Tuesday, October 11, 2016

काश! इजहार कर देते...




नीरज तिवारी


वो हमसे चांद और सितारों की बात करते हैं
हम हकीकत में हैं उलझे, वो नजारों की बात करते हैं
वो खुद हथियार उठाते हैं.... हूंह...कुछ जम नहीं रहा। आज कुछ लिख क्‍यों नहीं पा रहा हूं। किसी भी शब्‍द का कोई तालमेल क्‍यों नहीं मिल रहा। सोचा था कि आज ही अपनी कोई नज्‍म लिख दूंगा लेकिन कुछ खालीपन सा महसूस हो रहा है। सब ठीक तो है ही। फिर ये शब्‍दों का सन्‍नाटा कैसा।कागज पर चंद लाइनें लिखने के बाद विजय कुछ बेचैन सा हो गया। वह अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। कमरे में यूं ही इधर-उधर चहलकदमी करने लगा। रह-रहकर उसके मन में तमाम खयाल आते। वो समझ ही नहीं पा रहा था कि आज उसके मन में किस खालीपन ने शब्‍दों की चोरी कर ली है।
इसबीच साप्‍ताहिक पत्रिका में नई नज्‍म भेजने का वादा भी करीब आ रहा था।
इधर विजय की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उधर, नंदा को भी कोई भी कुछ नहीं सूझ रहा था। नंदा एक सरकारी स्‍कूल में टीचर है। कभी उसे भी गाने लिखने और गुनगुनाने का शौक था। मगर आज वह सिर्फ अखबार और पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं की पाठक थी। वह हमेशा ही इस बात को लेकरएक कोफ्त में रहती थी कि जो वो करना चाहती थी उसे उसने नहीं किया। आज भी वह कुछ ऐसी ही उधेड़-बुन में लगी हुई थी। मन में शोर बढ़ता जा रहा था। वह बीते दिनों में खो रही थी। उसे भी कुछ न सूझा तो अपनी बालकनी में जा खड़ी हुई। उसके यहां काम करने वाली शबनम ने देखा किमालकिन बालकनी में टहल रही हैं तो वह झट से उनकी पसंद की ब्‍लैक टी ले आई। एक आहट के साथ ही शबनम ने नंदा से कहा, ‘मैडम जी, चाय लाई हूं।‘ नंदा भी शायद से यादों की खुमारी में खो चुकी थी। तभी तो शबनम को दो बार ‘मैडम जी, मैडम जी’ कहना पड़ा था। ऐसा लगा जैसे नंदा नींद सेजागी हो। उसने शबनम को थैंक्‍स कहकर चाय अपने हाथ में ले ली। दरअसल, शबनम जानती थी कि नंदा जब भी किसी सोच में घिर जाती थी तो उसे कुछ देर के बाद चाय की तलब लग जाया करती थी। मगर आज नंदा का मन कुछ ज्‍यादा ही भटक रहा था। उसने शबनम को घर जाने के लिए कहदिया। बोली, ‘तुम जाओ। मैं आज बाहर से ही कुछ मंगा लूंगी खाने के लिए।‘
शबनम के लिए ये एक नई चीज थी क्‍योंकि अमूमन नंदा जब भी परेशान होती थी तो शबनम को अपने ही पास रोक लिया करती थी। उससे रहा न गया तो पूछ बैठी, ‘क्‍या आज भी बाबूजी की याद आ रही है।‘ नंदा एकदम से कौंध गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके दुखती रग को जोर से दबा दिया है।वह सोच में पड़ गई। दरअसल, दो रोज पहले ही एक पुरानी पत्रिका में उसने विजय की लिखी एक गजल पढ़ी थी। उस गजल को पढ़कर नंदा पुरानी बातें सोचने लगी थी लेकिन स्‍कूल में बच्‍चों की परीक्षा की कॉपियां जांचने के चक्‍कर में उसे कुछ देर के बाद ही अपनी बीते कल को भूलकर आज मेंआना पड़ा था। लेकिन, रविवार का दिन उसका अपना दिन होता था। ऐसे में वह बीते पलों की परछाईं से आंख-मिचौली खेल रही थी। यादों के झूले में झूल रही थी। मगर शबनम ने जब विजय का ना लिया तो वह आज के उदास माहौल की हकीकत को जान गई। उसने हमेशा की तरह शबनम को टालदिया। लेकिन, अपने मन को संभाल न सकी। वह कॉलेज की उन यादों में खो गई। वह बालकनी में लगे सीसॉ पर बैठकर गुम सी हो गई। हाथ में रखी चाय की प्‍याली बिना खाली हुए ही ठंडी हो गई।
