Monday, December 17, 2007

प्रभात हो चली है



भवरों ने कमलों को त्यागा
राका दूजे ध्रुव को भागा
अँधेरे ने प्राण को त्यागा
प्रभात हो चली है

... आज के लिए बस इतना ही, पूरी कविता पढ़नी हो तो कभी फुरसत से बैठेंगे
आपका अजीज
नीरज

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