हर दिन अखबार पढ़ना क्यों जरूरी है? यह शायद आपको इस लंबे से लेख को पढ़ने के बाद समझ में आए...तो पढ़ना जारी रखिये...
दरअसल, आज जांजिबार के राष्ट्रपति हुसैन अली म्विन्यी के 17 से 20 जुलाई तक भारत की आधिकारिक यात्रा पर आने की खबर अखबार में पढ़ी। इस बीच दोनों देशों के बीच में होने वाले व्यापार को और मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा। संभव है कि इस दिशा में कुछ बड़े कदम भी उठाए जाएं।
सबसे पहले तो यह जानिए कि जांजिबार कहां है? दरअसल, जांजिबार पूर्वी अफ्रीका के तट के पास हिंद महासागर में स्थित एक द्वीपसमूह है। यह तंजानिया का एक अर्ध-स्वायत्त हिस्सा है। यह अपने खूबसूरत समुद्र तटों और 'स्टोन टाउन' के लिए जाना जाता है।
अब मन में जिज्ञासा जाग गई कि जांजिबार से भारत में किस तरह का व्यापार होता है?
थोड़ी रिसर्च से पता चला कि जांजिबार और भारत के बीच सदियों से व्यापारिक संबंध रहे हैं । तंजानिया का हिस्सा एवं आंशिक रूप से स्वायत्त राष्ट्र जांजिबार हमारे देश से चावल, चीनी, दवाएं और मोटर वाहन आयात कराता है। वहीं, जांजिबार से भारत में मुख्य रूप से लौंग व अन्य मसाले और कृषि उत्पाद मंगवाये जाते हैं। बता दें कि जांजिबार का लौंग विश्व में बहुत पसंद किया जाता है।
इसके बाद मन में फिर जिज्ञासा जागी कि भारत और जांजिबार के बीच यह व्यापारिक रिश्ता कितना पुराना है?
फिर थोड़ा सा गुगलिया गया। नतीजा मिला कि 9वीं शताब्दी से बहुत पहले से ही जांजिबार के व्यापारी अंतर्देशीय अफ्रीका और हिंद महासागर के व्यापारिक नेटवर्क के बीच महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। वे प्राचीन काल से भारतीय, फारसी और अरब व्यापारियों के साथ मिलकर व्यापार कर रहे थे। वे भारत, फारस और अरब व्यापारियों से सोना, हाथी दांत, एम्बरग्रीस और अन्य मूल्यवान पूर्वी अफ्रीकी वस्तुएं लेकर एशिया बेचते थे।
अब आप सोच रहे होंगे कि एम्बरग्रीस (Ambergris) क्या है? दरअसल, एम्बरग्रीस को 'तैरता हुआ सोना' भी कहा जाता है। यह स्पर्म व्हेल के पाचन तंत्र में बनने वाला एक ठोस मगर मोम जैसा पदार्थ होता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से महंगे और लग्जरी परफ्यूम बनाने में किया जाता है, क्योंकि यह खुशबू को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करता है।
खैर, अब फिर से दोनों देशों के बीच व्यावसायिक संबंधों के बारे में आगे जानते हैं। अब तक आप सबको यह तो स्पष्ट हो गया होगा कि भारतीय व्यापारियों का संबंध जांजिबार से अत्यंत प्राचीन है। जांजिबार के स्वाहिली (बोली का नाम यही है) व्यापारी हिंद महासागर के मानसून का उपयोग करते हुए सदियों से भारत आकर भारतीय कपड़े, मनके, चीनी मिट्टी के बर्तन तथा अन्य वस्तुएं अफ्रीकी बाजारों में बेचते थे। इसी प्रकार अफ्रीकी ग्रेट लेक क्षेत्र और जांबेजियन क्षेत्र के कारवां व्यापारी महासागर तट पर आकर इन भारतीय मालों का आदान-प्रदान करते थे।
यह भी जानना अहम है कि पुर्तगालियों के आने से पहले उंगुजा उकू, किजिमकाजी (दक्षिणी) और तुम्बातु (उत्तरी) प्रमुख व्यापार केंद्र थे। जांजिबार पूर्वी अफ्रीकी तट पर बिखरे हुए कई स्वायत्त शहर एवं राज्यों में से एक था। जहां भारतीय व्यापारिक समुदाय लंबे समय से स्थापित थे। स्वाहिली लोग इन प्राचीन व्यापारिक आदान-प्रदानों के मध्यस्थ और सुविधा प्रदाता बनकर जांजिबार और पूरे तटीय क्षेत्र को समृद्ध बनाते गए।
9वीं शताब्दी में भारत में मुख्य रूप से समुद्री और जमीनी मार्गों से अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक व्यापार होता था। इस दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया और अरब के साथ व्यापार बहुत फला-फूला।
अब जिज्ञासा ने और उत्कंठा पैदा कर दी। अब लगा कि यह भी समझा जाए कि 9वीं सदी में भारत कितना समृद्ध था?
