मुझे हक़ था इज़हार होने का...

मुझे हक़ था इजहार होने का 

उसे गुरुर था इंकार होने का…

वक़्त की शह पर सभी प्यादे हैं 

ख्वाब सबका है तलबगार होने का…

चुप रहता हूँ कहीं रूठ न जाओ तुम

सजा मिली है घर में ही तड़ीपार होने का…

मेरी ख़ामोशी भी कह जाती हैं बहुत कुछ 

हमें भी हुनर पता है फनकार होने का…

नफरतों की बातें किसी नफरती से कर 

हमें शौक नहीं गुनहगार होने का…

किसी भी गली से निकलूं घर तेरा आता है 

क्या यही क़ायदा क़ानून है प्यार होने का… 

कहीं हस्ती ही मेरी सिमट न जाए यहां 

सभी शक कर रहे हैं मेरे अय्यार होने का…

साथ बिताये हर पल की कसम है तुझे

ख़्वाहिश पूरी कर दे दीदार होने का...

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