बरसों से विभिन्‍न सामाजिक संगठन आवाज बुलंद करते रहे हैं. हालांकि, सेना ने इसे देश विरोधी ताकतों को काबू में रखने का अचूक 'हथियार' ही माना है. सबसे पहले ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए अफ्सपा को अध्यादेश के जरिए 1942 में पारित किया था.
दरअसल, गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, आर्म्‍ड फोर्सेस स्‍पेशल पावर एक्‍ट यानी अफ्सपा को असम व अरूणांचल प्रदेश से टुकड़ों-टुकड़ों में हटाने की कोशिश में है. इस संदर्भ से मंत्रालय ने भाजपा शासित राज्‍यों से उनकी राय मांगी है. हालांकि, जम्‍मू कश्‍मीर में इस कानून को हटाने की रणनीति पर चर्चा नहीं की गई है. इस बारे में मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि अब राज्‍यों की राय का इंतजार किया जा रहा है. इसके बाद ही कोई उचित कदम उठाया जाएगा. इस बारे में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू का कहना है कि अरूणांचल प्रदेश से इस कानून को हटाने के लिए केंद्र पूरी तरह से तैयार है. हालांकि, नगालैंड व म्‍यांमार में इस राहत को लाने की कोई योजना नहीं है. 
बता दें कि अफ्सपा कानून के तहत आर्मी व अन्‍य केंद्रीय बलों को इसका पूरा अधिकार हासिल होता है कि वह विवादित क्षेत्रों में किसी को भी कानून की खिलाफत करने पर गोली मार सकते हैं. बिना किसी सर्च वॉरेंट के घरों की तलाशी ली जा सकती है. शक के आधार पर ही किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है. यही कारण है कि विभिन्‍न सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों को यह कानून रास नहीं आता है. वहीं, सेना ने इसे एक काबिल कानून की संज्ञा दे रखी है. यहां यह भी जानना जरूरी है कि यह कानून नगालैंड, असम, मणिपुर (इम्‍फाल के सात विधानसभा क्षेत्रों को छोड़कर) में लागू है. वहीं, अरूणांचल प्रदेश के 16 थानाक्षेत्रों में प्रभावित है. उधर, असम के तिरप, लौंगडिंग और चैंगलैंग जिलों में इस कानून को लागू किया गया है. इससे इतर त्रिपुरा ले वर्ष 2015 में इस कानून को अपने यहां से हटा दिया था. साथ ही, मेघालय का सीमावर्ती क्षेत्र जो असम के बीस किलोमीटर के दायरे में आता है वहां इसे लागू किया गया है. 
भारत में संविधान की बहाली के बाद से ही पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रहे अलगाववाद, हिंसा और विदेशी आक्रमणों से प्रतिरक्षा के लिए मणिपुर और असम में वर्ष 1958 में अफ्सपा लागू किया गया था. वर्ष 1972 में कुछ संशोधनों के साथ इसे लगभग सारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में लागू कर दिया गया. अस्सी और नब्बे के दशकों में पंजाब और कश्मीर में भी राष्ट्रविरोधी तत्वों को नष्ट करने के लिए अफ्सपा के तहत सेना को विशेष अधिकार प्रदान किए गये. इस क़ानून के सेक्शन 3, 4, 6 और सेक्शन 7 पर विवाद रहा है. सेक्शन 3 के अंतर्गत केंद्र सरकार को ही किसी क्षेत्र को ‘डिस्टर्बड’ घोषित करने का अधिकार है. राज्य सरकारों की इसमें कोई ख़ास भूमिका नहीं होती. वहीं सेक्शन 4 आर्मी को बिना वारंट के हिरासत में लेने, किसी भी वाहन की जांच का अधिकार और उग्रवादियों के ठिकानों का पता लगाकर नष्ट करने का अधिकार देता है. सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम का सेक्शन 6 फ़ौज को संबंधित व्यक्ति की संपत्ति जब्त करने और गिरफ्तार करने का अधिकार देता है जबकि सेक्शन 7 के अनुसार इन मामलों में अभियोजन की अनुमति केवल केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृति के बाद ही होती है. 
