​हनुमान अंश के दर्शन से दिन की शुरुआत...

ऐसा पहली बार देखा कि एक मिनट की देरी से पहुँचने वाले अफ़सोस करते दिखे और फ़िल्म की पूरी कास्टिंग देखने-पढ़ने के बाद दर्शक सीट से उठे. यह भी पहली बार देखा कि परिवार की तीन पीढ़ीयां कोई एक फ़िल्म देखने पहुंची थीं. बच्चे, युवा, अधेड़ और बुजुर्ग, सभी उम्र के दर्शन पर्दे पर नजरें जमाये रहे.


नीम करोरी बाबा के बारे में जब भी कुछ सर्च करो तो जो किस्से पढ़ने को मिलते हैं, उन्हें ही स्क्रीन पर दिखाया गया. फिल्माया गया. इस रचना को देखने का मजा ही अलग था. ऐसा पहली बार लगा कि तीन घंटे का मनोरंजन नहीं, किसी महापुरुष के दर्शन का अनुभव लेने गया था. 


पूरी फ़िल्म में कोई सीटी नहीं बजी. कोई शोर नहीं हुआ. कोई हलचल नहीं दिखी. सभी शांत भाव से स्क्रीन ताकते रहे. जहाँ तक देख सका, तो दिखा कि कई गाल पोंछ रहे थे. 


कहानी लेखन में कोई बाजीगरी नहीं दिखी. संवाद लेखन भी साधारण रहा. सिनेमाई दृश्य भी साधारण गांव-खेत-जंगल के थे, फिर भी मन में उतरते चले गये. लेखक-निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने रचनात्मकता को नया आयाम दिया है. 


फिर बाबा नीम करोरी को पर्दे पर जीने वाले अभिनेता शोभिनव सत्य ने अभिनय को जीने में कोई लबादा नहीं ओढ़ा. सहज भाव, सीधा संवाद और चेहरे पर मंद मुस्कान के साथ अभिनय को एक क्षितिज पर पहुँचाया है. 


संगीत और गीत भी कान के सम्पर्क में आते ही मन में रम गये. कोई बड़ा प्रयोग नहीं, फिर भी सदा के लिए संगीत जगत में रमते रहेंगे. इस फ़िल्म के धुन और बोल यूँ ही वायरल नहीं हो रहे हैं, इनके पीछे कड़ी मेहनत है जो रिंगटोन आदि में झंकार दे रहे हैं.


इस फ़िल्म ने एक और मिथक को चुनौती दी है कि हाई फाई कास्टिंग और तगड़े पीआर के दम पर कुछ भी परोसने से वह कमाई कर लेगी. इस फ़िल्म की जीत रही, इसकी सादगी. 


कहने वाले कह सकते हैं कि श्रद्धालुओं ने इसे आंकड़ों में जीत दिलाई है, लेकिन यह भी एक बड़ा सत्य है कि किसी की जेब से रुपया निकलवाना इतना भी आसान नहीं होता. झूठे प्रचार की पोल खुल जाती है, इसलिये यही कहना उचित है कि फ़िल्म को लोगों ने स्वयं स्वीकार किया है, कर रहे हैं और अभी और करेंगे.


आशा है कि इसका अगला पार्ट भी आएगा क्योंकि गांव की गलियों से निकलकर विश्व पटल पर स्थान पाने का वर्णन भी सभी जानना चाह रहे हैं. फ़िल्म खत्म होने पर जब रौशनी हुई तो कइयों के चेहरे भावुक दिखे. ऐसा लगा कि फ़िल्म यदि समय की बाध्यता के चलते खत्म न होती तो लोग उसे देखते ही रहते. 


यूँ तो मैं कोई भी फ़िल्म नहीं छोड़ता, लेकिन उस पर कुछ लिखता नहीं. हालांकि, इस रचनात्मकता को देखने के बाद लिखना तो बनता ही था. 


आप भी देख आएं, अच्छा लगेगा. यह तो मैं जानता हूं कि आप जायेंगे तो अपने परिवार के साथ ही...तो हो आइये...देर न कीजिये.

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