विजय और नंदा एक ही कॉलेज में बीए के स्‍टूडेंट थे। दोनों के विचार एक जैसे थे। दोनों को किस्‍से, कहानी, गाना, कविताओं और गजलों की दुनिया रास आती थी। उनकी पहली मुलाकात भी लाइब्ररी में हुई थी। एक ही किताब को, एक ही समय पर उन दोनों पढ़ने की भी ठानी थी। उस समय विजय नेनंदा से दोस्‍ती करने के लिए किताब छोड़ दी। मगर नंदा उससे प्‍यार कर बैठी। पसंद तो विजय भी करता था उसे मगर दोनों में से किसी ने भी पहला कदम उठाने की कोशिश नहीं की। ये सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा। दोनों के मन में ख्‍वाबों का महल बनता रहा। फिर भी किसी ने कुछ नहींकहा। बीए का पहला साल खत्‍म हो गया। छुट्टियों में दोनों को दूरियों का अहसास हुआ। दोनों ने ही भांप लिया कि अब उनका रिश्‍ता काफी अहम मोड़ पर आ चुका है। लेकिन, न तो इस बीच विजय ने नंदा को फोन किया और न ही नंदा ने विजय को। हालांकि, दोनों एक-दूसरे की दी हुई किताब कोपढ़ना नहीं भूले। बीए सेकेंड इयर के पहले दिन का भी दोनों ने बेसब्री से इंतजार किया। दोनों ने नई क्‍लास के पहले दिन एक-दूसरे के पसंदीदा रंगों वाले कपड़े भी पहने। लेकिन, उस दिन भी दोनों में से किसी ने अपनी दिल की बात को साझा नहीं किया। उस दिन भी दुआ-सलाम के बाद नई गजलों औरकिताबों पर चर्चा हुई और मन की बात मन में ही दबी रह गई। पहले दिन की ही तरह दूसरे साल का आखिरी दिन भी आ गया। रिश्‍ता यूं ही चलता रहा। छुट्टियों में बेचैनी बढ़ती ही गई। लेकिन, इस बार दोनों ने एक-दूसरे को फोन किया। अपनी रचनाओं के साथ ही दूसरों की लिखे गीतों और कविताओंके बोल सुनाए। इस बीच कभी अकेले तो कभी मिलकर गीत गुनगुनाए। चूंकि, दोनों ही अलग-अलग शहरों में रहते थे। ज्‍यादा आना-जाना भी नहीं करते थे। इसलिए कभी मिलने की योजना बनी ही नहीं। लेकिन, दोनों में मिलने की तड़प बनी रही। दोनों ही न जाने किस बात का इंतजार कर रहे थे।दोनों ही पहल करने से डर रहे थे। इस पहल न करने की कश्‍मकश में बीए थर्ड इयर का समय आ गया। ऐसा लगा जैसे एक साल पुराना पल फिर से लौट आया हो। फिर भी कोई बात नहीं हुई। बस, जो नया हुआ वो ये कि विजय ने नंदा को एक गुलाब देकर कुछ कहने की कोशिश की। तभी नंदा कीसहेलियों ने दोनों को घेर लिया और उनकी नज्‍में सुनने की जिद करने लगीं। दोनों ने अपनी नई रचनाएं सुनाकर एक-दूसरे के सामने अपने मन की तो कह दी लेकिन न तो किसी ने इजहार किया और न ही किसी ने इकरार।
इस साल दोनों की करीबी बढ़ी। मगर इकरार किसी ने नहीं किया। दोनों ही जानते थे कि इसके बाद उनके मुलाकात की गुंजाइश कम जाएगी क्‍योंकि विजय के पिताजी रिटायर होने वाले थे। उनकी यही जिद थी कि विजय अब उनके साथ रहे। घर को देखते हुए अपने करियर की बुनियाद मजबूत करे।उधर, नंदा के घरवाले भी यही चाहते थे कि नंदा जल्‍द से जल्‍द अपने घर की जिम्‍मेदारियों को समझते हुए किसी नौकरी को तलाशे क्‍योंकि नंदा के पिता की मौत कई सालों पहले एक एक्‍सीडेंट में हो चुकी थी। उसकी मां आरती अब बुढ़ी हो चली थीं। अब उनका बुटीक का काम भले ही ठीक चल रहाथा लेकिन उनकी यही चाह थी कि अब नंदा अपने पांव पर खड़ी हो जाए ताकि उसकी शादी के लिए दहेज की व्‍यवस्‍था न करनी पड़े। नंदा और विजय दोनों ही अपने परिवार की जरूरत और मजबूरी को समझते थे। काश, दोनों अपने मन की बात को भी किसी से कह पाते। खैर जो हो ही न सका होउसके लिए दोनों को खलन तो होनी ही थी।
