Friday, March 28, 2014

कब आएगी तमीज????

जुबान ही है जो पान खिलाता है और जुबान ही है जो लात दिलाता है. यह बात मुझको तो बचपन में ही सिखा दी गई थी. उम्मीद करता हूं कि आपने भी सुनी होगी. मगर अजीब बात है कि देश को चलाने का अधिकार मांगने वाले नेताओं ने इस कहावत को सुना ही नहीं. तभी तो आए दिन कोई न कोई अपनी अमर्यादित भाषा से एक नए विवाद को जन्म दे देता है. अभी हाल ही में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वाराणसी से चुनावी ताल ठोंक रहे नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बार फिर अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया गया. इससे न सिर्फ वही नेता बल्कि कांग्रेस पार्टी भी पशोपेश में आ गई. मुझे यह समझ में नहीं आता कि इन लोगों को सद्बुद्धि कब आएगी?
दिग्विजय और पवार का जवाब नहीं
भाजपा पर उट-पटांग कमेंट करने वालों में दिग्विजय सिंह और शरद पवार दोनों का जवाब नहीं. दोनों ही कुछ न कुछ बक ही देते हैं. बस मुंह खोला और जहर उगल दिया. कितना आसान है इनके लिए नेशनल न्यूज में छा जाना. कुछ दिनों पहले तो शरद पवार ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए यहां तक कह दिया था कि ऊंगली पर से स्याही मिटाओ और बार-बार वोट करो. खैर, चुनाव आयोग का खौफ जैसे ही सताने लगा, महानुभाव ने फौरन ही अपने बयान से इतिश्री कर ली. कहा, मैंने उस अंदाज में नहीं कहा था. खैर, अपनी बातों को कहने के बाद पलट जाना तो इन नेताओं का पैदायशी अधिकार है. और अपने अधिकार का इस्तेमाल करना इनका हक है.
राज ठाकरे भी कम नहीं
अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने वालों की फेहरिस्त में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे का भी रिकॉर्ड कम आकर्षक नहीं है. यूपी और बिहार वालों को मुंबई से हटाने के लिए इन्होंने हद दर्जे की नीच शब्दों का इस्तेमाल किया. मगर मुंबई के पढ़े-लिखे वर्ग को शायद इनकी बात न्यायोचित नहीं लगी. तभी तो यूपी और बिहार के लोग वहां अपनी क्वालिटी के दम पर रहकर कमा-खा रहे हैं.
यह तो सिर्फ बानगी है...
गैरजिम्मेदाराना और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने वालों में भाजपा के कई नेताओं का भी नाम आता है. उनमें विनय कटियार सरीखे एक से बढ़कर एक दिग्गज नेता शामिल हैं. कुल मिलाकर इस लेख से मैं अपने पाठकों को सिर्फ यही बताना चाहता हूं कि वे ऐसी भाषाओं को जारी करने वाले नेता के भावों को देखें. न कि उनके कथनी को सुनकर जोश में आएं, क्योंकि वे सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए ऐसे अनर्गल बयानों की बारिश करते हैं. पढ़े-लिखे युवाओं को चाहिए कि वे ऐसी भाषाओं को सुनने के बाद अपना आपा न खोएं. वे सिर्फ अपनी सोच और समझ के आधार पर ही वोट करें. स्वयं एवं अपने हित-मित्रों को प्रेरित करें.
फोटो:: गूगल की देन है...

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