अब किताबों को खंगालने का समय आ गया। अलामरी से झांकती किताबों के साथ इंटरनेट पर फ्री पीडीएफ वाली कई पुस्तकों में देखने के बाद उत्तर मिला कि 9वीं शताब्दी भारत का सूती कपड़ा, मलमल और रेशम दुनिया भर में बहुत प्रसिद्ध था। गुजरात और बंगाल इसके मुख्य केंद्र थे। वर्तमान के केरलम के मालाबार तट से काली मिर्च, इलायची और दालचीनी का अरब और चीन में भारी मात्रा में निर्यात होता था। इसके अलावा भारत से कीमती रत्न, मोती, हाथी दांत और नील आदि का भी बड़ी मात्रा में निर्यात विश्व में किया जाता था।
वहीं, भारत के राजा अपनी सेनाओं को मजबूत करने के लिए अरब, बहरीन और फारस से घोड़ों का आयात करते थे। भारतीय व्यापारी चीन और मध्य एशिया से सोना और चांदी मंगवाते थे। चीन से रेशम भी खरीदा जाता था। यह रेशम अरब देशों को फिर से निर्यात किया जाता था। चीनी मिट्टी के बर्तन भारतीय लोग काफी पसंद करते थे।
जाहिर सी बात है कि इतना बड़ा व्यापार करने के लिए मार्ग भी खास होता होगा, तो उसका जवाब है कि उस समय अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के रास् यानी समुद्री मार्ग से व्यापार होता था। तत्कालीन समय में चोल राजाओं की नौसेना बहुत शक्तिशाली थी। वे दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे मलेशिया और इंडोनेशिया) के साथ व्यापार करते थे। उस समय जिस रास्ते से व्यापार किया जाता था, उसे 'सिल्क रूट' यानी रेशम मार्ग कहा जाता था। इसी मार्ग से भारतीय व्यापारी मध्य एशिया और चीन तक अपना माल लेकर जाते और आते थे।
उस समय व्यापार में नियमों का कड़ाई से पालन करने के लिए एक व्यापार संघ बनाया गया था। उसका नाम था 'अय्यावोले'। वे बड़ी ही कड़ाई से समुद्री और जमीनी मार्गों पर व्यापार नियंत्रित करते थे। एक बात और, उस समय व्यापार में सोने व चांदी के सिक्कों का उपयोग बढ़ता जा रहा था। इसके अलावा, वस्तुओं के बदले वस्तुओं का लेन-देन भी होता था, जिसे पौराणिक समय से विनिमय ही कहा जाता था।
अब सवाल उठता है कि उस समय भारत में बंदरगाहों का क्या हाल था?
थोड़ा सा प्रयास करने पर उजागर हुआ कि 9वीं शताब्दी को पूर्व-मध्यकाल का दौर कहा जाता था। उस दौरान भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों पर कई महत्वपूर्ण बंदरगाह सक्रिय थे। इस काल में गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट, पाल और शुरुआती चोल राजवंशों का इन क्षेत्रों पर मजबूत नियंत्रण था। पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों से अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समुद्री व्यापार चरम पर था।
अब नया सवाल जागा कि 9वीं सदी में भारतीय बंदरगाह कैसे थे? कितने समृद्ध थे? कितने सुरक्षित थे?