बीए थर्ड इयर करने के दौरान विजय ने कुछ पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। उसकी नज्‍मों को पाठक भी मिलने लगे। वह अपने पाठकों के प्‍यार भी प्रतिक्रियाओं में खोने लगा। वह धीरे-धीरे नंदा से भी दूर होने लगा। नंदा को थर्ड इयर के दौरान विजय की कमी महसूस होती रही। लेकिन, वहविजय की जिंदगी में दखल दिए बिना ही दूर होती रही। वह उसकी नई रचना को तलाश-तलशकर पढ़ती। जब भी कोई उसके सामने विजय की तारीफ करता तो कान लगाकर हर बात सुनती रही। हालांकि, नंदा पर उसकी मां का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। साल खत्‍म होने को था और घर लौटने कासमय भी आ रहा था। उधर, विजय अपनी शब्‍दों की दुनिया में खोता जा रहा था। जब थर्ड इयर का आखिरी समय आया तो दोनों ने भरे मन से एक-दूसरे से विदाई ली। नंदा कुछ कहने की ख्‍वाहिश में विजय से कॉलेज की कैंटीन के बाहर चलने के लिए कहती है। मगर विजय से दूर होने वाले उसकेकॉलेज के साथी पाठकों ने नई नज्‍में सुनने की जिद करने लगे। विजय ने भी वही गलती की जो उसे नहीं करनी थी। उसने नंदा को बाद में बात कहने की वादा करते हुए नज्‍में पढ़ने लगा। नंदा से विजय का ये रवैया न देखा गया। वह नाराज होकर अपने कमरे पर लौट आई। विजय की यादों को वहींछोड़ वह कब बस स्‍टेशन पहुंची और कब ट्रेन में सवार होकर अपने घर पहुंच गई, कुछ खबर ही नहीं लगी।
नंदा के यूं चले जाने के बाद विजय को उसकी कमी खली। फिर भी उसने अगले रोज नंदा के घर का नंबर डायल कर दिया। वह नंदा से बात करना चाहता था लेकिन उसने अपनी मां से कहलवा दिया कि वह घर पर नहीं है। सहेलियों के साथ कहीं बाहर गई है। कुछ दिनों तक विजय की कोशिश जारी रहीलेकिन नंदा भी अपनी जिद पर अड़ी रही। वह यही सोचती कि बीते तीन सालों में विजय ने उससे प्‍यार का इजहार नहीं किया। लड़का होने के नाते उसे ही पहल करनी चाहिए थी लेकिन कोई पहल नहीं की। ऐसे में अब फोन पर दोस्‍ती निभाने का सिलसिला अब खत्‍म कर देना चाहिए। नंदा की यहसोच कब विजय से उसकी दूरी बनती गई वह समझ नहीं सकी। उधर, नंदा का फोन पर आने से इंकार कर देना विजय के अहम पर वार कर गया। वह भी नंदा से नाराज हो गया। उसने सोचा कि अपनी हर नई नज्‍म में वह उसे ही अपने दिल की बात सुनाया करता था। फिर भी नंदा न कभी भी उससेप्‍यार का इजहार नहीं किया। वह अपने मन की बात को कबसे नंदा से कह चुका था। लेकिन, नंदा ही तो हमेशा अंजान बनी रही। इसी के साथ तीन साल से अधूरे प्‍यार के इस सफर में हिचकोले आने लगे। दोनों ही एक-दूसरे के दिल से कोसों दूर जाने लगे।
समय गुजरता रहा। कारवां चलता रहा। विजय अब एक नामी शायर की तर्ज पर जाना जाने लगा। नंदा ने भी अच्‍छी पढ़ाई कर टीचर की नौकरी पा ली। लेकिन, दोनों ने एक-दूसरे को हासिल की हुई मंजिल की कभी बधाई नहीं दी। दोनों ही एक-दूजे को बीता पल मानने लगे। फिर भी दोनों ने शादी नहींकी। विजय अपने शब्‍दों के सफर में हर रोज नई बुलंदी छूने लगा और नंदा स्‍कूल के बच्‍चों के बीच अपना सारा गम भुलाकर रम गई। लेकिन, वह नज्‍मों को पढ़ने के लिए समय निकाल लिया करती थी। उसने उस पहली किताब को भी खरीदा था जिसकी जिल्‍द पर शायर का नाम