Tuesday, September 23, 2014

मौलाना हसरत मोहानी ने इंकलाब जिंदाबाद का दिया नारा

इंकलाब जिंदाबाद का नारा देकर युवाओं को राह दिखाने वाले मौलाना हसरत मोहानी का जन्म उन्नाव के मोहान में हुआ था. क्रांतिकारी विचारधारा रखने वाले और उर्दू शायरी में एक मुकाम हासिल करने वाले मौलानाजी का 76 वर्ष की आयु में 13 मई 1951 को लखनऊ में निधन हो गया था. वर्ष 1921 में उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था. 

शिक्षा एवं करियर 
उनका असली नाम सैयद फैजुल हसन था. मगर उर्दू शायरी के लिए वे मौलाना हसरत मोहानी उपनाम का इस्तेमाल करते थे. आगे जाकर इसी नाम से उन्हें जाना जाने लगा. उनके पूर्वज इरान के निशापुर के रहने वाले थे. उन्होंने भगवान कृष्ण से सम्बंधित भी कई रचनाएं की थीं. वे मथुरा में कृष्ण जन्माष्टमी भी मनाया करते थे. वे बचपन से पढऩे में काफी कुशाग्र थे. उन्होंने अपने पहले स्टेट लेवल एग्जाम में टॉप किया था. आगे की पढ़ाई के लिए वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए थे. इसी बीच वे मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली के सम्पर्क में आए. उनकी शिक्षिका तस्लीम लखनवी और नसीम देहलवी का भी उन पर काफी प्रभाव पड़ा.

लेखनी में योगदान 
उनकी लिखी नज्म की पुस्तक कुल्लियत-ए-हसरत मोहानी को काफी सराहना मिली. उन्हीं की लिखी गजल चुपके-चुपके रात दिन को आज भी कई लोग पसंद करते हैं. गजल गायक गुलाम अली की आवाज ने इस गजल और भी ज्यादा शोहरत मिली. वर्ष 1982 में बनाई गई फिल्म निकाह में भी इनके जीवन को पर्दे पर दिखाया गया.

राजनीति में रहे सक्रिय
वर्ष 1921 में क्रातिकारी शहीद राम प्रसाद बिस्मिल अपने शाहजहांपुर के अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ अहमदाबाद में एक कांग्रेस की बैठक में गए थे. उनके साथ वरिष्ठ कांग्रेसी प्रेम कृष्ण खन्ना और क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खान भी मौजूद थे. बिस्मिल साहब ने इस दौरान मौलाना हसरत मोहानी के साथ मिलकर पूर्ण स्वराज को लेकर अपने विचार प्रकट किए. मगर महात्मा गांधी ने पूर्ण स्वराज हासिल करने के लिए युवाओं के उस तरीके को पसंद नहीं किया. यह बिस्मिलजी की कांग्रेस को एक लिबरल पार्टी के तौर पर पेश करने की एक सफल वजह बनी. इसके बाद से हसरत मोहानीजी भी स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे. वे पहले ऐसे मुस्लिम थे, जिन्होंने पूर्ण स्वराज (आाजदी-ए-कामिल) के लिए आवाज बुलंद करने के लिए जाने गए. वर्ष 1921 में वे ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रेसीडेंट चुने गए.

कम्युनिस्ट आंदोलनों में रहे सक्रिय
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में भी मौलानाजी का अहम योगदान था. ब्रिटिश सरकार का दुष्प्रचार करने के लिए उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था. खासकर ब्रिटिश पॉलीसिज के खिलाफ उन्होंने एक आर्टिकल लिखने पर उन्हें सजा दी गई.

जीवन के अंतिम क्षण
मौलाना हसरत मोहानी की मृत्यु 13 मई 1951 को लखनऊ में हुई थी. उसी साल मौलाना नुसरत मोहानी ने हसरत मोहानी मेमोरियल सोसाइटी की स्थापना की. करांची, सिंध और पाकिस्तान में हसरत मोहानी जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम पर कई पुस्तकालयों की स्थापना की गई. उनकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करांची में एक खराब सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया. मगर आज की तारीख में उस सड़क को फाइनेंशियल हब के तौर पर जाना जाता है.

रचनाएं
1. कुल्लियत-ए-हसरत मोहानी (हसरत मोहानीजी का काव्य संग्रह) 
2. शरह-ए-कलाम-ए-गालिब (मशहूर शायर गालिब की रचनाओं की व्याख्या)
3. नुकात-ए-सुखन (कविताओं के महत्वपूर्ण पहलुओं की व्याख्या)
4. मुसाहिदात-ए-जिंदान

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