...तो अब पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों के समृद्ध बंदरगाहों को समझते हैं...पश्चिमी तट के बंदरगाह मुख्य रूप से अब्बासी खिलाफत (अरब), फारस की खाड़ी और पूर्वी अफ्रीका के साथ व्यापार के लिए प्रसिद्ध थे। इनमें गुजरात का भरूच (भृगुकच्छ/बैरीगजा) बंदरगाह नर्मदा नदी के मुहाने पर स्थित उत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह था।
9वीं शताब्दी में इस पर नियंत्रण के लिए गुर्जर-प्रतिहार और राष्ट्रकूट राजाओं के बीच लगातार संघर्ष होते रहते थे। यहां से सूती वस्त्र और मसालों का भारी मात्रा में निर्यात होता था। गुजरात का ही संजान बंदरगाह 8वीं और 9वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों और पारसियों (जो फारस से आए थे) का एक प्रमुख सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र था। हालांकि, गुजरात का ही कैम्बे (खंभात) बंदरगाह गुप्त काल के बाद बड़ी तेजी से तरक्की करता गया। 9वीं शताब्दी तक इसने धीरे-धीरे भरूच के व्यापारिक प्रभुत्व को अपने नियंत्रण में ले लिया था।
वहीं, महाराष्ट्र का सोपारा (शूर्पारक) बंदरगाह वर्तमान में मुंबई के नाला सोपारा के पास स्थित था। यह बंदरगाह ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से लेकर 9वीं शताब्दी ईस्वी तक पश्चिमी तट का एक बेहद सक्रिय व्यापारिक केंद्र था। इसके अलावा केरल के दक्षिण-पश्चिम तट पर स्थित क्वीलोन (कोल्लम) का बंदरगाह चीन और बगदाद (मध्य पूर्व) को जोड़ने वाली समुद्री कड़ी था। चीनी और अरब जहाज यहां अपने माल की अदला-बदली करते थे।
वहीं, पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाह (बंगाल की खाड़ी मार्ग) पूर्वी तट के बंदरगाह श्रीलंका, म्यांमार, मलय प्रायद्वीप (मलेशिया/इंडोनेशिया) और चीन के साथ व्यापार के मुख्य द्वार थे। इनमें पश्चिम बंगाल का ताम्रलिप्ति (तामलुक) बंदरगाह पाल राजवंश के अधीन था। यह बंदरगाह 9वीं शताब्दी में भी पूर्वी भारत का सबसे बड़ा समुद्री केंद्र था। यहां से बौद्ध भिक्षु और व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया की यात्रा करते थे।
वहीं, तमिलनाडु में कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित पुहार (कावेरीपट्टनम/पूमपुहार) बंदरगाह चोल साम्राज्य का शुरुआती और बहुत प्रसिद्ध बंदरगाह था। चोल नौसेना इसी क्षेत्र से दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रही थीं। वहीं, तमिलनाडु का महाबलीपुरम (मामल्लापुरम) पल्लव और शुरुआती चोल काल में यह बंदरगाह कला के साथ-साथ सुदूर पूर्वी देशों में जहाजों को भेजने का एक प्रमुख निकास बिंदु था। तमिलनाडु का ही कौर्कई बंदरगाह पांड्य राजवंश का ऐतिहासिक बंदरगाह था, जो विशेष रूप से दुनिया भर में मोतियों की डाइविंग (Pearl Fishing) के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
इतना समझने के साथ यह भी जानना जरूरी है कि 9वीं शताब्दी के आस-पास किस वंश का भारत में शासन था?
