Saturday, December 1, 2012

अखबार मुस्कुरा रहा था, लोकतंत्र घबड़ा रहा था


ठंड की सुगबुगाहट होते ही माहौल रूमानी सा हो जाता है। जाड़े के मौसम की सुबह अनायास ही खिड़की से बाहर झांकने को मजबूर कर देती है। हल्की ओस की बूंदों के पार देखने का मजा और हल्की सांस छोड़ते हुए मुंह और नाक से भाप निकलने का एहसास यकायक ही दिल को रोमांचित कर देता है। ऐसी ही एक सुबह दिल घर के बाहर चहलकदमी करने को मजबूर करने लगा। हमने भी अपने ट्रैक शूट का जोड़ा निकाला और किरमिच के जूतों को सलीके से बांधते हुए पास की मुख्य सड़क पर जाना तय कर लिया। मैं घर से अपनी जैकेट की जेबों में हाथ डाले हुए कान में एफएम की लीड को लगाए हुए तेज कदमों से दबे अंदाज में कुछ विचारते और कुछ गुनगुनाते हुए चल पड़ा। अजब इत्तिफाक था सड़क के पास पहुंचते ही देखा कि रात भर जिस बैंड और डीजे के शोर के चलते मैं सो नहीं पाया था उसका पुछल्ला अब भी नजर आ रहा था। बारात अभी जाने को तैयार हो रही थी। बाराती पास की चाय की दुकान पर मजमा लगाए हुए थे। जाहिर है, ऐसे माहौल में कभी राजनीति पर चर्चा होती है तो कभी नवदंपतियों के प्रणय पर मजाक। यहां भी ऐसा ही कुछ देखने और सुनने को मिला। मैं भी शांत मन से उनकी चुहल का हिस्सा बनने लगा। दरअसल, मैंने पूरी तरह से लखनवी तहजीब का इस्तेमाल करते हुए दुकान पर रखे अखबार पर हाथ मारते हुए अपनी जगह सुनिश्चित कर ली थी।
अखबारी आदमी की बीमारी होती है कि वह अखबार को सिरसिरे निगाह से देखते हुए। आस-पास के लोगों का खबरों पर मन जांचने लगता है। सब कुछ साधारण सा था। कुछ भी तो नहीं बदला था। हमेशा की तरह लोगों ने दो-दो, एक-एक पन्नों को मांगते हुए उस ताजे अखबार का चीरहरण भी कर दिया था। इसी बीच किसी की नजर अखबार की एक खबार पर गई। खबर थी 'केंद्र सरकार के खिलाफ देशव्यापी धरने की' सभी ने इस धरने के आयोजक की तारीफ में कसीदे काढऩा और सरकार के खिलाफ गुस्सा उगलना शुरू कर दिया। कोई उस अनाम आयोजक को शेर तो कोई मर्द की संज्ञा दे रहा था। वहीं, सरकार विरोधियों ने पौ फटते ही पूरी संसद को गाली देना शुरू कर दिया। मैं सभी की बातों को सुन रहा था। अपनी मर्जी को मैंने किसी के सामने नहीं रखा। वरन यह जरूर किया की जैसे ही कोई मुझसे मुखातिब होता मैं उसकी बातों में हामी भर देता। सभी ने चाय की चुस्कियों का आनंद लिया और जमकर अपनी भड़ांस निकाली। अखबार के पन्ने पहले लोगों के दोनों हाथों में थे। कुछ देर बाद अंगुलियों की संख्या कम होती गई और अंत में वह दुकान में लगी टुटही बेंच पर बेतरतीब तरीके से सजा दिए गए। चाय भी खत्म होने लगी। लोग अपने-अपने रास्ते को होने लगे। सभी ने चाय का दाम चुकाने के साथ ही दिनभर के कामों की चर्चा भी आपस में कर ली। देशव्यापी धरना अखबार के माध्यम से उनकी आंखों में झांक रहा था। सभी ने अखबार को पंगू सरीखा करते हुए अपने रास्ते होना ज्यादा उचित समझा और धरने का हिस्सा बनने की बात पर बस इतना कहा कि अमा इतना वक्त कहां है। हां, लेकिन अनाम आयोजक की तारीफ में कोई कमी नहीं थी। हो भी क्यों न, वह उनके देश की रक्षा जो कर रहा था। वह संसद में उनके हाथों चुने गए मौजूद भ्रष्टï नेताओं से। अखबार कभी खुद पर कभी देश के ऐसे होनहारों पर हंस रहा था। वह मुझ पर भी हंस रहा था कि तुम ऐसे ही लोगों को जगाने के लिए खबरनवीस बने थे। अखबार लोकतंत्र का आईना होता है। मगर वह हम सबको आईना दिखा रहा था। लोकतंत्र का आईना देश की दुर्गति पर मुस्कुरा रहा था। वह मुझको देशवासियों का दिल दिखा रहा था। अखबार एक देशभक्त की आस में अपनी बांहें फैला रहा था।

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