साल 2005 में जीवन रेड्डी कमेटी और वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्टों में सेना और सुरक्षाबलों पर काफी गंभीर आरोप लगाए थे. इसी आधार पर अफ्सपा पर रोक लगाये जाने की मांग की गई थी, जिससे रक्षा मंत्रालय और सेना ने असहमति जताते हुए सिरे से नकार दिया. यह एक्ट सुरक्षा बलों को सशक्त करता है. इसी वजह से नगालैंड, पंजाब और कश्मीर में शांति बहाली में काफी सफलता मिली है. माना जाता है कि अधिकतर आरोप अलगाववादियों की साजिश के तहत लगाये जाते हैं और सिर्फ तीन फीसदी मामलों में ही सेना पर लगाए गए आरोप सही पाए गये हैं. जम्मू-कश्मीर के नेशनल कांफ्रेसं, पीडीपी और वाम दलों सहित देश के कई राजनीतिक दलों ने अफ्सपा एक्ट में संशोधन की मांग की है. हालांकि इस पर केंद्र सरकारों ने कभी सहमति नहीं जताई है. यही नहीं वर्ष 2000 में इम्फाल में कथित तौर पर असम राइफल्स के जवानों ने 10 लोगों पर गोली चला दी थी. इसके विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता इरोम चानू शर्मीला पिछले 16 सालों से आमरण अनशन कर रही थीं. हाल में हुये विधानसभा चुनाव में भी उन्‍होंने इस कानून के खिलाफ लड़ने का मन बनाते हुए चुनाव लड़ने का मन बनाया था. मगर जनता ने उन्‍हें अस्‍वीकार करते हुए इतने कम वोट दिए जिससे उनकी जमानत तक जब्‍त हो गई. इसके बाद बुद्धिजीवी वर्गों में इस बात को लेकर बहस ने जोर पकड़ लिया था कि जनता की भलाई के लिए इतने बरसों तक अनशन करने के बाद जनता ने इतनी बुरी तरह से क्‍यों नकार दिया.  
इस विवादित कानून को लेकर अब तक कई कमेटियों का गठन किया जा चुका है. इसके तहत जनवरी 2013 में गठित की गई सतोष हेगड़े कमीशन ने मणिपुर में हुए छह एनकाउंटर की जांच की थी. आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए सभी लोगों में एक भी ऐसा आदमी नहीं था जिसका कोई आपराधिक इतिहास रहा हो. आयोग ने अपनी सिफारिश में यह भी कहा था कि इस कानून को 'डिस्‍टर्ब' क्षेत्र में लागू करने के बाद हर छह माह पर जरूरत के मुताबिक संसोधित किया जाना चाहिए. वहीं, जस्‍टिस जीवन रेड्डी आयोग ने अफ्सपा कानून को घृणा और उत्‍पीड़न का सबसे बड़ा साधन करार दिया था. हालांकि, केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट पर कोई फैसला नहीं है. वहीं, अफ्सपा कानून के तहत किए गए एक एनकाउंटर की सुनवाई में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने अपने ऐतिहासि फैसले में कहा था, 'अफ्सपा कानून के तहत ऑर्म्‍ड फोर्सेस यदि किसी का एनकाउंटर करती है तो यह जांच का विषय होना चाहिए. इससे इस बात का कोई संबंध नहीं है कि गोली का शिकार एक आम आदमी है या आतंकी. कानून सभी के लिए समान है. लोकतंत्र को कायम रखने के लिए यह जरूरी है.'
यूं तो अफ्सपा कानून को लेकर तमाम तरह की समर्थन में या विरोध में दलीलें दी जा चुकी हैं. मगर किसी भी सेना से हाथ बांधकर आपराधिक तत्‍वों को शांत रखने की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है. ऐसे में अफ्सपा में कुछ संशोधन की बात तो जरूर की जा सकती है मगर इसे पूर्णतया हटा देना देश की आंतरिक सुरक्षा के नजरिये से उचित नहीं होगा. 

1 comment:

Dhiraj Tiwari said...

badhiya likhe ho yar great

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