...तो इसका जवाब है चोलवंश।
दरअसल, चोल राजवंश ने 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच भारत की सामुद्रिक यानी नौसैनिक शक्ति को बहुत समृद्ध किया था। 9वीं शताब्दी के अंत में चोल राजा आदित्य प्रथम और उनके उत्तराधिकारियों ने एक ऐसी शक्तिशाली नौसेना की नींव रखी थी, जिसने बंगाल की खाड़ी को 'चोल झील' में बदल दिया था।
चोलों ने सुदूर देशों तक व्यापार पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए उन्नत बंदरगाहों और नेचुरल हार्बर्स का विकास किया था। नागापट्टिनम चोल साम्राज्य का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य और वाणिज्यिक बंदरगाह था। यहां से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए सीधे जहाज रवाना होते थे। सुमात्रा (श्रीविजय) के राजा ने चोल राजा राजराज प्रथम की अनुमति से इसी बंदरगाह पर एक प्रसिद्ध बौद्ध विहार जिसे 'चूड़ामणि विहार' कहते थे, बनवाया था।
चोलों ने महाबलीपुरम (मामल्लापुरम) बंदरगाह को पल्लवों से अपने नियंत्रण में लिया और इसे एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया। उस समय कावेरीपट्टनम (पुहार) बंदरगाह कावेरी नदी के मुहाने पर स्थित था। यह बंदरगाह देश के अंदर और विदेशी व्यापार का मुख्य संगम स्थल था। वहीं, कडलोर और विझिंजम बंदरगाहों का उपयोग नौसैनिक युद्धपोतों को खड़ा करने और उनकी मरम्मत करने के लिए रणनीतिक सैन्य ठिकानों के रूप में किया जाता था।
अब बात करते हैं चोल राजवंश के प्रमुख समुद्री अभियान के बारे में...दरअसल, चोलों के समुद्री अभियानों का मुख्य उद्देश्य कोई क्षेत्रीय कब्जा करना नहीं, बल्कि समुद्री व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित करना और उन पर एकाधिकार जमाना था।
10वीं शताब्दी के अंत और 11वीं शताब्दी की शुरुआत में राजराज प्रथम ने अपनी नौसेना भेजकर मालदीव के द्वीपों और श्रीलंका के उत्तरी हिस्से पर विजय प्राप्त की थी। इसका उद्देश्य अरब सागर के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करना था। वहीं, इंडोनेशिया/मलेशिया के श्रीविजय पर ऐतिहासिक हमला करके 1025 ईस्वी में राजेंद्र चोल ने एक साहसी ऐतिहासिक समुद्री अभियान संपन्न किया था।
दरअसल, सुमात्रा के श्रीविजय साम्राज्य ने चीन जाने वाले भारतीय जहाजों पर कर लगा दिया था और रुकावटें पैदा की थीं। राजेंद्र चोल प्रथम ने बंगाल की खाड़ी पार कर एक विशाल नौसेना भेजी, श्रीविजय के राजा को बंदी बनाया और कड़ारम (केडाह) सहित कई बंदरगाहों को जीत लिया था। खैर...
जाहिर सी बात है कि चोल नौसेना काफी शक्तिशाली रही होगी। उसकी खूबी की बात की जाए तो यह बताना जरूरी हो जाता है कि चोल राजाओं के पास विभिन्न एवं विशाल आकारों के जहाज थे। उनके पास हल्के और तेज चलने वाले जहाजों से लेकर हाथियों और भारी हथियारों को ले जाने वाले विशाल 'धरणी' और 'लूला' नामक जहाज थे। वहीं, व्यापारी संघों के पास 'मणिग्रामम' और 'अंजुवन्नम' जैसे शक्तिशाली तमिल व्यापारी संघ थे। उनकी अपनी सेनाएं होती थीं, जो चोल नौसेना के साथ मिलकर काम करती थीं।
...तो यदि आप पढ़ते-पढ़ते यहां इस वाक्य तक पहुंच चुके होंगे तो आप यह भी समझ गए होंगे कि हर रोज अखबार पढ़ना और घरों में सबको पढ़वाना क्यों जरूरी है? आशा करता हूं कि आपमें भी जिज्ञासा यूं ही जागे। आप भी सूचना खोदने के लिए इंटरनेट का सही प्रयोग शुरू करें। जय हिंद!

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