नोएडा में श्रमिकों का प्रदर्शन खत्म! क्या वाकई में सब शांति-शांति है...नेपाल की नई सरकार की भी हो रही चर्चा

नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन के समय एक ऑफिस में की गई तोड़फोड़। फोटो : सौरभ राय (विशेष साभार)

नोएडा में श्रमिकों का प्रदर्शन खत्म हो गया है। लखनऊ से आए वरिष्ठों के मशविरे पर जिला प्रशासन ने बीच का रास्ता निकाला। सबकी सैलरी बढ़ाने का फॉर्मूला बनाया गया। हर कंपनी के गेट पर पोस्टर चस्पा दिए गए। अब यही कहा जा रहा है कि चारों ओर शांति है लेकिन वाकई में सब शांति है? 

श्रमिकों से बात करो तो वे इसे हवा-हवाई वादा करार दे रहे हैं। दरअसल, आज ऑफिस से घर आते समय तीन लड़कियां मिलीं। तीनों के नाम लक्ष्मी, नेहा और सपना है। वे प्रदर्शन और पुलिस को लेकर नाराजगी जता रही थीं। उस बातचीत में मैं भी शरीक हो गया। वे तीनों सेक्टर 59 के स्पार्क मिंडा कंपनी में काम करती हैं। उन्होंने कहा कि पहली बात तो यह है कि भरोसा ही नहीं हो रहा है कि इतनी आसानी से सैलरी बढ़ जाएगी। 

मैंने उन्हें कहा कि सरकार और जिला प्रशासन का आदेश है...कंपनी को वेतन में बढ़ोतरी करनी ही होगी। इस पर उन्होंने सवाल किया कि भइया एक बात बताइए कि यह कौन तय करेगा कि हम अकुशल, अर्द्धकुशल और कुशल हैं। कंपनी वाले तो यदि यह मान लेंगे कि हम कुशल हैं तो सैलरी बढ़ेगी, यदि नहीं माने तो हम अर्द्धकुशल ही तो कहे जाएंगे। 

उनमें से एक लड़की ने कहा, 'भइया, जब पहली नौकरी मिलती है तो हम कम से कम एक साल तक अकुशल कहलाएंगे। फिर एक साल के बाद अर्द्धकुशल हो जाएंगे। यह तो हम जानते हैं कि हमने एक साल में कितना सीखा, लेकिन कंपनी के ऑफिसर इसे क्यों मानेंगे? फिर कुशल होने के लिए भी अधिकारियों की चापलूसी करनी होगी।' 

फिर तीनों एक साथ बोल पड़ीं, इसीलिए हम लोग बता रहे हैं कि इस आदेश का कुछ नहीं होगा। अब तो हम लोग अधिकारियों की मर्जी के मालिक ही कहे जाएंगे। न कोई कुशल माना जाएगा और न ही अच्छा वेतन मिलेगा।'

मैं अब सोच में पड़ गया था। तभी ऑटो में सवार एक और महिला कर्मी, जिनका नाम ममता है बोल पड़ीं। उन्होंने कहा कि सबसे अच्छा काम नेपाल में हुआ है। 

मैं चकरा गया कि इसमें नेपाल कहां से आ गया? मैंने जिज्ञासावश पूछा, कैसे और क्यों? 

उन्होंने कहा कि वहां के नए प्रधानमंत्री ने सबके बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़वाने का आदेश दिया है। प्राइवेट हॉस्पिटल को भी सरकारी की तरह काम करने का आदेश दे दिया गया है। अब जब बच्चों की पढ़ाई और बीमारी में इलाज का बोझ नहीं होगा तो सैलरी कम हो या ज्यादा इससे क्या फर्क पड़ता है? 

अंत में उन्होंने एक बात और कही, जिस पर ड्राइवर से लेकर ऑटो में सवार दूसरे लोगों ने भी हामी भरी कि क्या कंपनी वाले अपने कर्मचारियों के रहने के लिए एक बड़ी सी इमारत नहीं बनवा सकते? यदि ऐसा हो जाए तो देखिए लोग कितना मन लगाकर कंपनी के लिए काम करेंगे। सारी दिक्कत ही खत्म हो जाएगी। यहां का आदमी तो मकानमालिकों को किराया देने के लिए नौकरी कर रहा है। 

मेरा स्टॉपेज आ गया था। इस पूरे मसले पर बहुत कुछ नया जानने को मिला....मैं अब भी उनकी बातें सोच रहा हूं।

नोट : स्पार्क मिंडा कंपनी में काम करने वाली तीनों लड़कियों के नाम काल्पनिक हैं। फोटो के लिए वरिष्ठ फोटोजर्नलिस्ट सौरभ राय का विशेष आभार।

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