विजय लिखा हुआथा। ये अलग बात है कि प्रस्‍तावना में शायर की तस्‍वीर को देखते ही उसने गुस्‍से से किताब को एक किनारे रख दिया था। कब वह किताब सिरहाने से हटकर आलमारी में रखी तमाम किताबों के बीच समा गई, नंदा को पता ही नहीं चला। विजय के मन में भी नंदा का खालीपन तो बना रहा लेकिनउसने भी दूरी को मिटाने के लिए नंदा से मिलने की कोशिश नहीं की। ऐसा लगता था कि दोनों ही एक-दूसरे की पहल का आज भी इंतजार कर रहे थे। वर्ना शादी न करने का फैसला दोनों ने क्‍यों न लिया।
दोनों के बीच कुछ नया नहीं हुआ। बस तारीखें बदलती रहीं। इधर नंदा की मां और उधर विजय के पिता ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। विजय के पिता के मरहूम होने की खबर तो नंदा को अखबारों से मिल गई लेकिन विजय को नंदा पर आई आफत के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। ऐसा समयभी आया जब दोनों एक-दूसरे को महीने दो महीने पर याद करने लगे। विजय की रचनाओं में उसे नंदा का जिक्र भी कम हो गया। उसके एकांकी जीवन का उदासपन उसकी गजलों में दिखने लगा। कहानियों में भी सन्‍नाटा सा छा गया। पाठकों ने विजय को और हाथोंहाथ लिया। सभी से दर्द का मसीहाकहते। सभी उसकी रचनाओं के इंतजार में रहने लगे। हालांक, नंदा अब विजय के दिली पाठकों में नहीं रह गई थी। उसे विजय के बारे में किसी से सुनना भी अच्‍छा नहीं लगता था। उसने ने उस रोज भी टीवी बंद कर दिया था जब विजय को एक न्‍यूज चैनल पर ‘बदलते साम्‍प्रदायिक माहौल मेंसाहित्‍य के योगदान’ विषय पर चर्चा के लिए बुलाया गया था। अब तो दोनों ही नहीं जानते थे कि उनके जीवन का रुखापन उनका ही पैदा किया हुआ था। ये अलग बात थी कि जब उन्‍हें कुछ समय मिलता खुद के बारे में सोचने के लिए तो वे दोनों एक-दूसरे के बारे में सोचते जरूर थे।
लैंडलाइन पर फोन का दौर गुजर चुका था। इंटरनेट की दुनिया में भी ऑरकुट बिछड़ चुका था। फेसबुक और व्‍हाट्सएप्‍प का दौर आ चुका था। दोनों की जिंदगी में जवानी का दौर जा चुका था। लेकिन, स्‍मार्टफोन रखना तो दोनों की मजबूरी थी। दोनों ही बदलते वक्‍त में भले ही अपने मन पर जमींअहम की पर्त को साफ न कर पाए हों लेकिन दुनिया से मिलकर चलने का दस्‍तूर तो उन्‍हें निभाना ही था। विजय की लिखी रचनाएं भी यूट्यूब और व्‍हाट्सएप्‍प पर शेयर की जाती थीं। गाहे-बगाहे नंदा भी ऐसे मैसेज या यूट्यूब के लिंक को टच कर लिया करती। लेकिन, आज भी दोनों ने एक-दूसरे कोफेसबुक पर फ्रेंड रिक्‍वेस्‍ट नहीं भेजी। अहम की दीवार अब इस कदर बरकरार रही। दोनों ही इस बात से अंजान रहे कि उनमें से किसी ने शादी की या नहीं। नंदा ने तो कभी जानने की कोशिश ही नहीं की और विजय ने इसे जरूरी नहीं समझा। हालांकि, नंदा कुछ लोगों के मुंह से यह सुन चुकी थी, ‘शायदही कोई शायर ऐसा होगा जो वफा में यकीन रखता होगा क्‍योंकि ये न तो रिश्‍तों को कोई तवज्‍जो देते हैं और न ही अपनी शब्‍दों की दुनिया से बाहर आने की कोशिश करते हैं।‘ यूं भी नंदा को अब विजय से कोई रिश्‍ता रखने की इच्‍छा नहीं थी। उधर, विजय भी नंदा को याद कर बस एक-दो नज्‍में बनालेता था क्‍योंकि अब तो उसकी रचनाओं में सिर्फ दर्द ही झलका करता था। पाठक उसी के आदी हो चुके थे। पाठक और श्रोता अब विजय से अब मोहब्‍बत की रूबाइयां पढ़ने और सुनने की ख्‍वाहिश ही नहीं रखते थे।
