Tuesday, January 14, 2014

मुझे आज भी इंतजार है....

अजीब सा तथ्य है जीवन का। न कोई उम्मीद और न कोई रास्ता। जब आंख खुली तो दिखा सिर्फ एक अंधेरों से भरा रास्ता। साथ जो मिला वह था रिश्तों का वास्ता। ठीक है कुछ तो ऐसा है जो किसी भी कथ्य पर भारी है। ज्ञान की रोशनी में दिखने वाला कच्चा सच कभी भी हजम नहीं हुआ। मगर उन्हीं अधूरी इच्छाओं और कवायद को आधार बनाकर जीवन को जीने का माध्यम बनाया गया। हम बने भी। हम समय आने पर विरोधियों के खिलाफ तने भी। फिर भी मन में एक कसक तो बनी ही रह गई। जीवन कुछ ऐसा नजर आता है जिसमें आसमान को छूने की ख्वाहि
श लिए हुए उछाल तो बहुत मारी गई है, लेकिन बिना किसी छुअन की एहसास लिए हुए ही हरारत के दर्द को झेलने का एहसास हो रहा है। मैं कदमों को रोक कर, वर्तमान के पलों को यादों की बिसराई में झोंककर और हकीकत के सीने में अपनी मरीचिका सरीखी मंजिलों रूपी छूरे को भोंक कर सोचता हूं तो एक टीस सी सीने में उठ जाती है। सोचता हूं कि उम्रं के इस पड़ाव में क्या खोया और क्या पाया तो रेत के अंजुरी से सरक जाने का एहसास होने लगता है। लगता है कि जीवन में सिवाय खोने के मैंने तो कुछ पाया ही नहीं। अंत में मुझे नसीब क्या हुआ, रिश्तों की कड़वाहट और सफेदपोश चरित्र को जीने की चाहत। मगर सच्चाई क्या है, मैंने तो जीवन भर सिवाय खुद को लोगों को ठगने का अवसर देने के अलावा कुछ किया ही नहीं। मगर अब बहुत हो गया। अब मुझे इस घिनवाद से भरी और असंख्य सड़े अंडों की सड़ांध से भरी जिंदगी को हर हाल में बदलना है। मैं बदल दूंगा इन परिस्थितियों को। सफलता को पाने वाली एहसास की स्थिति को मुझे पाना ही है। यही मेरी जिद है। इस जिद को पूरा किए बिना मुझे चैन नहीं आने वाला। यही वह जद्दोजहद होगी जो मुझे संतुष्टि का स्वाद चखाएगी। इसके लिए मुझे तुम्हारा साथ चाहिए। कुछ ऐसा ही मैं उस दिन भी कहना चाहना था। मैं उस दिन भी एक बच्चे की तरह तुम्हारी गोद में सिर रखकर रोना चाहता था। लेकिन, तुम्हारे पास तो मेरे लिए कुछ था ही नहीं। तुम मुझसे नाराज थी। कुछ बोलना ही नहीं चाहती थी। तुम कभी न टूट पाने वाली नींद की आगोश में थी। मैं उस दिन भी तुम्हारे सिरहाने बैठा, जागने का एहसास कर रहा था और आज भी तुम्हारे जागने का इंतजार कर रहा हूं।  

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