कोई तभी तक ऊँचा रहता है, जब तक वह नीचे नहीं गिरता। इसीलिये अपनी ऊँची स्थिति पर अभिमान नहीं करना चाहिये क्योंकि कोई भी डाली एक समय के बाद आपके 'घमंड' का बोझ नहीं सह पाती। वह लचक कर टूट जाती है। आप धराशायी हो जाएंगे। आपका 'वहम' रूपी 'अहम' धरा का धरा रह जायेगा। ऐसा ही त्रेतायुग में रावण और द्वापर युग में कौरवों के साथ हुआ था।
सत्य तो यही है। अब मानो चाहे न मानो। खैर, कभी-कभी 'बाटी-चोखा' खाकर यह सोचता हूँ कि इसकी खोज किस पाक कला विशेषज्ञ ने की होगी? ऐसे ही न जाने कितने आविष्कारक समाज को बहुत कुछ देकर भी अज्ञात बनकर रह गये।
हाँ, एक बात और...बाटी भोज के बाद 'पानी-बताशे' की मित्र नीरज जी ने पार्टी दी। उनका भी नाम नीरज ही है। जहॉं मेरे फर्जी प्रश्न का उत्तर देते हुये पानी-बताशा ठेले के स्वामी ने बताया कि उनके पास तीन-चार साल पहले एक कर्नल का लड़का रोज आकर पानी-बताशा यानी यूपी के 'पानी के बताशे' / 'पड़ाके' यानी दिल्ली वाला 'गोलगप्पा' या 'फुचका' यानी पश्चिम बंगाल वाला 'पुचका' यानी महाराष्ट्र और दक्षिण भारत वाला 'पानीपुरी' यानी हरियाणा वाले 'पानी-पताशी' यानी मध्य प्रदेश वाले 'फुल्की' यानी असम के 'फुस्का/पुस्का' यानी गुजरात वाली 'पकौड़ी' यानी ओडिशा वाली 'गुप-चुप' यानी पंजाब वाले 'गोल-गप्पे' यानी बिहार वाले 'जलपुरी/फुचका' खाने के लिये आता था। चचा के अनुसार, वह कर्नल का लड़का रोज 80 रुपये के मटर भरे बताशे चबा जाता था। उसका सारा खट्टा-मीठा पानी पी जाता था। उसके बाद सड़क के उस पार जाकर दो से तीन प्लेट चाऊमीन ढकोसता था।
यकीन मानिये लोगों से कभी-कभी बेवजह की बात करने पर भी ज्ञान मिल जाता है। यह कुछ ऐसा ही ज्ञान है, जो कहीं काम नहीं आयेगा।
भगवान जाने लोग इतना कैसे भकोस लेते हैं। खैर, देश में फर्जी में भाषा को लेकर विवाद नहीं करना चाहिये। देखिये एक ही तरह के पानी बताशे को देश के कई राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है लेकिन सबका स्वाद बस एक ही है। हर बोली की अपनी अलग ही मिठास और रूबाब है। उसका आनन्द लेना चाहिये। एक-दूसरे को नीचा नहीं दिखाना चाहिये।
इसीलिये कह रहा हूँ कि व्यर्थ का घमंड तबाही के सिवाय कुछ और नहीं दे सकता।
वैसे आपको नहीं लगता कि उक्त कर्नल का लड़का चरसी ही रहा होगा?
#लिखने_की_बीमारी_है.....
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