नंदा अब सिर्फ एक आदर्श टीचर और विजय सिर्फ दर्द भरी नज्‍मों के लिए जाने जाते थे। लेकिन, दोनों के जीवन का सूनापन हर कोई नहीं जानता था। जब भी उनसे कोई शादी के बारे में पूछता तो वे हस के टाल देते। कहते, ‘कोई काबिल मिला हीं नहीं।‘ ये अलग बात है कि वे कभी इस बात का वाजिबजवाब भी नहीं तलाश पाए कि आखिर उन्‍होंने शादी क्‍यों नहीं की।
धीरे-धीरे जिद के आगे जवानी दम तोड़ चुकी थी। दोनों ही बूढ़े हो चले थे। ऐसे में वह दौर भी आया जब उन्‍हें उनकी जिंदगी का अकेलापन बोझ सा लगने लगा। दोनों ही सामान से भरे घर में सन्‍नाटा का शोर सुनने लगे। दोनों ही एक-दूसरे की कमी को महसूस करने लगे। बुढ़ापा अपने साथ एक अंजाना सा डर भी लाता है असहाय होने का। इसीलिए लोग परिवार और बच्‍चों की ख्‍वाहिश करते हैं। बुढ़ापे में अकेलापन एक बीमारी का रूप ले लेता है। उन दोनों को भी परिवार की कमी खलने लगी थी। हो भी क्‍यों न, विजय को अब मंच पर गाने का अवसर कम मिलने लगा था क्‍योंकि आधुनिकताकी दौड़ में लोग शब्‍दों से दूरी से बढ़ाने लगे थे। इधर नंदा भी रिटायर होने की कगार पर थी। उसे अब अपने घर से डर लगता था कि रिटायरमेंट के बाद उसका समय कैसेट कटेगा। परिवार न बनाने की यह गलती उन दोनों पर उम्र के अंत पड़ाव पर भारी पड़ रहा था। दोनों ही एक-दूसरे को याद करकेअपने आज में लौट आते। मगर बीते पलों में खोने और आज में लौटने का यह सिलसिला कब आज में कम और बीते पलों में ज्‍यादा बीतने लगा, दोनों समझ ही नहीं पाए।
शबनम ने भी इस बात को भांप लिया था। वह जान चुकी थी कि विजय बाबू को नंदा मैडम आज भी भुला नहीं पाई हैं। इस तरह की शाम जब नंदा बालकनी में टहलने लगती थी शबनम के लिए पहले महीनों में कुछ घंटे फिर सप्‍ताह में और अब आए दिन देखने की बात हो चली थी। तभी शबनम नेनंदा से बिना झिझक के पूछ लिया था, ‘बाबूजी की याद आ रही है क्‍या।‘ भले ही नंदा ने उसे टाल दिया हो लेकिन इस सच को दोनों ही अच्‍छी तरह जानती थीं। विजय भी इस सच को जानता तो था पर मानने को तैयार नहीं था। वह आज भी नंदा से पहल की उम्‍मीद लगाए हुए था। शायद, नंदाभी....लेकिन इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता था कि शायद दोनों एक-दूसरे को परिवार वाला समझते थे।
शबनम जा चुकी थी। चाय की प्‍याली अब भी भरी थी। बीते दिनों में नंदा गुम थी और विजय भी सिगरेट का पैकेट खाली कर नज्‍में लिखने की तमाम कोशिशों में मात खा चुका था। दोनों ही सच को स्‍वीकार नहीं कर रहे थे। दोनों ही रह-रहकर कभी खुद से तो कभी एक-दूसरे से पूछना चाह रहे थे, ‘आखिर उन्‍होंने इजहार क्‍यों नहीं किया? काश उन्‍होंने ही अपनी ओर से पहल करते हुए पहले इजहार कर दिया होता।’
खैर, यादों का गुबार छंट रहा था और विजय अपनी डेस्‍क पर नज्‍म लिखने के लिए लौट आया...लोग चांद-सितारों की बात करते हैंहम तन्‍हा रहने वालों से जज्‍बातों की बात करते हैं
ये और है कि हमें किसी का साथ नहीं मिला
फिर भी हम जुगनू से रात रोशन करने की बात करते हैं
हूंह....बात अब भी नहीं बन रही। कुछ देर के बाद लिखने बैठुंगा। ये सोचकर विजय फिर घर से बाहर निकल आया। कुछ नई लाइनें सोचकर एक फिर कमरे में लौट आया। नज्‍म पूरी हुई और दिन का अंत हो गया। इस तरह बीते कई बरसों में गुजरे दिनों की तरह एक और दिन गुजर गया।

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